आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 15
द्वारका की रक्षा-व्यवस्था
युधिष्ठिर कृष्ण से सौभ-वध की कथा विस्तार से सुनाने को कहते हैं। कृष्ण आकाश से शाल्व द्वारा द्वारका की घेराबंदी से आरम्भ करके बताते हैं कि नगर को कैसे तैयार किया गया था: उसके द्वार, बुर्ज और युद्ध-यन्त्र, शस्त्रों के भण्डार, जगह-जगह तैनात यादव वीर और रक्षक, मद्यपान पर रोक, नटों-गायकों का निष्कासन, तोड़े गए पुल, नुकीले खूँटों से भरी खाइयाँ और विषम भूमि, मुद्रा के बिना आवागमन पर रोक, और भली-भाँति वेतन पाई हुई, परखी हुई सेना — यह सब राजा आहुक (उग्रसेन) के संरक्षण में।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.15.1)
वासुदेव महाबाहो विस्तरेण महामते । सौभस्य वधमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥
vāsudeva mahābāho vistareṇa mahāmate | saubhasya vadhamācakṣva na hi tṛpyāmi kathyataḥ
हे महाबाहु, महामति वासुदेव! सौभ के विनाश की कथा मुझे विस्तार से सुनाइए; आपके मुख से सुनते हुए मेरा मन नहीं भरता।
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (3.15.2)
हतं श्रुत्वा महाबाहो मया श्रौतश्रवं नृप । उपायाद्भरतश्रेष्ठ साल्वो द्वारवतीं पुरीम् ॥
hataṃ śrutvā mahābāho mayā śrautaśravaṃ nṛpa | upāyādbharataśreṣṭha sālvo dvāravatīṃ purīm
हे महाबाहो, हे भरतश्रेष्ठ! श्रुतश्रवा के पुत्र राजा शिशुपाल को मेरे द्वारा मारा गया सुनकर शाल्व द्वारवती नगरी पर चढ़ आया।
श्लोक 3 (3.15.3)
अरुणत्तां सुदुष्टात्मा सर्वतः पाण्डुनन्दन । साल्वो वैहायसं चापि तत्पुरं व्यूह्य विष्ठितः ॥
aruṇattāṃ suduṣṭātmā sarvataḥ pāṇḍunandana | sālvo vaihāyasaṃ cāpi tatpuraṃ vyūhya viṣṭhitaḥ
हे पाण्डुनन्दन! उस अत्यन्त दुष्टात्मा शाल्व ने नगरी को चारों ओर से घेर लिया और अपनी सेना की व्यूह-रचना करके नगर के ऊपर आकाश में आ डटा।
श्लोक 4 (3.15.4)
तत्रस्थोऽथ महीपालो योधयामास तां पुरीम् । अभिसारेण सर्वेण तत्र युद्धमवर्तत ॥
tatrastho'tha mahīpālo yodhayāmāsa tāṃ purīm | abhisāreṇa sarveṇa tatra yuddhamavartata
वहीं से उस राजा ने नगरी पर आक्रमण किया, और वहाँ हर प्रकार के धावे के साथ युद्ध चलने लगा।
श्लोक 5 (3.15.5)
पुरी समन्ताद्विहिता सपताका सतोरणा । सचक्रा सहुडा चैव सयन्त्रखनका तथा ॥
purī samantādvihitā sapatākā satoraṇā | sacakrā sahuḍā caiva sayantrakhanakā tathā
नगरी चारों ओर से सुरक्षित की गई थी — पताकाओं और तोरणों से, योद्धाओं की टुकड़ियों और उनके ठिकानों से, यन्त्रों से और सुरंग खोदने वालों से,
श्लोक 6 (3.15.6)
सोपशल्यप्रतोलीका साट्टाट्टालकगोपुरा । सचक्रग्रहिणी चैव सोल्कालातावपोथिका ॥
sopaśalyapratolīkā sāṭṭāṭṭālakagopurā | sacakragrahiṇī caiva solkālātāvapothikā
नुकीले खूँटों और गलियों से, अटारियों, बुर्जों और नगर-द्वारों से, शत्रु-सेना को पकड़ने वाले यन्त्रों से, जलती मशालों और यन्त्रों से गिराए जाने वाले पत्थरों-लट्ठों से,
श्लोक 7 (3.15.7)
सोष्ट्रिका भरतश्रेष्ठ सभेरीपणवानका । सतोमराङ्कुशा राजन्सशतघ्नीकलाङ्गला ॥
soṣṭrikā bharataśreṣṭha sabherīpaṇavānakā | satomarāṅkuśā rājansaśataghnīkalāṅgalā
हे भरतश्रेष्ठ! मिट्टी और चमड़े के पात्रों से, भेरी, पणव और आनक नगाड़ों से, हे राजन्, तोमरों और अंकुशों से, शतघ्नियों और हल जैसे शस्त्रों से,
श्लोक 8 (3.15.8)
सभुशुण्ड्यश्मगुडका सायुधा सपरश्वधा । लोहचर्मवती चापि साग्निः सगुडशृङ्गिका । शास्त्रदृष्टेन विधिना सुयुक्ता भरतर्षभ ॥
sabhuśuṇḍyaśmaguḍakā sāyudhā saparaśvadhā | lohacarmavatī cāpi sāgniḥ saguḍaśṛṅgikā | śāstradṛṣṭena vidhinā suyuktā bharatarṣabha
भुशुण्डियों और गोल पत्थरों से, शस्त्रों और फरसों से, लोहे की ढालों से, आग्नेय अस्त्रों से, गोलों और उन्हें फेंकने वाले यन्त्रों से — हे भरतश्रेष्ठ, वह शास्त्रों में बताई विधि से भली-भाँति सज्जित थी,
श्लोक 9 (3.15.9)
रथैरनेकैर्विविधैर्गदसाम्बोद्धवादिभिः । पुरुषैः कुरुशार्दूल समर्थैः प्रतिवारणे ॥
rathairanekairvividhairgadasāmboddhavādibhiḥ | puruṣaiḥ kuruśārdūla samarthaiḥ prativāraṇe
हे कुरुसिंह! अनेक प्रकार के रथों से, और गद, साम्ब, उद्धव आदि उन पुरुषों से जो शत्रु को रोकने में समर्थ थे,
श्लोक 10 (3.15.10)
अतिख्यातकुलैर्वीरैर्दृष्टवीर्यैश्च संयुगे । मध्यमेन च गुल्मेन रक्षिभिः सा सुरक्षिता । उत्क्षिप्तगुल्मैश्च तथा हयैश्च सपताकिभिः ॥
atikhyātakulairvīrairdṛṣṭavīryaiśca saṃyuge | madhyamena ca gulmena rakṣibhiḥ sā surakṣitā | utkṣiptagulmaiśca tathā hayaiśca sapatākibhiḥ
प्रसिद्ध कुलों में जन्मे और युद्ध में परखे हुए पराक्रम वाले वीरों से। वह रक्षकों द्वारा, बीच में तैनात सेना-दल द्वारा, इधर-उधर जाने वाली टुकड़ियों द्वारा और पताकाधारी घुड़सवारों द्वारा भली-भाँति सुरक्षित थी।
श्लोक 11 (3.15.11)
आघोषितं च नगरे न पातव्या सुरेति वै । प्रमादं परिरक्षद्भिरुग्रसेनोद्धवादिभिः ॥
āghoṣitaṃ ca nagare na pātavyā sureti vai | pramādaṃ parirakṣadbhirugrasenoddhavādibhiḥ
और नगर में घोषणा करा दी गई कि कोई मदिरा न पिए; उग्रसेन, उद्धव आदि असावधानी से बचने के लिए सतर्क थे।
श्लोक 12 (3.15.12)
प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्यात्साल्वो नराधिपः । इति कृत्वाऽप्रमत्तास्ते सर्वे वृष्ण्यन्धकाः स्थिताः ॥
pramatteṣvabhighātaṃ hi kuryātsālvo narādhipaḥ | iti kṛtvā'pramattāste sarve vṛṣṇyandhakāḥ sthitāḥ
"यदि हम असावधान रहे तो राजा शाल्व हम पर प्रहार कर देगा" — यह सोचकर सभी वृष्णि और अन्धक सावधान होकर डटे रहे।
श्लोक 13 (3.15.13)
आनर्ताश्च तथा सर्वे नटनर्तकगायकाः । बहिर्निर्वासिताः सर्वे रक्षद्भिर्वित्तसंचयम् ॥
ānartāśca tathā sarve naṭanartakagāyakāḥ | bahirnirvāsitāḥ sarve rakṣadbhirvittasaṃcayam
और धन-भण्डार की रक्षा करने वालों ने आनर्त देश के सभी नटों, नर्तकों और गायकों को नगर से बाहर निकाल दिया।
श्लोक 14 (3.15.14)
संक्रमा भेदिताः सर्वे नावश्च प्रतिषेधिताः । परिखाश्चापि कौरव्य कीलैः सुनिचिताः कृताः ॥
saṃkramā bheditāḥ sarve nāvaśca pratiṣedhitāḥ | parikhāścāpi kauravya kīlaiḥ sunicitāḥ kṛtāḥ
सारे पुल तोड़ दिए गए, नावों का चलना रोक दिया गया, और हे कौरव्य, खाइयों में घने नुकीले खूँटे गाड़ दिए गए।
श्लोक 15 (3.15.15)
उदपानाः कुरुश्रेष्ठ तथैवाप्यम्बरीषकाः । समन्तात्क्रोशमात्रं च कारिता विषमा च भूः । संक्रमा भेदिताः सर्वे प्राकाराश्च नवीकृताः ॥
udapānāḥ kuruśreṣṭha tathaivāpyambarīṣakāḥ | samantātkrośamātraṃ ca kāritā viṣamā ca bhūḥ | saṃkramā bheditāḥ sarve prākārāśca navīkṛtāḥ
हे कुरुश्रेष्ठ! इसी प्रकार कुओं और छिपे हुए अग्निकुण्डों की भी व्यवस्था की गई; और चारों ओर एक कोस तक भूमि को विषम बना दिया गया। सारे पुल तोड़ दिए गए और परकोटों की नए सिरे से मरम्मत की गई।
श्लोक 16 (3.15.16)
प्रकृत्या विषमं दुर्गं प्रकृत्या च सुरक्षितम् । प्रकृत्या चायुधोपेतं विशेषेण तदाऽनघ ॥
prakṛtyā viṣamaṃ durgaṃ prakṛtyā ca surakṣitam | prakṛtyā cāyudhopetaṃ viśeṣeṇa tadā'nagha
हे निष्पाप! वह दुर्ग स्वभाव से ही दुर्गम था, स्वभाव से ही सुरक्षित था और स्वभाव से ही शस्त्रों से भरा था — और उस समय तो विशेष रूप से।
श्लोक 17 (3.15.17)
सुरक्षितं सुगुप्तं च सर्वायुधसमन्वितम् । तत्पुरं भरतश्रेष्ठ यथेन्द्रभवनं तथा ॥
surakṣitaṃ suguptaṃ ca sarvāyudhasamanvitam | tatpuraṃ bharataśreṣṭha yathendrabhavanaṃ tathā
हे भरतश्रेष्ठ! भली-भाँति रक्षित, सुगुप्त और सब शस्त्रों से सम्पन्न वह नगर इन्द्र के भवन के समान था।
श्लोक 18 (3.15.18)
न चामुद्रोऽभिनिर्याति न चामुद्रः प्रवेश्यते । वृष्ण्यन्धकपुरे राजंस्तदा सौभसमागमे ॥
na cāmudro'bhiniryāti na cāmudraḥ praveśyate | vṛṣṇyandhakapure rājaṃstadā saubhasamāgame
हे राजन्! सौभ के आने के समय वृष्णि-अन्धकों के उस नगर से बिना मुद्रा के न कोई बाहर जा सकता था, न बिना मुद्रा के किसी को भीतर आने दिया जाता था।
श्लोक 19 (3.15.19)
अनुरथ्यासु सर्वासु चत्वरेषु च कौरव । बलं बभूव राजेन्द्र प्रभूतगजवाजिमत् ॥
anurathyāsu sarvāsu catvareṣu ca kaurava | balaṃ babhūva rājendra prabhūtagajavājimat
हे कौरव, हे राजेन्द्र! सभी गलियों और चौराहों पर हाथियों और घोड़ों से भरपूर सेना तैनात थी।
श्लोक 20 (3.15.20)
दत्तवेतनभक्तं च दत्तायुधपरिच्छदम् । कृतोपधानं च तदा बलमासीद्विशांपते ॥
dattavetanabhaktaṃ ca dattāyudhaparicchadam | kṛtopadhānaṃ ca tadā balamāsīdviśāṃpate
हे प्रजापालक! उस सेना को वेतन और भोजन दिया जा चुका था, शस्त्र और साज-सामान दिए जा चुके थे, और उस समय उसका विशेष सम्मान भी किया गया था।
श्लोक 21 (3.15.21)
न कुप्यवेतनी कश्चिन्न चातिक्रान्तवेतनी । नानुग्रहभृतः कश्चिन्न चादृष्टपराक्रमः ॥
na kupyavetanī kaścinna cātikrāntavetanī | nānugrahabhṛtaḥ kaścinna cādṛṣṭaparākramaḥ
किसी को भी ताँबे जैसी हीन धातु में वेतन नहीं दिया गया था, किसी का वेतन बकाया नहीं था, कोई केवल कृपा से भर्ती नहीं हुआ था, और किसी का पराक्रम अपरीक्षित नहीं था।
श्लोक 22 (3.15.22)
एवं सुविहिता राजन्द्वारका भूरिदक्षिणैः । आहुकेन सुगुप्ता च राज्ञा राजीवलोचन ॥
evaṃ suvihitā rājandvārakā bhūridakṣiṇaiḥ | āhukena suguptā ca rājñā rājīvalocana
हे कमलनयन राजन्! इस प्रकार उदार दान देने वाले पुरुषों ने द्वारका की भली-भाँति व्यवस्था की थी, और राजा आहुक उसकी रक्षा कर रहे थे।