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आदि पर्व · अध्याय 101

भरत का वंश

वैशम्पायन भरत के राज्य का वर्णन करते हैं — उनकी विजयें, सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ और कण्व को दिए गए दान, तथा यह कि अपने पुत्रों को अस्वीकार करने के बाद उन्होंने भरद्वाज से भुमन्यु को पुत्र रूप में पाया। फिर वंश सुहोत्र, अजमीढ और संवरण तक पहुँचता है; पांचालों से पराजित होकर संवरण हज़ार वर्ष सिन्धु के तट पर रहते हैं और वसिष्ठ को पुरोहित बनाकर अपना राज्य फिर पाते हैं। संवरण और तपती से कुरु उत्पन्न होते हैं, जो कुरुक्षेत्र को पवित्र करते हैं, और वंशावली प्रतीप तथा उनके पुत्रों देवापि, शान्तनु और बाह्लीक तक चलती है; अन्त में भरत के यज्ञों की और प्रशंसा है।

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.101.1)

दुष्यन्ताद्भरतो राज्यं यथान्यायमवाप सः । तस्य तत्प्रथितं कर्म प्रावर्तत महात्मनः ॥

duṣyantādbharato rājyaṃ yathānyāyamavāpa saḥ | tasya tatprathitaṃ karma prāvartata mahātmanaḥ

दुष्यन्त के पुत्र भरत ने न्यायपूर्वक राज्य प्राप्त किया, और उस महात्मा के प्रसिद्ध कर्म संसार में फैल गए —

श्लोक 2 (1.101.2)

भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् । स विजित्य महीपालांश्चकार वशवर्तिनः ॥

bhāsvaraṃ divyamajitaṃ lokasaṃnādanaṃ mahat | sa vijitya mahīpālāṃścakāra vaśavartinaḥ

वे कर्म तेजस्वी, दिव्य, अजेय और महान थे, जिनकी गूँज समस्त लोकों में थी। उसने पृथ्वी के राजाओं को जीतकर अपने अधीन कर लिया।

श्लोक 3 (1.101.3)

चचार च सतां धर्मं प्राप्य चानुत्तमं यशः । स राजा चक्रवर्त्यासीत्सार्वभौमः प्रतापवान् ॥

cacāra ca satāṃ dharmaṃ prāpya cānuttamaṃ yaśaḥ | sa rājā cakravartyāsītsārvabhaumaḥ pratāpavān

वह सज्जनों के धर्म पर चला और उसने अनुपम यश पाया। वह प्रतापी राजा समस्त पृथ्वी का स्वामी चक्रवर्ती सम्राट बना।

श्लोक 4 (1.101.4)

ईजे च बहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः । याजयामास तं कण्वो दक्षवद्भूरिदक्षिणम् ॥

īje ca bahubhiryajñairyathā śakro marutpatiḥ | yājayāmāsa taṃ kaṇvo dakṣavadbhūridakṣiṇam

उसने मरुतों के स्वामी इन्द्र के समान अनेक यज्ञ किए। कण्व ने उसके यज्ञ कराए, और दक्ष के समान उसने भरपूर दक्षिणा दी।

श्लोक 5 (1.101.5)

श्रीमद्गोविततं नाम वाजिमेधमवाप सः । यस्मिन्सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥

śrīmadgovitataṃ nāma vājimedhamavāpa saḥ | yasminsahasraṃ padmānāṃ kaṇvāya bharato dadau

उस श्रीमान राजा ने 'गोवितत' नामक अश्वमेध यज्ञ किया, जिसमें भरत ने कण्व को एक सहस्र पद्म (धन) दान किया।

श्लोक 6 (1.101.6)

सोऽश्वमेधशतैरीजे यमुनामनु तीरगः । त्रिशतैश्च सरस्वत्यां गङ्गामनु चतुःशतैः ॥

so'śvamedhaśatairīje yamunāmanu tīragaḥ | triśataiśca sarasvatyāṃ gaṅgāmanu catuḥśataiḥ

तटों पर चलते हुए उसने यमुना के किनारे सौ अश्वमेध यज्ञ किए, सरस्वती पर तीन सौ और गंगा के किनारे चार सौ।

श्लोक 7 (1.101.7)

दौष्यन्तिर्भरतो यज्ञैरीजे शाकुन्तलो नृपः । तस्माद्भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः ॥

dauṣyantirbharato yajñairīje śākuntalo nṛpaḥ | tasmādbharatavaṃśasya vipratasthe mahadyaśaḥ

दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र राजा भरत ने यज्ञों से आराधना की, और उन्हीं से भरतवंश का महान यश दूर-दूर तक फैला।

श्लोक 8 (1.101.8)

भरतस्य वरस्त्रीषु पुत्राः संजज्ञिरे पृथक् । नाभ्यनन्दत्तदा राजा नानुरूपा ममेति तान् ॥

bharatasya varastrīṣu putrāḥ saṃjajñire pṛthak | nābhyanandattadā rājā nānurūpā mameti tān

भरत की श्रेष्ठ पत्नियों से अलग-अलग पुत्र उत्पन्न हुए। किन्तु राजा उनसे प्रसन्न नहीं हुआ और बोला, "ये मेरे अनुरूप नहीं हैं।"

श्लोक 9 (1.101.9)

ततस्तान्मातरः क्रुद्धाः पुत्रान्निन्युर्यमक्षयम् । ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ॥

tatastānmātaraḥ kruddhāḥ putrānninyuryamakṣayam | tatastasya narendrasya vitathaṃ putrajanma tat

तब उनकी माताओं ने क्रोध में आकर उन पुत्रों को यमलोक पहुँचा दिया, और इस प्रकार उस नरेश का पुत्र उत्पन्न करना व्यर्थ हो गया।

श्लोक 10 (1.101.10)

ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा । लेभे पुत्रं भरद्वाजाद्भुमन्युं नाम भारत ॥

tato mahadbhiḥ kratubhirījāno bharatastadā | lebhe putraṃ bharadvājādbhumanyuṃ nāma bhārata

हे भारत! तब बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए भरत ने भरद्वाज से भुमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया।

श्लोक 11 (1.101.11)

ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः । भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥

tataḥ putriṇamātmānaṃ jñātvā pauravanandanaḥ | bhumanyuṃ bharataśreṣṭha yauvarājye'bhyaṣecayat

हे भरतश्रेष्ठ! तब अपने को पुत्रवान जानकर पौरवों को आनन्द देने वाले भरत ने भुमन्यु का युवराज-पद पर अभिषेक किया।

श्लोक 12 (1.101.12)

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत्सुतः । सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा ॥

tato diviratho nāma bhumanyorabhavatsutaḥ | suhotraśca suhotā ca suhaviḥ suyajustathā

तब भुमन्यु के दिविरथ नामक पुत्र हुआ। सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु

श्लोक 13 (1.101.13)

पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन्सुताः । तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ॥

puṣkariṇyāmṛcīkaśca bhumanyorabhavansutāḥ | teṣāṃ jyeṣṭhaḥ suhotrastu rājyamāpa mahīkṣitām

और ऋचीक — ये भुमन्यु के पुष्करिणी से उत्पन्न पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े सुहोत्र ने राजाओं पर आधिपत्य प्राप्त किया।

श्लोक 14 (1.101.14)

राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद्बहुभिः सवैः । सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम् ॥

rājasūyāśvamedhādyaiḥ so'yajadbahubhiḥ savaiḥ | suhotraḥ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ bubhuje sāgarāmbarām

उसने राजसूय, अश्वमेध आदि अनेक सोमयज्ञ किए। सुहोत्र ने समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग किया,

श्लोक 15 (1.101.15)

पूर्णां हस्तिगवाश्वैश्च बहुरत्नसमाकुलाम् । ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ॥

pūrṇāṃ hastigavāśvaiśca bahuratnasamākulām | mamajjeva mahī tasya bhūribhārāvapīḍitā

जो हाथियों, गौओं और घोड़ों से भरी और अनेक रत्नों से सम्पन्न थी। उसके राज्य में पृथ्वी मानो भारी बोझ से दबकर धँसी जा रही थी,

श्लोक 16 (1.101.16)

हस्त्यश्वरथसंपूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् । सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ॥

hastyaśvarathasaṃpūrṇā manuṣyakalilā bhṛśam | suhotre rājani tadā dharmataḥ śāsati prajāḥ

क्योंकि वह हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी थी और मनुष्यों से खचाखच भरी हुई थी, जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजा का शासन कर रहा था।

श्लोक 17 (1.101.17)

चैत्ययूपाङ्किता चासीद्भूमिः शतसहस्रशः । प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत ॥

caityayūpāṅkitā cāsīdbhūmiḥ śatasahasraśaḥ | pravṛddhajanasasyā ca sarvadaiva vyarocata

भूमि लाखों चैत्यों और यज्ञ-स्तम्भों से चिह्नित थी, और बढ़ती हुई प्रजा तथा लहलहाती फसलों से सदा शोभा पाती थी।

श्लोक 18 (1.101.18)

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात्पृथिवीपतेः । अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत ॥

aikṣvākī janayāmāsa suhotrātpṛthivīpateḥ | ajamīḍhaṃ sumīḍhaṃ ca purumīḍhaṃ ca bhārata

हे भारत! इक्ष्वाकुवंश की राजकुमारी ने पृथ्वीपति सुहोत्र से अजमीढ, सुमीढ और पुरुमीढ को जन्म दिया।

श्लोक 19 (1.101.19)

अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन्वंशः प्रतिष्ठितः । षट् पुत्रान्सोप्यजनयत्तिसृषु स्त्रीषु भारत ॥

ajamīḍho varasteṣāṃ tasminvaṃśaḥ pratiṣṭhitaḥ | ṣaṭ putrānsopyajanayattisṛṣu strīṣu bhārata

हे भारत! उनमें अजमीढ श्रेष्ठ थे और उन्हीं में वंश प्रतिष्ठित हुआ। उन्होंने भी तीन पत्नियों से छह पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 20 (1.101.20)

ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठिनौ । केशिन्यजनयज्जह्नुं सुतौ च जनरूपिणौ ॥

ṛkṣaṃ dhūminyatho nīlī duṣyantaparameṣṭhinau | keśinyajanayajjahnuṃ sutau ca janarūpiṇau

धूमिनी ने ऋक्ष को, नीली ने दुष्यन्त और परमेष्ठी को, और केशिनी ने जह्नु तथा जन और रूपी नामक दो पुत्रों को जन्म दिया।

श्लोक 21 (1.101.21)

विदुः संवरणं वीरमृक्षाद्राथन्तरीसुतम् । तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः । अन्वयाः कुशिका राजञ्जह्नोरमिततेजसः ॥

viduḥ saṃvaraṇaṃ vīramṛkṣādrāthantarīsutam | tatheme sarvapañcālā duṣyantaparameṣṭhinoḥ | anvayāḥ kuśikā rājañjahnoramitatejasaḥ

वीर संवरण को ऋक्ष से उत्पन्न, राथन्तरी का पुत्र माना जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार ये सब पांचाल दुष्यन्त और परमेष्ठी के वंशज हैं, और कुशिक अमित तेजस्वी जह्नु के।

श्लोक 22 (1.101.22)

जनरूपिणयोर्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम् । ऋक्षात्संवरणो जज्ञे राजन्वंशकरस्तव ॥

janarūpiṇayorjyeṣṭhamṛkṣamāhurjanādhipam | ṛkṣātsaṃvaraṇo jajñe rājanvaṃśakarastava

कहा जाता है कि जन और रूपी से भी ज्येष्ठ नरेश ऋक्ष थे। हे राजन्! ऋक्ष से संवरण उत्पन्न हुए, जो तुम्हारे वंश के प्रवर्तक हैं।

श्लोक 23 (1.101.23)

आर्क्षे संवरणे राजन्प्रशासति वसुन्धराम् । संक्षयः सुमहानासीत्प्रजानामिति नः श्रुतम् ॥

ārkṣe saṃvaraṇe rājanpraśāsati vasundharām | saṃkṣayaḥ sumahānāsītprajānāmiti naḥ śrutam

हे राजन्! हमने सुना है कि जब ऋक्षपुत्र संवरण पृथ्वी पर शासन कर रहे थे, तब प्रजा का बहुत बड़ा विनाश हुआ।

श्लोक 24 (1.101.24)

व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा । क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम् ॥

vyaśīryata tato rāṣṭraṃ kṣayairnānāvidhaistadā | kṣunmṛtyubhyāmanāvṛṣṭyā vyādhibhiśca samāhatam

तब नाना प्रकार के विनाशों से राज्य छिन्न-भिन्न हो गया; वह भूख, मृत्यु, अनावृष्टि और रोगों से पीड़ित था।

श्लोक 25 (1.101.25)

अभ्यघ्नन्भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च । चालयन्वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा ॥

abhyaghnanbhāratāṃścaiva sapatnānāṃ balāni ca | cālayanvasudhāṃ cemāṃ balena caturaṅgiṇā

शत्रुओं की सेनाओं ने अपनी चतुरंगिणी सेना से इस पृथ्वी को कँपाते हुए भरतवंशियों पर प्रहार किया।

श्लोक 26 (1.101.26)

अभ्ययात्तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तरसा महीम् । अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत् ॥

abhyayāttaṃ ca pāñcālyo vijitya tarasā mahīm | akṣauhiṇībhirdaśabhiḥ sa enaṃ samare'jayat

पांचालनरेश ने वेग से पृथ्वी को जीतकर दस अक्षौहिणी सेनाओं के साथ उन पर चढ़ाई की और युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया।

श्लोक 27 (1.101.27)

ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः । राजा संवरणस्तस्मात्पलायत महाभयात् ॥

tataḥ sadāraḥ sāmātyaḥ saputraḥ sasuhṛjjanaḥ | rājā saṃvaraṇastasmātpalāyata mahābhayāt

तब राजा संवरण अपनी पत्नियों, मन्त्रियों, पुत्रों और मित्रों के साथ उस महान भय से भाग निकले।

श्लोक 28 (1.101.28)

ते प्रतीचीं पराभूताः प्रपन्ना भारता दिशम् । सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसंस्तदा । नदीविषयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः ॥

te pratīcīṃ parābhūtāḥ prapannā bhāratā diśam | sindhornadasya mahato nikuñje nyavasaṃstadā | nadīviṣayaparyante parvatasya samīpataḥ

पराजित होकर भरतवंशी पश्चिम दिशा की शरण में गए। तब वे महानदी सिन्धु के किनारे एक कुंज में, नदी-प्रदेश की सीमा पर, एक पर्वत के निकट रहने लगे।

श्लोक 29 (1.101.29)

तत्रावसन्बहून्कालान्भारता दुर्गमाश्रिताः । तेषां निवसतां तत्र सहस्रं परिवत्सरान् ॥

tatrāvasanbahūnkālānbhāratā durgamāśritāḥ | teṣāṃ nivasatāṃ tatra sahasraṃ parivatsarān

वहाँ भरतवंशी दुर्गम स्थान का आश्रय लेकर बहुत समय तक रहे। जब उन्हें वहाँ रहते हुए एक हज़ार वर्ष बीत गए,

श्लोक 30 (1.101.30)

अथाभ्यगच्छद्भरतान्वसिष्ठो भगवानृषिः । तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥

athābhyagacchadbharatānvasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ | tamāgataṃ prayatnena pratyudgamyābhivādya ca

तब भगवान ऋषि वसिष्ठ भरतवंशियों के पास आए। उनके आने पर वे आदरपूर्वक उनकी अगवानी को गए और उन्हें प्रणाम किया,

श्लोक 31 (1.101.31)

अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा । निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे ॥

arghyamabhyāharaṃstasmai te sarve bhāratāstadā | nivedya sarvamṛṣaye satkāreṇa suvarcase

और तब सब भरतवंशियों ने उन्हें अर्घ्य अर्पित किया तथा सत्कारपूर्वक उस तेजस्वी ऋषि के सामने सब कुछ निवेदन किया।

श्लोक 32 (1.101.32)

तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा । पुरोहितो भवान्नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ॥

tamāsane copaviṣṭaṃ rājā vavre svayaṃ tadā | purohito bhavānno'stu rājyāya prayatemahi

जब वे आसन पर विराजमान हुए, तब राजा ने स्वयं उनका वरण किया और कहा, "आप हमारे पुरोहित बनें; हम राज्य के लिए प्रयत्न करें।"

श्लोक 33 (1.101.33)

ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतान्प्रत्यपद्यत । अथाभ्यषिञ्चत्साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ॥

omityevaṃ vasiṣṭho'pi bhāratānpratyapadyata | athābhyaṣiñcatsāmrājye sarvakṣatrasya pauravam

वसिष्ठ ने भी 'ॐ' कहकर भरतवंशियों को स्वीकार किया। फिर उन्होंने उस पौरव का समस्त क्षत्रियों के सम्राट के रूप में अभिषेक किया,

श्लोक 34 (1.101.34)

विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम् । भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत्पुरोत्तमम् ॥

viṣāṇabhūtaṃ sarvasyāṃ pṛthivyāmiti naḥ śrutam | bharatādhyuṣitaṃ pūrvaṃ so'dhyatiṣṭhatpurottamam

जिससे वे सारी पृथ्वी में सर्वोपरि हो गए — ऐसा हमने सुना है। उन्होंने उस श्रेष्ठ नगर में निवास किया जिसमें पहले भरत रहते थे,

श्लोक 35 (1.101.35)

पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः । ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः ॥

punarbalibhṛtaścaiva cakre sarvamahīkṣitaḥ | tataḥ sa pṛthivīṃ prāpya punarīje mahābalaḥ

और फिर से पृथ्वी के सब राजाओं को करदाता बना लिया। तब पृथ्वी को पुनः प्राप्त करके उस महाबली ने फिर यज्ञ किए —

श्लोक 36 (1.101.36)

आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः । ततः संवरणात्सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ॥

ājamīḍho mahāyajñairbahubhirbhūridakṣiṇaiḥ | tataḥ saṃvaraṇātsaurī tapatī suṣuve kurum

उस अजमीढवंशी ने बहुत दक्षिणा वाले अनेक महायज्ञ किए। फिर सूर्यपुत्री तपती ने संवरण से कुरु को जन्म दिया।

श्लोक 37 (1.101.37)

राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे । महिम्ना तस्य कुरवो लेभिरे प्रत्ययं भृशम् । तस्य नाम्नाऽभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलं ॥

rājatve taṃ prajāḥ sarvā dharmajña iti vavrire | mahimnā tasya kuravo lebhire pratyayaṃ bhṛśam | tasya nāmnā'bhivikhyātaṃ pṛthivyāṃ kurujāṅgalaṃ

सारी प्रजा ने उन्हें धर्मज्ञ जानकर राजा के रूप में चुना। उनकी महिमा से कुरुवंशियों ने बड़ा विश्वास अर्जित किया, और उन्हीं के नाम पर पृथ्वी पर कुरुजांगल प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 38 (1.101.38)

कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः । अश्ववन्तमभिष्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम् ॥

kurukṣetraṃ sa tapasā puṇyaṃ cakre mahātapāḥ | aśvavantamabhiṣyantaṃ tathā caitrarathaṃ munim

उस महातपस्वी ने अपनी तपस्या से कुरुक्षेत्र को पुण्यभूमि बनाया। अश्ववान, अभिष्यन्त, चैत्ररथ, मुनि

श्लोक 39 (1.101.39)

जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्यानुशुश्रुम । पञ्चैतान्वाहिनी पुत्रान्व्यजायत मनस्विनी ॥

janamejayaṃ ca vikhyātaṃ putrāṃścāsyānuśuśruma | pañcaitānvāhinī putrānvyajāyata manasvinī

और विख्यात जनमेजय — हमने सुना है कि ये उनके पुत्र थे। इन पाँच पुत्रों को मनस्विनी वाहिनी ने जन्म दिया।

श्लोक 40 (1.101.40)

अविक्षितः परिक्षित्तु शबलाश्वस्तु वीर्यवान् । आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः ॥

avikṣitaḥ parikṣittu śabalāśvastu vīryavān | ādirājo virājaśca śālmaliśca mahābalaḥ

अविक्षित के पुत्र थे — परिक्षित, पराक्रमी शबलाश्व, आदिराज, विराज, महाबली शाल्मलि,

श्लोक 41 (1.101.41)

उच्चैःश्रवा भङ्गकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः । एतेषामन्ववाये तु ख्यातास्ते कर्मजैर्गुणैः । जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः ॥

uccaiḥśravā bhaṅgakāro jitāriścāṣṭamaḥ smṛtaḥ | eteṣāmanvavāye tu khyātāste karmajairguṇaiḥ | janamejayādayaḥ sapta tathaivānye mahārathāḥ

उच्चैःश्रवा, भङ्गकार और आठवें जितारि। इनके वंश में अपने कर्मों से उत्पन्न गुणों के कारण विख्यात राजा हुए — जनमेजय आदि सात महारथी,

श्लोक 42 (1.101.42)

परीक्षितोऽभवन्पुत्राः सर्वे धर्मार्थकोविदाः । कक्षसेनोग्रसेनौ तु चित्रसेनश्च वीर्यवान् ॥

parīkṣito'bhavanputrāḥ sarve dharmārthakovidāḥ | kakṣasenograsenau tu citrasenaśca vīryavān

जो परिक्षित के पुत्र थे और सभी धर्म तथा अर्थ के ज्ञाता थे — कक्षसेन, उग्रसेन, पराक्रमी चित्रसेन,

श्लोक 43 (1.101.43)

इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः । जनमेजयस्य तनया भुवि ख्याता महाबलाः ॥

indrasenaḥ suṣeṇaśca bhīmasenaśca nāmataḥ | janamejayasya tanayā bhuvi khyātā mahābalāḥ

इन्द्रसेन, सुषेण और भीमसेन नाम वाले। जनमेजय के पुत्र, जो पृथ्वी पर विख्यात और महाबली थे, ये थे —

श्लोक 44 (1.101.44)

धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्बाह्लीक एव च । निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली ॥

dhṛtarāṣṭraḥ prathamajaḥ pāṇḍurbāhlīka eva ca | niṣadhaśca mahātejāstathā jāmbūnado balī

पहले उत्पन्न धृतराष्ट्र, पाण्डु, बाह्लीक, महातेजस्वी निषध, बलवान जाम्बूनद,

श्लोक 45 (1.101.45)

कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः । सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहिते रताः ॥

kuṇḍodaraḥ padātiśca vasātiścāṣṭamaḥ smṛtaḥ | sarve dharmārthakuśalāḥ sarvabhūtahite ratāḥ

कुण्डोदर, पदाति और आठवें वसाति — ये सभी धर्म और अर्थ में कुशल तथा समस्त प्राणियों के हित में लगे रहने वाले थे।

श्लोक 46 (1.101.46)

धृतराष्ट्रोऽथ राजासीत्तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः । हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः ॥

dhṛtarāṣṭro'tha rājāsīttasya putro'tha kuṇḍikaḥ | hastī vitarkaḥ krāthaśca kuṇḍinaścāpi pañcamaḥ

फिर धृतराष्ट्र राजा हुए। उनके पुत्र थे — कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ, पाँचवें कुण्डिन,

श्लोक 47 (1.101.47)

हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः । धृतराष्ट्रसुतानां तु त्रीनेतान्प्रथितान्भुवि ॥

haviḥśravāstathendrābho bhumanyuścāparājitaḥ | dhṛtarāṣṭrasutānāṃ tu trīnetānprathitānbhuvi

हविःश्रवा, इन्द्राभ और अपराजित भुमन्यु। धृतराष्ट्र के पुत्रों में ये तीन पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुए —

श्लोक 48 (1.101.48)

प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत । प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ॥

pratīpaṃ dharmanetraṃ ca sunetraṃ cāpi bhārata | pratīpaḥ prathitasteṣāṃ babhūvāpratimo bhuvi

हे भारत! प्रतीप, धर्मनेत्र और सुनेत्र। इनमें प्रतीप पृथ्वी पर अद्वितीय और विख्यात हुए।

श्लोक 49 (1.101.49)

प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ । देवापिः शन्तनुश्चैव बाह्लीकश्च महारथः ॥

pratīpasya trayaḥ putrā jajñire bharatarṣabha | devāpiḥ śantanuścaiva bāhlīkaśca mahārathaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! प्रतीप के तीन पुत्र उत्पन्न हुए — देवापि, शान्तनु और महारथी बाह्लीक।

श्लोक 50 (1.101.50)

देवापिस्तु प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया । शन्तनुश्च महीं लेभे बाह्लीकश्च महारथः ॥

devāpistu pravavrāja teṣāṃ dharmahitepsayā | śantanuśca mahīṃ lebhe bāhlīkaśca mahārathaḥ

देवापि ने अपने भाइयों के धर्म और हित की इच्छा से संन्यास ले लिया, और शान्तनु ने पृथ्वी का राज्य पाया; साथ में महारथी बाह्लीक भी थे।

श्लोक 51 (1.101.51)

भरतस्यान्वयास्त्वेते देवकल्पा महारथाः । बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः ॥

bharatasyānvayāstvete devakalpā mahārathāḥ | babhūvurbrahmakalpāśca bahavo rājasattamāḥ

भरत के ये वंशज देवताओं के समान महारथी थे, और उनमें से बहुत-से श्रेष्ठ राजा ब्रह्मा के समान थे।

श्लोक 52 (1.101.52)

एवंविधा महाभागा देवरूपाः प्रहारिणः । अन्ववाये महाराज ऐलवंशविवर्धनाः ॥

evaṃvidhā mahābhāgā devarūpāḥ prahāriṇaḥ | anvavāye mahārāja ailavaṃśavivardhanāḥ

हे महाराज! इस वंश में ऐसे ही महाभाग, देवरूप और प्रहार में कुशल राजा हुए, जिन्होंने ऐल (इला के) वंश की वृद्धि की।

श्लोक 53 (1.101.53)

गङ्गातीरं समागम्य दीक्षितो जनमेजय । अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च ॥

gaṅgātīraṃ samāgamya dīkṣito janamejaya | aśvamedhasahasrāṇi vājapeyaśatāni ca

हे जनमेजय! गंगा के तट पर जाकर दीक्षा लेकर भरत ने एक हज़ार अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ किए।

श्लोक 54 (1.101.54)

पुनरीजे महायज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः । अग्निष्टोमातिरात्राणामुक्थानां सोमवत्पुनः ॥

punarīje mahāyajñaiḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ | agniṣṭomātirātrāṇāmukthānāṃ somavatpunaḥ

फिर उन्होंने श्रेष्ठ दक्षिणाओं से सम्पन्न महायज्ञ किए — अग्निष्टोम, अतिरात्र और उक्थ, सोम सहित फिर से —

श्लोक 55 (1.101.55)

वाजपेयेष्टिसत्राणां सहस्रैश्च सुसंभृतैः । इष्ट्वा शाकुन्तलो राजा तर्पयित्वा द्विजान्धनैः ॥

vājapeyeṣṭisatrāṇāṃ sahasraiśca susaṃbhṛtaiḥ | iṣṭvā śākuntalo rājā tarpayitvā dvijāndhanaiḥ

और सुसज्जित सहस्रों वाजपेय, इष्टियों और सत्रों से। इन यज्ञों को करके शकुन्तलापुत्र राजा भरत ने ब्राह्मणों को धन से तृप्त किया,

श्लोक 56 (1.101.56)

पुनः सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ । जम्बूनदस्य शुद्धस्य कनकस्य महायशाः ॥

punaḥ sahasraṃ padmānāṃ kaṇvāya bharato dadau | jambūnadasya śuddhasya kanakasya mahāyaśāḥ

और उस महायशस्वी भरत ने फिर से कण्व को शुद्ध जाम्बूनद स्वर्ण के एक सहस्र पद्म दान किए।

श्लोक 57 (1.101.57)

यस्य यूपाः शतव्यामाः परिणाहेऽथ काञ्चनाः । सहस्रव्याममुद्वृद्धाः सेन्द्रैर्देवैः समुच्छ्रिताः ॥

yasya yūpāḥ śatavyāmāḥ pariṇāhe'tha kāñcanāḥ | sahasravyāmamudvṛddhāḥ sendrairdevaiḥ samucchritāḥ

उसके यज्ञ-स्तम्भ सोने के थे, जिनकी परिधि सौ व्याम और ऊँचाई हज़ार व्याम थी; इन्द्र सहित देवताओं ने उन्हें खड़ा किया था,

श्लोक 58 (1.101.58)

स्वलङ्कृता भ्राजमानाः सर्वरत्नैर्मनोरमैः । हिरण्यं द्विरदानश्वान्महिषोष्ट्रगजाविकम् ॥

svalaṅkṛtā bhrājamānāḥ sarvaratnairmanoramaiḥ | hiraṇyaṃ dviradānaśvānmahiṣoṣṭragajāvikam

वे भली-भाँति अलंकृत थे और सब प्रकार के मनोहर रत्नों से चमक रहे थे। सोना, दँतैल हाथी, घोड़े, भैंसें, ऊँट, गज और भेड़ें,

श्लोक 59 (1.101.59)

दासीदासं धनं धान्यं गाः सुशीलाः सवत्सकाः । भूमिं यूपसहस्राङ्कां कण्वाय बहुदक्षिणाम् ॥

dāsīdāsaṃ dhanaṃ dhānyaṃ gāḥ suśīlāḥ savatsakāḥ | bhūmiṃ yūpasahasrāṅkāṃ kaṇvāya bahudakṣiṇām

दासियाँ और दास, धन, अन्न, बछड़ों सहित सीधी गौएँ और हज़ार यज्ञ-स्तम्भों से चिह्नित भूमि — यह सब उसने भरपूर दक्षिणा के रूप में कण्व को दिया।

श्लोक 60 (1.101.60)

बहूनां ब्रह्मकल्पानां धनं दत्त्वा क्रतून्बहून् । ग्रामान्गृहाणि शुभ्राणि कोटिशोथाददत्तदा ॥

bahūnāṃ brahmakalpānāṃ dhanaṃ dattvā kratūnbahūn | grāmāngṛhāṇi śubhrāṇi koṭiśothādadattadā

ब्रह्मा के समान अनेक ब्राह्मणों को धन देकर और बहुत-से यज्ञ करके उसने तब करोड़ों की संख्या में गाँव और उज्ज्वल भवन दान किए।

श्लोक 61 (1.101.61)

भरताद्भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम् । भरतस्यान्वये जाता देवकल्पा महारथाः ॥

bharatādbhāratī kīrtiryenedaṃ bhārataṃ kulam | bharatasyānvaye jātā devakalpā mahārathāḥ

भरत से ही भारती कीर्ति है, और उन्हीं के कारण यह कुल भारत कहलाता है। भरत के वंश में देवताओं के समान महारथी उत्पन्न हुए,

श्लोक 62 (1.101.62)

बहवो ब्रह्मकल्पाश्च बभूवुः क्षत्रसत्तमाः । तेषामपरिमेयानि नामधेयानि सन्त्युत ॥

bahavo brahmakalpāśca babhūvuḥ kṣatrasattamāḥ | teṣāmaparimeyāni nāmadheyāni santyuta

और ब्रह्मा के समान बहुत-से श्रेष्ठ क्षत्रिय हुए। उनके नाम असंख्य हैं।

श्लोक 63 (1.101.63)

तेषां कुले यथा मुख्यान्कीर्तयिष्यामि भारत । महाभागान्देवकल्पान्सत्यार्जवपरायणान् ॥

teṣāṃ kule yathā mukhyānkīrtayiṣyāmi bhārata | mahābhāgāndevakalpānsatyārjavaparāyaṇān

हे भारत! उनके कुल में जो प्रमुख थे, उन महाभाग, देवतुल्य, सत्य और सरलता में निष्ठ राजाओं का मैं यथाक्रम वर्णन करूँगा।

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