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भीष्म पर्व · अध्याय 43

युद्ध से पहले युधिष्ठिर का गुरुजनों से आशीर्वाद लेना

गीता की महिमा के पाँच श्लोकों के बाद संजय बताते हैं कि अर्जुन के गाण्डीव उठाते ही सेनाएँ फिर गरज उठीं। युधिष्ठिर कवच और शस्त्र रखकर पैदल कौरव-सेना की ओर चल पड़ते हैं; भाई व्याकुल होते हैं और शत्रु उनका उपहास करते हैं, पर श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे गुरुजनों की अनुमति लेने जा रहे हैं। भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य उन्हें आशीर्वाद देते हैं और स्वीकार करते हैं कि वे धन के कारण कौरवों से बँधे हैं; भीष्म और द्रोण अपनी मृत्यु का संकेत देते हैं, और शल्य कर्ण का तेज नष्ट करने का वचन देते हैं। कर्ण श्रीकृष्ण का प्रस्ताव ठुकरा देते हैं, युयुत्सु पाण्डवों के पक्ष में आ जाते हैं, और सबकी प्रशंसा के बीच पाण्डव फिर से युद्ध के लिए सज्जित होते हैं।

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (6.43.1)

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥

gītā sugītā kartavyā kimanyaiḥ śāstrasaṃgrahaiḥ | yā svayaṃ padmanābhasya mukhapadmādviniḥsṛtā

गीता का भली-भाँति अध्ययन और गान करना चाहिए; अन्य शास्त्र-संग्रहों से क्या प्रयोजन? यह स्वयं पद्मनाभ (विष्णु) के मुखकमल से निकली है।

श्लोक 2 (6.43.2)

सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः । सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्ववेदमयो मनुः ॥

sarvaśāstramayī gītā sarvadevamayo hariḥ | sarvatīrthamayī gaṅgā sarvavedamayo manuḥ

गीता में सब शास्त्र समाए हैं, हरि में सब देवता, गंगा में सब तीर्थ और मनु में सब वेद।

श्लोक 3 (6.43.3)

गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते । चतुर्गकारसंयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते ॥

gītā gaṅgā ca gāyatrī govindeti hṛdi sthite | caturgakārasaṃyukte punarjanma na vidyate

जब गीता, गंगा, गायत्री और गोविन्द, ये "ग" से आरम्भ होने वाले चारों, हृदय में बस जाते हैं, तब पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 4 (6.43.4)

षट्शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्तपञ्चाशत्सप्तषष्टिं तु सञ्जयः ॥

ṣaṭśatāni saviṃśāni ślokānāṃ prāha keśavaḥ | arjunaḥ saptapañcāśatsaptaṣaṣṭiṃ tu sañjayaḥ

केशव ने छह सौ बीस श्लोक कहे, अर्जुन ने सत्तावन और संजय ने सड़सठ;

श्लोक 5 (6.43.5)

धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते । भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च । सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ॥

dhṛtarāṣṭraḥ ślokamekaṃ gītāyā mānamucyate | bhāratāmṛtasarvasvagītāyā mathitasya ca | sāramuddhṛtya kṛṣṇena arjunasya mukhe hutam

और धृतराष्ट्र ने एक श्लोक; यही गीता का परिमाण कहा जाता है। गीता महाभारत रूपी अमृत का सर्वस्व है; श्रीकृष्ण ने उसका मन्थन करके उसका सार निकाला और उसे आहुति की भाँति अर्जुन के मुख में अर्पित किया।

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (6.43.6)

ततो धनंजयं दृष्ट्वा बाणगाण्डीवधारिणम् । पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथाः ॥

tato dhanaṃjayaṃ dṛṣṭvā bāṇagāṇḍīvadhāriṇam | punareva mahānādaṃ vyasṛjanta mahārathāḥ

तब बाण और गाण्डीव धनुष धारण किए धनंजय को देखकर महारथियों ने फिर से भारी गर्जना की।

श्लोक 7 (6.43.7)

पाण्डवाः सोमकाश्चैव ये चैषामनुयायिनः । दध्मुश्च मुदिताः शङ्खान्वीराः सागरसंभवान् ॥

pāṇḍavāḥ somakāścaiva ye caiṣāmanuyāyinaḥ | dadhmuśca muditāḥ śaṅkhānvīrāḥ sāgarasaṃbhavān

पाण्डवों, सोमकों और उनके अनुयायी वीरों ने प्रसन्न होकर समुद्र से उत्पन्न शंख बजाए।

श्लोक 8 (6.43.8)

ततो भेर्यश्च पेश्यश्च क्रकचा गोविषाणिकाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त ततः शब्दो महानभूत् ॥

tato bheryaśca peśyaśca krakacā goviṣāṇikāḥ | sahasaivābhyahanyanta tataḥ śabdo mahānabhūt

तब भेरियाँ, पेशी, क्रकच और गोविषाणिक (सींग के बाजे) एक साथ बजाए गए, और बड़ा भारी कोलाहल हुआ।

श्लोक 9 (6.43.9)

तथा देवाः सगन्धर्वाः पितरश्च जनाधिप । सिद्धचारणसङ्घाश्च समीयुस्ते दिदृक्षया ॥

tathā devāḥ sagandharvāḥ pitaraśca janādhipa | siddhacāraṇasaṅghāśca samīyuste didṛkṣayā

हे जनाधिप, उसी प्रकार गन्धर्वों सहित देवता, पितर तथा सिद्धों और चारणों के समूह देखने की इच्छा से वहाँ एकत्र हुए।

श्लोक 10 (6.43.10)

ऋषयश्च महाभागाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् । समीयुस्तत्र सहिता द्रष्टुं तद्वैशसं महत् ॥

ṛṣayaśca mahābhāgāḥ puraskṛtya śatakratum | samīyustatra sahitā draṣṭuṃ tadvaiśasaṃ mahat

महाभाग ऋषि भी शतक्रतु (इन्द्र) को आगे करके वह महान् संहार देखने के लिए एक साथ वहाँ आए।

श्लोक 11 (6.43.11)

ते सेने स्तिमिते सज्जे वीक्षमाणे परस्परम् । गङ्गायमुनयोर्वेगो यथैवैत्य परस्परम् ॥

te sene stimite sajje vīkṣamāṇe parasparam | gaṅgāyamunayorvego yathaivaitya parasparam

दोनों सेनाएँ सज्जित और निश्चल खड़ी एक-दूसरे को देख रही थीं, जैसे गंगा और यमुना की धाराएँ आपस में मिलने को आती हैं।

श्लोक 12 (6.43.12)

एवं प्रवृत्ते ते सेने निःशब्दे जनसंसदि । चित्रे पट इवालेख्ये दर्शनीयतरे शुभे ॥

evaṃ pravṛtte te sene niḥśabde janasaṃsadi | citre paṭa ivālekhye darśanīyatare śubhe

इस प्रकार डटी हुई वे दोनों सेनाएँ उस विशाल जनसमूह में निःशब्द खड़ी थीं, मानो वस्त्र पर अंकित कोई चित्र हों, सुन्दर और देखने में अत्यन्त मनोहर।

श्लोक 13 (6.43.13)

ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रज्वलिते नृप ॥

tato yudhiṣṭhiro dṛṣṭvā yuddhāya samavasthite | te sene sāgaraprakhye muhuḥ prajvalite nṛpa

तब हे राजन्, युद्ध के लिए डटी हुई, सागर के समान विशाल और बार-बार दमकती उन दोनों सेनाओं को देखकर युधिष्ठिर ने

श्लोक 14 (6.43.14)

विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् । अवरुह्य रथात्क्षिप्रं पद्भ्यामेव कृताञ्जलिः ॥

vimucya kavacaṃ vīro nikṣipya ca varāyudham | avaruhya rathātkṣipraṃ padbhyāmeva kṛtāñjaliḥ

उस वीर ने अपना कवच उतार दिया, श्रेष्ठ शस्त्र रख दिया और शीघ्र रथ से उतरकर हाथ जोड़े पैदल ही चल पड़े।

श्लोक 15 (6.43.15)

पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । वाग्यतः प्रययौ धीरः प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥

pitāmahamabhiprekṣya dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | vāgyataḥ prayayau dhīraḥ prāṅmukho ripuvāhinīm

पितामह की ओर दृष्टि लगाए धर्मराज युधिष्ठिर मौन और धीर भाव से पूर्व की ओर शत्रु-सेना की तरफ़ बढ़े।

श्लोक 16 (6.43.16)

तं प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अवतीर्य रथात्तूर्णं भ्रातृभिः सहितोऽन्वयात् ॥

taṃ prayāntamabhiprekṣya kuntīputro dhanañjayaḥ | avatīrya rathāttūrṇaṃ bhrātṛbhiḥ sahito'nvayāt

उन्हें जाते देख कुन्तीपुत्र धनंजय तुरन्त रथ से उतरे और भाइयों सहित उनके पीछे चल पड़े।

श्लोक 17 (6.43.17)

वासुदेवश्च भगवान्पृष्ठतोऽनुजगाम तम् । तथा मुख्याश्च राजानस्तच्चित्ता जग्मुरुत्सुकाः ॥

vāsudevaśca bhagavānpṛṣṭhato'nujagāma tam | tathā mukhyāśca rājānastaccittā jagmurutsukāḥ

भगवान् वासुदेव भी उनके पीछे-पीछे गए, और प्रमुख राजा भी उन्हीं में चित्त लगाए उत्सुकता से चल पड़े।

अर्जुन उवाच

श्लोक 18 (6.43.18)

किं ते व्यवसितं राजन्यदस्मानपहाय वै । पद्भ्यामेव प्रयातोऽसि प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥

kiṃ te vyavasitaṃ rājanyadasmānapahāya vai | padbhyāmeva prayāto'si prāṅmukho ripuvāhinīm

हे राजन्, आपने क्या निश्चय किया है कि हमें छोड़कर पैदल ही पूर्व की ओर शत्रु-सेना की तरफ़ जा रहे हैं?

भीमसेन उवाच

श्लोक 19 (6.43.19)

क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचायुधः । दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातॄनुत्सृज्य पार्थिव ॥

kva gamiṣyasi rājendra nikṣiptakavacāyudhaḥ | daṃśiteṣvarisainyeṣu bhrātṝnutsṛjya pārthiva

हे राजेन्द्र, शत्रु-सेनाएँ कवच पहने खड़ी हैं; ऐसे में कवच और शस्त्र त्यागकर, भाइयों को छोड़कर, हे पृथ्वीपति, आप कहाँ जाएँगे?

नकुल उवाच

श्लोक 20 (6.43.20)

एवं गते त्वयि ज्येष्ठे मम भ्रातरि भारत । भीर्मे दुनोति हृदयं ब्रूहि गन्ता भवान्क्व नु ॥

evaṃ gate tvayi jyeṣṭhe mama bhrātari bhārata | bhīrme dunoti hṛdayaṃ brūhi gantā bhavānkva nu

हे भारत, आप जैसे मेरे ज्येष्ठ भ्राता के इस प्रकार जाने से भय मेरे हृदय को व्यथित कर रहा है। बताइए, आप कहाँ जा रहे हैं?

सहदेव उवाच

श्लोक 21 (6.43.21)

अस्मिन्रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये । उत्सृज्य क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृप ॥

asminraṇasamūhe vai vartamāne mahābhaye | utsṛjya kva nu gantāsi śatrūnabhimukho nṛpa

जब यह महाभयंकर संग्राम सामने उपस्थित है, तब हे नृप, हमें छोड़कर शत्रुओं की ओर मुँह किए आप कहाँ जाएँगे?

सञ्जय उवाच

श्लोक 22 (6.43.22)

एवमाभाष्यमाणोऽपि भ्रातृभिः कुरुनन्दनः । नोवाच वाग्यतः किंचिद्गच्छत्येव युधिष्ठिरः ॥

evamābhāṣyamāṇo'pi bhrātṛbhiḥ kurunandanaḥ | novāca vāgyataḥ kiṃcidgacchatyeva yudhiṣṭhiraḥ

भाइयों के इस प्रकार कहने पर भी कुरुनन्दन युधिष्ठिर कुछ न बोले; मौन रहकर वे चलते ही रहे।

श्लोक 23 (6.43.23)

तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामनाः । अभिप्रायोऽस्य विज्ञातो मयेति प्रहसन्निव ॥

tānuvāca mahāprājño vāsudevo mahāmanāḥ | abhiprāyo'sya vijñāto mayeti prahasanniva

तब महाबुद्धिमान, महामना वासुदेव ने मानो मुस्कराते हुए उनसे कहा: "इनका अभिप्राय मैं समझ गया हूँ।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 24 (6.43.24)

एष भीष्मं तथा द्रोणं गौतमं शल्यमेव च । अनुमान्य गुरून्सर्वान्योत्स्यते पार्थिवोऽरिभिः ॥

eṣa bhīṣmaṃ tathā droṇaṃ gautamaṃ śalyameva ca | anumānya gurūnsarvānyotsyate pārthivo'ribhiḥ

ये भीष्म, द्रोण, गौतम (कृप) और शल्य, इन सब गुरुजनों से अनुमति लेकर तब शत्रुओं से युद्ध करेंगे।

श्लोक 25 (6.43.25)

श्रूयते हि पुराकल्पे गुरूनननुमान्य यः । युध्यते स भवेद्व्यक्तमपध्यातो महत्तरैः ॥

śrūyate hi purākalpe gurūnananumānya yaḥ | yudhyate sa bhavedvyaktamapadhyāto mahattaraiḥ

क्योंकि प्राचीन शास्त्रों में सुना जाता है कि जो गुरुजनों की अनुमति लिए बिना युद्ध करता है, वह निश्चय ही बड़ों के कोप का भागी होता है।

श्लोक 26 (6.43.26)

अनुमान्य यथाशास्त्रं यस्तु युध्येन्महत्तरैः । ध्रुवस्तस्य जयो युद्धे भवेदिति मतिर्मम ॥

anumānya yathāśāstraṃ yastu yudhyenmahattaraiḥ | dhruvastasya jayo yuddhe bhavediti matirmama

परन्तु जो शास्त्र-विधि से अनुमति लेकर बड़ों से युद्ध करता है, युद्ध में उसकी विजय निश्चित होती है; ऐसा मेरा मत है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 27 (6.43.27)

एवं ब्रुवति कृष्णेऽत्र धार्तराष्ट्रचमूं प्रति । हाहाकारो महानासीन्निःशब्दास्त्वपरेऽभवन् ॥

evaṃ bruvati kṛṣṇe'tra dhārtarāṣṭracamūṃ prati | hāhākāro mahānāsīnniḥśabdāstvapare'bhavan

कृष्ण के ऐसा कहते समय धृतराष्ट्र-पुत्रों की सेना की ओर बड़ा हाहाकार मच गया, और दूसरे लोग निःशब्द हो गए।

श्लोक 28 (6.43.28)

दृष्ट्वा युधिष्ठिरं दूराद्धार्तराष्ट्रस्य सैनिकाः । मिथः संकथयांचक्रुरेषो हि कुलपांसनः ॥

dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraṃ dūrāddhārtarāṣṭrasya sainikāḥ | mithaḥ saṃkathayāṃcakrureṣo hi kulapāṃsanaḥ

दूर से युधिष्ठिर को देखकर दुर्योधन के सैनिक आपस में बातें करने लगे: "यह तो अपने कुल का कलंक है!"

सैनिका ऊचुः

श्लोक 29 (6.43.29)

व्यक्तं भीत इवाभ्येति राजासौ भीष्ममन्तिकम् । युधिष्ठिरः ससोदर्यः शरणार्थं प्रयाचकः ॥

vyaktaṃ bhīta ivābhyeti rājāsau bhīṣmamantikam | yudhiṣṭhiraḥ sasodaryaḥ śaraṇārthaṃ prayācakaḥ

स्पष्ट है कि यह राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित मानो डरकर, शरण माँगने वाले याचक की भाँति भीष्म के पास आ रहा है।

श्लोक 30 (6.43.30)

धनञ्जये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे । नकुले सहदेवे च भीतिरभ्येति पाण्डवम् ॥

dhanañjaye kathaṃ nāthe pāṇḍave ca vṛkodare | nakule sahadeve ca bhītirabhyeti pāṇḍavam

धनंजय, पाण्डुपुत्र वृकोदर, नकुल और सहदेव जैसे रक्षकों के रहते इस पाण्डव को भय कैसे हो रहा है?

श्लोक 31 (6.43.31)

न नूनं क्षत्रियकुले जातः संप्रथिते भुवि । यथाऽस्य हृदयं भीतमल्पसत्त्वस्य संयुगे ॥

na nūnaṃ kṣatriyakule jātaḥ saṃprathite bhuvi | yathā'sya hṛdayaṃ bhītamalpasattvasya saṃyuge

निश्चय ही यह पृथ्वी पर प्रसिद्ध क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न नहीं हुआ, क्योंकि इस अल्पसाहसी का हृदय युद्ध में इतना डरा हुआ है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 32 (6.43.32)

ततस्ते सैनिकाः सर्वे प्रशंसन्ति स्म कौरवान् । हृष्टाः सुमनसो भूत्वा चेलानि दुधुवुश्च ह ॥

tataste sainikāḥ sarve praśaṃsanti sma kauravān | hṛṣṭāḥ sumanaso bhūtvā celāni dudhuvuśca ha

तब वे सब सैनिक कौरवों की प्रशंसा करने लगे; हर्षित और प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने अपने वस्त्र हिलाए।

श्लोक 33 (6.43.33)

व्यनिन्दंश्च तथा सर्वे योधास्तव विशांपते । युधिष्ठिरं ससोदर्यं सहितं केशवेन हि ॥

vyanindaṃśca tathā sarve yodhāstava viśāṃpate | yudhiṣṭhiraṃ sasodaryaṃ sahitaṃ keśavena hi

हे प्रजानाथ, आपके सब योद्धाओं ने भाइयों और केशव सहित युधिष्ठिर की निन्दा भी की।

श्लोक 34 (6.43.34)

ततस्तत्कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्ठिरम् । निःशब्दमभवत्तूर्णं पुनरेव विशांपते ॥

tatastatkauravaṃ sainyaṃ dhikkṛtvā tu yudhiṣṭhiram | niḥśabdamabhavattūrṇaṃ punareva viśāṃpate

हे विशाम्पते, फिर वह कौरव-सेना युधिष्ठिर को धिक्कारकर शीघ्र ही पुनः निःशब्द हो गई।

श्लोक 35 (6.43.35)

किं नु वक्ष्यति राजाऽसौ किं भीष्मः प्रतिवक्ष्यति । किं भीमः समरश्लाघी किं नु कृष्णार्जुनाविति ॥

kiṃ nu vakṣyati rājā'sau kiṃ bhīṣmaḥ prativakṣyati | kiṃ bhīmaḥ samaraślāghī kiṃ nu kṛṣṇārjunāviti

"वह राजा क्या कहेगा? भीष्म क्या उत्तर देंगे? युद्ध पर गर्व करने वाले भीम क्या कहेंगे, और कृष्ण तथा अर्जुन क्या कहेंगे?"

श्लोक 36 (6.43.36)

विवक्षितं किमस्येति संशयः सुमहानभूत् । उभयोः सेनयो राजन्युधिष्ठिरकृते तदा ॥

vivakṣitaṃ kimasyeti saṃśayaḥ sumahānabhūt | ubhayoḥ senayo rājanyudhiṣṭhirakṛte tadā

"इनका कहने का अभिप्राय क्या है?" हे राजन्, उस समय युधिष्ठिर को लेकर दोनों सेनाओं में ऐसा बड़ा संशय उत्पन्न हो गया।

श्लोक 37 (6.43.37)

सोऽवगाह्य चमूं शत्रोः शरशक्तिसमाकुलाम् । भीष्ममेवाभ्ययात्तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः ॥

so'vagāhya camūṃ śatroḥ śaraśaktisamākulām | bhīṣmamevābhyayāttūrṇaṃ bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ

बाणों और शक्तियों से भरी शत्रु-सेना में घुसकर वे भाइयों से घिरे हुए तुरन्त सीधे भीष्म के पास पहुँचे।

श्लोक 38 (6.43.38)

तमुवाच ततः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डवः । भीष्मं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम् ॥

tamuvāca tataḥ pādau karābhyāṃ pīḍya pāṇḍavaḥ | bhīṣmaṃ śāntanavaṃ rājā yuddhāya samupasthitam

तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर ने युद्ध के लिए उपस्थित शान्तनुनन्दन भीष्म के चरण दोनों हाथों से पकड़कर उनसे कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 39 (6.43.39)

आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात आशिषश्च प्रयोजय ॥

āmantraye tvāṃ durdharṣa tvayā yotsyāmahe saha | anujānīhi māṃ tāta āśiṣaśca prayojaya

हे दुर्धर्ष, मैं आपसे विदा लेने आया हूँ; हमें आपसे युद्ध करना है। हे तात, मुझे आज्ञा दीजिए और आशीर्वाद दीजिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 40 (6.43.40)

यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते । शपेयं त्वां महाराज परीभावाय भारत ॥

yadyevaṃ nābhigacchethā yudhi māṃ pṛthivīpate | śapeyaṃ tvāṃ mahārāja parībhāvāya bhārata

हे पृथ्वीपति, यदि तुम युद्ध से पहले इस प्रकार मेरे पास न आते, तो हे महाराज, हे भारत, मैं तुम्हें पराभव का शाप दे देता।

श्लोक 41 (6.43.41)

प्रीतोऽहं पुत्र युध्यस्व जयमाप्नुहि पाण्डव । यत्तेऽभिलषितं चान्यत्तदवाप्नुहि संयुगे ॥

prīto'haṃ putra yudhyasva jayamāpnuhi pāṇḍava | yatte'bhilaṣitaṃ cānyattadavāpnuhi saṃyuge

पुत्र, मैं प्रसन्न हूँ। हे पाण्डव, युद्ध करो और विजय पाओ। और जो कुछ भी तुम चाहते हो, वह भी युद्ध में प्राप्त करो।

श्लोक 42 (6.43.42)

व्रियतां च वरः पार्थ किमस्मत्तोऽभिकाङ्क्षसि । एवं गते महाराज न तवास्ति पराजयः ॥

vriyatāṃ ca varaḥ pārtha kimasmatto'bhikāṅkṣasi | evaṃ gate mahārāja na tavāsti parājayaḥ

हे पार्थ, वर माँगो; तुम मुझसे क्या चाहते हो? ऐसा होने पर, हे महाराज, तुम्हारी पराजय नहीं होगी।

श्लोक 43 (6.43.43)

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥

arthasya puruṣo dāso dāsastvartho na kasyacit | iti satyaṃ mahārāja baddho'smyarthena kauravaiḥ

मनुष्य धन का दास है, पर धन किसी का दास नहीं। हे महाराज, यह सत्य है कि मैं धन के कारण कौरवों से बँधा हुआ हूँ।

श्लोक 44 (6.43.44)

अतस्त्वां क्लीबवद्वाक्यं ब्रवीमि कुरुनन्दन । भृतोऽस्म्यर्थेन कौरव्य युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥

atastvāṃ klībavadvākyaṃ bravīmi kurunandana | bhṛto'smyarthena kauravya yuddhādanyatkimicchasi

इसीलिए, हे कुरुनन्दन, मैं तुमसे नपुंसक की भाँति यह बात कहता हूँ: हे कौरव्य, मैं कौरवों के धन से पोषित हूँ। युद्ध के अतिरिक्त तुम और क्या चाहते हो?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 45 (6.43.45)

मन्त्रयस्व महाबाहो हितैषी मम नित्यशः । युध्यस्व कौरवस्यार्थे ममैष सततं वरः ॥

mantrayasva mahābāho hitaiṣī mama nityaśaḥ | yudhyasva kauravasyārthe mamaiṣa satataṃ varaḥ

हे महाबाहो, आप सदा मेरे हितैषी हैं; मुझे परामर्श दीजिए। युद्ध आप कौरव के लिए ही करें; यही मेरा सदा का वर है।

भीष्म उवाच

श्लोक 46 (6.43.46)

राजन्किमत्र साह्यं ते करोमि कुरुनन्दन । कामं योत्स्ये परस्यार्थे ब्रूहि यत्ते विवक्षितम् ॥

rājankimatra sāhyaṃ te karomi kurunandana | kāmaṃ yotsye parasyārthe brūhi yatte vivakṣitam

हे राजन्, हे कुरुनन्दन, यहाँ मैं तुम्हारी क्या सहायता करूँ? युद्ध तो मैं अवश्य दूसरे पक्ष की ओर से करूँगा। बताओ, तुम क्या कहना चाहते हो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 47 (6.43.47)

कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् । एतन्मे मन्त्रय हितं यदि श्रेयः प्रपश्यसि ॥

kathaṃ jayeyaṃ saṃgrāme bhavantamaparājitam | etanme mantraya hitaṃ yadi śreyaḥ prapaśyasi

युद्ध में आप जैसे अपराजित को मैं कैसे जीतूँ? यदि आप कल्याण का मार्ग देखते हों, तो मेरे हित की यह बात मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 48 (6.43.48)

नैनं पश्यामि कौन्तेय यो मां युध्यन्तमाहवे । विजयेत पुमान्कश्चित्साक्षादपि शतक्रतुः ॥

nainaṃ paśyāmi kaunteya yo māṃ yudhyantamāhave | vijayeta pumānkaścitsākṣādapi śatakratuḥ

हे कुन्तीनन्दन, मैं ऐसा कोई पुरुष नहीं देखता जो युद्ध में लड़ते हुए मुझे जीत सके, साक्षात् शतक्रतु (इन्द्र) भी नहीं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 49 (6.43.49)

हन्त पृच्छामि तस्मात्त्वां पितामह नमोऽस्तु ते । वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मनः समरे परैः ॥

hanta pṛcchāmi tasmāttvāṃ pitāmaha namo'stu te | vadhopāyaṃ bravīhi tvamātmanaḥ samare paraiḥ

तो हे पितामह, आपको प्रणाम करके मैं यह पूछता हूँ: युद्ध में शत्रुओं द्वारा आपके वध का उपाय बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 50 (6.43.50)

न स्म तं तात पश्यामि समरे यो जयेत माम् । न तावन्मृत्युकालोऽपि पुनरागमनं कुरु ॥

na sma taṃ tāta paśyāmi samare yo jayeta mām | na tāvanmṛtyukālo'pi punarāgamanaṃ kuru

हे तात, मैं ऐसा किसी को नहीं देखता जो युद्ध में मुझे जीत सके। अभी तो मेरी मृत्यु का समय भी नहीं आया है। फिर कभी आना।

सञ्जय उवाच

श्लोक 51 (6.43.51)

ततो युधिष्ठिरो वाक्यं भीष्मस्य कुरुनन्दन । शिरसा प्रतिजग्राह भूयस्तमभिवाद्य च ॥

tato yudhiṣṭhiro vākyaṃ bhīṣmasya kurunandana | śirasā pratijagrāha bhūyastamabhivādya ca

हे कुरुनन्दन, तब युधिष्ठिर ने भीष्म की बात सिर झुकाकर स्वीकार की और उन्हें फिर प्रणाम करके

श्लोक 52 (6.43.52)

प्रायात्पुनर्महाबाहुराचार्यस्य रथं प्रति । पश्यतां सर्वसैन्यानां मध्येन भ्रातृभिः सह ॥

prāyātpunarmahābāhurācāryasya rathaṃ prati | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ madhyena bhrātṛbhiḥ saha

वे महाबाहु भाइयों सहित, सब सेनाओं के देखते-देखते उनके बीच से होकर आचार्य द्रोण के रथ की ओर गए।

श्लोक 53 (6.43.53)

स द्रोणमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनिःश्रेयसं वचः ॥

sa droṇamabhivādyātha kṛtvā cābhipradakṣiṇam | uvāca rājā durdharṣamātmaniḥśreyasaṃ vacaḥ

द्रोण को प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके राजा ने उन दुर्धर्ष आचार्य से अपने कल्याण की बात कही।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 54 (6.43.54)

आमन्त्रये त्वां भगवन्योत्स्ये विगतकल्मषः । कथं जये रिपून्सर्वाननुज्ञातस्त्वया द्विज ॥

āmantraye tvāṃ bhagavanyotsye vigatakalmaṣaḥ | kathaṃ jaye ripūnsarvānanujñātastvayā dvija

हे भगवन्, मैं आपसे विदा लेता हूँ; मैं निष्पाप रहकर युद्ध करूँगा। हे द्विज, आपकी अनुमति से मैं सब शत्रुओं को कैसे जीतूँ?

द्रोण उवाच

श्लोक 55 (6.43.55)

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज परीभावाय सर्वशः ॥

yadi māṃ nābhigacchethā yuddhāya kṛtaniścayaḥ | śapeyaṃ tvāṃ mahārāja parībhāvāya sarvaśaḥ

यदि युद्ध का निश्चय करके तुम मेरे पास न आते, तो हे महाराज, मैं तुम्हें सब प्रकार से पराभव का शाप दे देता।

श्लोक 56 (6.43.56)

तद्युधिष्ठिर तुष्टोऽस्मि पूजितश्च त्वयाऽनघ । अनुजानामि युध्यस्व विजयं समवाप्नुहि ॥

tadyudhiṣṭhira tuṣṭo'smi pūjitaśca tvayā'nagha | anujānāmi yudhyasva vijayaṃ samavāpnuhi

इसलिए हे निष्पाप युधिष्ठिर, मैं सन्तुष्ट हूँ और तुमने मेरा सम्मान किया है। मैं आज्ञा देता हूँ: युद्ध करो और विजय पाओ।

श्लोक 57 (6.43.57)

करवाणि च ते कामं ब्रूहि त्वमभिकाङ्क्षितम् । एवं गते महाराज युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥

karavāṇi ca te kāmaṃ brūhi tvamabhikāṅkṣitam | evaṃ gate mahārāja yuddhādanyatkimicchasi

मैं तुम्हारी इच्छा भी पूरी करूँगा; बताओ तुम क्या चाहते हो। ऐसी स्थिति में, हे महाराज, युद्ध के अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो?

श्लोक 58 (6.43.58)

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥

arthasya puruṣo dāso dāsastvartho na kasyacit | iti satyaṃ mahārāja baddho'smyarthena kauravaiḥ

मनुष्य धन का दास है, पर धन किसी का दास नहीं। हे महाराज, यह सत्य है कि मैं धन के कारण कौरवों से बँधा हुआ हूँ।

श्लोक 59 (6.43.59)

ब्रवीम्येतत्क्लीबवत्त्वां युद्धादन्यत्किमिच्छसि । योत्स्येऽहं कौरवस्यार्थे तवाशास्यो जयो मया ॥

bravīmyetatklībavattvāṃ yuddhādanyatkimicchasi | yotsye'haṃ kauravasyārthe tavāśāsyo jayo mayā

मैं नपुंसक की भाँति तुमसे यह कहता हूँ: युद्ध के अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो? युद्ध तो मैं कौरव के लिए करूँगा, पर कामना तुम्हारी विजय की करूँगा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 60 (6.43.60)

जयमाशास्स्व मे ब्रह्मन्मन्त्रयस्व च मद्धितम् । युध्यस्व कौरवस्यार्थे वर एष वृतो मया ॥

jayamāśāssva me brahmanmantrayasva ca maddhitam | yudhyasva kauravasyārthe vara eṣa vṛto mayā

हे ब्रह्मन्, मेरी विजय की कामना कीजिए और मेरे हित का परामर्श दीजिए। युद्ध आप कौरव के लिए करें; यही वर मैं माँगता हूँ।

द्रोण उवाच

श्लोक 61 (6.43.61)

ध्रुवस्ते विजयो राजन्यस्य मन्त्री हरिस्तव । अहं त्वामभिजानामि रणे शत्रून्विजेष्यसि ॥

dhruvaste vijayo rājanyasya mantrī haristava | ahaṃ tvāmabhijānāmi raṇe śatrūnvijeṣyasi

हे राजन्, तुम्हारी विजय निश्चित है, क्योंकि स्वयं हरि तुम्हारे मन्त्री हैं। मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ; तुम रण में शत्रुओं को जीत लोगे।

श्लोक 62 (6.43.62)

यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः । युध्यस्व गच्छ कौन्तेय पृच्छ मां किं ब्रवीमि ते ॥

yato dharmastataḥ kṛṣṇo yataḥ kṛṣṇastato jayaḥ | yudhyasva gaccha kaunteya pṛccha māṃ kiṃ bravīmi te

जहाँ धर्म है, वहाँ कृष्ण हैं; जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है। हे कुन्तीनन्दन, जाओ, युद्ध करो। पूछो, मैं तुम्हें क्या बताऊँ?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 63 (6.43.63)

पृच्छामि त्वां द्विजश्रेष्ठ शृणु यन्मेऽभिकाङ्क्षितम् । कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् ॥

pṛcchāmi tvāṃ dvijaśreṣṭha śṛṇu yanme'bhikāṅkṣitam | kathaṃ jayeyaṃ saṃgrāme bhavantamaparājitam

हे द्विजश्रेष्ठ, मैं आपसे पूछता हूँ, मेरी अभिलाषा सुनिए: युद्ध में आप जैसे अपराजित को मैं कैसे जीतूँ?

द्रोण उवाच

श्लोक 64 (6.43.64)

न तेऽस्ति विजयस्तावद्यावद्युध्याम्यहं रणे । ममाशु निधने राजन्यतस्व सह सोदरैः ॥

na te'sti vijayastāvadyāvadyudhyāmyahaṃ raṇe | mamāśu nidhane rājanyatasva saha sodaraiḥ

जब तक मैं रण में लड़ता रहूँगा, तब तक तुम्हारी विजय नहीं होगी। हे राजन्, भाइयों सहित शीघ्र मेरी मृत्यु का प्रयत्न करो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 65 (6.43.65)

हन्त तस्मान्महाबाहो वधोपायं वदात्मनः । आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमोऽस्तु ते ॥

hanta tasmānmahābāho vadhopāyaṃ vadātmanaḥ | ācārya praṇipatyaiṣa pṛcchāmi tvāṃ namo'stu te

तो हे महाबाहो, अपने वध का उपाय बताइए। हे आचार्य, मैं आपके चरणों में झुककर यह पूछता हूँ; आपको नमस्कार है।

द्रोण उवाच

श्लोक 66 (6.43.66)

न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद्रथे स्थितम् । युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षौघवर्षिणम् ॥

na śatruṃ tāta paśyāmi yo māṃ hanyādrathe sthitam | yudhyamānaṃ susaṃrabdhaṃ śaravarṣaughavarṣiṇam

हे तात, मैं ऐसा कोई शत्रु नहीं देखता जो रथ पर खड़े, क्रोधपूर्वक लड़ते और बाणों की झड़ी बरसाते हुए मुझे मार सके,

श्लोक 67 (6.43.67)

ऋते प्रायगतं राजन्न्यस्तशस्त्रमचेतनम् । हन्यान्मां युधि योधानां सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

ṛte prāyagataṃ rājannyastaśastramacetanam | hanyānmāṃ yudhi yodhānāṃ satyametadbravīmi te

सिवाय उस स्थिति के, हे राजन्, जब मैंने मृत्यु का निश्चय कर लिया हो, शस्त्र रख दिए हों और चेतना समेट ली हो; तब योद्धाओं में से कोई मुझे युद्ध में मार सकता है। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

श्लोक 68 (6.43.68)

शस्त्रं चाहं रणे जह्यां श्रुत्वा तु महदप्रियम् । श्रद्धेयवाक्यात्पुरुषादेतत्सत्यं ब्रवीमि ते ॥

śastraṃ cāhaṃ raṇe jahyāṃ śrutvā tu mahadapriyam | śraddheyavākyātpuruṣādetatsatyaṃ bravīmi te

और किसी विश्वसनीय वचन वाले पुरुष से कोई अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर मैं रण में शस्त्र त्याग दूँगा। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 69 (6.43.69)

एतच्छ्रुत्वा महाराज भारद्वाजस्य धीमतः । अनुमान्य तमाचार्यं प्रायाच्छारद्वतं प्रति ॥

etacchrutvā mahārāja bhāradvājasya dhīmataḥ | anumānya tamācāryaṃ prāyācchāradvataṃ prati

हे महाराज, बुद्धिमान भरद्वाजनन्दन की यह बात सुनकर और आचार्य से अनुमति लेकर वे शरद्वान् के पुत्र कृप की ओर चले।

श्लोक 70 (6.43.70)

सोऽभिवाद्य कृपं राजा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । उवाच दुर्धर्षतमं वाक्यं वाक्यविदां वरः ॥

so'bhivādya kṛpaṃ rājā kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | uvāca durdharṣatamaṃ vākyaṃ vākyavidāṃ varaḥ

कृप को प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके वाणी के मर्मज्ञों में श्रेष्ठ राजा ने यह अत्यन्त प्रभावशाली वचन कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 71 (6.43.71)

अनुमानये त्वां योत्स्येऽहं गुरो विगतकल्मषः । जयेयं च रिपून्सर्वाननुज्ञातस्त्वयाऽनघ ॥

anumānaye tvāṃ yotsye'haṃ guro vigatakalmaṣaḥ | jayeyaṃ ca ripūnsarvānanujñātastvayā'nagha

हे गुरो, मैं निष्पाप रहकर युद्ध करने के लिए आपसे अनुमति माँगता हूँ; हे अनघ, आपकी आज्ञा पाकर मैं सब शत्रुओं को जीतूँ।

कृप उवाच

श्लोक 72 (6.43.72)

यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज परीभावाय सर्वशः ॥

yadi māṃ nābhigacchethā yuddhāya kṛtaniścayaḥ | śapeyaṃ tvāṃ mahārāja parībhāvāya sarvaśaḥ

यदि युद्ध का निश्चय करके तुम मेरे पास न आते, तो हे महाराज, मैं तुम्हें सब प्रकार से पराभव का शाप दे देता।

श्लोक 73 (6.43.73)

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥

arthasya puruṣo dāso dāsastvartho na kasyacit | iti satyaṃ mahārāja baddho'smyarthena kauravaiḥ

मनुष्य धन का दास है, पर धन किसी का दास नहीं। हे महाराज, यह सत्य है कि मैं धन के कारण कौरवों से बँधा हुआ हूँ।

श्लोक 74 (6.43.74)

तेषामर्थे महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः । अतस्त्वां क्लीबवद्ब्रूयां युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥

teṣāmarthe mahārāja yoddhavyamiti me matiḥ | atastvāṃ klībavadbrūyāṃ yuddhādanyatkimicchasi

हे महाराज, मेरा विचार है कि मुझे उन्हीं के लिए युद्ध करना है। इसीलिए मैं तुमसे नपुंसक की भाँति कहता हूँ: युद्ध के अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 75 (6.43.75)

हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वचः । इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतनः ॥

hanta pṛcchāmi te tasmādācārya śṛṇu me vacaḥ | ityuktvā vyathito rājā novāca gatacetanaḥ

"तो हे आचार्य, मैं आपसे पूछता हूँ, मेरी बात सुनिए…" इतना कहकर राजा व्यथित हो गए और सुध-बुध खोकर आगे कुछ न बोल सके।

सञ्जय उवाच

श्लोक 76 (6.43.76)

तं गौतमः प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम् । अवध्योऽहं महीपाल युध्यस्व जयमाप्नुहि ॥

taṃ gautamaḥ pratyuvāca vijñāyāsya vivakṣitam | avadhyo'haṃ mahīpāla yudhyasva jayamāpnuhi

उनके कहने का अभिप्राय समझकर गौतम (कृप) ने उत्तर दिया: "हे महीपाल, मैं अवध्य हूँ। युद्ध करो और विजय पाओ।"

कृप उवाच

श्लोक 77 (6.43.77)

प्रीतस्तेऽभिगमेनाहं जयं तव नराधिप । आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

prītaste'bhigamenāhaṃ jayaṃ tava narādhipa | āśāsiṣye sadotthāya satyametadbravīmi te

हे नराधिप, तुम्हारे मेरे पास आने से मैं प्रसन्न हूँ। मैं प्रतिदिन उठकर तुम्हारी विजय की कामना करूँगा। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 78 (6.43.78)

एतच्छ्रुत्वा महाराज गौतमस्य विशांपते । अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट् ॥

etacchrutvā mahārāja gautamasya viśāṃpate | anumānya kṛpaṃ rājā prayayau yena madrarāṭ

हे महाराज, हे विशाम्पते, गौतम की यह बात सुनकर राजा कृप से अनुमति लेकर वहाँ गए जहाँ मद्रराज थे।

श्लोक 79 (6.43.79)

स शल्यमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनिःश्रेयसं वचः ॥

sa śalyamabhivādyātha kṛtvā cābhipradakṣiṇam | uvāca rājā durdharṣamātmaniḥśreyasaṃ vacaḥ

शल्य को प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके राजा ने उन दुर्धर्ष वीर से अपने कल्याण की बात कही।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 80 (6.43.80)

अनुमानये त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये विगतकल्मषः । जयेयं नु परान्राजन्ननुज्ञातस्त्वया रिपून् ॥

anumānaye tvāṃ durdharṣa yotsye vigatakalmaṣaḥ | jayeyaṃ nu parānrājannanujñātastvayā ripūn

हे दुर्धर्ष, मैं आपसे अनुमति माँगता हूँ; मैं निष्पाप रहकर युद्ध करूँगा। हे राजन्, आपकी आज्ञा से मैं अपने शत्रुओं को जीतूँ।

शल्य उवाच

श्लोक 81 (6.43.81)

यदि मां नाधिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चयः । शपेयं त्वां महाराज परीभावाय वै रणे ॥

yadi māṃ nādhigacchethā yuddhāya kṛtaniścayaḥ | śapeyaṃ tvāṃ mahārāja parībhāvāya vai raṇe

यदि युद्ध का निश्चय करके तुम मेरे पास न आते, तो हे महाराज, मैं तुम्हें रण में पराभव का शाप दे देता।

श्लोक 82 (6.43.82)

तुष्टोऽस्मि पूजितश्चास्मि यत्काङ्क्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जयमाप्नुहि ॥

tuṣṭo'smi pūjitaścāsmi yatkāṅkṣasi tadastu te | anujānāmi caiva tvāṃ yudhyasva jayamāpnuhi

मैं सन्तुष्ट और सम्मानित हूँ; तुम जो चाहते हो वह तुम्हें मिले। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ: युद्ध करो और विजय पाओ।

श्लोक 83 (6.43.83)

ब्रूहि चैष परं वीर केनार्थः किं ददामि ते । एवं गते महाराज युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥

brūhi caiṣa paraṃ vīra kenārthaḥ kiṃ dadāmi te | evaṃ gate mahārāja yuddhādanyatkimicchasi

हे वीर, और भी बताओ: तुम्हें किस वस्तु का प्रयोजन है, मैं तुम्हें क्या दूँ? ऐसी स्थिति में, हे महाराज, युद्ध के अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो?

श्लोक 84 (6.43.84)

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥

arthasya puruṣo dāso dāsastvartho na kasyacit | iti satyaṃ mahārāja baddho'smyarthena kauravaiḥ

मनुष्य धन का दास है, पर धन किसी का दास नहीं। हे महाराज, यह सत्य है कि मैं धन के कारण कौरवों से बँधा हुआ हूँ।

श्लोक 85 (6.43.85)

करिष्यामि हि ते कामं भागिनेय यथेप्सितम् । ब्रवीम्यतः क्लीबवत्त्वां युद्धादन्यत्किमिच्छसि ॥

kariṣyāmi hi te kāmaṃ bhāgineya yathepsitam | bravīmyataḥ klībavattvāṃ yuddhādanyatkimicchasi

हे भानजे, मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हारा काम करूँगा। इसीलिए मैं तुमसे नपुंसक की भाँति कहता हूँ: युद्ध के अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 86 (6.43.86)

मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मद्धितमुत्तमम् । कामं युध्य परस्यार्थे वरमेतं वृणोम्यहम् ॥

mantrayasva mahārāja nityaṃ maddhitamuttamam | kāmaṃ yudhya parasyārthe varametaṃ vṛṇomyaham

हे महाराज, सदा मेरे परम हित का परामर्श दीजिए। युद्ध आप भले ही दूसरे पक्ष के लिए करें; यही वर मैं माँगता हूँ।

शल्य उवाच

श्लोक 87 (6.43.87)

किमत्र ब्रूहि साह्यं ते करोमि नृपसत्तम । कामं योत्स्ये परस्यार्थे बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥

kimatra brūhi sāhyaṃ te karomi nṛpasattama | kāmaṃ yotsye parasyārthe baddho'smyarthena kauravaiḥ

हे नृपश्रेष्ठ, बताओ, यहाँ मैं तुम्हारी क्या सहायता करूँ? युद्ध तो मैं अवश्य दूसरे पक्ष के लिए करूँगा, क्योंकि मैं धन के कारण कौरवों से बँधा हूँ।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 88 (6.43.88)

स एव मे वरः शल्य उद्योगे यस्त्वया कृतः । सूतपुत्रस्य संग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया ॥

sa eva me varaḥ śalya udyoge yastvayā kṛtaḥ | sūtaputrasya saṃgrāme kāryastejovadhastvayā

हे शल्य, मेरा वर वही है जो आपने युद्ध की तैयारी के समय दिया था: संग्राम में आपको सूतपुत्र (कर्ण) का तेज नष्ट करना है।

शल्य उवाच

श्लोक 89 (6.43.89)

संपत्स्यत्येष ते कामः कुन्तीपुत्र यथेप्सितम् । गच्छ युध्यस्व विस्रब्धः प्रतिजाने वचस्तव ॥

saṃpatsyatyeṣa te kāmaḥ kuntīputra yathepsitam | gaccha yudhyasva visrabdhaḥ pratijāne vacastava

हे कुन्तीपुत्र, तुम्हारी यह इच्छा तुम्हारे मन के अनुसार पूरी होगी। जाओ, निश्चिन्त होकर युद्ध करो; तुम्हारा कहा पूरा करने की मैं प्रतिज्ञा करता हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 90 (6.43.90)

अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम् । निर्जगाम महासैन्याद्भ्रातृभिः परिवारितः ॥

anumānyātha kaunteyo mātulaṃ madrakeśvaram | nirjagāma mahāsainyādbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ

अपने मामा मद्रराज से अनुमति लेकर कुन्तीपुत्र भाइयों से घिरे हुए उस विशाल सेना से बाहर निकल आए।

श्लोक 91 (6.43.91)

वासुदेवस्तु राधेयमाहवेऽभिजगाम वै । तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः ॥

vāsudevastu rādheyamāhave'bhijagāma vai | tata enamuvācedaṃ pāṇḍavārthe gadāgrajaḥ

उधर वासुदेव रणभूमि में राधानन्दन कर्ण के पास गए, और गद के बड़े भाई श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के हित के लिए उनसे यह कहा:

वासुदेव उवाच

श्लोक 92 (6.43.92)

श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात्किल न योत्स्यसे । अस्मान्वरय राधेय यावद्भीष्मो न हन्यते ॥

śrutaṃ me karṇa bhīṣmasya dveṣātkila na yotsyase | asmānvaraya rādheya yāvadbhīṣmo na hanyate

हे कर्ण, मैंने सुना है कि भीष्म से द्वेष के कारण तुम युद्ध नहीं करोगे। तो हे राधेय, जब तक भीष्म मारे नहीं जाते, तब तक तुम हमारा पक्ष ले लो।

श्लोक 93 (6.43.93)

हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम् । धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत्समम् ॥

hate tu bhīṣme rādheya punareṣyasi saṃyugam | dhārtarāṣṭrasya sāhāyyaṃ yadi paśyasi cetsamam

हे राधेय, भीष्म के मारे जाने पर, यदि उचित समझो तो धृतराष्ट्र-पुत्र की सहायता के लिए फिर युद्ध में लौट आना।

कर्ण उवाच

श्लोक 94 (6.43.94)

न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव । त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम् ॥

na vipriyaṃ kariṣyāmi dhārtarāṣṭrasya keśava | tyaktaprāṇaṃ hi māṃ viddhi duryodhanahitaiṣiṇam

हे केशव, मैं धृतराष्ट्र-पुत्र का कोई अप्रिय कार्य नहीं करूँगा। जान लो, मैंने दुर्योधन के हित के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए हैं।

सञ्जय उवाच

श्लोक 95 (6.43.95)

तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णः संन्यवर्तत भारत । युधिष्ठिरपुरोगैश्च पाण्डवैः सह संगतः ॥

tacchrutvā vacanaṃ kṛṣṇaḥ saṃnyavartata bhārata | yudhiṣṭhirapurogaiśca pāṇḍavaiḥ saha saṃgataḥ

हे भारत, यह बात सुनकर कृष्ण लौट आए और युधिष्ठिर आदि पाण्डवों से जा मिले।

श्लोक 96 (6.43.96)

अथ सैन्यस्य मध्ये तु प्राक्रोशत्पाण्डवाग्रजः । योऽस्मान्वृणोति तमहं वरये साह्यकारणात् ॥

atha sainyasya madhye tu prākrośatpāṇḍavāgrajaḥ | yo'smānvṛṇoti tamahaṃ varaye sāhyakāraṇāt

तब सेना के बीच ज्येष्ठ पाण्डव ने ऊँचे स्वर में पुकारा: "जो हमें अपनाएगा, उसे मैं सहायता के लिए अपनाता हूँ।"

श्लोक 97 (6.43.97)

अथ तान्समभिप्रेक्ष्य युयुत्सुरिदमब्रवीत् । प्रीतात्मा धर्मराजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

atha tānsamabhiprekṣya yuyutsuridamabravīt | prītātmā dharmarājānaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

तब उनकी ओर देखकर युयुत्सु ने प्रसन्नचित्त होकर कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर से यह कहा:

युयुत्सुरुवाच

श्लोक 98 (6.43.98)

अहं योत्स्यामि भवतः संयुगे धृतराष्ट्रजान् । युष्मदर्थं महाराज यदि मां वृणुषेऽनघ ॥

ahaṃ yotsyāmi bhavataḥ saṃyuge dhṛtarāṣṭrajān | yuṣmadarthaṃ mahārāja yadi māṃ vṛṇuṣe'nagha

हे निष्पाप महाराज, यदि आप मुझे स्वीकार करें तो मैं आपकी ओर से, आपके लिए, युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों से लड़ूँगा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 99 (6.43.99)

एह्येहि सर्वे योत्स्यामस्तव भ्रातॄनपण्डितान् । युयुत्सो वासुदेवश्च वयं च ब्रूम सर्वशः ॥

ehyehi sarve yotsyāmastava bhrātṝnapaṇḍitān | yuyutso vāsudevaśca vayaṃ ca brūma sarvaśaḥ

आओ, आओ! हम सब मिलकर तुम्हारे मूर्ख भाइयों से युद्ध करेंगे। हे युयुत्सु, वासुदेव और हम सब तुमसे यही कहते हैं।

श्लोक 100 (6.43.100)

वृणोमि त्वां महाबाहो युध्यस्व मम कारणात् । त्वयि पिण्डश्च तन्तुश्च धृतराष्ट्रस्य दृश्यते ॥

vṛṇomi tvāṃ mahābāho yudhyasva mama kāraṇāt | tvayi piṇḍaśca tantuśca dhṛtarāṣṭrasya dṛśyate

हे महाबाहो, मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ; मेरे लिए युद्ध करो। धृतराष्ट्र का पिण्डदान और उनकी वंश-परम्परा तुम्हीं पर टिकी दिखाई देती है।

श्लोक 101 (6.43.101)

भजस्वास्मान्राजपुत्र भजमानान्महाद्युते । न भविष्यति दुर्बुद्धिर्धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ॥

bhajasvāsmānrājaputra bhajamānānmahādyute | na bhaviṣyati durbuddhirdhārtarāṣṭro'tyamarṣaṇaḥ

हे राजकुमार, हे महातेजस्वी, हमारा साथ दो, हम तुम्हें अपनाते हैं। वह दुर्बुद्धि, अत्यन्त क्रोधी धृतराष्ट्र-पुत्र नहीं बचेगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 102 (6.43.102)

ततो युयुत्सुः कौरव्यान्परित्यज्य सुतांस्तव । जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम् ॥

tato yuyutsuḥ kauravyānparityajya sutāṃstava | jagāma pāṇḍuputrāṇāṃ senāṃ viśrāvya dundubhim

तब युयुत्सु आपके पुत्र कौरवों को छोड़कर, दुन्दुभि बजवाकर घोषणा करते हुए पाण्डवों की सेना में चले गए।

श्लोक 103 (6.43.103)

ततो युधिष्ठिरो राजा संप्रहृष्टः सहानुजः । जग्राह कवचं भूयो दीप्तिमत्कनकोज्ज्वलम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā saṃprahṛṣṭaḥ sahānujaḥ | jagrāha kavacaṃ bhūyo dīptimatkanakojjvalam

तब राजा युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाइयों सहित अत्यन्त हर्षित होकर स्वर्ण से दमकता अपना तेजस्वी कवच फिर धारण कर लिया।

श्लोक 104 (6.43.104)

प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्वरथान्पुरुषर्षभाः । ततो व्यूहं यथापूर्वं प्रत्यव्यूहन्त ते पुनः ॥

pratyapadyanta te sarve svarathānpuruṣarṣabhāḥ | tato vyūhaṃ yathāpūrvaṃ pratyavyūhanta te punaḥ

वे सब पुरुषश्रेष्ठ फिर अपने-अपने रथों पर चढ़ गए और पहले की भाँति पुनः व्यूह रच लिया।

श्लोक 105 (6.43.105)

अवादयन्दुन्दुभींश्च शतशश्चैव पुष्करान् । सिंहनादांश्च विविधान्विनेदुः पुरुषर्षभाः ॥

avādayandundubhīṃśca śataśaścaiva puṣkarān | siṃhanādāṃśca vividhānvineduḥ puruṣarṣabhāḥ

उन्होंने सैकड़ों दुन्दुभियाँ और पुष्कर नामक नगाड़े बजाए, और वे पुरुषश्रेष्ठ अनेक प्रकार के सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 106 (6.43.106)

रथस्थान्पुरुषव्याघ्रान्पाण्डवान्प्रेक्ष्य पार्थिवाः । धृष्टद्युम्नादयः सर्वे पुनर्जहृषिरे तदा ॥

rathasthānpuruṣavyāghrānpāṇḍavānprekṣya pārthivāḥ | dhṛṣṭadyumnādayaḥ sarve punarjahṛṣire tadā

पुरुषसिंह पाण्डवों को फिर रथों पर बैठे देखकर धृष्टद्युम्न आदि सभी राजा पुनः हर्ष से भर उठे।

श्लोक 107 (6.43.107)

गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान्मानयतां च तान् । दृष्ट्वा महीक्षितस्तत्र पूजयांचक्रिरे भृशम् ॥

gauravaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ mānyānmānayatāṃ ca tān | dṛṣṭvā mahīkṣitastatra pūjayāṃcakrire bhṛśam

माननीयों का सम्मान करने वाले पाण्डवों का यह गौरव देखकर वहाँ के राजाओं ने उनकी बहुत प्रशंसा की।

श्लोक 108 (6.43.108)

सौहृदं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् । दयां च ज्ञातिषु परां कथयांचक्रिरे नृपाः ॥

sauhṛdaṃ ca kṛpāṃ caiva prāptakālaṃ mahātmanām | dayāṃ ca jñātiṣu parāṃ kathayāṃcakrire nṛpāḥ

राजा उन महात्माओं के समयोचित सौहार्द और स्नेह की, तथा अपने बन्धुओं के प्रति उनकी गहरी दया की चर्चा करने लगे।

श्लोक 109 (6.43.109)

साधुसाध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसंहिताः । वाचः पुण्याः कीर्तिमतां मनोहृदयहर्षणाः ॥

sādhusādhviti sarvatra niśceruḥ stutisaṃhitāḥ | vācaḥ puṇyāḥ kīrtimatāṃ manohṛdayaharṣaṇāḥ

"साधु! साधु!" सब ओर उन यशस्वी पाण्डवों की स्तुति से भरी पवित्र वाणियाँ गूँज उठीं, जो मन और हृदय को आनन्द देने वाली थीं।

श्लोक 110 (6.43.110)

म्लेच्छाश्चार्याश्च ये तत्र ददृशुः शुश्रुवुस्तथा । वृत्तं तत्पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदाः ॥

mlecchāścāryāśca ye tatra dadṛśuḥ śuśruvustathā | vṛttaṃ tatpāṇḍuputrāṇāṃ ruruduste sagadgadāḥ

वहाँ जो भी म्लेच्छ और आर्य थे, उन्होंने पाण्डवों का वह आचरण देखा और सुना, तो वे गद्गद कण्ठ से रो पड़े।

श्लोक 111 (6.43.111)

ततो जघ्नुर्महाभेरीः शतशश्च सहस्रशः । शङ्खांश्च गोक्षीरनिभान्दध्मुर्हृष्टा मनस्विनः ॥

tato jaghnurmahābherīḥ śataśaśca sahasraśaḥ | śaṅkhāṃśca gokṣīranibhāndadhmurhṛṣṭā manasvinaḥ

तब मनस्वी वीरों ने हर्षित होकर सैकड़ों-हजारों बड़ी भेरियाँ बजाईं और गाय के दूध के समान श्वेत शंख फूँके।

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