गायत्री मंत्र
Gāyatrī Mantra
Gayatri Mantra
सवितृ · Savitr is invoked as the divine power behind the visible sun, the source of illumination of both world and mind
अर्थ
"Om. Across the earth, the atmosphere, and the heavens, we meditate upon that supremely adorable effulgence of the divine Savitr, may it illumine our minds and impel them to right understanding."
ॐ। भू, भुवः और स्वः, तीनों लोकों में व्याप्त, उस सविता देव की वरण योग्य दिव्य ज्योति का हम ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, सत्य की ओर प्रेरित करे।
शब्द दर शब्द
ब्रह्म का आदि नाद
The primordial sound, Brahman
भू-लोक, भौतिक जगत
The earth realm, the physical world we inhabit
भुवर्-लोक, प्राण का जगत
The atmospheric realm, the mid-world of breath and vitality
स्वर्-लोक, ज्योतिर्मय लोक
The luminous realm, the heavenly world of light
वह, परम सत्य की ओर संकेत
That, pointing to the supreme reality beyond all naming
सविता का, आन्तरिक प्रेरक, सूर्य के पीछे का दिव्य
Of Savitr, the divine impeller, the inner sun behind the visible sun
सबसे श्रेष्ठ, वरण योग्य
Most worthy of being chosen, supremely adorable
तेज, दिव्य प्रकाश जो सब अशुद्धि नष्ट करता है
Effulgence, the divine radiance that destroys all impurity
देव का, परमात्मा का
Of the divine, of God
हम ध्यान करते हैं
We meditate upon, we hold in steady contemplation
हमारी बुद्धियाँ, हमारी विवेक शक्ति
Our intellects, our inner faculties of understanding
जो
Who, that one who
हमारी
Of us, ours
प्रेरित करे, प्रकाशित करे
May inspire, may impel, may illumine into right action
त्रि सन्ध्या
गायत्री का जप परम्परा से दिन की तीन सन्धियों पर किया जाता है, प्रातः, माध्याह्निक और सायं। तीनों समय सूर्य को सविता का प्रत्यक्ष रूप मानकर पूर्व, ऊर्ध्व और पश्चिम की ओर मुख करके जप होता है। यही पूर्ण विधि सन्ध्या वन्दनम् कहलाती है।
जप कैसे करें
सर्वोत्तम समय
- प्रातः सन्ध्या — सूर्योदय, पूर्व की ओर मुख करके
- माध्याह्निक सन्ध्या — मध्याह्न, ऊर्ध्व दिशा में
- सायं सन्ध्या — सूर्यास्त, पश्चिम की ओर मुख करके
- ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) — एकल जप के लिए
माला
Sphatika (crystal) · Red sandalwood (lal chandan)
संख्या
सन्ध्या वन्दनम् में न्यूनतम १०८; दैनिक एकल जप के लिए १०८। वेदोक्त नियमित अभ्यास में तीनों सन्धियों पर जप।
आसन
प्रातः पूर्व, मध्याह्न ऊर्ध्व, सायं पश्चिम की ओर मुख करके सुखासन में रीढ़ सीधी रखें
तैयारी
स्नान करें, शुद्ध वस्त्र धारण करें, यदि सम्भव हो तो सूर्य को अर्ध्य दें, तीन गहरी साँसें लें और ध्यानपूर्वक आरम्भ करें
Vaikhari
वाचिक
उच्च स्वर में जप — सन्ध्या वन्दनम् में पारम्परिक रूप से उच्चरित; सामूहिक जप में प्रभावी
Upamsu
उपांशु
फुसफुसाकर जप — व्यक्तिगत दैनिक अभ्यास के लिए
Manasika
मानसिक
मानसिक ध्यान — उच्चतम स्तर; अन्तर्ज्योति में प्रवेश
108× जप ऑडियो
पूर्ण-लंबाई ऑडियो — जल्द ही ऐप और वेब पर।
इस मंत्र के बारे में
वेदों की माता — यह केवल एक उपाधि नहीं है। चौबीस अक्षर, तीन पंक्तियाँ, और उनमें वह प्रार्थना समाहित है जो ऋग्वेद के ऋषि विश्वामित्र ने ३.६२.१० में रची थी — साढ़े तीन हजार वर्ष पहले — और जो आज भी भारत के हर कोने में उगते सूर्य के सामने जपी जाती है।
मन्त्र की प्रार्थना अत्यन्त सरल किन्तु गहरी है। हम सविता देव के उस वरण-योग्य तेज का ध्यान करते हैं — 'वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।' यहाँ बाहरी फल नहीं माँगा जा रहा, कोई धन या यश नहीं। माँगा जा रहा है कि देखने की शक्ति शुद्ध हो — कि जो बुद्धि से जानते हैं वह सत्य हो, कि जो निर्णय करते हैं वह सही हो।
सविता — दृश्य सूर्य के पीछे की दिव्य शक्ति — वेदों में उस शक्ति का नाम है जो दिन को प्रकट करती है, जो कर्म को प्रेरित करती है, जो समस्त जीवन को गतिशील रखती है। गायत्री का जप तीनों सन्धियों पर करना — सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त — प्राकृतिक चक्र के साथ अनुसन्धान है। दिन के तीन प्रमुख मोड़ों पर आन्तरिक ज्योति को उसी प्रकाश-स्रोत से जोड़ने का अभ्यास जो आकाश में दिखता है।
सन्ध्या वन्दनम् वह पूर्ण विधि है जिसके भीतर यह मन्त्र पारम्परिक रूप से बैठता है — स्नान, अर्ध्य, प्राणायाम, जप, और तीनों सन्धि-काल में ध्यान। जो सन्ध्या वन्दनम् नहीं सीख सके, उनके लिए सरल व्यक्तिगत जप — प्रातः एक सौ आठ बार — वह सम्बन्ध बनाए रखता है जो प्राचीन भारत ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँजोया है। यह किसी जाति या सम्प्रदाय से बँधी प्रार्थना नहीं — यह उस दिव्य प्रकाश से सीधी बात है जो सब में समान रूप से चमकता है।
मूल
- स्रोत
- Rig Veda 3.62.10, Mandala 3, Sukta 62, Mantra 10
- परंपरा
- Universal Vedic mantra, accepted across every Hindu sampradāya
- प्राचीनता
- ~3,500 वर्ष
- में भी संदर्भित
- · Yajurveda, repeated as a central mantra of the Sandhyā Vandanam
- · Samaveda, included in chanted form
- · Atharvaveda 19.71.1
- · Devi Bhagavata Purana, extensive Gayatri praise
- · Bhagavad Gita 10.35, Krishna says 'gāyatrī chandasām ahaṃ' (of meters, I am the Gayatri)
पारंपरिक लाभ
- बौद्धिक प्रकाश — सवितृ की दिव्य ज्योति द्वारा बुद्धि का प्रकाशन
- आन्तरिक शुद्धि — मन और बुद्धि के विकारों का निवारण
- तीन लोकों के साथ साधक का अनुसन्धान
- सत्य को पहचानने और उसके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा
- ध्यान की क्षमता और एकाग्रता का विकास
- दिन के प्राकृतिक चक्र के साथ आन्तरिक ताल का मेल
वैदिक ग्रन्थों में वर्णित पारम्परिक आध्यात्मिक लाभ। यह बुद्धि-प्रकाशन की साधना है, भौतिक वरदानों की याचना नहीं।
रोजमर्रा के भारत में यह मंत्र
प्रत्येक उगते सूर्य के साथ, पूरे भारत में — चाहे किसी पण्डित की बालकनी हो या किसी कार्यालय-कर्मचारी का मोबाइल फोन — गायत्री उच्चरित होती है। बच्चे इसे विद्यालय की सुबह की आरती में सीखते हैं। माताएँ इसे गर्भस्थ शिशु के लिए गाती हैं। विश्वविद्यालय के समापन समारोह इससे समाप्त होते हैं। दक्षिण भारत में सन्ध्या वन्दनम् का अभ्यास तमिलनाडु, कर्नाटक और आन्ध्र के परिवारों में आज भी जीवित है। प्रवासी भारतीयों के घरों में यह प्रायः सबसे पहले सिखाया जाने वाला मन्त्र है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्रोत और ईमानदारी
- · Rig Veda 3.62.10
- · Yajurveda
- · Bhagavad Gita 10.35
- · Devi Bhagavata Purana
- · Atharvaveda 19.71.1
किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।
कुछ आधुनिक योगिक परंपराओं में गायत्री को आज्ञा चक्र से जोड़ा जाता है — अंतःप्रकाश से उसके संबंध के कारण — किंतु यह प्राथमिक शास्त्रीय मानचित्रण नहीं है। यह मंत्र मूलतः सवितृ की वैदिक ध्यान-साधना है, न कि तांत्रिक चक्र-अभ्यास।