श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ||१०-१||
śrībhagavānuvāca . bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ . yatte.ahaṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā ||10-1||
।।10.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।
Modern Reflection
आज के भारत में यह श्लोक उस गुरु, माता-पिता या मेंटर जैसा लगता है जो कठिन बातचीत को फिर से शुरू करता है क्योंकि उसे सचमुच आपकी चिंता है। कई विद्यार्थी, प्रोफेशनल और बुज़ुर्ग सलाह सुनते हैं, पर मन फिर भी उलझा रहता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को छोड़ते नहीं; वे उसके हित के लिए फिर बोलते हैं। परीक्षा का तनाव हो, नौकरी का बर्नआउट हो या अकेलापन—यह श्लोक कहता है कि सच्ची बुद्धि धैर्य से आती है। प्रेम से दी गई सीख बार-बार सुननी पड़ सकती है।