Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 251

अग्नि द्वारा अर्जुन और कृष्ण को अस्त्र-दान; खाण्डव-दाह का आरम्भ

अग्नि वरुण का स्मरण करके उनसे वह धनुष, दो तरकश और वानर-ध्वज वाला रथ माँगते हैं जो उन्हें सोम ने दिया था। वरुण गाण्डीव, अक्षय तरकश और हनुमान की ध्वजा वाला रथ दे देते हैं; अर्जुन रथ पर चढ़कर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, और अग्नि कृष्ण को चक्र तथा आग्नेय अस्त्र देते हैं और वरुण उन्हें कौमोदकी गदा देते हैं। इन्द्र और सब देवताओं से लड़ने को तैयार अर्जुन और कृष्ण अग्नि से प्रज्वलित होने को कहते हैं, और अग्निदेव तेजोमय रूप धारण करके खाण्डव वन को जलाने लगते हैं।

अध्याय 250अध्याय-सूचीअध्याय 252

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.251.1)

एवमुक्तः स भगवान्धूमकेतुर्हुताशनः । चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया ॥

evamuktaḥ sa bhagavāndhūmaketurhutāśanaḥ | cintayāmāsa varuṇaṃ lokapālaṃ didṛkṣayā

ऐसा कहे जाने पर धुएँ को ध्वजा बनाने वाले भगवान अग्निदेव ने लोकपाल वरुण के दर्शन की इच्छा से उनका स्मरण किया,

श्लोक 2 (1.251.2)

आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम् । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् ॥

ādityamudake devaṃ nivasantaṃ jaleśvaram | sa ca taccintitaṃ jñātvā darśayāmāsa pāvakam

उन अदितिपुत्र देवता का, जो जल के स्वामी हैं और जल में निवास करते हैं। वरुण ने यह जानकर कि उनका स्मरण किया गया है, अग्नि को दर्शन दिए।

श्लोक 3 (1.251.3)

तमब्रवीद्धूमकेतुः प्रतिगृह्य जलेश्वरम् । चतुर्थं लोकपालानां देवदेवं सनातनम् ॥

tamabravīddhūmaketuḥ pratigṛhya jaleśvaram | caturthaṃ lokapālānāṃ devadevaṃ sanātanam

जल के स्वामी, लोकपालों में चौथे, सनातन देवाधिदेव वरुण का स्वागत करके धूमकेतु अग्नि ने उनसे कहा—

श्लोक 4 (1.251.4)

सोमेन राज्ञा यद्दत्तं धनुश्चैवेषुधी च ते । तत्प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ॥

somena rājñā yaddattaṃ dhanuścaiveṣudhī ca te | tatprayacchobhayaṃ śīghraṃ rathaṃ ca kapilakṣaṇam

"राजा सोम ने आपको जो धनुष और दो तरकश दिए थे, वे दोनों मुझे शीघ्र दीजिए, और वानर के चिह्न वाला रथ भी।

श्लोक 5 (1.251.5)

कार्यं च सुमहत्पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति । चक्रेण वासुदेवश्च तन्ममाद्य प्रदीयताम् ॥

kāryaṃ ca sumahatpārtho gāṇḍīvena kariṣyati | cakreṇa vāsudevaśca tanmamādya pradīyatām

पार्थ गाण्डीव से और वासुदेव चक्र से बहुत बड़ा कार्य करेंगे। इसलिए आज वह मुझे दे दिया जाए।"

श्लोक 6 (1.251.6)

ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत । तदद्भुतं महावीर्यं यशःकीर्तिविवर्धनम् ॥

dadānītyeva varuṇaḥ pāvakaṃ pratyabhāṣata | tadadbhutaṃ mahāvīryaṃ yaśaḥkīrtivivardhanam

वरुण ने अग्नि को उत्तर दिया, "देता हूँ।" वह अद्भुत, महाशक्तिशाली धनुष, जो यश और कीर्ति बढ़ाने वाला था,

श्लोक 7 (1.251.7)

सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च । सर्वायुधमहामात्रं परसैन्यप्रधर्षणम् ॥

sarvaśastrairanādhṛṣyaṃ sarvaśastrapramāthi ca | sarvāyudhamahāmātraṃ parasainyapradharṣaṇam

जिसे कोई शस्त्र दबा नहीं सकता था और जो सब शस्त्रों को मथ डालता था, जो सब आयुधों में प्रधान और शत्रु-सेना को कुचल देने वाला था,

श्लोक 8 (1.251.8)

एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् । चित्रमुच्चावचैर्वर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमव्रणम् ॥

ekaṃ śatasahasreṇa saṃmitaṃ rāṣṭravardhanam | citramuccāvacairvarṇaiḥ śobhitaṃ ślakṣṇamavraṇam

जो अकेला एक लाख के बराबर था, राष्ट्र को बढ़ाने वाला था, भाँति-भाँति के रंगों से चित्रित, सुशोभित, चिकना और दोषरहित था,

श्लोक 9 (1.251.9)

देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः । प्रादाच्चैव धनूरत्नमक्षय्यौ च महेषुधी ॥

devadānavagandharvaiḥ pūjitaṃ śāśvatīḥ samāḥ | prādāccaiva dhanūratnamakṣayyau ca maheṣudhī

और जिसे देवता, दानव और गन्धर्व अनन्त वर्षों से पूजते आए थे, धनुषों में रत्न के समान वह धनुष उन्होंने दे दिया, और दो बड़े अक्षय तरकश भी;

श्लोक 10 (1.251.10)

रथं च दिव्याश्वयुजं कपिप्रवरकेतनम् । उपेतं राजतैरश्वैर्गान्धर्वैर्हेममालिभिः ॥

rathaṃ ca divyāśvayujaṃ kapipravaraketanam | upetaṃ rājatairaśvairgāndharvairhemamālibhiḥ

और दिव्य घोड़ों से जुता, श्रेष्ठ वानर की ध्वजा वाला वह रथ भी, जिसमें सोने की मालाएँ पहने चाँदी जैसे श्वेत गन्धर्व-देश के घोड़े जुते थे,

श्लोक 11 (1.251.11)

पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवायुसमैर्जवे । सर्वोपकरणैर्युक्तमजय्यं देवदानवैः ॥

pāṇḍurābhrapratīkāśairmanovāyusamairjave | sarvopakaraṇairyuktamajayyaṃ devadānavaiḥ

जो श्वेत बादलों के समान थे और वेग में मन और वायु के बराबर थे; वह रथ सब साधनों से युक्त था और देवता या दानव भी उसे जीत नहीं सकते थे,

श्लोक 12 (1.251.12)

भानुमन्तं महाघोषं सर्वरत्नमनोरमम् । ससर्ज यं सुतपसा भौमनो भुवनप्रभुः ॥

bhānumantaṃ mahāghoṣaṃ sarvaratnamanoramam | sasarja yaṃ sutapasā bhaumano bhuvanaprabhuḥ

वह रथ दीप्तिमान, महान घोष करने वाला और सब प्रकार के रत्नों से मनोहर था; उसे जगत के स्वामी भौमन ने अपने महान तप से रचा था,

श्लोक 13 (1.251.13)

प्रजापतिरनिर्देश्यं यस्य रूपं रवेरिव । यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजयत्प्रभुः ॥

prajāpatiranirdeśyaṃ yasya rūpaṃ raveriva | yaṃ sma somaḥ samāruhya dānavānajayatprabhuḥ

उन प्रजापति ने; उस रथ का रूप सूर्य के समान अवर्णनीय था, और उसी पर चढ़कर प्रभु सोम ने कभी दानवों को जीता था।

श्लोक 14 (1.251.14)

नवमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिया । आश्रितौ तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमावुभौ ॥

navameghapratīkāśaṃ jvalantamiva ca śriyā | āśritau taṃ rathaśreṣṭhaṃ śakrāyudhasamāvubhau

वह नए मेघ के समान दिखता था और अपनी शोभा से मानो जल रहा था। उस श्रेष्ठ रथ पर इन्द्रधनुष के समान दो वस्तुएँ स्थित थीं—

श्लोक 15 (1.251.15)

तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा । तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूलकेतनः ॥

tāpanīyā surucirā dhvajayaṣṭiranuttamā | tasyāṃ tu vānaro divyaḥ siṃhaśārdūlaketanaḥ

सोने का बना, अत्यन्त सुन्दर, अनुपम ध्वजदण्ड, और उस पर सिंह और बाघ के समान भयंकर एक दिव्य वानर।

श्लोक 16 (1.251.16)

हनूमान्नाम तेजस्वी कामरूपी महाबलः । दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत । ध्वजे भूतानि तत्रासन्विविधानि महान्ति च ॥

hanūmānnāma tejasvī kāmarūpī mahābalaḥ | didhakṣanniva tatra sma saṃsthito mūrdhnyaśobhata | dhvaje bhūtāni tatrāsanvividhāni mahānti ca

उसका नाम हनुमान था; वह तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला और महाबली था। वह वहाँ शिखर पर ऐसे बैठा शोभा पा रहा था मानो सब कुछ जला डालना चाहता हो। उस ध्वजा में अनेक प्रकार के विशाल प्राणी रहते थे,

श्लोक 17 (1.251.17)

नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति । स तं नानापताकाभिः शोभितं रथसत्तमम् ॥

nādena ripusainyānāṃ yeṣāṃ saṃjñā praṇaśyati | sa taṃ nānāpatākābhiḥ śobhitaṃ rathasattamam

जिनकी गर्जना से शत्रु-सेनाओं की चेतना लुप्त हो जाती है। अनेक पताकाओं से सुशोभित उस उत्तम रथ की

श्लोक 18 (1.251.18)

प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य च । सन्नद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रकः ॥

pradakṣiṇamupāvṛtya daivatebhyaḥ praṇamya ca | sannaddhaḥ kavacī khaḍgī baddhagodhāṅgulitrakaḥ

उन्होंने दाहिनी ओर रखकर परिक्रमा की और देवताओं को प्रणाम किया; फिर युद्ध के लिए तैयार होकर, कवच पहनकर, खड्ग लेकर और गोह के चमड़े के अँगुलित्राण बाँधकर

श्लोक 19 (1.251.19)

आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा । तच्च दिव्यं धनुः श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥

āruroha tadā pārtho vimānaṃ sukṛtī yathā | tacca divyaṃ dhanuḥ śreṣṭhaṃ brahmaṇā nirmitaṃ purā

पार्थ उस पर वैसे ही चढ़े जैसे पुण्यात्मा विमान पर चढ़ता है। और ब्रह्मा द्वारा पूर्वकाल में बनाए गए उस दिव्य, श्रेष्ठ धनुष

श्लोक 20 (1.251.20)

गाण्डीवमुपसंगृह्य बभूव मुदितोऽर्जुनः । हुताशनं पुरस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् ॥

gāṇḍīvamupasaṃgṛhya babhūva mudito'rjunaḥ | hutāśanaṃ puraskṛtya tatastadapi vīryavān

गाण्डीव को हाथ में लेकर अर्जुन आनन्दित हुए। फिर अग्निदेव को आगे करके उस पराक्रमी वीर ने

श्लोक 21 (1.251.21)

जग्राह बलमास्थाय ज्यया च युयुजे धनुः । मौर्व्यां तु योज्यमानायां बलिना पाण्डवेन ह ॥

jagrāha balamāsthāya jyayā ca yuyuje dhanuḥ | maurvyāṃ tu yojyamānāyāṃ balinā pāṇḍavena ha

बल लगाकर उसे पकड़ा और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई। जब बलवान पाण्डव प्रत्यंचा चढ़ा रहे थे,

श्लोक 22 (1.251.22)

येऽशृण्वन्कूजितं यत्र तेषां वै व्यथितं मनः । लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाऽक्षय्ये महेषुधी ॥

ye'śṛṇvankūjitaṃ yatra teṣāṃ vai vyathitaṃ manaḥ | labdhvā rathaṃ dhanuścaiva tathā'kṣayye maheṣudhī

तब जिन्होंने उसकी टंकार सुनी, उनका मन व्याकुल हो उठा। रथ, धनुष और दो बड़े अक्षय तरकश पाकर

श्लोक 23 (1.251.23)

बभूव कल्यः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि । वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः ॥

babhūva kalyaḥ kaunteyaḥ prahṛṣṭaḥ sāhyakarmaṇi | vajranābhaṃ tataścakraṃ dadau kṛṣṇāya pāvakaḥ

कुन्तीपुत्र सहायता के कार्य के लिए समर्थ और प्रसन्न हो गए। तब अग्नि ने कृष्ण को वज्र की नाभि वाला चक्र

श्लोक 24 (1.251.24)

आग्नेयमस्त्रं दयितं स च कल्योऽभवत्तदा । अब्रवीत्पावकश्चैवमेतेन मधुसूदन ॥

āgneyamastraṃ dayitaṃ sa ca kalyo'bhavattadā | abravītpāvakaścaivametena madhusūdana

और प्रिय आग्नेय अस्त्र दिया, और वे भी तब समर्थ हो गए। अग्नि ने कहा— "हे मधुसूदन, इसके द्वारा

अग्निरुवाच

श्लोक 25 (1.251.25)

अमानुषानपि रणे जेष्यसि त्वमसंशयम् । अनेन तु मनुष्याणां देवानामपि चाहवे ॥

amānuṣānapi raṇe jeṣyasi tvamasaṃśayam | anena tu manuṣyāṇāṃ devānāmapi cāhave

तुम युद्ध में अमानुषी प्राणियों को भी निःसन्देह जीत लोगे। इसके द्वारा युद्ध में मनुष्यों और देवताओं में भी,

श्लोक 26 (1.251.26)

रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाधिकस्तथा । भविष्यसि न सन्देहः प्रवरोऽपि निबर्हणे ॥

rakṣaḥpiśācadaityānāṃ nāgānāṃ cādhikastathā | bhaviṣyasi na sandehaḥ pravaro'pi nibarhaṇe

तथा राक्षसों, पिशाचों, दैत्यों और नागों में भी तुम सबसे बढ़कर रहोगे, इसमें सन्देह नहीं, और उनके संहार में अग्रणी होगे।

श्लोक 27 (1.251.27)

क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत्त्वया माधव शत्रुषु । हत्वाऽप्रतिहतं सङ्ख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ॥

kṣiptaṃ kṣiptaṃ raṇe caitattvayā mādhava śatruṣu | hatvā'pratihataṃ saṅkhye pāṇimeṣyati te punaḥ

हे माधव, युद्ध में तुम इसे जब-जब शत्रुओं पर फेंकोगे, यह बिना रुके उन्हें मारकर फिर तुम्हारे हाथ में लौट आएगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (1.251.28)

वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् । दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं प्रभुः ॥

varuṇaśca dadau tasmai gadāmaśaniniḥsvanām | daityāntakaraṇīṃ ghorāṃ nāmnā kaumodakīṃ prabhuḥ

और प्रभु वरुण ने उन्हें कौमोदकी नाम की एक भयंकर गदा दी, जिसकी ध्वनि वज्र के समान थी और जो दैत्यों का अन्त करने वाली थी।

श्लोक 29 (1.251.29)

ततः पावकमब्रूतां प्रहृष्टावर्जुनाच्युतौ । कृतास्त्रौ शस्त्रसंपन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ॥

tataḥ pāvakamabrūtāṃ prahṛṣṭāvarjunācyutau | kṛtāstrau śastrasaṃpannau rathinau dhvajināvapi

तब हर्षित अर्जुन और अच्युत ने अग्नि से कहा— "अब हम अस्त्र-विद्या में निपुण और शस्त्रों से सम्पन्न हैं, रथ और ध्वजा वाले भी हो गए हैं;

अर्जुनाच्युतावूचतुः

श्लोक 30 (1.251.30)

कल्यौ स्वो भगवन्योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः । किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सता ॥

kalyau svo bhagavanyoddhumapi sarvaiḥ surāsuraiḥ | kiṃ punarvajriṇaikena pannagārthe yuyutsatā

हे भगवन्, हम सब देवताओं और असुरों से भी लड़ने में समर्थ हैं; फिर उस अकेले वज्रधारी का तो कहना ही क्या, जो नाग के लिए युद्ध करना चाहता है।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 31 (1.251.31)

चक्रपाणिर्हृषीकेशो विचरन्युधि वीर्यवान् । चक्रेण भस्मसात्सर्वं विसृष्टेन तु वीर्यवान् । त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न कुर्याज्जनार्दनः ॥

cakrapāṇirhṛṣīkeśo vicaranyudhi vīryavān | cakreṇa bhasmasātsarvaṃ visṛṣṭena tu vīryavān | triṣu lokeṣu tannāsti yanna kuryājjanārdanaḥ

"हाथ में चक्र लिए पराक्रमी हृषीकेश युद्ध में विचरते हुए अपने छोड़े हुए चक्र से सब कुछ भस्म कर सकते हैं। तीनों लोकों में ऐसा कुछ नहीं जो जनार्दन न कर सकें।

श्लोक 32 (1.251.32)

गाण्डीवं धनुरादाय तथाऽक्षय्ये महेषुधी । अहमप्युत्सहे लोकान्विजेतुं युधि पावक ॥

gāṇḍīvaṃ dhanurādāya tathā'kṣayye maheṣudhī | ahamapyutsahe lokānvijetuṃ yudhi pāvaka

हे पावक, गाण्डीव धनुष और दो बड़े अक्षय तरकश लेकर मैं भी युद्ध में लोकों को जीतने का सामर्थ्य रखता हूँ।

श्लोक 33 (1.251.33)

सर्वतः परिवार्यैवं दावमेतं महाप्रभो । कामं संप्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ॥

sarvataḥ parivāryaivaṃ dāvametaṃ mahāprabho | kāmaṃ saṃprajvalādyaiva kalyau svaḥ sāhyakarmaṇi

इसलिए हे महाप्रभो, इस वन को चारों ओर से घेरकर आज ही इच्छानुसार भली-भाँति प्रज्वलित हो जाइए; हम दोनों सहायता के लिए तैयार हैं।

श्लोक 34 (1.251.34)

यदि खाण्डवमेष्यति प्रमादात्सगणो वा परिरक्षितुं महेन्द्रः । शरताडितगात्रकुण्डलानां कदनं द्रक्ष्यति देववाहिनीनाम् ॥

yadi khāṇḍavameṣyati pramādātsagaṇo vā parirakṣituṃ mahendraḥ | śaratāḍitagātrakuṇḍalānāṃ kadanaṃ drakṣyati devavāhinīnām

यदि महेन्द्र असावधानी से अपने गणों के साथ खाण्डव की रक्षा करने आएँगे, तो वे देव-सेनाओं का संहार देखेंगे, जिनके शरीर और कुण्डल बाणों से बिंधे होंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (1.251.35)

एवमुक्तः स भगवान्दाशार्हेणार्जुनेन च । तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे ॥

evamuktaḥ sa bhagavāndāśārheṇārjunena ca | taijasaṃ rūpamāsthāya dāvaṃ dagdhuṃ pracakrame

दाशार्ह कृष्ण और अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान अग्नि ने अपना तेजोमय रूप धारण किया और वन को जलाना आरम्भ किया।

श्लोक 36 (1.251.36)

सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तथा । ददाह खाण्डवं दावं युगान्तमिव दर्शयन् ॥

sarvataḥ parivāryātha saptārcirjvalanastathā | dadāha khāṇḍavaṃ dāvaṃ yugāntamiva darśayan

सात ज्वालाओं वाले प्रज्वलित अग्नि ने चारों ओर से घेरकर खाण्डव वन को जलाया, मानो युग के अन्त का दृश्य दिखा रहा हो।

श्लोक 37 (1.251.37)

प्रतिगृह्य समाविश्य तद्वनं भरतर्षभ । मेघस्तनितनिर्घोषः सर्वभूतान्यकम्पयत् ॥

pratigṛhya samāviśya tadvanaṃ bharatarṣabha | meghastanitanirghoṣaḥ sarvabhūtānyakampayat

हे भरतश्रेष्ठ, उस वन को पकड़कर और उसमें प्रवेश करके, मेघों के गर्जन जैसी ध्वनि करते हुए उसने सब प्राणियों को कँपा दिया।

श्लोक 38 (1.251.38)

दह्यतस्तस्य च बभौ रूपं दावस्य भारत । मेरोरिव नगेन्द्रस्य कीर्णस्यांशुमतोऽंशुभिः ॥

dahyatastasya ca babhau rūpaṃ dāvasya bhārata | meroriva nagendrasya kīrṇasyāṃśumato'ṃśubhiḥ

हे भारत, जलते हुए उस वन का रूप सूर्य की किरणों से व्याप्त पर्वतराज मेरु के समान शोभित हो रहा था।

अध्याय 250अध्याय-सूचीअध्याय 252