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हौं

Hauṃ

HOWM (rhymes with 'now')

साझा

शिव · Shiva

अर्थ

"'हौं' भगवान शिव की सर्वोच्च चेतना-शक्ति का बीज — कश्मीर शैव और नाथ परम्परा का उन्नत शैव-बीज"

'हौं' में शिव की वह परम-स्वतंत्रता (स्वातंत्र्य-शक्ति) है जो ब्रह्माण्ड को स्वयं से उत्पन्न करती है, धारण करती है और स्वयं में वापस ले लेती है

अक्षर

ह + औ + ं (अनुस्वार) + बिन्दु; 'ह' शिव-बीज और आकाश-तत्त्व; 'औ' शिव की महागर्जना; 'ं' नाद-विसर्ग

Ha (ह्)1

ह — शिव का मूल बीज-स्वर; आकाश-तत्त्व; परम चेतना का संकेत

Au (ौ)2

औ — शिव की विशाल, गूँजती गर्जना; ब्रह्माण्ड-व्यापी उपस्थिति

Anusvāra (ं)3

ं (बिन्दु) — नाद-बिन्दु; परम शून्य में विलय; तुरीय-अवस्था

पहला पाठीय संदर्भ: Sharada Tilaka Tantra; Mantra Mahodadhi; the Shiva Tantras of the Kashmir Shaiva and Shaiva Siddhanta lineages; Tantric appendices to the Sri Rudram
An advanced Shaiva beej. Distinct from the simpler Haṃ (which is the universal Hamsa-Soham principle). Hauṃ is the masculine counterpart in some traditions to the feminine beejas (Hrīṃ, Klīṃ, Aiṃ) and carries the principle of pure Shiva-consciousness.

उच्चारण कैसे करें

उच्चारण विधि

'हौं' — 'हौ' जैसे 'हौज' में, फिर अनुस्वार 'ं' — गहरी, गूँजती, शिव की गर्जना-सी ध्वनि

सामान्य गलती

'हों' या 'हूं' की तरह नहीं — 'औ' का स्वर विशिष्ट है; 'ं' को पूर्ण 'म' में नहीं बदलते; ध्वनि उदर से उठकर सिर में गूँजे

अवधि

3 सेकंड प्रति दोहराव

चक्र संबंध

सहस्रार / आज्ञा

Sahasrara (Crown) and Ajna (Third Eye)

सहस्रार (मस्तक-मुकुट) और आज्ञा — कश्मीर शैव का ढाँचा

कश्मीर शैव परम्परा चक्र-मानचित्रण से परे जाती है — शिव-चेतना सभी चक्रों में व्याप्त है। 'हौं' को 'परम-शिव' की दृष्टि से देखा जाता है, न कि एकल चक्र से।

में पाया गया

हौं शिवाय नमः — कश्मीर शैव का विशेष रूप

ॐ नमः शिवाय — सर्व-सुलभ पंचाक्षरी (सभी के लिए खुली)

हौं जूं सः — नाथ परम्परा का विशिष्ट संयोजन (दीक्षा-अपेक्षित)

'हौं' कश्मीर शैव, शैव सिद्धान्त, नाथ और अघोर परम्पराओं का उन्नत बीज है। सामान्य शिव-भक्ति के लिए 'ॐ नमः शिवाय' पूर्णतः पर्याप्त और सर्व-सुलभ है।

जप कैसे करें

सर्वोत्तम समय

  • गुरु-निर्देशानुसार — दीक्षित साधकों के लिए
  • महाशिवरात्रि — शिव-साधना का सर्वोच्च पर्व
  • सोमवार — शिव का पावन दिन
  • ब्रह्म मुहूर्त — गहन ध्यान का सर्वोत्तम समय

माला

Rudraksha (5-mukhi)

संख्या

१०८; रुद्राक्ष माला — केवल

आसन

गुरु-निर्देशित आसन; सामान्यतः पद्मासन या सिद्धासन

तैयारी

केवल दीक्षित साधकों के लिए गुरु-निर्देशित विधि से; स्नान, भस्म-धारण और रुद्राक्ष माला

Vaikhari

वाचिक

गुरु-निर्देशित विधि से उच्चारण — विशेष अनुष्ठानों में

Upamsu

उपांशु

उन्नत साधना की प्रमुख विधि — श्वास के साथ समन्वय

Manasika

मानसिक

उच्चतम स्तर — समाधि में शिव-चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव

१०८ जप में लगभग 5 मिनट लगते हैं

इस अक्षर के बारे में

श्मीर शैव दर्शन भारत की सबसे सूक्ष्म आध्यात्मिक परम्पराओं में से एक है। अभिनवगुप्त (१०वीं-११वीं शताब्दी) इस परम्परा के सर्वोच्च आचार्य थे। उनका ग्रंथ 'तन्त्रालोक' इस दर्शन का विश्वकोश है।

इस दर्शन में शिव = परम-चेतना (चित्) और शक्ति = उसकी स्वातंत्र्य-क्रिया। ब्रह्माण्ड शिव का 'स्वयं-प्रकटन' है — अनुग्रह से, भय से नहीं। और मुक्ति 'प्रत्यभिज्ञा' है — अपनी शिव-प्रकृति की पुनः-पहचान।

'हौं' इस पुनः-पहचान की प्रक्रिया का बीज है। यह उस साधक के लिए है जो इस दर्शन में दीक्षित है और अपने गुरु के मार्गदर्शन में साधना कर रहा है।

पारंपरिक उपयोग

कश्मीर शैव साधना में शिव-चेतना का प्रत्यभिज्ञान (पुनः-पहचान)

नाथ परम्परा में श्वास-साधना और प्राण-जागरण

अघोर-परम्परा में गहन ध्यान और समाधि

उन्नत शैव दीक्षा के बाद क्रमिक साधना में

आधुनिक भारत में

कश्मीर शैव दर्शन की शिक्षाएँ आज विश्व-भर में ध्यान, योग और अद्वैत-चिन्तन के माध्यम से फैल रही हैं। परंतु 'हौं' बीज का व्यावहारिक जप केवल दीक्षित साधकों के लिए है। सामान्य जिज्ञासु इस दर्शन को पुस्तकों और गुरु-सत्संग से समझ सकते हैं।
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दीक्षा आवश्यक

यह एक उन्नत शैव बीज है। इसके लिए कश्मीर शैव, शैव सिद्धान्त, नाथ या अघोर परम्परा में विधिवत दीक्षा आवश्यक है। बिना दीक्षा के इसका जप उचित नहीं। सामान्य शिव-भक्ति के लिए 'ॐ नमः शिवाय' मुक्त और शक्तिशाली विकल्प है।

प्रश्न

स्रोत

  • · Sharada Tilaka Tantra
  • · Mantra Mahodadhi
  • · Shiva Tantras (Kashmir Shaiva and Shaiva Siddhanta)
  • · Pratyabhijna texts, Abhinavagupta, Kshemaraja
  • · Sri Rudram (Krishna Yajurveda) for the Mahamrityunjaya tradition

कश्मीर शैव परम्परा चक्र-मानचित्रण से परे जाती है — शिव-चेतना सभी चक्रों में व्याप्त है। 'हौं' को 'परम-शिव' की दृष्टि से देखा जाता है, न कि एकल चक्र से।

किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।