भीष्म पर्व · अध्याय 12
शेष द्वीपों का वर्णन तथा राहु, चन्द्र और सूर्य का परिमाण
सञ्जय पृथ्वी के वर्णन में शेष द्वीपों का वृत्तान्त पूरा करते हैं: घी, दधिमण्ड, सुरा और जल के समुद्र; कुश, शाल्मलि, क्रौञ्च और पुष्कर द्वीपों के पर्वत, वर्ष और देश, जहाँ की दीर्घायु प्रजा प्रजापति के संरक्षण में एक ही धर्म का पालन करती है; और समा नामक प्रदेश, जहाँ चार दिग्गज जीवनदायी वायु को पकड़ते और छोड़ते हैं। धृतराष्ट्र के पूछने पर वे राहु, चन्द्रमा और सूर्य का परिमाण बताते हैं, कहते हैं कि राहु इन दोनों को ग्रस लेता है, और राजा को धैर्य रखने को कहकर तथा इसके श्रवण का फल बताकर भूमिपर्व समाप्त करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.12.1)
उत्तरेषु च कौरव्य द्वीपेषु श्रूयते कथा । एवं तत्र महाराज ब्रुवतश्च निबोध मे ॥
uttareṣu ca kauravya dvīpeṣu śrūyate kathā | evaṃ tatra mahārāja bruvataśca nibodha me
हे कुरुनन्दन, उत्तर के द्वीपों के विषय में भी एक वृत्तान्त सुना जाता है। हे महाराज, मैं जैसे उसे कहता हूँ, वैसे ही मुझसे सुनो।
श्लोक 2 (6.12.2)
घृततोयः समुद्रोऽत्र दधिमण्डोदकोऽपरः । सुरोदः सागरश्चैव तथान्यो जलसागरः ॥
ghṛtatoyaḥ samudro'tra dadhimaṇḍodako'paraḥ | surodaḥ sāgaraścaiva tathānyo jalasāgaraḥ
यहाँ घी के जल वाला एक समुद्र है, दूसरा दही के मण्ड (मट्ठे) के जल वाला है; फिर सुरा का समुद्र है और एक अन्य, जल का सागर।
श्लोक 3 (6.12.3)
परस्परेण द्विगुणाः सर्वे द्वीपा नराधिप । पर्वताश्च महाराज समुद्रैः परिवारिताः ॥
paraspareṇa dviguṇāḥ sarve dvīpā narādhipa | parvatāśca mahārāja samudraiḥ parivāritāḥ
हे नरेश, ये सभी द्वीप एक-दूसरे से दुगुने हैं, और हे महाराज, उनके पर्वत समुद्रों से घिरे हुए हैं।
श्लोक 4 (6.12.4)
गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मानःशिलो महान् । पर्वतः पश्चिमे कृष्णो नारायणसखो नृप ॥
gaurastu madhyame dvīpe girirmānaḥśilo mahān | parvataḥ paścime kṛṣṇo nārāyaṇasakho nṛpa
बीच वाले द्वीप में मैनसिल का बना गौर नामक महान पर्वत है; और हे नृप, पश्चिम में कृष्ण नामक पर्वत है, जो नारायण का सखा है।
श्लोक 5 (6.12.5)
तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशवः । प्रसन्नश्चाभवत्तत्र प्रजानां व्यदधत्सुखम् ॥
tatra ratnāni divyāni svayaṃ rakṣati keśavaḥ | prasannaścābhavattatra prajānāṃ vyadadhatsukham
वहाँ स्वयं केशव दिव्य रत्नों की रक्षा करते हैं; और वहाँ प्रसन्न होकर उन्होंने प्रजा को सुख प्रदान किया।
श्लोक 6 (6.12.6)
कुशस्तम्बः कुशद्वीपे मध्ये जनपदैः सह । संपूज्यते शाल्मलिश्च द्वीपे शाल्मलिके नृप ॥
kuśastambaḥ kuśadvīpe madhye janapadaiḥ saha | saṃpūjyate śālmaliśca dvīpe śālmalike nṛpa
कुशद्वीप में जनपदों के बीच कुश का एक गुच्छ है, जिसकी वहाँ के लोगों सहित पूजा होती है; और हे नृप, शाल्मलि द्वीप में शाल्मलि (सेमल) वृक्ष पूजा जाता है।
श्लोक 7 (6.12.7)
क्रौञ्चद्वीपे महाक्रौञ्चो गिरी रत्नचयाकरः । संपूज्यते महाराज चातुर्वर्ण्येन नित्यदा ॥
krauñcadvīpe mahākrauñco girī ratnacayākaraḥ | saṃpūjyate mahārāja cāturvarṇyena nityadā
क्रौञ्चद्वीप में रत्नों की राशियों की खान महाक्रौञ्च पर्वत है; हे महाराज, चारों वर्णों के लोग सदा उसकी पूजा करते हैं।
श्लोक 8 (6.12.8)
गोमन्तः पर्वतो राजन्सुमहान्सर्वधातुमान् । यत्र नित्यं निवसति श्रीमान्कमललोचनः ॥
gomantaḥ parvato rājansumahānsarvadhātumān | yatra nityaṃ nivasati śrīmānkamalalocanaḥ
हे राजन्, वहाँ गोमन्त नामक पर्वत है, जो अत्यन्त विशाल और सब प्रकार की धातुओं से भरा है; उस पर श्रीमान् कमलनयन भगवान् सदा निवास करते हैं —
श्लोक 9 (6.12.9)
मोक्षिभिः संस्तुतो नित्यं प्रभुर्नारायणो हरिः । कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्चितः ॥
mokṣibhiḥ saṃstuto nityaṃ prabhurnārāyaṇo hariḥ | kuśadvīpe tu rājendra parvato vidrumaiścitaḥ
वे प्रभु नारायण हरि, जिनकी मोक्ष चाहने वाले सदा स्तुति करते हैं। हे राजेन्द्र, कुशद्वीप में मूँगों से भरा एक पर्वत है;
श्लोक 10 (6.12.10)
सुनामा नाम दुर्धर्षो द्वितीयो हेमपर्वतः । द्युतिमान्नाम कौरव्य तृतीयः कुमुदो गिरिः ॥
sunāmā nāma durdharṣo dvitīyo hemaparvataḥ | dyutimānnāma kauravya tṛtīyaḥ kumudo giriḥ
दूसरा सुनामा नाम का अजेय स्वर्णपर्वत है; हे कौरव्य, तीसरा कुमुद पर्वत है, जिसे द्युतिमान् कहते हैं;
श्लोक 11 (6.12.11)
चतुर्थः पुष्पवान्नाम पञ्चमस्तु कुशेशयः । षष्ठो हरिगिरिर्नाम षडेते पर्वतोत्तमाः ॥
caturthaḥ puṣpavānnāma pañcamastu kuśeśayaḥ | ṣaṣṭho harigirirnāma ṣaḍete parvatottamāḥ
चौथा पुष्पवान् नाम का है, पाँचवाँ कुशेशय, और छठा हरिगिरि नाम का है। ये छह श्रेष्ठ पर्वत हैं।
श्लोक 12 (6.12.12)
तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः सर्वभागशः । औद्भिदं प्रथमं वर्षं द्वितीयं वेणुमण्डलम् ॥
teṣāmantaraviṣkambho dviguṇaḥ sarvabhāgaśaḥ | audbhidaṃ prathamaṃ varṣaṃ dvitīyaṃ veṇumaṇḍalam
उनके बीच का विस्तार हर भाग में दुगुना होता जाता है। पहला वर्ष (भूखण्ड) औद्भिद है, दूसरा वेणुमण्डल,
श्लोक 13 (6.12.13)
तृतीयं सुरथाकारं चतुर्थं कम्बलं स्मृतम् । धृतिमत्पञ्चमं वर्षं षष्ठं वर्षं प्रभाकरम् ॥
tṛtīyaṃ surathākāraṃ caturthaṃ kambalaṃ smṛtam | dhṛtimatpañcamaṃ varṣaṃ ṣaṣṭhaṃ varṣaṃ prabhākaram
तीसरा सुरथाकार, चौथा कम्बल कहलाता है, पाँचवाँ वर्ष धृतिमत् है और छठा वर्ष प्रभाकर,
श्लोक 14 (6.12.14)
सप्तमं कापिलं वर्षं सप्तैते वर्षलम्भकाः । एतेषु देवगन्धर्वाः प्रजाश्च जगतीश्वर ॥
saptamaṃ kāpilaṃ varṣaṃ saptaite varṣalambhakāḥ | eteṣu devagandharvāḥ prajāśca jagatīśvara
और सातवाँ वर्ष कापिल है। ये सात भूखण्ड हैं। हे जगदीश्वर, इनमें देवता, गन्धर्व और प्रजाएँ
श्लोक 15 (6.12.15)
विहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जनः । न तेषु दस्यवः सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप ॥
viharante ramante ca na teṣu mriyate janaḥ | na teṣu dasyavaḥ santi mlecchajātyo'pi vā nṛpa
विचरते और आनन्द करते हैं; वहाँ कोई नहीं मरता। हे नृप, उनमें न दस्यु हैं और न म्लेच्छ जाति के लोग।
श्लोक 16 (6.12.16)
गौरप्रायो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव । अवशिष्टेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर ॥
gauraprāyo janaḥ sarvaḥ sukumāraśca pārthiva | avaśiṣṭeṣu sarveṣu vakṣyāmi manujeśvara
हे राजन्, वहाँ के सभी लोग प्रायः गौरवर्ण और सुकुमार होते हैं। हे मनुजेश्वर, अब मैं शेष सबके विषय में बताऊँगा,
श्लोक 17 (6.12.17)
यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु । क्रौञ्चद्वीपे महाराज क्रौञ्चो नाम महागिरिः ॥
yathāśrutaṃ mahārāja tadavyagramanāḥ śṛṇu | krauñcadvīpe mahārāja krauñco nāma mahāgiriḥ
हे महाराज, जैसा मैंने सुना है वैसा ही; तुम एकाग्र मन से सुनो। हे महाराज, क्रौञ्चद्वीप में क्रौञ्च नाम का महान पर्वत है।
श्लोक 18 (6.12.18)
क्रौञ्चात्परो वामनको वामनादन्धकारकः । अन्धकारात्परो राजन्मैनाकः पर्वतोत्तमः ॥
krauñcātparo vāmanako vāmanādandhakārakaḥ | andhakārātparo rājanmainākaḥ parvatottamaḥ
क्रौञ्च से आगे वामनक है, वामन से आगे अन्धकारक; हे राजन्, अन्धकार से आगे पर्वतों में श्रेष्ठ मैनाक है।
श्लोक 19 (6.12.19)
मैनाकात्परतो राजन्गोविन्दो गिरिरुत्तमः । गोविन्दात्परतो राजन्निबिडो नाम पर्वतः ॥
mainākātparato rājangovindo giriruttamaḥ | govindātparato rājannibiḍo nāma parvataḥ
हे राजन्, मैनाक से आगे उत्तम पर्वत गोविन्द है; और हे राजन्, गोविन्द से आगे निबिड नाम का पर्वत है।
श्लोक 20 (6.12.20)
परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन । देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥
parastu dviguṇasteṣāṃ viṣkambho vaṃśavardhana | deśāṃstatra pravakṣyāmi tanme nigadataḥ śṛṇu
हे वंशवर्धन, उनमें से प्रत्येक का विस्तार पिछले से दुगुना है। अब मैं वहाँ के देशों का वर्णन करूँगा; मेरे कहे को सुनो।
श्लोक 21 (6.12.21)
क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुगः । मनोनुगात्परश्चोष्णो देशः कुरुकुलोद्वह ॥
krauñcasya kuśalo deśo vāmanasya manonugaḥ | manonugātparaścoṣṇo deśaḥ kurukulodvaha
क्रौञ्च पर्वत का देश कुशल है, वामन का मनोनुग; हे कुरुकुल को धारण करने वाले, मनोनुग से आगे उष्ण देश है।
श्लोक 22 (6.12.22)
उष्णात्परः प्रावरकः प्रावारादन्धकारकः । अन्धकारकदेशात्तु मुनिदेशः परः स्मृतः ॥
uṣṇātparaḥ prāvarakaḥ prāvārādandhakārakaḥ | andhakārakadeśāttu munideśaḥ paraḥ smṛtaḥ
उष्ण से आगे प्रावरक है, प्रावार से आगे अन्धकारक; और अन्धकारक देश से आगे मुनिदेश बताया जाता है।
श्लोक 23 (6.12.23)
मुनिदेशात्परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः । सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायो जनाधिप ॥
munideśātparaścaiva procyate dundubhisvanaḥ | siddhacāraṇasaṃkīrṇo gauraprāyo janādhipa
मुनिदेश से आगे दुन्दुभिस्वन कहलाने वाला देश है, जो सिद्धों और चारणों से भरा है; हे जनाधिप, वहाँ के लोग प्रायः गौरवर्ण हैं।
श्लोक 24 (6.12.24)
एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविताः । पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान् ॥
ete deśā mahārāja devagandharvasevitāḥ | puṣkare puṣkaro nāma parvato maṇiratnavān
हे महाराज, इन देशों में देवता और गन्धर्व आते-जाते रहते हैं। पुष्कर द्वीप में मणियों और रत्नों से भरा पुष्कर नाम का पर्वत है।
श्लोक 25 (6.12.25)
तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देवः प्रजापतिः । तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्षयः ॥
tatra nityaṃ prabhavati svayaṃ devaḥ prajāpatiḥ | taṃ paryupāsate nityaṃ devāḥ sarve maharṣayaḥ
वहाँ स्वयं भगवान् प्रजापति सदा विराजते हैं, और सब देवता तथा महर्षि निरन्तर उनकी उपासना करते हैं,
श्लोक 26 (6.12.26)
वाग्भिर्मनोनुकूलाभिः पूजयन्तो जनाधिप । जम्बूद्वीपात्प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत ॥
vāgbhirmanonukūlābhiḥ pūjayanto janādhipa | jambūdvīpātpravartante ratnāni vividhānyuta
हे जनाधिप, मन को भाने वाली वाणी से उनका पूजन करते हुए। जम्बूद्वीप से अनेक प्रकार के रत्न
श्लोक 27 (6.12.27)
द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुसत्तम । ब्रह्मचर्येण सत्येन प्रजानां हि दमेन च ॥
dvīpeṣu teṣu sarveṣu prajānāṃ kurusattama | brahmacaryeṇa satyena prajānāṃ hi damena ca
हे कुरुश्रेष्ठ, उन सब द्वीपों की प्रजा के लिए जाते हैं। वहाँ की प्रजा के ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय-संयम के कारण
श्लोक 28 (6.12.28)
आरोग्यायुःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः । एको जनपदो राजन्द्वीपेष्वेतेषु भारत । उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ॥
ārogyāyuḥpramāṇābhyāṃ dviguṇaṃ dviguṇaṃ tataḥ | eko janapado rājandvīpeṣveteṣu bhārata | uktā janapadā yeṣu dharmaścaikaḥ pradṛśyate
उनका आरोग्य और आयु का परिमाण एक द्वीप से दूसरे में दुगुना-दुगुना होता जाता है। हे राजन्, हे भारत, इन द्वीपों में एक ही जनपद है; जिन जनपदों का वर्णन किया गया, उन सबमें एक ही धर्म दिखाई देता है।
श्लोक 29 (6.12.29)
ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापतिः । द्वीपानेतान्महाराज रक्षंस्तिष्ठति नित्यदा ॥
īśvaro daṇḍamudyamya svayameva prajāpatiḥ | dvīpānetānmahārāja rakṣaṃstiṣṭhati nityadā
हे महाराज, स्वयं प्रजापति ईश्वर दण्ड उठाए हुए सदा इन द्वीपों की रक्षा करते रहते हैं।
श्लोक 30 (6.12.30)
स राजा स शिवो राजन्स पिता प्रपितामहः । गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाः सजडपण्डिताः ॥
sa rājā sa śivo rājansa pitā prapitāmahaḥ | gopāyati naraśreṣṭha prajāḥ sajaḍapaṇḍitāḥ
हे राजन्, वही उनके राजा हैं, वही कल्याणकारी शिव हैं, वही पिता और प्रपितामह हैं; हे नरश्रेष्ठ, वही मूर्ख और विद्वान् सब प्रजा की रक्षा करते हैं।
श्लोक 31 (6.12.31)
भोजनं चात्र कौरव्य प्रजाः स्वयमुपस्थितम् । सिद्धमेव महाबाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा ॥
bhojanaṃ cātra kauravya prajāḥ svayamupasthitam | siddhameva mahābāho taddhi bhuñjanti nityadā
हे कौरव्य, यहाँ प्रजा के पास भोजन अपने-आप उपस्थित हो जाता है; हे महाबाहो, वह पका-पकाया ही होता है और वे सदा उसी को खाते हैं।
श्लोक 32 (6.12.32)
ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः । चतुरश्रा महाराज त्रयस्त्रिंशत्तु मण्डलम् ॥
tataḥ paraṃ samā nāma dṛśyate lokasaṃsthitiḥ | caturaśrā mahārāja trayastriṃśattu maṇḍalam
उसके आगे समा नाम की लोक-स्थिति दिखाई देती है। हे महाराज, वह चौकोर है और उसका मण्डल (घेरा) तैंतीस का है।
श्लोक 33 (6.12.33)
तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसंमताः । दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनैरावतादयः ॥
tatra tiṣṭhanti kauravya catvāro lokasaṃmatāḥ | diggajā bharataśreṣṭha vāmanairāvatādayaḥ
हे कौरव्य, वहाँ लोकों द्वारा सम्मानित चार दिग्गज रहते हैं; हे भरतश्रेष्ठ, वे हैं वामन, ऐरावत आदि,
श्लोक 34 (6.12.34)
सुप्रतीकस्तदा राजन्प्रभिन्नकरटामुखः । तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे ॥
supratīkastadā rājanprabhinnakaraṭāmukhaḥ | tasyāhaṃ parimāṇaṃ tu na saṃkhyātumihotsahe
और हे राजन्, सुप्रतीक भी, जिसके गण्डस्थल और मुख से मद बहता है। उनके परिमाण की गणना करने का साहस मैं यहाँ नहीं कर सकता;
श्लोक 35 (6.12.35)
असंख्यातः स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव हि ॥
asaṃkhyātaḥ sa nityaṃ hi tiryagūrdhvamadhastathā | tatra vai vāyavo vānti digbhyaḥ sarvābhya eva hi
वह सदा असंख्य है — तिरछे, ऊपर और नीचे भी। वहाँ सब दिशाओं से वायु बहती है,
श्लोक 36 (6.12.36)
असंबद्धा महाराज तान्निगृह्णन्ति ते गजाः । पुष्करैः पद्मसंकाशैर्विकसद्भिर्महाप्रभैः ॥
asaṃbaddhā mahārāja tānnigṛhṇanti te gajāḥ | puṣkaraiḥ padmasaṃkāśairvikasadbhirmahāprabhaiḥ
हे महाराज, बेरोक-टोक; और वे हाथी उन्हें अपनी सूँड़ों के अग्रभाग से पकड़ लेते हैं, जो कमल के समान, खिलते हुए और अत्यन्त तेजस्वी हैं;
श्लोक 37 (6.12.37)
शतधा पुनरेवाशु ते तान्मुञ्चन्ति नित्यशः । श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः । आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजाः ॥
śatadhā punarevāśu te tānmuñcanti nityaśaḥ | śvasadbhirmucyamānāstu diggajairiha mārutāḥ | āgacchanti mahārāja tatastiṣṭhanti vai prajāḥ
और फिर तुरन्त ही उन्हें सौ धाराओं में निरन्तर छोड़ देते हैं। हे महाराज, साँस लेते हुए दिग्गजों द्वारा छोड़ी गई वायु यहाँ आती है, और उसी से प्रजा जीवित रहती है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 38 (6.12.38)
परो वै विस्तरोऽत्यर्थं त्वया सञ्जय कीर्तितः । दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि सञ्जय ॥
paro vai vistaro'tyarthaṃ tvayā sañjaya kīrtitaḥ | darśitaṃ dvīpasaṃsthānamuttaraṃ brūhi sañjaya
हे सञ्जय, तुमने अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया और द्वीपों की स्थिति दिखा दी। हे सञ्जय, अब आगे का वृत्तान्त बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 39 (6.12.39)
उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहं वै शृणु तत्त्वतः । स्वर्भानोः कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः ॥
uktā dvīpā mahārāja grahaṃ vai śṛṇu tattvataḥ | svarbhānoḥ kauravaśreṣṭha yāvadeva pramāṇataḥ
हे महाराज, द्वीपों का वर्णन हो चुका। हे कौरवश्रेष्ठ, अब ग्रह स्वर्भानु (राहु) के विषय में ठीक-ठीक सुनो कि उसका परिमाण कितना है।
श्लोक 40 (6.12.40)
परिमण्डलो महाराज स्वर्भानुः श्रूयते ग्रहः । योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै ॥
parimaṇḍalo mahārāja svarbhānuḥ śrūyate grahaḥ | yojanānāṃ sahasrāṇi viṣkambho dvādaśāsya vai
हे महाराज, स्वर्भानु ग्रह गोलाकार सुना जाता है; उसका व्यास बारह हज़ार योजन है।
श्लोक 41 (6.12.41)
परिणाहेन षट्त्रिंशद्विपुलत्वेन चानघ । षष्टिमाहुः शतान्यस्य बुधाः पौराणिकास्तथा ॥
pariṇāhena ṣaṭtriṃśadvipulatvena cānagha | ṣaṣṭimāhuḥ śatānyasya budhāḥ paurāṇikāstathā
हे निष्पाप, उसकी परिधि छत्तीस हज़ार योजन है, और पुराणों के ज्ञाता विद्वान् उसकी विपुलता छह हज़ार (साठ सौ) बताते हैं।
श्लोक 42 (6.12.42)
चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः । विष्कम्भेण कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत्तु मण्डलम् ॥
candramāstu sahasrāṇi rājannekādaśa smṛtaḥ | viṣkambheṇa kuruśreṣṭha trayastriṃśattu maṇḍalam
हे राजन्, चन्द्रमा का व्यास ग्यारह हज़ार योजन माना गया है; हे कुरुश्रेष्ठ, उसका मण्डल (परिधि) तैंतीस हज़ार का है;
श्लोक 43 (6.12.43)
एकोनषष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मनः ॥
ekonaṣaṣṭiviṣkambhaṃ śītaraśmermahātmanaḥ
और शीतल किरणों वाले उस महान चन्द्रमा का विस्तार उनसठ का है।
श्लोक 44 (6.12.44)
सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन । विष्कम्भेण ततो राजन्मण्डलं त्रिंशता समम् ॥
sūryastvaṣṭau sahasrāṇi dve cānye kurunandana | viṣkambheṇa tato rājanmaṇḍalaṃ triṃśatā samam
हे कुरुनन्दन, सूर्य का व्यास आठ हज़ार और दो हज़ार और, अर्थात् दस हज़ार योजन है; हे राजन्, उसका मण्डल तीस हज़ार के बराबर है;
श्लोक 45 (6.12.45)
अष्टपञ्चाशतं राजन्विपुलत्वेन चानघ । श्रूयते परमोदारः पतगोऽसौ विभावसुः ॥
aṣṭapañcāśataṃ rājanvipulatvena cānagha | śrūyate paramodāraḥ patago'sau vibhāvasuḥ
हे निष्पाप राजन्, उसकी विपुलता अट्ठावन की है। ऐसा सुना जाता है कि वह विभावसु (सूर्य) परम उदार और तीव्र गति वाला है।
श्लोक 46 (6.12.46)
एतत्प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत । स राहुश्छादयत्येतौ यथाकालं महत्तया ॥
etatpramāṇamarkasya nirdiṣṭamiha bhārata | sa rāhuśchādayatyetau yathākālaṃ mahattayā
हे भारत, यहाँ सूर्य का यही परिमाण बताया गया है। वह राहु अपनी विशालता के कारण समय आने पर इन दोनों को ढक लेता है —
श्लोक 47 (6.12.47)
चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोऽयमुदाहृतः । इत्येतत्ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुषा ॥
candrādityau mahārāja saṃkṣepo'yamudāhṛtaḥ | ityetatte mahārāja pṛcchataḥ śāstracakṣuṣā
हे महाराज, चन्द्रमा और सूर्य को। यह संक्षेप में कहा गया है। हे महाराज, इस प्रकार तुम्हारे पूछने पर शास्त्र की दृष्टि से
श्लोक 48 (6.12.48)
सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि । यथोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सनिर्माणमिदं जगत् ॥
sarvamuktaṃ yathātattvaṃ tasmācchamamavāpnuhi | yathoddiṣṭaṃ mayā proktaṃ sanirmāṇamidaṃ jagat
मैंने सब कुछ यथार्थ रूप में कह दिया; इसलिए शान्ति प्राप्त करो। जैसा निर्दिष्ट है, वैसे ही मैंने इस जगत् का उसकी रचना सहित वर्णन किया।
श्लोक 49 (6.12.49)
तस्मादाश्वस कौरव्य पुत्रं दुर्योधनं प्रति । श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम् ॥
tasmādāśvasa kauravya putraṃ duryodhanaṃ prati | śrutvedaṃ bharataśreṣṭha bhūmiparva manonugam
इसलिए हे कौरव्य, अपने पुत्र दुर्योधन के विषय में धैर्य रखो। हे भरतश्रेष्ठ, मन को भाने वाले इस भूमिपर्व को सुनकर
श्लोक 50 (6.12.50)
श्रीमान्भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसंमतः । आयुर्बलं च कीर्तिश्च तस्य तेजश्च वर्धते ॥
śrīmānbhavati rājanyaḥ siddhārthaḥ sādhusaṃmataḥ | āyurbalaṃ ca kīrtiśca tasya tejaśca vardhate
क्षत्रिय श्रीसम्पन्न, सफल-मनोरथ और सज्जनों द्वारा सम्मानित होता है; उसकी आयु, बल, कीर्ति और तेज बढ़ते हैं।
श्लोक 51 (6.12.51)
यः शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतव्रतः । प्रीयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहाः ॥
yaḥ śṛṇoti mahīpāla parvaṇīdaṃ yatavrataḥ | prīyante pitarastasya tathaiva ca pitāmahāḥ
हे महीपाल, जो व्रत का पालन करते हुए पर्व के दिनों में इसे सुनता है, उसके पितर और पितामह प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 52 (6.12.52)
इदं तु भारतं वर्षं यत्र वर्तामहे वयम् । पूर्वैः प्रवर्तितं पुण्यं तत्सर्वं श्रुतवानसि ॥
idaṃ tu bhārataṃ varṣaṃ yatra vartāmahe vayam | pūrvaiḥ pravartitaṃ puṇyaṃ tatsarvaṃ śrutavānasi
यह भारतवर्ष, जिसमें हम रहते हैं और जिसे पूर्वजों ने पुण्यमय बनाया — वह सब तुमने सुन लिया है।