हिमालय उवाच । योगं च भक्तिसहितं ज्ञानं च श्रुतिसंमतम् । वदस्व परमेशानि त्वमेवाहं यतो भवेः ॥ व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नमुखपङ्कजा । वक्तुमारभताम्बा सा रहस्यं श्रुतिगूहितम् ॥ शृण्वन्तु निर्जराः सर्वे व्याहरन्त्या वचो मम । यस्य श्रवणमात्रेण मद्रूपत्वं प्रपद्यते ॥१॥
himālaya uvāca | yogaṃ ca bhaktisahitaṃ jñānaṃ ca śrutisaṃmatam | vadasva parameśāni tvamevāhaṃ yato bhaveḥ || vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā prasannamukhapaṅkajā | vaktumārabhatāmbā sā rahasyaṃ śrutigūhitam || śṛṇvantu nirjarāḥ sarve vyāharantyā vaco mama | yasya śravaṇamātreṇa madrūpatvaṃ prapadyate ||1||
।।१।। हिमालय ने कहा: हे परमेश्वरी, मुझे भक्ति-सहित योग और श्रुति-सम्मत ज्ञान कहिए, जिससे मैं स्वयं आप ही हो जाऊँ। व्यास बोले: उनके वचन सुन कर, प्रसन्न मुखकमल वाली माता कहने लगीं वह रहस्य जो श्रुति में छिपा है। हे देवगण, सब सुनो मेरे ये वचन, जिनके सुनने मात्र से मेरे ही स्वरूप की प्राप्ति होती है।
Modern Reflection
।।१।। यह श्लोक तीन काम एक साथ करता है: हिमालय का प्रश्न रखता है, कथा को क्षण भर के लिए व्यास को सौंपता है, और फिर पूरे ग्रंथ में देवी के पहले वचन बुलवाता है। उनका आरंभिक दावा अपने आकार में चौंकाने वाला है। वे पुण्य, स्वर्ग, या दूर की मोक्ष-प्राप्ति का वादा नहीं करतीं। वे कहती हैं कि आगे जो कहा जाएगा उसे केवल सुन लेना ही उनके स्वरूप की प्राप्ति के लिए पर्याप्त है। यही ठीक वह तर्क है जो आज किसी भी भारतीय गाँव की कथा-परंपरा में चलता है: जब कोई दादी संध्या समय बच्चों को रामायण या देवी माहात्म्य सुनाने बैठती है, तब परंपरा यह नहीं माँगती कि बच्चा पहले संस्कृत व्याकरण सीखे या कोई व्रत पूरा करे। वह मानती है कि निरंतर, ध्यान से सुनना अपने आप में परिवर्तन करता है, ठीक वैसे जैसे जल पत्थर को बल से नहीं, वर्षों के धैर्यपूर्ण स्पर्श से गढ़ता है। देवीगीता अपने आरंभ में इसी विश्वास को सिद्धांत के रूप में रखती है।