श्रीउद्धव उवाच । यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव । योगमादिष्टवानेतद् रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥१३-१५॥
śrī-uddhava uvāca | yadā tvaṁ sanakādibhyo yena rūpeṇa keśava | yogam ādiṣṭavān etad rūpam icchāmi veditum ||13-15||
।।१।। उद्धव बोले: हे केशव, मैं वह रूप जानना चाहता हूँ जिसमें आपने एक समय सनक और अन्य ब्रह्म-पुत्रों को इस योग का उपदेश दिया था।
Modern Reflection
।।१।। हंस गीता पीछे देखने के निवेदन से शुरू होती है। उद्धव कृष्ण के साथ अपने समय के अंत में हैं। कृष्ण संसार से जा रहे हैं। इस क्षण में उद्धव भविष्य के बारे में नहीं पूछते, वर्तमान शोक के बारे में नहीं पूछते, बल्कि बहुत पहले दूसरे विद्यार्थियों को दिए गए एक पुराने उपदेश के बारे में पूछते हैं। गम्भीर क्षणों में भारतीय वृत्ति पीछे की ओर बढ़ती है। पूरी हंस गीता एक पीछे देखते प्रश्न का उत्तर है। श्लोक का व्याकरण सटीक है: 'यदा', जब। उद्धव समय में स्थित एक घटना के बारे में पूछ रहे हैं, जिसमें एक विशेष रूप था। उपदेश उसी विशिष्टता पर टिका है।