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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 24

युधिष्ठिर का वृद्धजनों को देखने के लिए प्रस्थान

माता के शोक में डूबे पाण्डव राजकाज की उपेक्षा करने लगते हैं और सोचते हैं कि कुन्ती, गान्धारी और अन्धे राजा वन में किस दशा में होंगे। सहदेव वही बात कह देते हैं जो युधिष्ठिर के मन में है, और द्रौपदी भी कुन्ती को देखने की इच्छा प्रकट करती हैं। युधिष्ठिर सेना, रथ, पालकियाँ, कोश, शिल्पी और रसोई तैयार करने की आज्ञा देते हैं, जो नगरवासी चाहे उसे साथ चलने की अनुमति देते हैं, अगले दिन प्रस्थान की घोषणा करवाते हैं, और नगर के बाहर पाँच दिन रुकने के बाद वन की ओर चल पड़ते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.24.1)

एवं ते पुरुषव्याघ्राः पाण्डवा मातृनन्दनाः । स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥

evaṃ te puruṣavyāghrāḥ pāṇḍavā mātṛnandanāḥ | smaranto mātaraṃ vīrā babhūvurbhṛśaduḥkhitāḥ

इस प्रकार वे पुरुषसिंह पाण्डव, माता के आनन्द देने वाले पुत्र, वे वीर अपनी माता को याद करके अत्यन्त दुःखी हो गए।

श्लोक 2 (15.24.2)

ये राजकार्येषु पुरा व्यासक्ता नित्यशोऽभवन् । ते राजकार्याणि तदा नाकार्षुः सर्वतः पुरे ॥

ye rājakāryeṣu purā vyāsaktā nityaśo'bhavan | te rājakāryāṇi tadā nākārṣuḥ sarvataḥ pure

जो पहले सदा राजकार्यों में लगे रहते थे, उन्होंने तब नगर में कहीं भी राजकार्य नहीं किया।

श्लोक 3 (15.24.3)

प्रविष्टा इव शोकेन नाभ्यनन्दन्त किञ्चन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न किञ्चित्प्रत्यपूजयन् ॥

praviṣṭā iva śokena nābhyanandanta kiñcana | sambhāṣyamāṇā api te na kiñcitpratyapūjayan

मानो शोक के वश में होकर वे किसी बात से प्रसन्न नहीं होते थे, और बोलने पर भी किसी का कुछ उत्तर नहीं देते थे।

श्लोक 4 (15.24.4)

ते स्म वीरा दुराधर्षा गांभीर्ये सागरोपमाः । शोकोपहतविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥

te sma vīrā durādharṣā gāṃbhīrye sāgaropamāḥ | śokopahatavijñānā naṣṭasaṃjñā ivābhavan

वे दुर्धर्ष वीर, गम्भीरता में समुद्र के समान, शोक से विवेक खो बैठे और मानो चेतना ही गँवा बैठे।

श्लोक 5 (15.24.5)

अचिन्तयंश्च जननीं ततस्ते पाण्डुनन्दनाः । कथं नु वृद्धमिथुनं वहत्यतिकृशा पृथा ॥

acintayaṃśca jananīṃ tataste pāṇḍunandanāḥ | kathaṃ nu vṛddhamithunaṃ vahatyatikṛśā pṛthā

तब वे पाण्डुपुत्र अपनी माता का चिन्तन करते रहे: "अत्यन्त दुर्बल हुई पृथा उस वृद्ध दम्पति का भार कैसे उठाती होगी?

श्लोक 6 (15.24.6)

कथं च स महीपालो हतपुत्रो निराश्रयः । पत्न्या सह वसत्येको वने श्वापदसेविते ॥

kathaṃ ca sa mahīpālo hataputro nirāśrayaḥ | patnyā saha vasatyeko vane śvāpadasevite

और पुत्रों को खो चुके, निराश्रय वे राजा अपनी पत्नी के साथ अकेले हिंसक पशुओं से भरे वन में कैसे रहते होंगे?

श्लोक 7 (15.24.7)

सा च देवी महाभागा गान्धारी हतबान्धवा । पतिमन्धं कथं वृद्धमन्वेति विजने वने ॥

sā ca devī mahābhāgā gāndhārī hatabāndhavā | patimandhaṃ kathaṃ vṛddhamanveti vijane vane

और वह महाभागा देवी गान्धारी, जिसके बन्धु मारे जा चुके हैं, निर्जन वन में अपने वृद्ध अन्धे पति के पीछे कैसे चलती होगी?"

श्लोक 8 (15.24.8)

एवं तेषां कथयतामौत्सुक्यमभवत्तदा । गमने चाभवद्बुद्धिर्धृतराष्ट्रदिदृक्षया ॥

evaṃ teṣāṃ kathayatāmautsukyamabhavattadā | gamane cābhavadbuddhirdhṛtarāṣṭradidṛkṣayā

इस प्रकार बातें करते हुए तब उनके मन में उत्कण्ठा जागी, और धृतराष्ट्र को देखने की इच्छा से जाने का विचार उन्हें हुआ।

श्लोक 9 (15.24.9)

सहदेवस्तु राजानं प्रणिपत्येदमब्रवीत् । अहो मे भवतो दृष्टं हृदयं गमनं प्रति ॥

sahadevastu rājānaṃ praṇipatyedamabravīt | aho me bhavato dṛṣṭaṃ hṛdayaṃ gamanaṃ prati

तब सहदेव ने राजा को प्रणाम करके यह कहा: "अहो! मैंने देख लिया है कि आपका हृदय जाने की ओर लगा है।

सहदेव उवाच

श्लोक 10 (15.24.10)

न हि त्वां गौरवेणाहमशकं वक्तुमञ्जसा । गमनं प्रति राजेन्द्र तदिदं समुपस्थितम् ॥

na hi tvāṃ gauraveṇāhamaśakaṃ vaktumañjasā | gamanaṃ prati rājendra tadidaṃ samupasthitam

हे राजेन्द्र! गौरव के कारण मैं आपसे जाने की बात सहज ही नहीं कह सका था, और अब यही बात सामने आ गई है।

श्लोक 11 (15.24.11)

दिष्ट्या द्रक्ष्यामि तां कुन्तीं वर्तयन्तीं तपस्विनीम् । जटिलां तापसीं वृद्धां कुशकाशपरिक्षताम् ॥

diṣṭyā drakṣyāmi tāṃ kuntīṃ vartayantīṃ tapasvinīm | jaṭilāṃ tāpasīṃ vṛddhāṃ kuśakāśaparikṣatām

सौभाग्य से मैं तपस्विनी जीवन बिताती हुई, जटा धारण किए, वृद्धा तापसी कुन्ती को देखूँगा, जो कुश और काश से छिल गई है।

श्लोक 12 (15.24.12)

प्रासादहर्म्यसंवृद्धामत्यन्तसुखभागिनीम् । कदानुजननीं श्रान्तां द्रक्ष्यामि भृशदुःखिताम् ॥

prāsādaharmyasaṃvṛddhāmatyantasukhabhāginīm | kadānujananīṃ śrāntāṃ drakṣyāmi bhṛśaduḥkhitām

प्रासादों और हवेलियों में पली, अत्यन्त सुख भोगने वाली अपनी थकी और अति दुःखी माता को मैं कब देखूँगा?

श्लोक 13 (15.24.13)

अनित्याः खलु मर्त्यानां गतयो भरतर्षभ । कुन्ती राजसुता यत्र वसत्यसुखिता वने ॥

anityāḥ khalu martyānāṃ gatayo bharatarṣabha | kuntī rājasutā yatra vasatyasukhitā vane

हे भरतश्रेष्ठ! मनुष्यों की गतियाँ अनिश्चित ही होती हैं, जो राजकन्या कुन्ती आज वन में दुःख से रह रही हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (15.24.14)

सहदेववचः श्रुत्वा द्रौपदी योषितां वरा । उवाच देवी राजानमभिपूज्याभिनन्द्य च ॥

sahadevavacaḥ śrutvā draupadī yoṣitāṃ varā | uvāca devī rājānamabhipūjyābhinandya ca

सहदेव की बात सुनकर नारियों में श्रेष्ठ देवी द्रौपदी ने राजा का सत्कार और अभिनन्दन करके कहा।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 15 (15.24.15)

कदा द्रक्ष्यामि तां देवीं यदि जीवति सा पृथा । जीवन्त्या ह्यद्य मे प्रीतिर्भविष्यति जनाधिप ॥

kadā drakṣyāmi tāṃ devīṃ yadi jīvati sā pṛthā | jīvantyā hyadya me prītirbhaviṣyati janādhipa

"यदि पृथा जीवित है, तो मैं उस देवी को कब देखूँगी? हे जनाधिप! यदि वह जीवित है, तो आज मुझे प्रसन्नता होगी।

श्लोक 16 (15.24.16)

एषा तेऽस्तु मतिर्नित्यं धर्मे ते रमतां मनः । योऽद्य त्वमस्मान्राजेन्द्र श्रेयसा योजयिष्यसि ॥

eṣā te'stu matirnityaṃ dharme te ramatāṃ manaḥ | yo'dya tvamasmānrājendra śreyasā yojayiṣyasi

आपकी यह बुद्धि सदा बनी रहे और आपका मन धर्म में रमता रहे, क्योंकि हे राजेन्द्र! आज आप हमें कल्याण से जोड़ेंगे।

श्लोक 17 (15.24.17)

अग्रपादस्थितं चेमं विद्धि राजन्वधूजनम् । काङ्क्षन्तं दर्शनं कुन्त्या गान्धार्याः श्वसुरस्य च ॥

agrapādasthitaṃ cemaṃ viddhi rājanvadhūjanam | kāṅkṣantaṃ darśanaṃ kuntyā gāndhāryāḥ śvasurasya ca

और हे राजन्! जानिए कि बहुओं का यह समूह जाने को आगे पैर बढ़ाए खड़ा है और कुन्ती, गान्धारी तथा श्वसुर के दर्शन चाहता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (15.24.18)

इत्युक्तः स नृपो देव्या द्रौपद्या भरतर्षभ । सेनाध्यक्षान्समानाय्य सर्वानिदमुवाच ह ॥

ityuktaḥ sa nṛpo devyā draupadyā bharatarṣabha | senādhyakṣānsamānāyya sarvānidamuvāca ha

हे भरतश्रेष्ठ! देवी द्रौपदी के ऐसा कहने पर राजा ने सब सेनापतियों को बुलाकर यह कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (15.24.19)

निर्यातयत मे सेनां प्रभूतरथकुञ्जराम् । द्रक्ष्यामि वनसंस्थं च धृतराष्ट्रं महीपतिम् ॥

niryātayata me senāṃ prabhūtarathakuñjarām | drakṣyāmi vanasaṃsthaṃ ca dhṛtarāṣṭraṃ mahīpatim

"मेरी रथों और हाथियों से भरी सेना को प्रस्थान कराओ। मैं वन में रहने वाले राजा धृतराष्ट्र को देखूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (15.24.20)

स्त्र्यध्यक्षांश्चाब्रवीद्राजा यानानि विविधानि मे । सज्जीक्रियन्तां सर्वाणि शिबिकाश्च सहस्रशः ॥

stryadhyakṣāṃścābravīdrājā yānāni vividhāni me | sajjīkriyantāṃ sarvāṇi śibikāśca sahasraśaḥ

राजा ने अन्तःपुर के अध्यक्षों से कहा: "मेरे सब प्रकार के वाहन तैयार किए जाएँ और हज़ारों पालकियाँ भी।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (15.24.21)

शकटापणवेशाश्च कोशः शिल्पिन एव च । निर्यान्तु कोशपालाश्च कुरुक्षेत्राश्रमं प्रति ॥

śakaṭāpaṇaveśāśca kośaḥ śilpina eva ca | niryāntu kośapālāśca kurukṣetrāśramaṃ prati

गाड़ियाँ, दुकानें और तम्बू, कोश और शिल्पी तथा कोशपाल कुरुक्षेत्र के आश्रम की ओर प्रस्थान करें।

श्लोक 22 (15.24.22)

यश्च पौरजनः कश्चिद्द्रष्टुमिच्छति पार्थिवम् । अनावृतः सुविहितः स च यातु सुरक्षितः ॥

yaśca paurajanaḥ kaściddraṣṭumicchati pārthivam | anāvṛtaḥ suvihitaḥ sa ca yātu surakṣitaḥ

और जो कोई नगरवासी राजा को देखना चाहे, वह बिना रोक-टोक, भली-भाँति सज्जित और सुरक्षित होकर जाए।

श्लोक 23 (15.24.23)

सूदाः पौरोगवाश्चैव सर्वं चैव महानसम् । विविधं भक्ष्यभोज्यं च शकटैरुह्यतां मम ॥

sūdāḥ paurogavāścaiva sarvaṃ caiva mahānasam | vividhaṃ bhakṣyabhojyaṃ ca śakaṭairuhyatāṃ mama

रसोइये और पाकशाला के अध्यक्ष, सारी रसोई, और अनेक प्रकार के खाने-पीने की वस्तुएँ मेरे लिए गाड़ियों पर ले चली जाएँ।

श्लोक 24 (15.24.24)

प्रयाणं घुष्यतां चैव श्वोभूत इति माचिरम् । क्रियतां पथि चाप्यद्य वेश्मानि विविधानि च ॥

prayāṇaṃ ghuṣyatāṃ caiva śvobhūta iti māciram | kriyatāṃ pathi cāpyadya veśmāni vividhāni ca

घोषणा करा दी जाए कि कल, बिना देर किए प्रस्थान होगा, और आज ही मार्ग में अनेक प्रकार के आवास बनवा दिए जाएँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (15.24.25)

एवमाज्ञाप्य राजा स भ्रातृभिः सह पाण्डवः । श्वोभूते निर्ययौ राजन्सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ॥

evamājñāpya rājā sa bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaḥ | śvobhūte niryayau rājansastrīvṛddhapuraḥsaraḥ

हे राजन्! यों आज्ञा देकर पाण्डवराज अपने भाइयों के साथ अगले दिन स्त्रियों और वृद्धों को आगे करके चल पड़े।

श्लोक 26 (15.24.26)

स बहिर्दिवसानेव जनौघं परिपालयन् । न्यवसन्नृपतिः पञ्च ततोऽगच्छद्वनं प्रति ॥

sa bahirdivasāneva janaughaṃ paripālayan | nyavasannṛpatiḥ pañca tato'gacchadvanaṃ prati

वे राजा नगर के बाहर पाँच दिन तक जनसमूह की देखभाल करते हुए ठहरे, फिर वन की ओर चले।

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