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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 41

श्राद्ध-कर्म और आश्रमवासिक पर्व का समापन

नारद युधिष्ठिर को आश्वस्त करते हैं कि धृतराष्ट्र अपनी ही यज्ञाग्नियों से दग्ध हुए, किसी व्यर्थ अग्नि से नहीं, और कुन्ती ने महान् सिद्धि पाई है; वे उदक-क्रिया करने को कहते हैं। युधिष्ठिर भाइयों, पत्नियों और प्रजा सहित गङ्गा में स्नान कर जलदान करते हैं, गङ्गाद्वार में अस्थि-संस्कार के लिए पुरुष भेजते हैं और बारहवें दिन प्रचुर दान के साथ श्राद्ध करते हैं। नारद चले जाते हैं; धृतराष्ट्र के अठारह वर्ष बीते थे और युधिष्ठिर बिना उल्लास के राज्य सँभालते रहे।

अध्याय 40अध्याय-सूची

नारद उवाच

श्लोक 1 (15.41.1)

नासौ वृथाऽग्निना दग्धो यथा तत्र श्रुतं मया । वैचित्रवीर्यो नृपतिर्न ते शोच्यो नराधिप ॥

nāsau vṛthā'gninā dagdho yathā tatra śrutaṃ mayā | vaicitravīryo nṛpatirna te śocyo narādhipa

जैसा मैंने वहाँ सुना, वे किसी व्यर्थ अग्नि से नहीं जले। हे नरेश! विचित्रवीर्य-पुत्र राजा आपके शोक के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 2 (15.41.2)

वनं प्रविशतानेन वायुभक्षेण धीमता । अग्नयः कारयित्वेष्टिमुत्सृष्टा इति नः श्रुतम् ॥

vanaṃ praviśatānena vāyubhakṣeṇa dhīmatā | agnayaḥ kārayitveṣṭimutsṛṣṭā iti naḥ śrutam

वायु पर रहने वाले उन बुद्धिमान् राजा ने वन में प्रवेश करते समय इष्टि करवाकर अग्नियों को छोड़ दिया था, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 3 (15.41.3)

याजकास्तु ततस्तस्य तानग्नीन्निर्जने वने । समुत्सृज्य यथाकामं जग्मुर्भरतसत्तम ॥

yājakāstu tatastasya tānagnīnnirjane vane | samutsṛjya yathākāmaṃ jagmurbharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ! तब याजक उन अग्नियों को उस निर्जन वन में छोड़कर इच्छानुसार चले गए।

श्लोक 4 (15.41.4)

स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत्किल । तेन तद्वनमादीप्तमिति ते तापसाऽब्रुवन् ॥

sa vivṛddhastadā vahnirvane tasminnabhūtkila | tena tadvanamādīptamiti te tāpasā'bruvan

तब कहते हैं कि उस वन में वही अग्नि बढ़ गई और उसी से वह वन जल उठा; ऐसा उन तपस्वियों ने मुझसे कहा।

श्लोक 5 (15.41.5)

स राजा जाह्नवीतीरे यथा ते कथितं मया । तेनाग्निना समायुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ॥

sa rājā jāhnavītīre yathā te kathitaṃ mayā | tenāgninā samāyuktaḥ svenaiva bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! जैसा मैंने आपसे कहा, वे राजा जाह्नवी के तट पर अपनी ही उस अग्नि से संयुक्त हुए।

श्लोक 6 (15.41.6)

एवमावेदयामासुर्मुनयस्ते ममानघ । ये ते भागीरथीतीरे मया दृष्टा युधिष्ठिर ॥

evamāvedayāmāsurmunayaste mamānagha | ye te bhāgīrathītīre mayā dṛṣṭā yudhiṣṭhira

हे निष्पाप युधिष्ठिर! भागीरथी के तट पर जिन मुनियों को मैंने देखा था, उन्होंने मुझे यही बताया।

श्लोक 7 (15.41.7)

एवं स्वेनाग्निना राजा समायुक्तो महीपते । मा शोचिथास्त्वं नृपतिं गतः स परमां गतिम् ॥

evaṃ svenāgninā rājā samāyukto mahīpate | mā śocithāstvaṃ nṛpatiṃ gataḥ sa paramāṃ gatim

हे महीपते! इस प्रकार राजा अपनी ही अग्नि से संयुक्त हुए। आप उन राजा के लिए शोक न करें; वे परम गति को प्राप्त हो गए हैं।

श्लोक 8 (15.41.8)

गुरुशुश्रूषया चैव जननी ते जनाधिप । प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशयः ॥

guruśuśrūṣayā caiva jananī te janādhipa | prāptā sumahatīṃ siddhimiti me nātra saṃśayaḥ

हे जनाधिप! और आपकी माता ने गुरुजनों की सेवा के द्वारा महान् सिद्धि प्राप्त की है, इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 9 (15.41.9)

कर्तुमर्हसि राजेन्द्र तेषां त्वमुदकक्रियाम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैरेतदत्र विधीयताम् ॥

kartumarhasi rājendra teṣāṃ tvamudakakriyām | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvairetadatra vidhīyatām

हे राजेन्द्र! आपको सब भाइयों के साथ उनके लिए जलदान करना चाहिए; अब यही किया जाए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (15.41.10)

ततः स पृथिवीपालः पाण्डवानां धुरंधरः । निर्ययौ सहसोदर्यः सदारश्च नरर्षभः ॥

tataḥ sa pṛthivīpālaḥ pāṇḍavānāṃ dhuraṃdharaḥ | niryayau sahasodaryaḥ sadāraśca nararṣabhaḥ

तब पाण्डवों का भार उठाने वाले, पुरुषश्रेष्ठ वे पृथ्वीपति अपने भाइयों और पत्नियों के साथ निकल पड़े।

श्लोक 11 (15.41.11)

पौरजानपदाश्चैव राजभक्तिपुरस्कृताः । गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ॥

paurajānapadāścaiva rājabhaktipuraskṛtāḥ | gaṅgāṃ prajagmurabhito vāsasaikena saṃvṛtāḥ

राजभक्ति से प्रेरित पुरवासी और जनपदवासी भी एक-एक वस्त्र ओढ़े हुए चारों ओर से गङ्गा के तट पर पहुँचे।

श्लोक 12 (15.41.12)

ततोऽवगाह्य सलिले सर्वे तु कुरुपुङ्गवाः । युयुत्सुमग्रतः कृत्वा ददुस्तोयं महात्मने ॥

tato'vagāhya salile sarve tu kurupuṅgavāḥ | yuyutsumagrataḥ kṛtvā dadustoyaṃ mahātmane

फिर सब कुरुश्रेष्ठों ने जल में स्नान किया और युयुत्सु को आगे करके उन महात्मा के लिए जलदान किया।

श्लोक 13 (15.41.13)

गान्धार्याश्च पृथायाश्च विधिवन्नामगोत्रतः । शौचं निवर्तयन्तस्ते तत्रोषुर्नगराद्बहिः ॥

gāndhāryāśca pṛthāyāśca vidhivannāmagotrataḥ | śaucaṃ nivartayantaste tatroṣurnagarādbahiḥ

विधिपूर्वक नाम और गोत्र का उच्चारण करके गान्धारी और पृथा के लिए भी उन्होंने जल दिया; और शुद्धि-कर्म पूरा करते हुए वे नगर के बाहर वहीं रहे।

श्लोक 14 (15.41.14)

प्रेषयामास स नरान्विधिज्ञानाप्तकारिणः । गङ्गाद्वारं कुरुश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ॥

preṣayāmāsa sa narānvidhijñānāptakāriṇaḥ | gaṅgādvāraṃ kuruśreṣṭho yatra dagdho'bhavannṛpaḥ

कुरुश्रेष्ठ ने विधि जानने वाले और विश्वसनीय पुरुषों को गङ्गाद्वार भेजा, जहाँ राजा दग्ध हुए थे।

श्लोक 15 (15.41.15)

तत्रैव तेषां कुल्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात्तदा । कर्तव्यानीति पुरुषान्दत्तदेयान्महीपतिः ॥

tatraiva teṣāṃ kulyāni gaṅgādvāre'nvaśāttadā | kartavyānīti puruṣāndattadeyānmahīpatiḥ

उस समय राजा ने आवश्यक सामग्री देकर उन पुरुषों को आज्ञा दी कि गङ्गाद्वार में वहीं उनकी अस्थियों के संस्कार किए जाएँ।

श्लोक 16 (15.41.16)

द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः । ददौ श्राद्धानि विधिवद्दक्षिणावन्ति पाण्डवः ॥

dvādaśe'hani tebhyaḥ sa kṛtaśauco narādhipaḥ | dadau śrāddhāni vidhivaddakṣiṇāvanti pāṇḍavaḥ

बारहवें दिन शुद्धि पूरी करके पाण्डव राजा ने उनके लिए विधिपूर्वक, दक्षिणा सहित श्राद्ध किए।

श्लोक 17 (15.41.17)

धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः । सुवर्णं रजतं गाश्च शय्याश्च सुमहाधनाः ॥

dhṛtarāṣṭraṃ samuddiśya dadau sa pṛthivīpatiḥ | suvarṇaṃ rajataṃ gāśca śayyāśca sumahādhanāḥ

उस राजा ने धृतराष्ट्र के उद्देश्य से सोना, चाँदी, गायें और बहुमूल्य शय्याएँ दीं।

श्लोक 18 (15.41.18)

गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथायाश्च पृथक्पृथक् । सङ्कीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ॥

gāndhāryāścaiva tejasvī pṛthāyāśca pṛthakpṛthak | saṅkīrtya nāmanī rājā dadau dānamanuttamam

उस तेजस्वी राजा ने गान्धारी और पृथा के नाम अलग-अलग उच्चारित करके उनके लिए सर्वोत्तम दान दिए।

श्लोक 19 (15.41.19)

यो यदिच्छति यावच्च तावत्स लभते द्विजः । शयनं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ॥

yo yadicchati yāvacca tāvatsa labhate dvijaḥ | śayanaṃ bhojanaṃ yānaṃ maṇiratnamatho dhanam

जो ब्राह्मण जो कुछ और जितना चाहता, उतना पाता था: शय्या, भोजन, वाहन, मणि-रत्न और धन।

श्लोक 20 (15.41.20)

यानमाच्छादनं भोगान्दासीश्च समलङ्कृताः । ददौ राजा समुद्दिश्य तयोर्मात्रोर्महीपतिः ॥

yānamācchādanaṃ bhogāndāsīśca samalaṅkṛtāḥ | dadau rājā samuddiśya tayormātrormahīpatiḥ

वाहन, वस्त्र, भोग-सामग्री और सुसज्जित दासियाँ राजा ने उन दोनों माताओं के उद्देश्य से दीं।

श्लोक 21 (15.41.21)

ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकशः । प्रविवेश पुनर्धीमान्नगरं वारणाह्वयम् ॥

tataḥ sa pṛthivīpālo dattvā śrāddhānyanekaśaḥ | praviveśa punardhīmānnagaraṃ vāraṇāhvayam

तब बुद्धिमान् राजा ने अनेक बार श्राद्ध-दान करके फिर गजनामधारी नगर हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

श्लोक 22 (15.41.22)

ते चापि राजवचनात्पुरुषा ये गताऽभवन् । सङ्कल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ॥

te cāpi rājavacanātpuruṣā ye gatā'bhavan | saṅkalpya teṣāṃ kulyāni punaḥ pratyāgamaṃstataḥ

और राजा की आज्ञा से जो पुरुष गए थे, वे उनकी अस्थियाँ एकत्र करके फिर लौट आए।

श्लोक 23 (15.41.23)

माल्यैर्गन्धैश्च विविधैरर्चयित्वा यथाविधि । कुल्यानि तेषां संयोज्य तदाचख्युर्महीपतेः ॥

mālyairgandhaiśca vividhairarcayitvā yathāvidhi | kulyāni teṣāṃ saṃyojya tadācakhyurmahīpateḥ

माला और अनेक प्रकार के गन्धों से विधिपूर्वक उनकी पूजा करके और अस्थियों को गङ्गा से मिलाकर उन्होंने राजा को सूचना दी।

श्लोक 24 (15.41.24)

समाश्वास्य तु राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । नारदोप्यगमत्प्रीतः परमर्षिर्यथोप्सितम् ॥

samāśvāsya tu rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | nāradopyagamatprītaḥ paramarṣiryathopsitam

धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर को सान्त्वना देकर परमर्षि नारद सन्तुष्ट होकर इच्छित स्थान को चले गए।

श्लोक 25 (15.41.25)

एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः । वनवासे तथा त्रीणि नगरे दशपञ्च च ॥

evaṃ varṣāṇyatītāni dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ | vanavāse tathā trīṇi nagare daśapañca ca

इस प्रकार बुद्धिमान् धृतराष्ट्र के वर्ष बीते: तीन वन में और पन्द्रह नगर में,

श्लोक 26 (15.41.26)

हतपुत्रस्य सङ्ग्रामे दानानि ददतः सदा । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणां भ्रातॄणां स्वजनस्य च ॥

hataputrasya saṅgrāme dānāni dadataḥ sadā | jñātisambandhimitrāṇāṃ bhrātṝṇāṃ svajanasya ca

जो युद्ध में पुत्रों के मारे जाने पर भी ज्ञातियों, सम्बन्धियों, मित्रों, भाइयों और अपने जनों को सदा दान देते रहे।

श्लोक 27 (15.41.27)

युधिष्ठिरस्तु नृपतिर्नातिप्रीतमनास्तदा । धारयामास तद्राज्यं निहतज्ञातिबान्धवः ॥

yudhiṣṭhirastu nṛpatirnātiprītamanāstadā | dhārayāmāsa tadrājyaṃ nihatajñātibāndhavaḥ

परन्तु राजा युधिष्ठिर, जिनके ज्ञातिजन और बन्धु मारे जा चुके थे, उस समय अधिक प्रसन्न मन के बिना उस राज्य को धारण करते रहे।

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