हरे कृष्ण महामंत्र
Hare Kṛṣṇa Mahāmantra
Hare Krishna Mahamantra
गोविन्द · Govinda, the supreme Bhagavān of the Gaudiya tradition
अर्थ
"O divine energy, O all-attractive Lord, O source of all joy, engage me in your service. The repetition of the names alone, the tradition teaches, is enough to cross the ocean of this age."
हे दिव्य शक्ति, हे सर्व आकर्षक प्रभु, हे आनन्द के स्रोत, मुझे अपनी सेवा में लगा लीजिए। इस युग को पार करने के लिए केवल नाम जप ही पर्याप्त है।
शब्द दर शब्द
हे हरि (दुःख हरने वाले), और गौड़ीय दृष्टि में हरा, श्री राधा, जो भक्त को कृष्ण की ओर ले जाती हैं
O Hari (the remover of suffering), and in the Gaudiya reading also Harā, the energy of God, Radha herself, who carries the devotee toward Krishna
सर्व आकर्षक, परम भगवान् जो हर हृदय को अपनी ओर खींचते हैं
The all-attractive one, the supreme Bhagavān who draws every heart
जिसमें आत्मा आनन्द पाती है, सीता के राम और हृदय के आत्माराम दोनों
The one in whom the soul finds joy, both Sītā's Rāma and the inner Rāma of bliss (ātmā-rāma)
कलि युग का महामंत्र
कलि सन्तारण उपनिषद् और गौड़ीय वैष्णव परम्परा कहती है कि कलि युग में जटिल वैदिक यज्ञ अधिकांश लोगों के लिए सम्भव नहीं रहे; अब केवल नाम जप ही मार्ग है। सभी नाम जपों में यह सोलह नाम वाला मन्त्र महामन्त्र कहलाता है, जिसके द्वारा साधक इस युग के सागर को पार करता है।
जप कैसे करें
सर्वोत्तम समय
- ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे)
- एकादशी — वैष्णव उपवास-दिन
- जन्माष्टमी की रात — निरन्तर कीर्तन
- कार्तिक मास — सर्वाधिक पवित्र वैष्णव मास
- किसी भी कृष्ण-स्थान पर — वृन्दावन, मथुरा, द्वारका
- कभी भी, कहीं भी — कलियुग-धर्म के रूप में
माला
Tulsi mala
संख्या
एक माला (१०८) से आरम्भ करें। गौड़ीय परम्परा में दैनिक न्यूनतम १६ माला (१,७२८ बार) अनुशंसित है।
आसन
सुखासन में रीढ़ सीधी रखते हुए तुलसी माला हाथ में लें। श्रीकृष्ण या राधा-कृष्ण की छवि के सामने बैठना शुभ है।
तैयारी
तुलसी माला धारण करें। दीया जलाएं। श्रीकृष्ण को तुलसी-पत्र अर्पित करें। तीन साँसें लें और सम्पूर्ण ध्यान और प्रेम के साथ जप आरम्भ करें।
Vaikhari
वाचिक
उच्च स्वर में कीर्तन — महामन्त्र की विशेष शक्ति; सामूहिक संकीर्तन में सर्वाधिक प्रभावशाली
Upamsu
उपांशु
फुसफुसाकर जप — एकान्त व्यक्तिगत अभ्यास के लिए
Manasika
मानसिक
मानसिक जप — सर्वोच्च; प्रत्येक श्वास के साथ नाम का स्मरण
108× जप ऑडियो
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इस मंत्र के बारे में
पाँच सौ वर्ष पहले, नवद्वीप (बंगाल) में एक सन्ध्या घटित हुई जिसने भक्ति की दुनिया बदल दी। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु — गाते, नाचते, आनन्द में डूबे — गलियों में निकल पड़े और साथ लाए एक मन्त्र: हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
यह मन्त्र नया नहीं था। कलि-सन्तारण उपनिषद् — जो अथर्ववेद परम्परा का एक लघु ग्रन्थ है — इसे 'हरे राम हरे राम' क्रम से उद्धृत करता है और घोषित करता है कि यह कलियुग में पार उतरने का एकमात्र मन्त्र है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने इसे उस जीवित तरंग में रूपान्तरित किया जो आज सात महाद्वीपों में फैली है।
महामन्त्र की संरचना तीन नामों पर आधारित है। 'हरे' राधा को सम्बोधन है — भगवान् की आह्लादिनी शक्ति, प्रेम की देवी। 'कृष्ण' वह नाम है जो परम आनन्द को पुकारता है। 'राम' अयोध्यापति राम और साथ ही राम-आनन्द — कृष्ण का ही एक रूप। सोलह बार उच्चरित ये तीन नाम चैतन्य परम्परा में 'तारक-ब्रह्म-नाम' हैं — वह नाम जो भव-सागर से पार उतारता है।
गौड़ीय वैष्णव दर्शन में यहाँ यह नहीं माना जाता कि नाम भगवान् से भिन्न है — 'नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः।' कृष्ण का नाम स्वयं कृष्ण हैं। इसलिए जप केवल आध्यात्मिक व्यायाम नहीं है — यह स्वयं कृष्ण की उपस्थिति है। अभ्यास खुला है, किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं। तुलसी माला, प्रतिदिन न्यूनतम एक माला — और यदि सम्भव हो तो सोलह माला — वह जीवित धारा है।
मूल
- स्रोत
- Kali Santarana Upanishad, a Vaishnava Upanishad of the Krishna Yajurveda tradition
- परंपरा
- Vaishnava, most especially the Gaudiya Vaishnava tradition founded by Chaitanya Mahaprabhu in 16th century Bengal
- प्राचीनता
- ~5,000 वर्ष
- में भी संदर्भित
- · Brahmanda Purana
- · Padma Purana
- · Chaitanya Charitamrita by Krishnadasa Kaviraja
पारंपरिक लाभ
- चित्त की शुद्धि — कलियुग की समस्त बाधाओं का क्षय
- श्रीकृष्ण और राधा से प्रत्यक्ष प्रेम-सम्बन्ध
- माया से मुक्ति — नाम-कीर्तन की आह्लादिनी शक्ति
- कलियुग की विशेष औषधि — कलि-सन्तारण उपनिषद् के अनुसार
- भक्ति का उत्थान — गौड़ीय परम्परा में सर्वोच्च साधना
- नाम में ही भगवान् की उपस्थिति — नाम और नामी में अभेद
गौड़ीय वैष्णव ग्रन्थों में वर्णित पारम्परिक लाभ। यह भक्ति की साधना है; परिणाम कृपा और प्रेम के रूप में आते हैं।
रोजमर्रा के भारत में यह मंत्र
वृन्दावन की गलियों में, मायापुर के श्री धाम में, हरे कृष्ण मंदिरों में जो टोक्यो से लंदन तक फैले हैं — महामन्त्र एक ही रूप में गूँजता है। ISKCON ने इसे वैश्विक बनाया, किन्तु इसकी जड़ें श्री चैतन्य महाप्रभु के बंगाल में हैं। जन्माष्टमी की रात भारत के हर कृष्ण मंदिर में यही मन्त्र रात भर गाया जाता है। आधुनिक युवा इसे कीर्तन-संगीत के रूप में Spotify पर सुनते हैं; ग्राम के मेले और नगर की भागवत-सभाएँ दोनों में यह प्रवाहित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्रोत और ईमानदारी
- · Kali Santarana Upanishad (Krishna Yajurveda)
- · Brahmanda Purana
- · Padma Purana
- · Chaitanya Charitamrita, Krishnadasa Kaviraja
किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।
गौड़ीय वैष्णव साधना में चक्र-मानचित्रण केंद्रीय नहीं है। यह मंत्र भक्ति-रस की दृष्टि से समझा जाता है, न कि तांत्रिक ऊर्जा-रचना की दृष्टि से।