ॐ
Oṃ
AUM
ब्रह्म · Brahman / Universal, not bound to any single personal deity
अर्थ
"'ॐ' सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूल नाद — अकार, उकार और मकार का समन्वय"
'ॐ' वह प्रणव-नाद है जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई, जिसमें स्थित है और जिसमें विलीन होगी — सच्चिदानन्द का एकाक्षर प्रतीक
अक्षर
अ + उ + म + अर्धमात्रा (तुरीय); अ = जागृत अवस्था, उ = स्वप्न अवस्था, म = सुषुप्ति, अर्धमात्रा = तुरीय (परम चेतना)
अ — जागृत अवस्था (वैश्वानर); सृष्टि का आरम्भ; ब्रह्मा की शक्ति
उ — स्वप्न अवस्था (तैजस); स्थिति; विष्णु की शक्ति
म — सुषुप्ति (प्राज्ञ); प्रलय; शिव की शक्ति
अर्धमात्रा (नाद-बिन्दु) — तुरीय अवस्था; शुद्ध चेतना; परम ब्रह्म का स्पर्श
oṃ ity etad akṣaram idaṃ sarvam (Om, this syllable is all this), Mandukya Upanishad, verse 1
उच्चारण कैसे करें
उच्चारण विधि
'ॐ' — 'अ' से शुरू (उदर से), 'उ' के साथ ऊपर उठता है (वक्षस्थल से), 'म' पर होठ मिलते हैं और नाद खोपड़ी में गूँजता है; फिर मौन की अर्धमात्रा
सामान्य गलती
केवल 'ओम्' की तरह नहीं — 'ॐ' में 'अ' और 'उ' दोनों ध्वनियाँ हैं जो स्वाभाविक रूप से एकाकार होती हैं; 'म' के बाद नाद को अचानक नहीं काटते — उसे स्वाभाविक विलय तक गूँजने देते हैं
अवधि
6 सेकंड प्रति दोहराव
चक्र संबंध
सहस्रार
↗Sahasrara (Crown chakra)
सभी चक्रों को स्पर्श करता है — मूलाधार से सहस्रार तक
ॐ का उच्चारण शरीर के सभी स्तरों पर कम्पन उत्पन्न करता है — 'अ' निचले चक्रों में, 'उ' मध्य चक्रों में और 'म' ऊपरी चक्रों में अनुभव होता है। यह किसी एक चक्र तक सीमित नहीं।
में पाया गया
ॐ नमः शिवाय — शैव पंचाक्षरी
ॐ नमो नारायणाय — वैष्णव अष्टाक्षरी
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः — सरस्वती मंत्र
ॐ तत् सत् — वेदान्त की परम घोषणा
हर हिंदू मंत्र का आरम्भ 'ॐ' से होता है। मण्डूक्य उपनिषद ॐ पर पूरी तरह समर्पित है और यह बताता है कि 'ॐ' सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है — 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म'।
जप कैसे करें
सर्वोत्तम समय
- ब्रह्म मुहूर्त — सूर्योदय से पूर्व का परम शांत समय
- सूर्यास्त — सन्ध्या-काल में ॐ जप विशेष फलदायी
- योगाभ्यास से पहले और बाद में
- किसी भी समय — ॐ 'अकाल-सुलभ' है; कोई प्रतिबंध नहीं
माला
Any mala — Om is universal
संख्या
१०८; रुद्राक्ष, स्फटिक या तुलसी — कोई भी माला
आसन
पद्मासन या सुखासन — रीढ़ सीधी रखें ताकि नाद का प्रवाह निर्बाध हो
तैयारी
कोई विशेष तैयारी आवश्यक नहीं। शांत स्थान, शांत मन और स्वच्छ शरीर पर्याप्त है।
Vaikhari
वाचिक
दीर्घ, गूँजते उच्चारण के साथ — योग-कक्षाओं, ध्यान-समूहों और मंदिर-पूजा में
Upamsu
उपांशु
मृदु, होठों की हलचल के साथ — व्यक्तिगत ध्यान और मंत्र-जप में
Manasika
मानसिक
पूर्णतः मन में — उच्चतम स्तर का ध्यान; अजपा-जप का आधार
इस अक्षर के बारे में
मण्डूक्य उपनिषद की प्रथम पंक्ति है: 'ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्' — यह अक्षर ॐ यही समस्त जगत है। उपनिषद आगे बताता है कि ॐ के चार मात्राएँ हैं — अ, उ, म और अर्धमात्रा — जो चार अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) के अनुरूप हैं।
पातंजल योग दर्शन में ईश्वर का वाचक 'प्रणव' ॐ है। योग-सूत्र में कहा गया है: 'तस्य वाचकः प्रणवः' — 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' — उसका जप करो और उसके अर्थ का चिन्तन करो।
नाद-योग की परम्परा में ॐ का उच्चारण शरीर में विशेष कम्पन उत्पन्न करता है। 'अ' उदर में, 'उ' वक्ष में और 'म' मस्तक में अनुनाद करता है — यह तीनों मिलकर शरीर-मन के सभी स्तरों को एकसाथ स्पर्श करते हैं।
पारंपरिक उपयोग
किसी भी मंत्र, पूजा या ध्यान का आरम्भ ॐ से करना
योगाभ्यास में प्राणायाम के साथ ॐ का उच्चारण
ध्यान में मन को केन्द्रित करने के लिए
आध्यात्मिक जागृति और परम चेतना का द्वार खोलने के लिए
आधुनिक भारत में
आधुनिक विज्ञान ने भी ॐ के उच्चारण के लाभों पर शोध किया है — वेगस-तंत्रिका की उत्तेजना, मस्तिष्क-तरंगों में परिवर्तन और तनाव-हार्मोन में कमी। परंतु परम्परा के लिए ॐ केवल शारीरिक लाभ का साधन नहीं — यह उस अनंत चेतना का स्मरण है जो हम सभी के भीतर निवास करती है।
खुली साधना
ॐ सर्व-सुलभ है — किसी भी परम्परा, जाति या देश का व्यक्ति इसे जप सकता है। कोई दीक्षा, शर्त या प्रतिबंध नहीं।
प्रश्न
स्रोत
- · Mandukya Upanishad (12 verses, the principal exposition)
- · Chandogya Upanishad 1.1 (Om as the udgītha)
- · Taittiriya Upanishad
- · Bhagavad Gita 17.23 (om tat sat, the threefold designation of Brahman)
- · Patanjali Yoga Sutras 1.27 (tasya vācakaḥ praṇavaḥ, His designation is the Pranava)
ॐ का उच्चारण शरीर के सभी स्तरों पर कम्पन उत्पन्न करता है — 'अ' निचले चक्रों में, 'उ' मध्य चक्रों में और 'म' ऊपरी चक्रों में अनुभव होता है। यह किसी एक चक्र तक सीमित नहीं।
किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।