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आदि पर्व · अध्याय 237

पाँच अप्सराओं की मुक्ति और बभ्रुवाहन का जन्म

वर्गा अपनी कथा आगे सुनाती है: अप्सराओं ने ब्राह्मण से क्षमा माँगी, तब उसने शाप की सीमा बाँध दी और कहा कि एक दिन कोई श्रेष्ठ पुरुष उन्हें जल से निकालेगा और उनका रूप लौट आएगा, तथा ये तीर्थ "नारीतीर्थ" के नाम से विख्यात होंगे। फिर नारद ने उन्हें अर्जुन की प्रतीक्षा करने के लिए दक्षिण के पाँच तीर्थों में भेजा। अर्जुन इसी प्रकार उसकी चारों सखियों को भी मुक्त करते हैं, फिर मणलूर लौटते हैं, जहाँ चित्राङ्गदा से उनका पुत्र बभ्रुवाहन जन्म लेता है। वे उस बालक को शुल्क के रूप में चित्रवाहन को सौंपते हैं, चित्राङ्गदा से उसका पालन करने और युधिष्ठिर के राजसूय में इन्द्रप्रस्थ आने को कहते हैं, और केरल देश को पार करके पशुपति के आदि-स्थान गोकर्ण पहुँचते हैं।

अध्याय 236अध्याय-सूचीअध्याय 238

वर्गोवाच

श्लोक 1 (1.237.1)

ततो वयं प्रव्यथिताः सर्वा भारतसत्तम । अयाम शरणं विप्रं तं तपोधनमच्युतम् ॥

tato vayaṃ pravyathitāḥ sarvā bhāratasattama | ayāma śaraṇaṃ vipraṃ taṃ tapodhanamacyutam

"तब हे भरतश्रेष्ठ, हम सब अत्यन्त व्यथित होकर उस अविचल तपोधन ब्राह्मण की शरण में गईं।

श्लोक 2 (1.237.2)

रूपेण वयसा चैव कन्दर्पेण च दर्पिताः । अयुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज ॥

rūpeṇa vayasā caiva kandarpeṇa ca darpitāḥ | ayuktaṃ kṛtavatyaḥ sma kṣantumarhasi no dvija

'रूप, यौवन और काम के मद में आकर हमने अनुचित कार्य किया है। हे द्विज, हमें क्षमा कर दीजिए।

श्लोक 3 (1.237.3)

एष एव वधोऽस्माकं स्वयं प्राप्तस्तपोधन । यद्वयं संशितात्मानं प्रलोब्धुं त्वामिहागताः ॥

eṣa eva vadho'smākaṃ svayaṃ prāptastapodhana | yadvayaṃ saṃśitātmānaṃ pralobdhuṃ tvāmihāgatāḥ

हे तपोधन, यही हमारे लिए मृत्यु के समान है, जो हमने स्वयं ही बुलाई है — कि हम आप जैसे संयमी को लुभाने यहाँ आईं।

श्लोक 4 (1.237.4)

अवध्यास्तु स्त्रियः सृष्टा मन्यन्ते धर्मचारिणः । तस्माद्धर्मेण वर्ध त्वं नास्मान्हिंसितुमर्हसि ॥

avadhyāstu striyaḥ sṛṣṭā manyante dharmacāriṇaḥ | tasmāddharmeṇa vardha tvaṃ nāsmānhiṃsitumarhasi

धर्म का आचरण करने वाले मानते हैं कि स्त्रियाँ अवध्य रची गई हैं। इसलिए आप धर्म से ही बढ़ें; हमें कष्ट देना आपके योग्य नहीं।

श्लोक 5 (1.237.5)

सर्वभूतेषु धर्मज्ञ मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । सत्यो भवतु कल्याण एष वादो मनीषिणाम् ॥

sarvabhūteṣu dharmajña maitro brāhmaṇa ucyate | satyo bhavatu kalyāṇa eṣa vādo manīṣiṇām

हे धर्मज्ञ, ब्राह्मण को सब प्राणियों का मित्र कहा जाता है। हे कल्याणमय, मनीषियों का यह कथन सत्य सिद्ध हो।

श्लोक 6 (1.237.6)

शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनम् । शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म तस्मात्त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥

śaraṇaṃ ca prapannānāṃ śiṣṭāḥ kurvanti pālanam | śaraṇaṃ tvāṃ prapannāḥ sma tasmāttvaṃ kṣantumarhasi

सज्जन शरण में आए हुओं की रक्षा करते हैं। हम आपकी शरण में आई हैं, इसलिए आप हमें क्षमा करें।'

श्लोक 7 (1.237.7)

एवमुक्तः स धर्मात्मा ब्राह्मणः शुभकर्मकृत् । प्रसादं कृतवान्वीर रविसोमसमप्रभः ॥

evamuktaḥ sa dharmātmā brāhmaṇaḥ śubhakarmakṛt | prasādaṃ kṛtavānvīra ravisomasamaprabhaḥ

हे वीर, ऐसा कहे जाने पर सूर्य और चन्द्रमा के समान तेजस्वी, शुभ कर्म करने वाले उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने हम पर कृपा की।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 8 (1.237.8)

शतं शतसहस्रं तु सर्वमक्षय्यवाचकम् । परिमाणं शतं त्वेतन्नेदमक्षय्यवाचकम् ॥

śataṃ śatasahasraṃ tu sarvamakṣayyavācakam | parimāṇaṃ śataṃ tvetannedamakṣayyavācakam

'"सौ" और "लाख" — ऐसे सभी शब्द अक्षय (अनन्त) के वाचक भी हो सकते हैं। पर मेरा यह "सौ" एक निश्चित परिमाण है; यह अक्षय का वाचक नहीं है।

श्लोक 9 (1.237.9)

यदा च वो ग्राहभूता गृह्णन्तीः पुरुषाञ्जले । उत्कर्षति जलात्तस्मात्स्थलं पुरुषसत्तमः ॥

yadā ca vo grāhabhūtā gṛhṇantīḥ puruṣāñjale | utkarṣati jalāttasmātsthalaṃ puruṣasattamaḥ

जब ग्राह बनकर जल में मनुष्यों को पकड़ती हुई तुम्हें कोई पुरुषश्रेष्ठ उस जल से खींचकर स्थल पर ले आएगा,

श्लोक 10 (1.237.10)

तदा यूयं पुनः सर्वाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ । अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन ॥

tadā yūyaṃ punaḥ sarvāḥ svaṃ rūpaṃ pratipatsyatha | anṛtaṃ noktapūrvaṃ me hasatāpi kadācana

तब तुम सब फिर से अपना रूप पा लोगी। मैंने पहले कभी हँसी में भी झूठ नहीं बोला।

श्लोक 11 (1.237.11)

तानि सर्वाणि तीर्थानि ततः प्रभृति चैव ह । नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्यातिं यास्यन्ति सर्वशः । पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीषिणां ॥

tāni sarvāṇi tīrthāni tataḥ prabhṛti caiva ha | nārītīrthāni nāmneha khyātiṃ yāsyanti sarvaśaḥ | puṇyāni ca bhaviṣyanti pāvanāni manīṣiṇāṃ

और तब से वे सब तीर्थ यहाँ "नारीतीर्थ" के नाम से सर्वत्र विख्यात होंगे, और मनीषियों के लिए पुण्यदायक तथा पावन होंगे।'

वर्गोवाच

श्लोक 12 (1.237.12)

ततोऽभिवाद्य तं विप्रं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । अचिन्तयामोऽपसृत्य तस्माद्देशात्सुदुःखिताः ॥

tato'bhivādya taṃ vipraṃ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | acintayāmo'pasṛtya tasmāddeśātsuduḥkhitāḥ

तब उस ब्राह्मण को प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके हम बहुत दुःखी होकर उस स्थान से दूर चली गईं और सोचने लगीं —

श्लोक 13 (1.237.13)

क्व नु नाम वयं सर्वाः कालेनाल्पेन तं नरम् । समागच्छेम यो नस्तद्रूपमापादयेत्पुनः ॥

kva nu nāma vayaṃ sarvāḥ kālenālpena taṃ naram | samāgacchema yo nastadrūpamāpādayetpunaḥ

'हम सब थोड़े ही समय में उस पुरुष से कहाँ मिलें, जो हमें फिर से हमारा रूप लौटा दे?'

श्लोक 14 (1.237.14)

ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत । दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम् ॥

tā vayaṃ cintayitvaiva muhūrtādiva bhārata | dṛṣṭavatyo mahābhāgaṃ devarṣimuta nāradam

हे भारत, हम ऐसा सोच ही रही थीं कि क्षण भर में हमें महाभाग देवर्षि नारद दिखाई दिए।

श्लोक 15 (1.237.15)

संप्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम् । अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्रीडिताननाः ॥

saṃprahṛṣṭāḥ sma taṃ dṛṣṭvā devarṣimamitadyutim | abhivādya ca taṃ pārtha sthitāḥ sma vrīḍitānanāḥ

हे पार्थ, उन अपार तेज वाले देवर्षि को देखकर हम अत्यन्त हर्षित हुईं, उन्हें प्रणाम किया और लज्जा से मुख झुकाए खड़ी रहीं।

श्लोक 16 (1.237.16)

स नोऽपृच्छद्दुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम् । श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत् ॥

sa no'pṛcchadduḥkhamūlamuktavatyo vayaṃ ca tam | śrutvā tatra yathāvṛttamidaṃ vacanamabravīt

उन्होंने हमसे हमारे दुःख का कारण पूछा, और हमने उन्हें बता दिया। वहाँ सारा वृत्तान्त सुनकर उन्होंने यह कहा —

श्लोक 17 (1.237.17)

दक्षिणे सागरानूपे पञ्च तीर्थानि सन्ति वै । पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरं ॥

dakṣiṇe sāgarānūpe pañca tīrthāni santi vai | puṇyāni ramaṇīyāni tāni gacchata mā ciraṃ

'दक्षिणी समुद्र-तट पर पाँच तीर्थ हैं, जो पवित्र और रमणीय हैं। बिना देर किए वहाँ जाओ।

श्लोक 18 (1.237.18)

तत्राशु पुरुषव्याघ्रः पाण्डवेयो धनञ्जयः । मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः ॥

tatrāśu puruṣavyāghraḥ pāṇḍaveyo dhanañjayaḥ | mokṣayiṣyati śuddhātmā duḥkhādasmānna saṃśayaḥ

वहाँ पुरुषसिंह, शुद्धात्मा पाण्डुपुत्र धनञ्जय शीघ्र ही तुम्हें इस दुःख से छुड़ा देंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।'

श्लोक 19 (1.237.19)

इत्युक्त्वा नारदः सर्वास्तत्रैवान्तरधीयत । तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमितो गताः । तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वयाऽनघ ॥

ityuktvā nāradaḥ sarvāstatraivāntaradhīyata | tasya sarvā vayaṃ vīra śrutvā vākyamito gatāḥ | tadidaṃ satyamevādya mokṣitāhaṃ tvayā'nagha

हम सबसे यह कहकर नारद वहीं अन्तर्धान हो गए। हे वीर, उनकी बात सुनकर हम सब यहाँ आईं; और आज वह सत्य हो गई — हे निष्पाप, तुमने मुझे मुक्त कर दिया।

श्लोक 20 (1.237.20)

एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः । कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय ॥

etāstu mama tāḥ sakhyaścatasro'nyā jale śritāḥ | kuru karma śubhaṃ vīra etāḥ sarvā vimokṣaya

पर मेरी वे चार सखियाँ अब भी जल में हैं। हे वीर, यह शुभ कर्म करो — उन सबको भी मुक्त कर दो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (1.237.21)

ततस्ताः पाण्डवश्रेष्ठः सर्वा एव विशांपते । अवगाह्य च तत्तीर्थं गृहीतो ग्राहिभिस्तदा ॥

tatastāḥ pāṇḍavaśreṣṭhaḥ sarvā eva viśāṃpate | avagāhya ca tattīrthaṃ gṛhīto grāhibhistadā

हे प्रजानाथ, तब पाण्डवश्रेष्ठ ने उन सबको मुक्त किया — वे एक-एक तीर्थ में उतरते, तो वहाँ की ग्राहियाँ उन्हें पकड़ लेतीं,

श्लोक 22 (1.237.22)

ग्राहीभिश्चोत्तताराशु तारयामास तत्क्षणात् । सा चाप्सरा बभूवाशु सर्वाभरणभूषिता ॥

grāhībhiścottatārāśu tārayāmāsa tatkṣaṇāt | sā cāpsarā babhūvāśu sarvābharaṇabhūṣitā

और वे उन ग्राहियों को लेकर तुरन्त जल से बाहर आते, उसी क्षण उन्हें पार ले आते; और वह ग्राही तत्काल सब आभूषणों से सजी अप्सरा बन जाती।

श्लोक 23 (1.237.23)

एवं क्रमेण ताः सर्वा मोक्षयामास वीर्यवान् ॥

evaṃ krameṇa tāḥ sarvā mokṣayāmāsa vīryavān

इस प्रकार उस पराक्रमी वीर ने क्रम से उन सबको मुक्त कर दिया।

श्लोक 24 (1.237.24)

उत्थाय च जलात्तस्मात्प्रतिलभ्य वपुः स्वकम् । तास्तदाऽप्सरसो राजन्नदृश्यन्त यथा पुरा ॥

utthāya ca jalāttasmātpratilabhya vapuḥ svakam | tāstadā'psaraso rājannadṛśyanta yathā purā

हे राजन्, जल से निकलकर और अपना शरीर फिर से पाकर वे अप्सराएँ पहले जैसी दिखाई देने लगीं।

श्लोक 25 (1.237.25)

तीर्थानि शोधयित्वा तु तथानुज्ञाय ताः प्रभुः । चित्राङ्गदां पुनर्द्रष्टुं मणलूरं पुनर्ययौ ॥

tīrthāni śodhayitvā tu tathānujñāya tāḥ prabhuḥ | citrāṅgadāṃ punardraṣṭuṃ maṇalūraṃ punaryayau

तीर्थों को शुद्ध करके और अप्सराओं को जाने की अनुमति देकर वे प्रभु चित्राङ्गदा को फिर देखने के लिए मणलूर लौट गए।

श्लोक 26 (1.237.26)

तस्यामजनयत्पुत्रं राजानं बभ्रुवाहनम् । तं दृष्ट्वा पाण्डवो राजंश्चित्रवाहनमब्रवीत् ॥

tasyāmajanayatputraṃ rājānaṃ babhruvāhanam | taṃ dṛṣṭvā pāṇḍavo rājaṃścitravāhanamabravīt

उन्होंने चित्राङ्गदा से पुत्र उत्पन्न किया — राजा बभ्रुवाहन। हे राजन्, उसे देखकर पाण्डव ने चित्रवाहन से कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (1.237.27)

चित्राङ्गदायाः शुल्कं त्वं गृहाण बभ्रुवाहनम् । अनेन च भविष्यामि ऋणान्मुक्तो नराधिप ॥

citrāṅgadāyāḥ śulkaṃ tvaṃ gṛhāṇa babhruvāhanam | anena ca bhaviṣyāmi ṛṇānmukto narādhipa

"हे नराधिप, चित्राङ्गदा के शुल्क के रूप में आप बभ्रुवाहन को ग्रहण करें। इसके द्वारा मैं आपके ऋण से मुक्त हो जाऊँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (1.237.28)

चित्राङ्गदां पुनर्वाक्यमब्रवीत्पाण्डुनन्दनः । इहैव भव भद्रं ते वर्धेथा बभ्रुवाहनम् ॥

citrāṅgadāṃ punarvākyamabravītpāṇḍunandanaḥ | ihaiva bhava bhadraṃ te vardhethā babhruvāhanam

फिर पाण्डुनन्दन ने चित्राङ्गदा से कहा — "तुम्हारा कल्याण हो, तुम यहीं रहो और बभ्रुवाहन का पालन-पोषण करो।

अर्जुन उवाच

श्लोक 29 (1.237.29)

इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्रागत्य रंस्यसि । कुन्तीं युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ ॥

indraprasthanivāsaṃ me tvaṃ tatrāgatya raṃsyasi | kuntīṃ yudhiṣṭhiraṃ bhīmaṃ bhrātarau me kanīyasau

तुम मेरे निवास इन्द्रप्रस्थ में आकर वहाँ आनन्द से रहोगी। माता कुन्ती, युधिष्ठिर, भीम और मेरे दोनों छोटे भाइयों को,

श्लोक 30 (1.237.30)

आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च बान्धवान् । बान्धवैः सहिता सर्वैर्नन्दसे त्वमनिन्दिते ॥

āgatya tatra paśyethā anyānapi ca bāndhavān | bāndhavaiḥ sahitā sarvairnandase tvamanindite

और अन्य सम्बन्धियों को भी तुम वहाँ आकर देखोगी; हे अनिन्दिते, सब बन्धु-बान्धवों के साथ तुम आनन्दित रहोगी।

श्लोक 31 (1.237.31)

धर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः । जित्वा तु पृथिवीं सर्वां राजसूयं करिष्यति ॥

dharme sthitaḥ satyadhṛtiḥ kaunteyo'tha yudhiṣṭhiraḥ | jitvā tu pṛthivīṃ sarvāṃ rājasūyaṃ kariṣyati

धर्म में स्थित और सत्य पर अडिग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सारी पृथ्वी को जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे।

श्लोक 32 (1.237.32)

तत्रागच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः । बहूनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता ॥

tatrāgacchanti rājānaḥ pṛthivyāṃ nṛpasaṃjñitāḥ | bahūni ratnānyādāya āgamiṣyati te pitā

उसमें पृथ्वी के वे सब शासक आएँगे जो राजा कहलाते हैं; तुम्हारे पिता भी बहुत-से रत्न लेकर आएँगे।

श्लोक 33 (1.237.33)

एकसार्थं प्रयातासि चित्रवाहनसेवया । द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः ॥

ekasārthaṃ prayātāsi citravāhanasevayā | drakṣyāmi rājasūye tvāṃ putraṃ pālaya mā śucaḥ

तुम चित्रवाहन की सेवा में उन्हीं के साथ एक ही दल में आओगी। राजसूय में मैं तुमसे मिलूँगा। पुत्र का पालन करो और शोक मत करो।

श्लोक 34 (1.237.34)

बभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो बहिश्चरः । तस्माद्भरस्व पुत्रं वै पुरुषं वंशवर्धनम् ॥

babhruvāhananāmnā tu mama prāṇo bahiścaraḥ | tasmādbharasva putraṃ vai puruṣaṃ vaṃśavardhanam

बभ्रुवाहन नाम से मेरे ही प्राण मेरे शरीर से बाहर विचर रहे हैं। इसलिए वंश को बढ़ाने वाले इस पुत्र का भरण-पोषण करो —

श्लोक 35 (1.237.35)

चित्रवाहनदायादं धर्मात्पौरवनन्दनम् । पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात्पालय सर्वदा ॥

citravāhanadāyādaṃ dharmātpauravanandanam | pāṇḍavānāṃ priyaṃ putraṃ tasmātpālaya sarvadā

वह चित्रवाहन का उत्तराधिकारी है, धर्म से पौरवों को आनन्द देने वाला है, पाण्डवों का प्रिय पुत्र है — इसलिए सदा उसकी रक्षा करना।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (1.237.36)

विप्रयोगेण संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते । चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा सागरानूपमाश्रितः ॥

viprayogeṇa saṃtāpaṃ mā kṛthāstvamanindite | citrāṅgadāmevamuktvā sāgarānūpamāśritaḥ

हे अनिन्दिते, वियोग के कारण सन्ताप मत करना।" चित्राङ्गदा से ऐसा कहकर वे समुद्र-तट की ओर चल पड़े,

श्लोक 37 (1.237.37)

स्थानं दूरं समाप्लुत्य दत्त्वा बहुधनं तदा । केरलान्समतिक्रम्य गोकर्णमभितोऽगमत् ॥

sthānaṃ dūraṃ samāplutya dattvā bahudhanaṃ tadā | keralānsamatikramya gokarṇamabhito'gamat

और एक दूर के पवित्र स्थान पर स्नान करके तथा बहुत-सा धन दान करके, केरल देश को पार कर वे गोकर्ण पहुँचे —

श्लोक 38 (1.237.38)

आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम् । यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम् ॥

ādyaṃ paśupateḥ sthānaṃ darśanādeva muktidam | yatra pāpo'pi manujaḥ prāpnotyabhayadaṃ padam

जो पशुपति का आदि-स्थान है, जिसके दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है, और जहाँ पापी मनुष्य भी अभय पद को प्राप्त कर लेता है।

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