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आदि पर्व · अध्याय 181

द्रुपद का यज्ञ: धृष्टद्युम्न और कृष्णा का जन्म

द्रोण से बदला लेने की आग में जलते द्रुपद ब्राह्मणों की बस्तियों में खोज करते हुए ऋषि-भ्राता याज और उपयाज को पाते हैं। उपयाज मना कर देते हैं, पर एक वर्ष की सेवा के बाद उन्हें अपने बड़े भाई याज के पास भेजते हैं, जो शुद्धि-अशुद्धि का कम विचार करते हैं; याज द्रोण का वध करने वाले पुत्र के लिए यज्ञ कराना स्वीकार करते हैं। अग्नि से कवचधारी राजकुमार धृष्टद्युम्न प्रकट होता है, जिसे एक अदृश्य वाणी द्रोण का वधकर्ता घोषित करती है, और वेदी से श्यामवर्णा, तेजस्विनी कृष्णा, जिसके बारे में भविष्यवाणी होती है कि वह क्षत्रियों के विनाश का कारण बनेगी। दोनों का नामकरण होता है, और द्रोण यह जानकर कि भाग्य टाला नहीं जा सकता, धृष्टद्युम्न को अस्त्रविद्या का शिष्य बना लेते हैं।

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 1 (1.181.1)

अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान्द्विजर्षभान् । अन्विच्छन्परिचक्राम ब्राह्मणावसथान्बहून् ॥

amarṣī drupado rājā karmasiddhāndvijarṣabhān | anvicchanparicakrāma brāhmaṇāvasathānbahūn

अमर्षशील राजा द्रुपद कर्मकाण्ड में सिद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मणों की खोज में अनेक ब्राह्मण-बस्तियों में घूमते रहे।

श्लोक 2 (1.181.2)

पुत्रजन्म परीप्सन्वै शोकोपहतचेतनः । द्रोणेन वैरं द्रुपदो न सुष्वाप स्मरन्सदा । नास्ति श्रेष्ठमपत्यं म इति नित्यमचिन्तयत् ॥

putrajanma parīpsanvai śokopahatacetanaḥ | droṇena vairaṃ drupado na suṣvāpa smaransadā | nāsti śreṣṭhamapatyaṃ ma iti nityamacintayat

पुत्र-जन्म की कामना से, शोक से व्याकुल चित्त होकर — क्योंकि द्रोण के साथ वैर को सदा याद करते हुए द्रुपद को नींद नहीं आती थी — वे निरन्तर सोचते रहते, "मेरी कोई श्रेष्ठ सन्तान नहीं है।"

श्लोक 3 (1.181.3)

जातान्पुत्रान्स निर्वेदाद्धिग्बन्धूनिति चाब्रवीत् । निःश्वासपरमश्चासीद्द्रोणं प्रतिचिकीर्षया ॥

jātānputrānsa nirvedāddhigbandhūniti cābravīt | niḥśvāsaparamaścāsīddroṇaṃ praticikīrṣayā

जो पुत्र उत्पन्न हो चुके थे उनके विषय में वे खिन्न होकर कहते, "धिक्कार है ऐसे बन्धुओं पर!" और द्रोण से बदला लेने की इच्छा में निरन्तर लम्बी साँसें भरते रहते।

श्लोक 4 (1.181.4)

प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च । क्षात्रेण च बलेनास्य चिन्तयन्नाध्यगच्छत ॥

prabhāvaṃ vinayaṃ śikṣāṃ droṇasya caritāni ca | kṣātreṇa ca balenāsya cintayannādhyagacchata

द्रोण के प्रभाव, विनय, शिक्षा और चरित्र पर विचार करते हुए उन्हें क्षत्रिय-बल से उनका सामना करने का कोई उपाय नहीं सूझा।

श्लोक 5 (1.181.5)

प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत । अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन् ॥

pratikartuṃ nṛpaśreṣṭho yatamāno'pi bhārata | abhitaḥ so'tha kalmāṣīṃ gaṅgākūle paribhraman

हे भारत, वे श्रेष्ठ राजा बदला लेने का प्रयत्न करते रहे, पर सफल न हुए। फिर कल्माषी नदी के आसपास और गङ्गा के तटों पर घूमते हुए

श्लोक 6 (1.181.6)

ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः । तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः ॥

brāhmaṇāvasathaṃ puṇyamāsasāda mahīpatiḥ | tatra nāsnātakaḥ kaścinna cāsīdavratī dvijaḥ

राजा एक पवित्र ब्राह्मण-बस्ती में पहुँचे। वहाँ कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था जो स्नातक न हो, और न कोई व्रतहीन था।

श्लोक 7 (1.181.7)

अधीयानौ महाभागौ सोऽपश्यत्संशितव्रतौ । याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ परमेष्ठिनौ ॥

adhīyānau mahābhāgau so'paśyatsaṃśitavratau | yājopayājau brahmarṣī śāmyantau parameṣṭhinau

वहाँ उन्होंने अध्ययन में लगे, कठोर व्रत वाले दो महाभाग ब्रह्मर्षियों — याज और उपयाज — को देखा, जो शान्त स्वभाव वाले और परम श्रेष्ठ थे,

श्लोक 8 (1.181.8)

संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ । तारणेयौ युक्तरूपौ ब्राह्मणावृषिसत्तमौ ॥

saṃhitādhyayane yuktau gotrataścāpi kāśyapau | tāraṇeyau yuktarūpau brāhmaṇāvṛṣisattamau

संहिता के अध्ययन में लगे, गोत्र से काश्यप, तारणेय कहलाने वाले, योग्य और उपयुक्त — वे दोनों ब्राह्मण ऋषियों में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 9 (1.181.9)

स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः । बुद्ध्वा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपह्वरे ॥

sa tāvāmantrayāmāsa sarvakāmairatandritaḥ | buddhvā balaṃ tayostatra kanīyāṃsamupahvare

बिना थके उन्होंने सब प्रकार की मनचाही वस्तुएँ देकर उन दोनों को आमन्त्रित किया; फिर उनकी सामर्थ्य को परखकर वे एकान्त में छोटे भाई के पास पहुँचे

श्लोक 10 (1.181.10)

प्रपेदे च्छन्दयन्कामैरुपयाजं धृतव्रतम् । पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक्सर्वकामदः ॥

prapede cchandayankāmairupayājaṃ dhṛtavratam | pādaśuśrūṣaṇe yuktaḥ priyavāksarvakāmadaḥ

और दृढ़व्रती उपयाज को मनचाही वस्तुओं का लोभ देकर उनकी शरण ली; वे उनके चरणों की सेवा में लगे रहते, मधुर वचन बोलते और उनकी हर इच्छा पूरी करने को तत्पर रहते।

श्लोक 11 (1.181.11)

अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः । येन मे कर्मणा ब्रह्मन्पुत्रः स्याद्द्रोणमृत्यवे ॥

arcayitvā yathānyāyamupayājamuvāca saḥ | yena me karmaṇā brahmanputraḥ syāddroṇamṛtyave

विधिपूर्वक उनका सत्कार करके उन्होंने उपयाज से कहा — "हे ब्रह्मन्, जिस कर्म से मुझे द्रोण की मृत्यु बनने वाला पुत्र प्राप्त हो,

द्रुपद उवाच

श्लोक 12 (1.181.12)

अर्जुनस्य भवेद्भार्या भवेद्या वरवर्णिनी । उपयाज कृते तस्मिन् गवां दाताऽस्मि तेऽर्बुदं ॥

arjunasya bhavedbhāryā bhavedyā varavarṇinī | upayāja kṛte tasmin gavāṃ dātā'smi te'rbudaṃ

और एक सुन्दरी कन्या भी जो अर्जुन की पत्नी बने — हे उपयाज, वह कर्म सम्पन्न होने पर मैं तुम्हें एक अर्बुद (दस करोड़) गौएँ दूँगा।

श्लोक 13 (1.181.13)

यद्वा तेऽन्यद्द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत् । सर्वं तत्ते प्रदाताऽहं न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥

yadvā te'nyaddvijaśreṣṭha manasaḥ supriyaṃ bhavet | sarvaṃ tatte pradātā'haṃ na hi me'trāsti saṃśayaḥ

अथवा हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारे मन को जो भी और प्रिय हो, वह सब मैं तुम्हें दूँगा; इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 14 (1.181.14)

इत्युक्तो नाहमित्येवं तमृषिः प्रत्यभाषत । आराधयिष्यन्द्रुपदः स तं पर्यचरत्पुनः ॥

ityukto nāhamityevaṃ tamṛṣiḥ pratyabhāṣata | ārādhayiṣyandrupadaḥ sa taṃ paryacaratpunaḥ

ऐसा कहे जाने पर ऋषि ने उत्तर दिया — "मैं नहीं करूँगा।" फिर भी द्रुपद उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनकी सेवा करते रहे।

श्लोक 15 (1.181.15)

ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः । उपयाजोऽब्रवीत्काले राजन्मधुरया गिरा ॥

tataḥ saṃvatsarasyānte drupadaṃ sa dvijottamaḥ | upayājo'bravītkāle rājanmadhurayā girā

फिर एक वर्ष बीतने पर, उचित अवसर देखकर, हे राजन्, द्विजश्रेष्ठ उपयाज ने मधुर वाणी में द्रुपद से कहा —

उपयाज उवाच

श्लोक 16 (1.181.16)

ज्येष्ठो भ्राता ममागृह्णाद्विचरन् गहने वने । अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम् ॥

jyeṣṭho bhrātā mamāgṛhṇādvicaran gahane vane | aparijñātaśaucāyāṃ bhūmau nipatitaṃ phalam

"मेरे बड़े भाई ने घने वन में घूमते हुए ऐसी भूमि पर गिरा एक फल उठा लिया जिसकी पवित्रता का कुछ पता नहीं था।

श्लोक 17 (1.181.17)

तदपश्यमहं भ्रातुरसाम्प्रतमनुव्रजन् । विमर्शं संकरादाने नायं कुर्यात्कदाचन ॥

tadapaśyamahaṃ bhrāturasāmpratamanuvrajan | vimarśaṃ saṃkarādāne nāyaṃ kuryātkadācana

भाई के पीछे-पीछे चलते हुए मैंने उनका वह अनुचित कर्म देखा। अशुद्ध वस्तु ग्रहण करने में वे कभी कोई विचार नहीं करते।

श्लोक 18 (1.181.18)

दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद्दोषान्पापानुबन्धकान् । विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् ॥

dṛṣṭvā phalasya nāpaśyaddoṣānpāpānubandhakān | vivinakti na śaucaṃ yaḥ so'nyatrāpi kathaṃ bhavet

उस फल को देखकर भी उन्होंने उससे जुड़े दोषों और पाप को नहीं देखा। जो यहाँ शुद्धि-अशुद्धि का विवेक नहीं करता, वह और कहीं कैसे करेगा?

श्लोक 19 (1.181.19)

संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले च यः । भैक्षमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा ॥

saṃhitādhyayanaṃ kurvanvasangurukule ca yaḥ | bhaikṣamutsṛṣṭamanyeṣāṃ bhuṅkte sma ca yadā tadā

संहिता का पाठ करते और गुरुकुल में रहते हुए भी वे जब-तब दूसरों की छोड़ी हुई भिक्षा खा लेते थे,

श्लोक 20 (1.181.20)

कीर्तयन्गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः । तं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा ॥

kīrtayanguṇamannānāmaghṛṇī ca punaḥ punaḥ | taṃ vai phalārthinaṃ manye bhrātaraṃ tarkacakṣuṣā

और निःसंकोच होकर बार-बार उस अन्न के गुण गाते थे। इसी तर्क से मैं अपने भाई को लाभ का इच्छुक मानता हूँ।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 21 (1.181.21)

तं वै गच्छस्व नृपते स त्वां संयाजयिष्यति । जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् ॥

taṃ vai gacchasva nṛpate sa tvāṃ saṃyājayiṣyati | jugupsamāno nṛpatirmanasedaṃ vicintayan

हे राजन्, तुम उन्हीं के पास जाओ; वे तुम्हारा यज्ञ करा देंगे।" राजा ने मन में उस आचरण की निन्दा करते हुए भी अपने प्रयोजन पर विचार किया,

श्लोक 22 (1.181.22)

उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याश्रममभ्यगात् । अभिसम्पूज्य पूजार्हमथ याजमुवाच ह ॥

upayājavacaḥ śrutvā yājasyāśramamabhyagāt | abhisampūjya pūjārhamatha yājamuvāca ha

और उपयाज की बात सुनकर याज के आश्रम में गए। पूजनीय याज का भली-भाँति सत्कार करके उन्होंने उनसे कहा —

द्रुपद उवाच

श्लोक 23 (1.181.23)

अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो । द्रोणवैराभिसन्तप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि ॥

ayutāni dadānyaṣṭau gavāṃ yājaya māṃ vibho | droṇavairābhisantaptaṃ prahlādayitumarhasi

"मैं तुम्हें अस्सी हज़ार गौएँ दूँगा; हे प्रभो, मेरा यज्ञ करा दो। द्रोण के वैर से मैं संतप्त हूँ; तुम मुझे शान्ति प्रदान करो।

श्लोक 24 (1.181.24)

स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः । तस्माद्द्रोणः पराजैष्ट मां वै स सखिविग्रहे ॥

sa hi brahmavidāṃ śreṣṭho brahmāstre cāpyanuttamaḥ | tasmāddroṇaḥ parājaiṣṭa māṃ vai sa sakhivigrahe

क्योंकि वे वेदज्ञों में श्रेष्ठ हैं और ब्रह्मास्त्र में भी अद्वितीय हैं; इसी कारण द्रोण ने मित्रता के विवाद में मुझे पराजित कर दिया।

श्लोक 25 (1.181.25)

क्षत्रियो नास्ति तस्यास्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः । कौरवाचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः ॥

kṣatriyo nāsti tasyāsyāṃ pṛthivyāṃ kaścidagraṇīḥ | kauravācāryamukhyasya bhāradvājasya dhīmataḥ

इस पृथ्वी पर कौरवों के प्रधान आचार्य, बुद्धिमान् भरद्वाजपुत्र से बढ़कर कोई क्षत्रिय नहीं है।

श्लोक 26 (1.181.26)

द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च । षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत् ॥

droṇasya śarajālāni prāṇidehaharāṇi ca | ṣaḍaratni dhanuścāsya dṛśyate paramaṃ mahat

द्रोण के बाणों की बौछार प्राणियों के शरीर से प्राण हर लेती है, और उनका छह हाथ लंबा धनुष अत्यन्त विशाल दिखाई देता है।

श्लोक 27 (1.181.27)

स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमसंशयम् । प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः ॥

sa hi brāhmaṇaveṣeṇa kṣātraṃ vegamasaṃśayam | pratihanti maheṣvāso bhāradvājo mahāmanāḥ

वह महाधनुर्धर, महामना भरद्वाजपुत्र ब्राह्मण के वेश में रहकर भी निःसंदेह क्षत्रिय के वेग को रोक देता है।

श्लोक 28 (1.181.28)

क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः । तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रधृष्यं नरैर्भुवि ॥

kṣatrocchedāya vihito jāmadagnya ivāsthitaḥ | tasya hyastrabalaṃ ghoramapradhṛṣyaṃ narairbhuvi

वह क्षत्रियों के संहार के लिए उत्पन्न जमदग्निपुत्र (परशुराम) के समान खड़ा है; उसके अस्त्रों का भयंकर बल पृथ्वी पर कोई मनुष्य सह नहीं सकता।

श्लोक 29 (1.181.29)

ब्राह्मं सन्धारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः । समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरःसरः ॥

brāhmaṃ sandhārayaṃstejo hutāhutirivānalaḥ | sametya sa dahatyājau kṣātradharmapuraḥsaraḥ

आहुति पाकर प्रज्वलित अग्नि के समान ब्राह्म तेज धारण करने वाला वह क्षत्रिय-धर्म को आगे रखकर युद्ध में भिड़ता है और शत्रुओं को भस्म कर देता है।

श्लोक 30 (1.181.30)

ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्मं तेजो विशिष्यते । सोऽहं क्षात्राद्बलाद्धीनो ब्राह्मं तेजः प्रपेदिवान् ॥

brahmakṣatre ca vihite brāhmaṃ tejo viśiṣyate | so'haṃ kṣātrādbalāddhīno brāhmaṃ tejaḥ prapedivān

ब्राह्मण और क्षत्रिय — इन दोनों विहित वर्गों में ब्राह्म तेज ही श्रेष्ठ है। इसलिए क्षत्रिय-बल में पिछड़कर मैंने ब्राह्म तेज की शरण ली है।

श्लोक 31 (1.181.31)

द्रोणाद्विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् । द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ॥

droṇādviśiṣṭamāsādya bhavantaṃ brahmavittamam | droṇāntakamahaṃ putraṃ labheyaṃ yudhi durjayam

द्रोण से भी श्रेष्ठ, वेदज्ञों में सर्वोत्तम आपको पाकर मैं ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ जो द्रोण का अन्त करे और युद्ध में अजेय हो।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 32 (1.181.32)

तत्कर्म कुरु मे याज वितराम्यर्बुदं गवाम् । तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् ॥

tatkarma kuru me yāja vitarāmyarbudaṃ gavām | tathetyuktvā tu taṃ yājo yājyārthamupakalpayat

हे याज, मेरा वह कर्म सम्पन्न करो; मैं तुम्हें एक अर्बुद गौएँ दूँगा।" "ऐसा ही हो" कहकर याज ने अपने यजमान के लिए यज्ञ की तैयारी आरम्भ की।

श्लोक 33 (1.181.33)

गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् । याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः ॥

gurvartha iti cākāmamupayājamacodayat | yājo droṇavināśāya pratijajñe tathā ca saḥ

"यह बड़े भाई का काम है" — ऐसा कहकर उन्होंने अनिच्छुक उपयाज को भी इसमें लगा लिया; और याज ने द्रोण के विनाश की प्रतिज्ञा की।

श्लोक 34 (1.181.34)

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः । आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै ॥

tatastasya narendrasya upayājo mahātapāḥ | ācakhyau karma vaitānaṃ tadā putraphalāya vai

तब महातपस्वी उपयाज ने राजा को पुत्ररूपी फल की प्राप्ति के लिए श्रौत यज्ञ की विधि बताई —

उपयाज उवाच

श्लोक 35 (1.181.35)

स च पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः । इष्यते यद्विधो राजन्भविता ते तथाविधः ॥

sa ca putro mahāvīryo mahātejā mahābalaḥ | iṣyate yadvidho rājanbhavitā te tathāvidhaḥ

"हे राजन्, वह पुत्र महापराक्रमी, महातेजस्वी और महाबली होगा — जैसा तुम चाहते हो, वह वैसा ही होगा।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 36 (1.181.36)

भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसन्धाय भूपतिः । आजह्रे तत्तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये ॥

bhāradvājasya hantāraṃ so'bhisandhāya bhūpatiḥ | ājahre tattathā sarvaṃ drupadaḥ karmasiddhaye

भरद्वाजपुत्र के वधकर्ता की कामना मन में रखकर राजा द्रुपद ने यज्ञ की सफलता के लिए वैसी ही सारी सामग्री जुटाई।

श्लोक 37 (1.181.37)

याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत्तदा । प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ॥

yājastu havanasyānte devīmājñāpayattadā | prehi māṃ rājñi pṛṣati mithunaṃ tvāmupasthitam

हवन के अन्त में याज ने रानी को बुलाया — "हे रानी पृषती, मेरे पास आओ; तुम्हारे लिए एक जोड़ा (पुत्र और पुत्री) उपस्थित है।"

राज्ञ्युवाच

श्लोक 38 (1.181.38)

अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन्दिव्यान्गन्धान्बिभर्मि च । सूतार्थे नोपलब्धाऽस्मि तिष्ठ याज मम प्रिये ॥

avaliptaṃ mukhaṃ brahmandivyāngandhānbibharmi ca | sūtārthe nopalabdhā'smi tiṣṭha yāja mama priye

"हे ब्रह्मन्, मेरा मुख अभी शुद्ध नहीं हुआ है और मैंने दिव्य सुगन्धियाँ धारण कर रखी हैं; सन्तान ग्रहण करने के लिए मैं अभी तैयार नहीं हूँ। हे याज, मेरी प्रसन्नता के लिए थोड़ा ठहरो।"

याज उवाच

श्लोक 39 (1.181.39)

याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् । कथं कामं न सन्दध्यात्सा त्वं विप्रेहि तिष्ठ वा ॥

yājena śrapitaṃ havyamupayājābhimantritam | kathaṃ kāmaṃ na sandadhyātsā tvaṃ viprehi tiṣṭha vā

"यह हवि याज ने पकाई है और उपयाज ने मन्त्रों से अभिमन्त्रित की है; यह मनोरथ पूरा कैसे न करेगी? अब तुम ब्राह्मण के पास आओ या वहीं ठहरो।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 40 (1.181.40)

एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते । उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसन्निभः ॥

evamuktvā tu yājena hute haviṣi saṃskṛte | uttasthau pāvakāttasmātkumāro devasannibhaḥ

याज के ऐसा कहकर संस्कारयुक्त हवि की आहुति देते ही उस अग्नि से देवता के समान एक कुमार प्रकट हुआ,

श्लोक 41 (1.181.41)

ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् । बिभ्रत्सखड्गः सशरो धनुष्मान्विनदन्मुहुः ॥

jvālāvarṇo ghorarūpaḥ kirīṭī varma cottamam | bibhratsakhaḍgaḥ saśaro dhanuṣmānvinadanmuhuḥ

अग्नि की ज्वाला-सा वर्ण, भयंकर रूप, सिर पर किरीट और उत्तम कवच धारण किए; वह खड्ग, बाण और धनुष लिए बार-बार गर्जना कर रहा था।

श्लोक 42 (1.181.42)

सोऽध्यारोहद्रथवरं तेन च प्रययौ तदा । ततः प्रणेदुः पञ्चालाः प्रहृष्टाः साधुसाध्विति ॥

so'dhyārohadrathavaraṃ tena ca prayayau tadā | tataḥ praṇeduḥ pañcālāḥ prahṛṣṭāḥ sādhusādhviti

वह एक श्रेष्ठ रथ पर चढ़ गया और उसी पर चल पड़ा; तब पाञ्चाल हर्ष से भरकर "साधु! साधु!" कहकर जयघोष करने लगे।

श्लोक 43 (1.181.43)

हर्षाविष्टांस्ततश्चैतान्नेयं सेहे वसुन्धरा । भयापहो राजपुत्रः पञ्चालानां यशस्करः ॥

harṣāviṣṭāṃstataścaitānneyaṃ sehe vasundharā | bhayāpaho rājaputraḥ pañcālānāṃ yaśaskaraḥ

हर्ष से भरे उन लोगों का भार यह पृथ्वी सह न सकी। "भय को दूर करने वाला, पाञ्चालों का यश बढ़ाने वाला यह राजकुमार

श्लोक 44 (1.181.44)

राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय वै । इत्युवाच महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा ॥

rājñaḥ śokāpaho jāta eṣa droṇavadhāya vai | ityuvāca mahadbhūtamadṛśyaṃ khecaraṃ tadā

और राजा का शोक मिटाने वाला है; यह द्रोण के वध के लिए उत्पन्न हुआ है" — ऐसा आकाश में विचरने वाले एक अदृश्य महान् भूत ने कहा।

श्लोक 45 (1.181.45)

कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात्समुत्थिता । सुभगा दर्शनीयाङ्गी स्वसितायतलोचना ॥

kumārī cāpi pāñcālī vedīmadhyātsamutthitā | subhagā darśanīyāṅgī svasitāyatalocanā

और पाञ्चाल राजकुमारी भी वेदी के मध्य से प्रकट हुई — सौभाग्यवती, सुन्दर अंगों वाली, लम्बे और काले नेत्रों वाली,

श्लोक 46 (1.181.46)

श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा । ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूश्चारुपीनपयोधरा ॥

śyāmā padmapalāśākṣī nīlakuñcitamūrdhajā | tāmratuṅganakhī subhrūścārupīnapayodharā

श्यामवर्णा, कमल-दल के समान नेत्रों वाली, नीले घुंघराले केशों वाली, ताँबे के रंग के उभरे नखों वाली, सुन्दर भौंहों वाली और सुन्दर पुष्ट स्तनों वाली,

श्लोक 47 (1.181.47)

मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी । नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रधावति ॥

mānuṣaṃ vigrahaṃ kṛtvā sākṣādamaravarṇinī | nīlotpalasamo gandho yasyāḥ krośātpradhāvati

मानो साक्षात् देवी ने मानव-देह धारण कर ली हो; उसके शरीर से नील कमल के समान सुगन्ध एक कोस तक फैलती थी।

श्लोक 48 (1.181.48)

या बिभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि । देवदानवयक्षाणामीप्सितां देवरूपिणीम् ॥

yā bibharti paraṃ rūpaṃ yasyā nāstyupamā bhuvi | devadānavayakṣāṇāmīpsitāṃ devarūpiṇīm

वह परम रूप धारण किए थी, जिसकी पृथ्वी पर कोई उपमा नहीं थी; वह देवरूपिणी देवताओं, दानवों और यक्षों द्वारा भी चाही जाने योग्य थी।

श्लोक 49 (1.181.49)

सदृशी पाण्डुपुत्रस्य अर्जुनस्येति भारत । ऊचुः प्रहृष्टमनसो राजभक्तिपुरस्कृताः ॥

sadṛśī pāṇḍuputrasya arjunasyeti bhārata | ūcuḥ prahṛṣṭamanaso rājabhaktipuraskṛtāḥ

हे भारत, प्रसन्नचित्त और राजभक्ति से भरे लोगों ने कहा — "यह पाण्डुपुत्र अर्जुन के योग्य है।"

श्लोक 50 (1.181.50)

तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी । सर्वयोषिद्वरा कृष्णा निनीषुः क्षत्रियान्क्षयम् ॥

tāṃ cāpi jātāṃ suśroṇīṃ vāguvācāśarīriṇī | sarvayoṣidvarā kṛṣṇā ninīṣuḥ kṣatriyānkṣayam

उस सुन्दर कटि वाली कन्या के जन्म लेते ही आकाशवाणी ने उसके विषय में भी कहा — "सब स्त्रियों में श्रेष्ठ यह कृष्णा क्षत्रियों को विनाश की ओर ले जाएगी।

वागुवाच

श्लोक 51 (1.181.51)

सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा । अस्या हेतोः कौरवाणां महदुत्पत्स्यते भयम् ॥

surakāryamiyaṃ kāle kariṣyati sumadhyamā | asyā hetoḥ kauravāṇāṃ mahadutpatsyate bhayam

समय आने पर यह सुन्दर कटि वाली देवताओं का कार्य सिद्ध करेगी; इसके कारण कौरवों पर महान् भय आएगा।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 52 (1.181.52)

तच्छ्रुत्वा सर्वपञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् । न चैतान्हर्षसम्पूर्णानियं सेहे वसुन्धरा ॥

tacchrutvā sarvapañcālāḥ praṇeduḥ siṃhasaṅghavat | na caitānharṣasampūrṇāniyaṃ sehe vasundharā

यह सुनकर सब पाञ्चाल सिंहों के झुंड की तरह गर्जना करने लगे; और हर्ष से भरे उन लोगों का भार यह पृथ्वी सह न सकी।

श्लोक 53 (1.181.53)

पाञ्चालराजस्तां दृष्ट्वा हर्षादश्रूण्यवर्तयत् । परिष्वज्य च तां कृष्णां स्नुषा पाण्डोरिति ब्रुवन् । अङ्कमारोप्य पाञ्चालीं राजा हर्षमवाप सः ॥

pāñcālarājastāṃ dṛṣṭvā harṣādaśrūṇyavartayat | pariṣvajya ca tāṃ kṛṣṇāṃ snuṣā pāṇḍoriti bruvan | aṅkamāropya pāñcālīṃ rājā harṣamavāpa saḥ

उसे देखकर पाञ्चालराज की आँखों से हर्ष के आँसू बहने लगे। कृष्णा को गले लगाकर, "यह पाण्डु की पुत्रवधू है!" कहते हुए राजा ने पाञ्चाली को गोद में बिठा लिया और आनन्द से भर उठे।

श्लोक 54 (1.181.54)

तौ दृष्ट्वा पार्षती याजं प्रपेदे वै सुतार्थिनी । न वै मदन्यां जननीं जानीयातामिमाविति ॥

tau dṛṣṭvā pārṣatī yājaṃ prapede vai sutārthinī | na vai madanyāṃ jananīṃ jānīyātāmimāviti

उन दोनों को देखकर सन्तान की इच्छुक पृषती याज के पास गई और बोली — "ये दोनों मेरे सिवा किसी और को अपनी माता न जानें।"

श्लोक 55 (1.181.55)

तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रियचिकीर्षया । तयोश्च नामनी चक्रुर्द्विजाः सम्पूर्णमानसाः ॥

tathetyuvāca tāṃ yājo rājñaḥ priyacikīrṣayā | tayośca nāmanī cakrurdvijāḥ sampūrṇamānasāḥ

राजा का प्रिय करने की इच्छा से याज ने उससे कहा — "ऐसा ही हो।" और पूर्णमनोरथ ब्राह्मणों ने उन दोनों का नामकरण किया —

श्लोक 56 (1.181.56)

धृष्टत्वादत्यमर्षित्वाद्द्युम्नाद्युत्संभवादपि । धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवत्विति ॥

dhṛṣṭatvādatyamarṣitvāddyumnādyutsaṃbhavādapi | dhṛṣṭadyumnaḥ kumāro'yaṃ drupadasya bhavatviti

"धृष्टता (साहस), अत्यन्त अमर्ष (शत्रु का उत्कर्ष न सह पाने) और द्युम्न (तेज और ऐश्वर्य) के साथ उत्पन्न होने के कारण द्रुपद का यह कुमार धृष्टद्युम्न कहलाए।"

श्लोक 57 (1.181.57)

कृष्णेत्येवाब्रुवन्कृष्णां कृष्णाऽभूत्सा हि वर्णतः । तथा तन्मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महामखे ॥

kṛṣṇetyevābruvankṛṣṇāṃ kṛṣṇā'bhūtsā hi varṇataḥ | tathā tanmithunaṃ jajñe drupadasya mahāmakhe

कन्या को उन्होंने कृष्णा कहा, क्योंकि वह वर्ण से श्यामा थी। इस प्रकार द्रुपद के महायज्ञ में वह जोड़ा उत्पन्न हुआ।

श्लोक 58 (1.181.58)

वैदिकाध्ययने पारं धृष्टद्युम्नो गतः परम् ॥

vaidikādhyayane pāraṃ dhṛṣṭadyumno gataḥ param

धृष्टद्युम्न वेदाध्ययन में परम पारंगत हो गया।

श्लोक 59 (1.181.59)

धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम् । उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान् ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ tu pāñcālyamānīya svaṃ niveśanam | upākarodastrahetorbhāradvājaḥ pratāpavān

प्रतापी भरद्वाजपुत्र पाञ्चाल राजकुमार धृष्टद्युम्न को अपने घर ले आए और उसे अस्त्रविद्या सिखाई।

श्लोक 60 (1.181.60)

अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः । तथा तत्कृतवान्द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात् ॥

amokṣaṇīyaṃ daivaṃ hi bhāvi matvā mahāmatiḥ | tathā tatkṛtavāndroṇa ātmakīrtyanurakṣaṇāt

भाग्य में जो होना है उसे टाला नहीं जा सकता — यह मानकर महाबुद्धिमान् द्रोण ने अपनी कीर्ति की रक्षा के लिए ऐसा किया।

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