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नारायणashtakshara vaishnavaखुली साधना~11 108× के लिए मिनट

ॐ नमो नारायणाय

Oṃ Namo Nārāyaṇāya

Om Namo Narayanaya

साझा

नारायण · Nārāyaṇa, the one who rests upon the waters of cosmic dissolution, the supreme Vishnu reclining on Ananta Shesha

अर्थ

"Om. I bow to Narayana, the supreme Vishnu who rests upon the waters of dissolution and yet is the inner self of every being."

ॐ। मैं नारायण को नमन करता हूँ, जो प्रलय के जल पर शयन करते हैं और जो हर जीव के भीतर आत्म-रूप से विराजमान हैं।

शब्द दर शब्द

Oṃ

ब्रह्म का आदि नाद

The primordial sound, the seed of all mantras

नमो
Namo

नमस्कार, समर्पण

Salutation, bowing, surrender (sandhi form of namaḥ)

नारायणाय
Nārāyaṇāya

नारायण को, जिनका निवास जल में है, परम विष्णु

To Narayana, the one whose abode is the waters (nāra = waters; ayana = abode); the supreme Vishnu

अष्टाक्षरी का महत्व

अष्टाक्षरी अर्थात् आठ अक्षर वाला। श्रीवैष्णव आचार्यों, नाथमुनि, यामुनाचार्य, रामानुज, ने इस मन्त्र पर विस्तृत भाष्य लिखा और प्रत्येक अक्षर को सिद्धान्त-गर्भित माना। पिल्लै लोकाचार्य के मुमुक्षुप्पडि का एक पूरा प्रकरण अष्टाक्षरी पर है। मन्त्र में श्रीवैष्णव का त्रिविध सिद्धान्त निहित है, शेषत्व, शरणागति, और नारायण का परत्व-अन्तर्यामित्व।

जप कैसे करें

सर्वोत्तम समय

  • ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) — विष्णु मन्त्रों के लिए दृढ़ता से अनुशंसित
  • एकादशी (प्रत्येक पक्ष का ग्यारहवाँ दिन)
  • वैकुण्ठ एकादशी (वर्ष की सबसे शक्तिशाली एकादशी, मार्गशीर्ष–पौष में)
  • शनिवार — कुछ क्षेत्रों में विष्णु-उपासना से पारम्परिक रूप से जुड़ा
  • अपने इष्ट वैष्णव आचार्यों की जन्म-नक्षत्र तिथि पर

माला

Tulsi mala · Sphatika

संख्या

आधारभूत अभ्यास के लिए प्रतिदिन १०८। श्री-वैष्णव दीक्षित प्रायः प्रतिदिन १००८ का संकल्प लेते हैं। पूर्ण पुरश्चरण आठ लाख जप है — प्रत्येक अक्षर के लिए एक लाख।

आसन

रीढ़ सीधी रखते हुए सुखासन में, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करें। विष्णु मूर्ति या शालग्राम के सामने बैठें यदि उपलब्ध हो।

तैयारी

हाथ और मुँह धोएं। पूर्ण वैष्णव पद्धति से अभ्यास करने पर माथे पर तिरुमण लगाएं। तुलसी-पत्र या पीले फूल चढ़ाएं। तीन साँसें लें। आरम्भ करें।

Vaikhari

वाचिक

उच्च स्वर में जप — व्यक्तिगत और पारिवारिक अभ्यास के लिए उपयुक्त

Upamsu

उपांशु

फुसफुसाकर जप — औपचारिक श्री-वैष्णव सन्ध्या अभ्यास में प्रचलित

Manasika

मानसिक

मानसिक मौन जप — सर्वोच्च रूप माना जाता है; निरन्तर साधना के लिए अनुशंसित

१०८ जप में लगभग 11 मिनट लगते हैं

108× जप ऑडियो

पूर्ण-लंबाई ऑडियो — जल्द ही ऐप और वेब पर।

इस मंत्र के बारे में

ैष्णव परम्परा में अष्टाक्षर मन्त्र — 'ॐ नमो नारायणाय' — वह स्थान रखता है जो शैव जगत् में 'ॐ नमः शिवाय' का है। आठ अक्षर, जिनके पहले ॐ लगता है, और दो हजार वर्षों में वैष्णव आचार्यों ने इन आठ अक्षरों के चारों ओर हिन्दू धर्म के सर्वाधिक सुनियोजित मन्त्र-शास्त्रों में से एक बुना है।

मन्त्र का प्रथम पाठशास्त्र नारायण उपनिषद् में है — कृष्ण यजुर्वेद परम्परा का एक लघु उपनिषद्। महानारायण उपनिषद् इसी मन्त्र को अधिक विस्तार से विकसित करता है। इन औपनिषदिक मूलों से मन्त्र को पंचरात्र आगमों ने लिया, जो वैष्णवता के क्रिया-दार्शनिक ग्रन्थ हैं, और इसे समूची परम्परा के केन्द्रीय मन्त्र के रूप में उन्नत किया।

प्रत्येक अक्षर को धार्मिक महत्व दिया गया। प्रत्येक जप को समझा गया कि वह साधक को उस शरणागति की ओर एक अक्षर और ले जाता है जिसे श्री-वैष्णव आचार्य सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि मानते हैं। शाब्दिक अर्थ सरल है — 'नारायण को नमन।' दोनों अर्थ परम्परा द्वारा समर्थित हैं।

'नमो' प्रणाम है, झुकना है, और श्री-वैष्णव व्याख्या में 'नमः' को 'न-मम' पढ़ा जाता है — 'मेरा नहीं' — अर्थात् भगवान् के पक्ष में आत्म-स्वामित्व का पूर्ण त्याग। इस पठन में मन्त्र बन जाता है: ॐ, मैं नारायण को नमन करता हूँ, और नमन में यह स्वीकार करता हूँ कि मैं अपना नहीं हूँ।

इन आठ अक्षरों में श्री-वैष्णव के तीन सिद्धान्त पढ़े जाते हैं। प्रथम है शेषत्व — यह मत कि आत्मा प्रभु के लिए विद्यमान है, स्वयं के लिए नहीं। द्वितीय है शरणागति — समर्पण, यह पहचान कि स्वयं को नहीं बचाया जा सकता और इसलिए अपने अस्तित्व का सम्पूर्ण भार प्रभु को सौंपना होगा। तृतीय है नारायण की द्वैत प्रकृति — परत्व (सर्वोच्च परातीत) और अन्तर्यामित्व (हर प्राणी के भीतर आत्म-नियन्ता के रूप में)।

इस मन्त्र के सर्वाधिक विकसित रूप की रक्षा करने वाली परम्परा श्री-वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना रामानुज ने ११वीं और १२वीं शताब्दी में तमिलनाडु में की। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, रामानुज तिरुकोष्टियूर मंदिर की सात सीढ़ियाँ चढ़े और मंदिर-शिखर से अष्टाक्षर मन्त्र को सुनाई देने की दूरी तक के हर व्यक्ति को पुकारकर सुनाया — अपने गुरु के उस गोपनीयता के नियम को तोड़ते हुए जिसे बनाए रखने की प्रतिज्ञा उन्होंने की थी। कारण, उन्होंने कहा — यदि यह किसी सुनने वाले को बचा सकता है, तो कोई जाति, कोई योग्यता और कोई औपचारिक दीक्षा उसके मार्ग में नहीं आनी चाहिए।

आज का अभ्यास उसी दृष्टि के निकट है। मन्त्र खुला है। तुलसी माला पर एक सौ आठ जप, प्रत्येक प्रातः। एकादशी, वैकुण्ठ एकादशी और कार्तिक मास में विस्तार। पूर्ण मन्त्र-पुरश्चरण आठ लाख जप है — एक गम्भीर संकल्प। किन्तु द्वार सबके लिए एक ही है: झुकने की तत्परता, आठ अक्षर एक बार में, जब तक झुकना ही आत्म-सत्य न बन जाए।

मूल

स्रोत
Narayana Upanishad (Krishna Yajurveda tradition)
परंपरा
Vaishnava, particularly central to Sri Vaishnava (Ramanuja's lineage), Pañcarātra, and Smarta traditions
प्राचीनता
~2,500 वर्ष
में भी संदर्भित
  • · Mahanarayana Upanishad
  • · Taittiriya Aranyaka 10.13
  • · Vishnu Purana
  • · Srimad Bhagavata Purana
  • · Pañcarātra Āgamas

पारंपरिक लाभ

  • शरणागति — सम्पूर्ण आत्म-समर्पण भगवान् को
  • शेषत्व का साक्षात्कार — आत्मा प्रभु के लिए विद्यमान है, स्वयं के लिए नहीं
  • नारायण से जुड़ाव — अन्तर्यामी रूप में हर प्राणी के भीतर विराजमान
  • मोक्ष — श्री-वैष्णव अर्थ में वैकुण्ठ में नित्य सेवा
  • सात्विक गुणों का विकास — शुद्धता, स्थिरता, भक्ति
  • सर्वोच्च रक्षा — उस व्यक्ति की रक्षा जो पूर्णतः समर्पित हो चुका है

वैष्णव ग्रन्थों के अनुसार पारम्परिक आध्यात्मिक लाभ। यह मन्त्र शरणागति का ध्यान है, सांसारिक फल की माँग नहीं।

रोजमर्रा के भारत में यह मंत्र

किसी भी दक्षिण भारतीय वैष्णव परिवार में — तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, केरल के कुछ भागों में — अष्टाक्षर दिन आरम्भ होने से पहले, दीपक जलाने से पहले उच्चरित होता है। तिरुपति, श्रीरंगम, काञ्चीपुरम, मेलुकोटे और महान् वैष्णव मंदिर-परिसरों में प्रातः आरती से पहले यह मन्त्र प्राकारम में गूँजता है। एकादशी पर परिवार उपवास रखता है और वृद्धजन तुलसी माला पर एक या दो माला जपते हैं। वैकुण्ठ एकादशी पर श्रीरंगम में वैकुण्ठ द्वार एक बार खुलता है — उस दिन यह मन्त्र मंदिर-लाउडस्पीकर, टीवी प्रसारण और वैष्णव परिवारों के WhatsApp सन्देशों में सर्वत्र व्याप्त रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्रोत और ईमानदारी

  • · Narayana Upanishad (Krishna Yajurveda)
  • · Mahanarayana Upanishad
  • · Taittiriya Aranyaka 10.13
  • · Pañcarātra Āgamas
  • · Sri Vaishnava acharya commentaries, Yamunacharya, Ramanuja, Vedanta Desika, Pillai Lokacharya

किसी भी परंपरागत Hz (हर्ट्ज़) आवृत्ति का उल्लेख नहीं है। सॉल्फेजियो आवृत्ति के दावे आधुनिक न्यू-एज मान्यताएँ हैं, शास्त्रसम्मत नहीं।

वैष्णव साधना में चक्र-मानचित्रण केंद्रीय नहीं है। यह मंत्र शरणागति (समर्पण) और शेषत्व (प्रभु का अंग होने) की दृष्टि से समझा जाता है, न कि तांत्रिक चक्र-रचना की दृष्टि से।