ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना। महद्भयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते॥१॥
īśvarānugrahādeva puṁsāmadvaitavāsanā| mahadbhayaparitrāṇādviprāṇāmupajāyate||1||
।।१।। केवल ईश्वर की कृपा से ही मनुष्यों में अद्वैत की वासना उत्पन्न होती है। यह जन्म-मृत्यु के महाभय से मुक्ति की चाह से उपजती है, और यह विवेकशील पुरुषों में जन्म लेती है।
Modern Reflection
।।१।। अवधूत गीता का हर मुद्रित संस्करण इसी श्लोक से आरम्भ होता है, और यह इस बात के लिए असामान्य है कि यह क्या नहीं कहता। यह नहीं कहता कि अद्वैत बुद्धि से, तप से, या वंश से प्राप्त होता है। यह कहता है कि अद्वैत-वासना, अद्वैत की ओर झुकाव, कृपा से जन्मी एक प्रवृत्ति है। वाराणसी और ऋषिकेश के आश्रमों में आज भी शिक्षक वेदान्त की कक्षा इसी श्लोक से शुरू करते हैं, ताकि शिष्य को अभिमान से बचाया जा सके: व्यक्ति चतुराई से इस शिक्षा के योग्य नहीं बनता। शब्द 'महद्भय', महाभय, तकनीकी है — इसका अर्थ सामान्य चिंता नहीं बल्कि बार-बार जन्म-मृत्यु का भय, संसार-भय है। मुम्बई का एक अधिकारी जो स्वास्थ्य-संकट के बाद ही उपनिषद पढ़ना शुरू करता है, इस श्लोक की भाषा में ठीक वही तंत्र प्रदर्शित करता है जिसका यह श्लोक नाम लेता है: सीमितता का भय, कृपा से, अद्वैत की भूख बन जाता है।