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आदि पर्व · अध्याय 208

द्रुपद का पुरोहित पाण्डवों के पास

धृष्टद्युम्न अपने पिता को बताता है कि ब्राह्मण-वेश में एक युवक ने महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर कृष्णा को जीता, दूसरे वीर ने वृक्ष उखाड़कर क्रुद्ध राजाओं को खदेड़ दिया, और वे भाई उसे एक कुम्हार की कर्मशाला में ले गए जहाँ उनकी माता-सी प्रतीत होने वाली एक स्त्री बैठी थी। उनकी युद्ध-चर्चा से उसे विश्वास हो जाता है कि वे कुन्ती के पुत्र हैं। द्रुपद उनका परिचय पूछने के लिए अपने पुरोहित को भेजते हैं; युधिष्ठिर पुरोहित का सत्कार करवाकर उत्तर देते हैं कि कन्या स्वयं द्रुपद की रखी शर्त के अनुसार न्यायपूर्वक जीती गई है, इसलिए राजा को दुखी होने का कोई कारण नहीं। तभी एक दूसरा दूत भोजन तैयार होने की सूचना लेकर आता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.208.1)

ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः । पित्रे शशंसाथ स राजपुत्रः । धृष्टद्युम्नः सोमकानां प्रबर्हो । वृत्तं यथा येन हृता च कृष्णा ॥

tatastathoktaḥ parihṛṣṭarūpaḥ | pitre śaśaṃsātha sa rājaputraḥ | dhṛṣṭadyumnaḥ somakānāṃ prabarho | vṛttaṃ yathā yena hṛtā ca kṛṣṇā

पिता के ऐसा पूछने पर सोमकों में श्रेष्ठ राजकुमार धृष्टद्युम्न ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया — कृष्णा को किसने और किस प्रकार ले जाया।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 2 (1.208.2)

योऽसौ युवा व्यायतलोहिताक्षः । कृष्णाजिनी देवसमानरूपः । यः कार्मुकाग्र्यं कृतवानधिज्यं । लक्षं च यः पातितवान्पृथिव्याम् ॥

yo'sau yuvā vyāyatalohitākṣaḥ | kṛṣṇājinī devasamānarūpaḥ | yaḥ kārmukāgryaṃ kṛtavānadhijyaṃ | lakṣaṃ ca yaḥ pātitavānpṛthivyām

"वह युवक, जिसकी आँखें बड़ी और लाल आभा वाली थीं, जो काला मृगचर्म ओढ़े था और देवताओं के समान रूपवान था, जिसने उस श्रेष्ठ धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और लक्ष्य को भूमि पर गिरा दिया —

श्लोक 3 (1.208.3)

असज्जमानश्च ततस्तरस्वी । वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः । चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु । सर्वैश्च देवैर्ऋषिभिश्च जुष्टः ॥

asajjamānaśca tatastarasvī | vṛto dvijāgryairabhipūjyamānaḥ | cakrāma vajrīva diteḥ suteṣu | sarvaiśca devairṛṣibhiśca juṣṭaḥ

— वह वेगशाली वीर फिर बिना किसी रुकावट के, श्रेष्ठ ब्राह्मणों से घिरा और उनसे सम्मानित होकर वैसे ही चल पड़ा, जैसे सब देवताओं और ऋषियों से सेवित वज्रधारी इन्द्र दिति के पुत्रों के बीच चलते हैं।

श्लोक 4 (1.208.4)

कृष्णा प्रगृह्याजिनमन्वयात्तं । नागं यथा नागवधूः प्रहृष्टा । श्यामो युवा वारणमत्तगामी । कृत्वा महत्कर्म सुदुष्करं तत् ॥

kṛṣṇā pragṛhyājinamanvayāttaṃ | nāgaṃ yathā nāgavadhūḥ prahṛṣṭā | śyāmo yuvā vāraṇamattagāmī | kṛtvā mahatkarma suduṣkaraṃ tat

कृष्णा उसका मृगचर्म पकड़कर प्रसन्नतापूर्वक उसके पीछे-पीछे वैसे चली, जैसे हथिनी गजराज के पीछे चलती है। मतवाले हाथी की चाल से चलने वाला वह श्यामवर्ण युवक, जिसने वह अत्यन्त दुष्कर महान कार्य किया —

श्लोक 5 (1.208.5)

यः सूतपुत्रेण चकार युद्धं । शङ्केऽर्जुनं तं त्रिदशेशवीर्यम् । अमृष्यमाणेषु नराधिपेषु । क्रुद्धेषु वै तत्र समापतत्सु ॥

yaḥ sūtaputreṇa cakāra yuddhaṃ | śaṅke'rjunaṃ taṃ tridaśeśavīryam | amṛṣyamāṇeṣu narādhipeṣu | kruddheṣu vai tatra samāpatatsu

— और जिसने सूतपुत्र से युद्ध किया, मुझे लगता है कि वह देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी अर्जुन ही है। जब राजा यह सहन न कर सके और क्रोध में भरकर वहाँ उस पर टूट पड़े —

श्लोक 6 (1.208.6)

ततोऽपरः पार्थिवसङ्घमध्ये । प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् । प्राकालयत्तेन स पार्थिवौघान् । भीमोऽन्तकः प्राणभृतो यथैव ॥

tato'paraḥ pārthivasaṅghamadhye | pravṛddhamārujya mahīpraroham | prākālayattena sa pārthivaughān | bhīmo'ntakaḥ prāṇabhṛto yathaiva

— तब राजाओं के समूह के बीच एक दूसरे पुरुष ने एक बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उससे राजाओं की भीड़ को वैसे ही खदेड़ दिया, जैसे भयंकर यमराज प्राणियों को खदेड़ता है।

श्लोक 7 (1.208.7)

तौ पार्थिवानां मिषतां नरेन्द्र । कृष्णामुपादाय गतौ नराग्र्यौ । विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यौ । बाह्यां पुराद्भार्गवकर्मशालाम् ॥

tau pārthivānāṃ miṣatāṃ narendra | kṛṣṇāmupādāya gatau narāgryau | vibhrājamānāviva candrasūryau | bāhyāṃ purādbhārgavakarmaśālām

हे राजन्, राजाओं के देखते-देखते वे दोनों नरश्रेष्ठ कृष्णा को साथ लेकर, चन्द्रमा और सूर्य के समान दमकते हुए, नगर के बाहर एक कुम्हार की कर्मशाला में चले गए।

श्लोक 8 (1.208.8)

तत्रोपविष्टार्चिरिवानलस्य । तेषां जनित्रीति मम प्रतर्कः । तथाविधैरेव नरप्रवीरै- । रुपोपविष्टैस्त्रिभिरग्निकल्पैः ॥

tatropaviṣṭārcirivānalasya | teṣāṃ janitrīti mama pratarkaḥ | tathāvidhaireva narapravīrai- | rupopaviṣṭaistribhiragnikalpaiḥ

वहाँ अग्नि की ज्वाला के समान एक स्त्री बैठी थी — मेरा अनुमान है कि वह उनकी माता है — और उसके पास वैसे ही तीन और नरवीर बैठे थे, जो अग्नि के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 9 (1.208.9)

तस्यास्ततस्तावभिवाद्य पादा- । वुक्त्वा च कृष्णामभिवादयेति । स्थितौ च तत्रैव निवेद्य कृष्णां । भिक्षाप्रचाराय गता नराग्र्याः ॥

tasyāstatastāvabhivādya pādā- | vuktvā ca kṛṣṇāmabhivādayeti | sthitau ca tatraiva nivedya kṛṣṇāṃ | bhikṣāpracārāya gatā narāgryāḥ

उन दोनों ने उसके चरणों में प्रणाम किया और कृष्णा से कहा, 'इन्हें प्रणाम करो।' कृष्णा को उसे सौंपकर वे वहीं ठहरे, और फिर वे नरश्रेष्ठ भिक्षा माँगने निकल गए।

श्लोक 10 (1.208.10)

तेषां तु भैक्षं प्रतिगृह्य कृष्णा । दत्त्वा बलिं ब्राह्मणसाच्च कृत्वा । तां चैव वृद्धां परिवेष्य तांश्च । नरप्रवीरान्स्वयमप्यभुङ्क्त ॥

teṣāṃ tu bhaikṣaṃ pratigṛhya kṛṣṇā | dattvā baliṃ brāhmaṇasācca kṛtvā | tāṃ caiva vṛddhāṃ pariveṣya tāṃśca | narapravīrānsvayamapyabhuṅkta

कृष्णा ने उनकी लाई भिक्षा ग्रहण की, बलि अर्पित की और ब्राह्मणों को उनका भाग दिया; फिर उस वृद्धा को और उन नरवीरों को भोजन परोसकर अन्त में स्वयं भोजन किया।

श्लोक 11 (1.208.11)

सुप्तास्तु ते पार्थिव सर्व एव । कृष्णा च तेषां चरणोपधाने । आसीत्पृथिव्यां शयनं च तेषां । दर्भाजिनाग्रास्तरणोपपन्नम् ॥

suptāstu te pārthiva sarva eva | kṛṣṇā ca teṣāṃ caraṇopadhāne | āsītpṛthivyāṃ śayanaṃ ca teṣāṃ | darbhājināgrāstaraṇopapannam

हे राजन्, फिर वे सब सो गए, और कृष्णा उनके पैरों की ओर तकिये की भाँति लेटी। उनकी शय्या भूमि पर ही थी, जिस पर कुश और मृगचर्म बिछे थे।

श्लोक 12 (1.208.12)

ते नर्दमाना इव कालमेघाः । कथा विचित्राः कथयांबभूवुः । न वैश्यशूद्रौपयिकीः कथास्ता । न च द्विजानां कथयन्ति वीराः ॥

te nardamānā iva kālameghāḥ | kathā vicitrāḥ kathayāṃbabhūvuḥ | na vaiśyaśūdraupayikīḥ kathāstā | na ca dvijānāṃ kathayanti vīrāḥ

वे काले मेघों की भाँति गरजते-से तरह-तरह की अद्भुत कथाएँ कहते रहे। वे वीर न वैश्यों-शूद्रों जैसी बातें करते हैं, न ब्राह्मणों जैसी।

श्लोक 13 (1.208.13)

निःसंशयं क्षत्रियपुंगवास्ते । यथा हि युद्धं कथयन्ति राजन् । आशा हि नो व्यक्तमियं समृद्धा । मुक्तान्हि पार्थाञ्शृणुमोऽग्निदाहात् ॥

niḥsaṃśayaṃ kṣatriyapuṃgavāste | yathā hi yuddhaṃ kathayanti rājan | āśā hi no vyaktamiyaṃ samṛddhā | muktānhi pārthāñśṛṇumo'gnidāhāt

हे राजन्, निःसन्देह वे क्षत्रियों में श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे युद्ध की ही चर्चा करते हैं। स्पष्ट है कि हमारी आशा पूरी हो गई है, क्योंकि हम सुनते हैं कि कुन्ती के पुत्र आग में जलने से बच निकले थे।

श्लोक 14 (1.208.14)

यथा हि लक्ष्यं निहतं धनुश्च । सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य । यथा हि भाषन्ति परस्परं ते । छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ॥

yathā hi lakṣyaṃ nihataṃ dhanuśca | sajyaṃ kṛtaṃ tena tathā prasahya | yathā hi bhāṣanti parasparaṃ te | channā dhruvaṃ te pracaranti pārthāḥ

जिस प्रकार उसने लक्ष्य गिराया और बलपूर्वक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, और जिस प्रकार वे आपस में बातें करते हैं, उससे निश्चय ही वे छद्मवेश में घूमते कुन्ती के पुत्र ही हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (1.208.15)

ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः । पुरोहितं प्रेषयामास तेषाम् । विद्याम युष्मानिति भाषमाणो । महात्मानः पाण्डुसुताः स्थ कच्चित् ॥

tataḥ sa rājā drupadaḥ prahṛṣṭaḥ | purohitaṃ preṣayāmāsa teṣām | vidyāma yuṣmāniti bhāṣamāṇo | mahātmānaḥ pāṇḍusutāḥ stha kaccit

तब राजा द्रुपद ने प्रसन्न होकर अपने पुरोहित को उनके पास भेजा और कहा कि जाकर पूछो — 'हम आपका परिचय जानना चाहते हैं; क्या आप महात्मा पाण्डु के पुत्र हैं?'

श्लोक 16 (1.208.16)

गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा । गत्वा प्रशंसामभिधाय तेषाम् । वाक्यं समग्रं नृपतेर्यथाव- । दुवाच चानुक्रमविक्रमेण ॥

gṛhītavākyo nṛpateḥ purodhā | gatvā praśaṃsāmabhidhāya teṣām | vākyaṃ samagraṃ nṛpateryathāva- | duvāca cānukramavikrameṇa

राजा का सन्देश लेकर पुरोहित वहाँ गया और पहले उनकी प्रशंसा करके फिर राजा का पूरा सन्देश यथावत्, क्रम से कह सुनाया।

पुरोहित उवाच

श्लोक 17 (1.208.17)

विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः । पाञ्चालराजो वरदो वरार्हाः । लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा । हर्षस्य नान्तं प्रतिपद्यते सः ॥

vijñātumicchatyavanīśvaro vaḥ | pāñcālarājo varado varārhāḥ | lakṣyasya veddhāramimaṃ hi dṛṣṭvā | harṣasya nāntaṃ pratipadyate saḥ

"हे आदरणीय वीरो! वरदानी पाञ्चालनरेश, इस भूमि के स्वामी, आपका परिचय जानना चाहते हैं। लक्ष्य वेधने वाले इस वीर को देखकर उनके हर्ष का अन्त नहीं है।

श्लोक 18 (1.208.18)

आख्यात च ज्ञातिकुलानुपूर्वीम् । पदं शिरःसु द्विषतां कुरुध्वम् । प्रह्लादयध्वं हृदयं ममेदं । पाञ्चालराजस्य च सानुगस्य ॥

ākhyāta ca jñātikulānupūrvīm | padaṃ śiraḥsu dviṣatāṃ kurudhvam | prahlādayadhvaṃ hṛdayaṃ mamedaṃ | pāñcālarājasya ca sānugasya

'अपने बन्धु-बान्धवों और कुल का क्रम से परिचय दीजिए; शत्रुओं के सिर पर पैर रखिए, और मेरे इस हृदय को तथा अनुचरों सहित पाञ्चालराज के हृदय को आनन्दित कीजिए।

श्लोक 19 (1.208.19)

पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः । प्रियः सखा चात्मसमो बभूव । तस्यैष कामो दुहिता ममेयं । स्नुषा यदि स्यादिह कौरवस्य ॥

pāṇḍurhi rājā drupadasya rājñaḥ | priyaḥ sakhā cātmasamo babhūva | tasyaiṣa kāmo duhitā mameyaṃ | snuṣā yadi syādiha kauravasya

'क्योंकि राजा पाण्डु राजा द्रुपद के प्रिय मित्र थे, उन्हें अपने ही समान प्रिय। उनकी यही कामना थी कि मेरी यह पुत्री कुरुवंशी पाण्डु की पुत्रवधू बने।

श्लोक 20 (1.208.20)

अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो । हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः । यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहु- । र्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् ॥

ayaṃ hi kāmo drupadasya rājño | hṛdi sthito nityamaninditāṅgāḥ | yadarjuno vai pṛthudīrghabāhu- | rdharmeṇa vindeta sutāṃ mamaitām

'हे निर्दोष अंगों वाले वीरो, राजा द्रुपद के हृदय में सदा यही कामना रही है कि विशाल और लम्बी भुजाओं वाले अर्जुन धर्मपूर्वक मेरी इस पुत्री को प्राप्त करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (1.208.21)

कृतं हि तत्स्यात्सुकृतं ममेदं । यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् । अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं । ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥

kṛtaṃ hi tatsyātsukṛtaṃ mamedaṃ | yaśaśca puṇyaṃ ca hitaṃ tadetat | athoktavākyaṃ hi purohitaṃ sthitaṃ | tato vinītaṃ samudīkṣya rājā

'तब मेरा यह कार्य सफल होगा; यही मेरे लिए यश, पुण्य और हित होगा।'" सन्देश कहकर पुरोहित विनम्रभाव से खड़ा रहा। तब राजा ने उसकी ओर देखा —

श्लोक 22 (1.208.22)

समीपतो भीममिदं शशास । प्रदीयतां पाद्यमर्घ्यं तथाऽस्मै । मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ- । स्तस्मै प्रयोज्याऽभ्यधिका हि पूजा ॥

samīpato bhīmamidaṃ śaśāsa | pradīyatāṃ pādyamarghyaṃ tathā'smai | mānyaḥ purodhā drupadasya rājña- | stasmai prayojyā'bhyadhikā hi pūjā

— और पास बैठे भीम को यह आज्ञा दी: 'इन्हें पाद्य और अर्घ्य दिया जाए। ये राजा द्रुपद के माननीय पुरोहित हैं; इनका विशेष सत्कार होना चाहिए।'

श्लोक 23 (1.208.23)

भीमस्ततस्तत्कृतवान्नरेन्द्र । तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् । सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा । युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥

bhīmastatastatkṛtavānnarendra | tāṃ caiva pūjāṃ pratigṛhya harṣāt | sukhopaviṣṭaṃ tu purohitaṃ tadā | yudhiṣṭhiro brāhmaṇamityuvāca

हे नरेन्द्र, भीम ने वैसा ही किया। पुरोहित ने वह सत्कार प्रसन्नता से स्वीकार किया और जब वे सुखपूर्वक बैठ गए, तब युधिष्ठिर ने उन ब्राह्मण से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (1.208.24)

पाञ्चालराजेन सुता निसृष्टा । स्वधर्मदृष्टेन यथा न कामात् । प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा । सा तेन वीरेण तथाऽनुवृत्ता ॥

pāñcālarājena sutā nisṛṣṭā | svadharmadṛṣṭena yathā na kāmāt | pradiṣṭaśulkā drupadena rājñā | sā tena vīreṇa tathā'nuvṛttā

"पाञ्चालनरेश ने अपनी पुत्री को अपने धर्म के अनुसार दिया है, अपनी इच्छा से नहीं। राजा द्रुपद ने उसका शुल्क निश्चित किया था, और इस वीर ने उसी के अनुसार उसे पूरा किया है।

श्लोक 25 (1.208.25)

न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा । न चापि शीले न कुले न गोत्रे । कृतेन सज्येन हि कार्मुकेण । विद्धेन लक्ष्येण हि सा विसृष्टा ॥

na tatra varṇeṣu kṛtā vivakṣā | na cāpi śīle na kule na gotre | kṛtena sajyena hi kārmukeṇa | viddhena lakṣyeṇa hi sā visṛṣṭā

वहाँ न वर्ण का प्रश्न उठाया गया था, न शील, कुल या गोत्र का। धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने और लक्ष्य वेधने के बदले ही वह दी गई थी।

श्लोक 26 (1.208.26)

सेयं तथाऽनेन महात्मनेह । कृष्णा जिता पार्थिवसङ्घमध्ये । नैवं गते सौमकिरद्य राजा । सन्तापमर्हत्यसुखाय कर्तुम् ॥

seyaṃ tathā'nena mahātmaneha | kṛṣṇā jitā pārthivasaṅghamadhye | naivaṃ gate saumakiradya rājā | santāpamarhatyasukhāya kartum

इसी प्रकार इस महात्मा ने राजाओं के समूह के बीच कृष्णा को जीता है। ऐसी स्थिति में सोमकवंशी राजा को आज सन्ताप करके स्वयं को दुखी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 27 (1.208.27)

कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः । स चापि संपत्स्यति पार्थिवस्य । संप्राप्यरूपां हि नरेन्द्रकन्या- । मिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये ॥

kāmaśca yo'sau drupadasya rājñaḥ | sa cāpi saṃpatsyati pārthivasya | saṃprāpyarūpāṃ hi narendrakanyā- | mimāmahaṃ brāhmaṇa sādhu manye

और राजा द्रुपद की जो कामना है, वह भी पूरी होगी। हे ब्राह्मण, मैं इस राजकन्या को हमारे सर्वथा योग्य मानता हूँ।

श्लोक 28 (1.208.28)

न तद्धनुर्मन्दबलेन शक्यं । मौर्व्या समायोजयितुं तथाहि । न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन । लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥

na taddhanurmandabalena śakyaṃ | maurvyā samāyojayituṃ tathāhi | na cākṛtāstreṇa na hīnajena | lakṣyaṃ tathā pātayituṃ hi śakyam

उस धनुष पर कोई अल्पबली प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता, और न अस्त्रविद्या से अनभिज्ञ या हीन कुल में जन्मा कोई व्यक्ति उस प्रकार लक्ष्य गिरा सकता है।

श्लोक 29 (1.208.29)

तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं । पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य । न चापि तत्पातनमन्यथेह । कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥

tasmānna tāpaṃ duhiturnimittaṃ | pāñcālarājo'rhati kartumadya | na cāpi tatpātanamanyatheha | kartuṃ hi śakyaṃ bhuvi mānavena

इसलिए पाञ्चालराज को आज अपनी पुत्री के कारण दुखी नहीं होना चाहिए। पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य उस लक्ष्य को किसी और प्रकार गिरा ही नहीं सकता था।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (1.208.30)

एवं ब्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु । पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः । तत्राजगामाशु नरो द्वितीयो । निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥

evaṃ bruvatyeva yudhiṣṭhire tu | pāñcālarājasya samīpato'nyaḥ | tatrājagāmāśu naro dvitīyo | nivedayiṣyanniha siddhamannam

युधिष्ठिर यह कह ही रहे थे कि पाञ्चालराज के पास से एक दूसरा व्यक्ति शीघ्रता से वहाँ आया, यह सूचना देने के लिए कि भोजन तैयार है।

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