भीष्म पर्व · अध्याय 52
भीष्म और अर्जुन का द्वन्द्व
धृतराष्ट्र के पूछने पर कि दूसरे दिन का युद्ध कैसे आरम्भ हुआ, सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन ने अपने योद्धाओं को ललकारा और भीष्म ने बाणों से पाण्डवों का व्यूह तोड़ दिया। अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना रथ भीष्म की ओर ले चलने को कहते हैं; कौरव महारथी अर्जुन को बींधते हैं और वे सबको उत्तर देते हैं। जब दुर्योधन शिकायत करता है कि अर्जुन उनकी जड़ काट रहे हैं, तो भीष्म क्षत्रिय-धर्म को धिक्कारते हुए उनसे भिड़ने जाते हैं। दोनों इतनी बराबरी से लड़ते हैं — एक-दूसरे के बाणों से ढककर, केवल ध्वज से पहचाने जाते हुए — कि देवता और ऋषि इस द्वन्द्व को सब लोकों में अद्वितीय बताते हैं; उधर सेनाएँ एक-दूसरे का संहार करती हैं और द्रोण का धृष्टद्युम्न से सामना होता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.52.1)
एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च । कथं प्रहरतां श्रेष्ठाः संप्रहारं प्रचक्रिरे ॥
evaṃ vyūḍheṣvanīkeṣu māmakeṣvitareṣu ca | kathaṃ praharatāṃ śreṣṭhāḥ saṃprahāraṃ pracakrire
जब इस प्रकार मेरी और दूसरे पक्ष की सेनाएँ व्यूह में खड़ी हो गईं, तब उन श्रेष्ठ योद्धाओं ने किस प्रकार युद्ध आरम्भ किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (6.52.2)
तथा व्यूढेष्वनीकेषु सन्नद्धरुचिरध्वजाः । तावकाः पाण्डवैः सार्धं यथाऽयुध्यन्त तच्छृणु । अपारमिव संदृश्य सागरप्रतिमं बलम् ॥
tathā vyūḍheṣvanīkeṣu sannaddharuciradhvajāḥ | tāvakāḥ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ yathā'yudhyanta tacchṛṇu | apāramiva saṃdṛśya sāgarapratimaṃ balam
जब सेनाएँ इस प्रकार व्यूह में खड़ी हो गईं और योद्धा कवच पहनकर सुन्दर ध्वजाएँ उठाए तैयार थे — सुनिए, आपके योद्धा पाण्डवों के साथ कैसे लड़े — और जब उन्होंने सागर के समान अपार सेना को देखा,
श्लोक 3 (6.52.3)
तेषां मध्ये स्थितो राजन्पुत्रो दुर्योधनस्तव । अब्रवीत्तावकान्सर्वान्युध्यध्वमिति दंशिताः ॥
teṣāṃ madhye sthito rājanputro duryodhanastava | abravīttāvakānsarvānyudhyadhvamiti daṃśitāḥ
तब हे राजन्, उनके बीच खड़े आपके पुत्र दुर्योधन ने आपके सब योद्धाओं से कहा — "कवच धारण किए हुए तुम लोग युद्ध करो!"
श्लोक 4 (6.52.4)
ते मनः क्रूरमाधाय समभित्यक्तजीविताः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ॥
te manaḥ krūramādhāya samabhityaktajīvitāḥ | pāṇḍavānabhyavartanta sarva evocchritadhvajāḥ
मन को कठोर करके और प्राणों का मोह छोड़कर वे सब ऊँची ध्वजाएँ लिए पाण्डवों पर टूट पड़े।
श्लोक 5 (6.52.5)
ततो युद्धं समभवत्तुमुलं रोमहर्षणम् । तावकानां परेषां च व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥
tato yuddhaṃ samabhavattumulaṃ romaharṣaṇam | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca vyatiṣaktarathadvipam
तब आपके और शत्रु-पक्ष के योद्धाओं के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला तुमुल युद्ध छिड़ गया, जिसमें रथ और हाथी आपस में उलझ गए।
श्लोक 6 (6.52.6)
मुक्तास्तु रथिभिर्बाणा रुक्मपुङ्खाः सुतेजिताः । सन्निपेतुरकुण्ठाग्रा नागेषु च हयेषु च ॥
muktāstu rathibhirbāṇā rukmapuṅkhāḥ sutejitāḥ | sannipeturakuṇṭhāgrā nāgeṣu ca hayeṣu ca
रथियों के छोड़े हुए सोने के पंखों वाले, भली-भाँति तेज़ किए हुए बाण अपनी अकुण्ठित नोकों से हाथियों और घोड़ों पर गिरने लगे।
श्लोक 7 (6.52.7)
तथा प्रवृत्ते संग्रामे धनुरुद्यम्य दंशितः । अभिपत्य महाबाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः ॥
tathā pravṛtte saṃgrāme dhanurudyamya daṃśitaḥ | abhipatya mahābāhurbhīṣmo bhīmaparākramaḥ
इस प्रकार युद्ध चल पड़ने पर भयंकर पराक्रम वाले महाबाहु भीष्म कवच धारण किए धनुष उठाकर आगे झपटे।
श्लोक 8 (6.52.8)
सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे । कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते ॥
saubhadre bhīmasene ca sātyakau ca mahārathe | kaikeye ca virāṭe ca dhṛṣṭadyumne ca pārṣate
सुभद्रापुत्र अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, कैकेय, विराट और पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न पर,
श्लोक 9 (6.52.9)
एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येषु चाभिभूः । ववर्ष शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः ॥
eteṣu naravīreṣu cedimatsyeṣu cābhibhūḥ | vavarṣa śaravarṣāṇi vṛddhaḥ kurupitāmahaḥ
इन नरवीरों पर और चेदि तथा मत्स्य योद्धाओं पर सबको दबा देने वाले वृद्ध कुरुपितामह ने बाणों की वर्षा की।
श्लोक 10 (6.52.10)
अभिद्यत ततो व्यूहस्तस्मिन्वीरसमागमे । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद्व्यतिकरो महान् ॥
abhidyata tato vyūhastasminvīrasamāgame | sarveṣāmeva sainyānāmāsīdvyatikaro mahān
वीरों के उस संघर्ष में तब व्यूह टूट गया और सब सेनाओं में भारी उथल-पुथल मच गई।
श्लोक 11 (6.52.11)
सादिनो ध्वजिनश्चैव हतप्रवरवाजिनः । विप्रद्रुतरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः ॥
sādino dhvajinaścaiva hatapravaravājinaḥ | vipradrutarathānīkāḥ samapadyanta pāṇḍavāḥ
पाण्डव-पक्ष के घुड़सवार और ध्वजधारी अस्त-व्यस्त हो गए; उनके श्रेष्ठ घोड़े मारे गए और रथों की टुकड़ियाँ भाग खड़ी हुईं।
श्लोक 12 (6.52.12)
अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् । वार्ष्णेयमब्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्र पितामहः ॥
arjunastu naravyāghro dṛṣṭvā bhīṣmaṃ mahāratham | vārṣṇeyamabravītkruddho yāhi yatra pitāmahaḥ
परन्तु नरव्याघ्र अर्जुन ने महारथी भीष्म को देखकर क्रोधपूर्वक वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण से कहा — "जहाँ पितामह हैं, वहाँ चलो!
अर्जुन उवाच
श्लोक 13 (6.52.13)
एष भीष्मः सुसंक्रुद्धो वार्ष्णेय मम वाहिनीम् । नाशयिष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः ॥
eṣa bhīṣmaḥ susaṃkruddho vārṣṇeya mama vāhinīm | nāśayiṣyati suvyaktaṃ duryodhanahite rataḥ
"हे वार्ष्णेय, ये भीष्म अत्यन्त क्रुद्ध हैं; दुर्योधन के हित में लगे हुए ये निश्चय ही मेरी सेना का नाश कर देंगे।
श्लोक 14 (6.52.14)
एष द्रोणः कृपः शल्यो विकर्णश्च जनार्दन । धार्तराष्ट्राश्च सहिता दुर्योधनपुरोगमाः ॥
eṣa droṇaḥ kṛpaḥ śalyo vikarṇaśca janārdana | dhārtarāṣṭrāśca sahitā duryodhanapurogamāḥ
"हे जनार्दन, ये द्रोण, कृप, शल्य और विकर्ण हैं, और दुर्योधन के नेतृत्व में एकजुट धृतराष्ट्र के पुत्र —
श्लोक 15 (6.52.15)
पाञ्चालान्निहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना । सोऽहं भीष्मं वधिष्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन ॥
pāñcālānnihaniṣyanti rakṣitā dṛḍhadhanvanā | so'haṃ bhīṣmaṃ vadhiṣyāmi sainyahetorjanārdana
"उस दृढ़ धनुर्धर (भीष्म) से रक्षित होकर ये पाञ्चालों का संहार कर डालेंगे। इसलिए हे जनार्दन, अपनी सेना के लिए मैं भीष्म का वध करूँगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (6.52.16)
तमब्रवीद्वासुदेवो यत्तो भव धनंजय । एष त्वां प्रापयिष्यामि पितामहरथं प्रति ॥
tamabravīdvāsudevo yatto bhava dhanaṃjaya | eṣa tvāṃ prāpayiṣyāmi pitāmaharathaṃ prati
वासुदेव ने उनसे कहा — "धनञ्जय, सावधान हो जाओ। मैं अभी तुम्हें पितामह के रथ के पास पहुँचाता हूँ।"
श्लोक 17 (6.52.17)
एवमुक्त्वा ततः शौरी रथं तं लोकविश्रुतम् । प्रापयामास भीष्मस्य रथं प्रति जनेश्वर ॥
evamuktvā tataḥ śaurī rathaṃ taṃ lokaviśrutam | prāpayāmāsa bhīṣmasya rathaṃ prati janeśvara
हे जनेश्वर, ऐसा कहकर शौरि (श्रीकृष्ण) उस लोकविख्यात रथ को भीष्म के रथ के सामने ले आए।
श्लोक 18 (6.52.18)
चलद्बहुपताकेन बलाकावर्णवाजिना । समुच्छ्रितमहाभीमनदद्वानरकेतुना ॥
caladbahupatākena balākāvarṇavājinā | samucchritamahābhīmanadadvānaraketunā
जिसकी बहुत-सी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिसके घोड़े बगुलों के समान श्वेत थे और जिस पर ऊँची उठी हुई, महाभयंकर, गर्जना करती वानर-ध्वजा थी,
श्लोक 19 (6.52.19)
महता मेघनादेन रथेनामिततेजसा । विनिघ्नन्कौरवानीकं शूरसेनांश्च पाण्डवः ॥
mahatā meghanādena rathenāmitatejasā | vinighnankauravānīkaṃ śūrasenāṃśca pāṇḍavaḥ
मेघ के समान गर्जना करने वाले उस अपार तेजस्वी विशाल रथ से कौरव-सेना और शूरसेनों का संहार करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन —
श्लोक 20 (6.52.20)
प्रायाच्छरणदः शीघ्रं सुहृदां हर्षवर्धनः । तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् ॥
prāyāccharaṇadaḥ śīghraṃ suhṛdāṃ harṣavardhanaḥ | tamāpatantaṃ vegena prabhinnamiva vāraṇam
शरण देने वाले और मित्रों का हर्ष बढ़ाने वाले — तीव्र गति से आगे बढ़े। मदमत्त हाथी की तरह वेग से आते हुए,
श्लोक 21 (6.52.21)
त्रासयन्तं रणे शूरान्मर्दयन्तं च सायकैः । सैन्धवप्रमुखैर्गुप्तः प्राच्यसौवीरकेकयैः । सहसा प्रत्युदीयाय भीष्मः शान्तनवोऽर्जुनम् ॥
trāsayantaṃ raṇe śūrānmardayantaṃ ca sāyakaiḥ | saindhavapramukhairguptaḥ prācyasauvīrakekayaiḥ | sahasā pratyudīyāya bhīṣmaḥ śāntanavo'rjunam
रण में शूरवीरों को भयभीत करते और बाणों से रौंदते हुए अर्जुन का सामना करने के लिए, सिन्धुराज के नेतृत्व वाले योद्धाओं तथा पूर्वी देशों, सौवीरों और केकयों से रक्षित शान्तनुनन्दन भीष्म सहसा आगे बढ़े।
श्लोक 22 (6.52.22)
को हि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् । द्रोणवैकर्तनाभ्यां वा रथी संयातुमर्हति ॥
ko hi gāṇḍīvadhanvānamanyaḥ kurupitāmahāt | droṇavaikartanābhyāṃ vā rathī saṃyātumarhati
भला कुरुपितामह, या द्रोण और वैकर्तन कर्ण के सिवा और कौन रथी गाण्डीवधारी से भिड़ सकता है?
श्लोक 23 (6.52.23)
ततो भीष्मो महाराज सर्वलोकमहारथः । अर्जुनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समाचिनोत् ॥
tato bhīṣmo mahārāja sarvalokamahārathaḥ | arjunaṃ saptasaptatyā nārācānāṃ samācinot
तब हे महाराज, सारे संसार के महारथी भीष्म ने सतहत्तर नाराच बाणों से अर्जुन को ढक दिया।
श्लोक 24 (6.52.24)
द्रोणश्च पञ्चविंशत्या कृपः पञ्चाशता शरैः । दुर्योधनश्चतुःषष्ट्या शल्यश्च नवभिः शरैः ॥
droṇaśca pañcaviṃśatyā kṛpaḥ pañcāśatā śaraiḥ | duryodhanaścatuḥṣaṣṭyā śalyaśca navabhiḥ śaraiḥ
द्रोण ने पच्चीस, कृप ने पचास, दुर्योधन ने चौंसठ और शल्य ने नौ बाणों से,
श्लोक 25 (6.52.25)
सैन्धवो नवभिश्चैव शकुनिश्चापि पञ्चभिः । विकर्णो दशभिर्भल्लै राजन्विव्याध पाण्डवम् ॥
saindhavo navabhiścaiva śakuniścāpi pañcabhiḥ | vikarṇo daśabhirbhallai rājanvivyādha pāṇḍavam
सिन्धुराज ने नौ, शकुनि ने पाँच और विकर्ण ने दस भल्ल बाणों से, हे राजन्, पाण्डुपुत्र को बींध डाला।
श्लोक 26 (6.52.26)
स तैर्विद्धो महेष्वासः समन्तान्निशितैः शरैः । न विव्यथे महाबाहुर्भिद्यमान इवाचलः ॥
sa tairviddho maheṣvāsaḥ samantānniśitaiḥ śaraiḥ | na vivyathe mahābāhurbhidyamāna ivācalaḥ
उन तीखे बाणों से चारों ओर से बिंधकर भी वह महाधनुर्धर महाबाहु विचलित नहीं हुए, जैसे प्रहार सहता पर्वत अडिग रहता है।
श्लोक 27 (6.52.27)
स भीष्मं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः । द्रोणं षष्ट्या नरव्याघ्रो विकर्णं च त्रिभिः शरैः ॥
sa bhīṣmaṃ pañcaviṃśatyā kṛpaṃ ca navabhiḥ śaraiḥ | droṇaṃ ṣaṣṭyā naravyāghro vikarṇaṃ ca tribhiḥ śaraiḥ
उन नरव्याघ्र ने बदले में भीष्म को पच्चीस, कृप को नौ, द्रोण को साठ और विकर्ण को तीन बाणों से बींधा,
श्लोक 28 (6.52.28)
शल्यं चैव त्रिभिर्बाणै राजानं चैव पञ्चभिः । प्रत्यविध्यदमेयात्मा किरीटी भरतर्षभ ॥
śalyaṃ caiva tribhirbāṇai rājānaṃ caiva pañcabhiḥ | pratyavidhyadameyātmā kirīṭī bharatarṣabha
और शल्य को तीन तथा राजा दुर्योधन को पाँच बाणों से — हे भरतश्रेष्ठ, अपरिमित आत्मबल वाले किरीटी ने इस प्रकार प्रत्युत्तर में प्रहार किया।
श्लोक 29 (6.52.29)
तं सात्यकिर्विराटश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च परिवव्रुर्धनंजयम् ॥
taṃ sātyakirvirāṭaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | saubhadro draupadeyāśca parivavrurdhanaṃjayam
सात्यकि, विराट, पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों ने धनञ्जय को घेर लिया।
श्लोक 30 (6.52.30)
ततो द्रोणं महेष्वासं गाङ्गेयस्य प्रिये रतम् । अभ्यवर्तत पाञ्चाल्यः संयुक्तः सह सोमकैः ॥
tato droṇaṃ maheṣvāsaṃ gāṅgeyasya priye ratam | abhyavartata pāñcālyaḥ saṃyuktaḥ saha somakaiḥ
तब सोमकों के साथ मिलकर पाञ्चालराजकुमार ने गंगापुत्र का प्रिय करने में लगे महाधनुर्धर द्रोण पर आक्रमण किया।
श्लोक 31 (6.52.31)
भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो राजन्विव्याध पाण्डवम् । अशीत्या निशितैर्बाणैस्ततोऽक्रोशन्त पाण्डवाः ॥
bhīṣmastu rathināṃ śreṣṭho rājanvivyādha pāṇḍavam | aśītyā niśitairbāṇaistato'krośanta pāṇḍavāḥ
परन्तु हे राजन्, रथियों में श्रेष्ठ भीष्म ने पाण्डुपुत्र को अस्सी तीखे बाणों से बींध दिया; इस पर पाण्डव चिल्ला उठे।
श्लोक 32 (6.52.32)
तेषां तु निनदं श्रुत्वा सहितानां प्रहृष्टवत् । प्रविवेश ततो मध्यं नरसिंहः प्रतापवान् ॥
teṣāṃ tu ninadaṃ śrutvā sahitānāṃ prahṛṣṭavat | praviveśa tato madhyaṃ narasiṃhaḥ pratāpavān
उन सबका एक साथ उठा कोलाहल सुनकर वह प्रतापी नरसिंह मानो हर्षित होकर शत्रु-सेना के बीच घुस गया।
श्लोक 33 (6.52.33)
तेषां महारथानां स मध्यं प्राप्य धनंजयः । चिक्रीड धनुषा राजँल्लक्षं कृत्वा महारथान् ॥
teṣāṃ mahārathānāṃ sa madhyaṃ prāpya dhanaṃjayaḥ | cikrīḍa dhanuṣā rājam̐llakṣaṃ kṛtvā mahārathān
हे राजन्, उन महारथियों के बीच पहुँचकर धनञ्जय महारथियों को अपना लक्ष्य बनाकर धनुष से खेलने लगे।
श्लोक 34 (6.52.34)
क्षत्रियाणां शिरांस्युग्रैः कृन्तञ्शस्त्रैर्महारथः । शून्यान्कृत्वा रथोपस्थान्व्यचरत्फल्गुनस्तदा ॥
kṣatriyāṇāṃ śirāṃsyugraiḥ kṛntañśastrairmahārathaḥ | śūnyānkṛtvā rathopasthānvyacaratphalgunastadā
अपने उग्र शस्त्रों से क्षत्रियों के सिर काटते और रथों के आसन सूने करते हुए महारथी फाल्गुन तब रणभूमि में विचरने लगे।
श्लोक 35 (6.52.35)
ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममाह जनेश्वरः । पीड्यमानं स्वकं सैन्यं दृष्ट्वा पार्थेन संयुगे ॥
tato duryodhano rājā bhīṣmamāha janeśvaraḥ | pīḍyamānaṃ svakaṃ sainyaṃ dṛṣṭvā pārthena saṃyuge
तब अपनी सेना को युद्ध में पार्थ द्वारा पीड़ित होते देख जनेश्वर राजा दुर्योधन ने भीष्म से कहा —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 36 (6.52.36)
एष पाण्डुसुतस्तात कृष्णेन सहितो बली । यततां सर्वसैन्यानां मूलं नः परिकृन्तति । त्वयि जीवति गाङ्गेय द्रोणे च रथिनां वरे ॥
eṣa pāṇḍusutastāta kṛṣṇena sahito balī | yatatāṃ sarvasainyānāṃ mūlaṃ naḥ parikṛntati | tvayi jīvati gāṅgeya droṇe ca rathināṃ vare
"तात, श्रीकृष्ण के साथ यह बलवान पाण्डुपुत्र हमारी सारी सेनाओं के यत्न करते रहने पर भी हमारी जड़ ही काट रहा है — और यह तब, जब हे गंगानन्दन, आप जीवित हैं और रथियों में श्रेष्ठ द्रोण भी।
श्लोक 37 (6.52.37)
त्वत्कृते चैव कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो विशांपते । न युध्यति रणे पार्थान्हितकामः सदा मम । स तथा कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फल्गुनः ॥
tvatkṛte caiva karṇo'pi nyastaśastro viśāṃpate | na yudhyati raṇe pārthānhitakāmaḥ sadā mama | sa tathā kuru gāṅgeya yathā hanyeta phalgunaḥ
"हे प्रजानाथ, आपके ही कारण सदा मेरा हित चाहने वाले कर्ण ने भी शस्त्र रख दिए हैं और वह रण में पार्थों से नहीं लड़ रहा। इसलिए हे गंगापुत्र, ऐसा कीजिए कि फाल्गुन मारा जाए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (6.52.38)
एवमुक्तस्ततो राजन्पिता देवव्रतस्तव । धिक् क्षात्रं धर्ममित्युक्त्वा प्रायात्पार्थं रथं प्रति ॥
evamuktastato rājanpitā devavratastava | dhik kṣātraṃ dharmamityuktvā prāyātpārthaṃ rathaṃ prati
हे राजन्, ऐसा कहे जाने पर आपके पितृतुल्य देवव्रत "क्षत्रिय-धर्म को धिक्कार है!" कहकर पार्थ के रथ की ओर चल पड़े।
श्लोक 39 (6.52.39)
उभौ श्वेतहयौ राजन्संसक्तौ प्रेक्ष्य पार्थिवाः । सिंहनादान्भृशं चक्रुः शङ्खान्दध्मुश्च मारिष ॥
ubhau śvetahayau rājansaṃsaktau prekṣya pārthivāḥ | siṃhanādānbhṛśaṃ cakruḥ śaṅkhāndadhmuśca māriṣa
हे राजन्, श्वेत घोड़ों वाले उन दोनों योद्धाओं को परस्पर भिड़ा देखकर राजाओं ने ज़ोर-ज़ोर से सिंहनाद किए और हे मान्यवर, शंख बजाए।
श्लोक 40 (6.52.40)
द्रौणिर्दुर्योधनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजः । परिवार्य रणे भीष्मं स्थिता युद्धाय मारिष ॥
drauṇirduryodhanaścaiva vikarṇaśca tavātmajaḥ | parivārya raṇe bhīṣmaṃ sthitā yuddhāya māriṣa
हे मान्यवर, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, दुर्योधन और आपका पुत्र विकर्ण रण में भीष्म को घेरकर युद्ध के लिए डट गए।
श्लोक 41 (6.52.41)
तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य धनञ्जयम् । स्थिता युद्धाय महते ततो युद्धमवर्तत ॥
tathaiva pāṇḍavāḥ sarve parivārya dhanañjayam | sthitā yuddhāya mahate tato yuddhamavartata
इसी प्रकार सब पाण्डव धनञ्जय को घेरकर महायुद्ध के लिए डट गए। फिर युद्ध आरम्भ हो गया।
श्लोक 42 (6.52.42)
गाङ्गेयस्तु रणे पार्थमानर्च्छन्नवभिः शरैः । तमर्जुनः प्रत्यविध्यद्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥
gāṅgeyastu raṇe pārthamānarcchannavabhiḥ śaraiḥ | tamarjunaḥ pratyavidhyaddaśabhirmarmabhedibhiḥ
गंगापुत्र ने रण में पार्थ को नौ बाणों से घायल किया; अर्जुन ने बदले में उन्हें मर्मस्थलों को भेदने वाले दस बाणों से बींधा।
श्लोक 43 (6.52.43)
ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः । अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्यावारयद्दिशः ॥
tataḥ śarasahasreṇa suprayuktena pāṇḍavaḥ | arjunaḥ samaraślāghī bhīṣmasyāvārayaddiśaḥ
तब युद्ध में गौरव पाने वाले पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भली-भाँति चलाए गए सहस्र बाणों से भीष्म की सब दिशाएँ रोक दीं।
श्लोक 44 (6.52.44)
शरजालं ततस्तत्तु शरजालेन मारिष । वारयामास पार्थस्य भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥
śarajālaṃ tatastattu śarajālena māriṣa | vārayāmāsa pārthasya bhīṣmaḥ śāntanavastadā
तब हे मान्यवर, शान्तनुनन्दन भीष्म ने पार्थ के उस बाण-जाल को अपने बाण-जाल से रोक दिया।
श्लोक 45 (6.52.45)
उभौ परमसंहृष्टावुभौ युद्धाभिनन्दिनौ । निर्विशेषमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥
ubhau paramasaṃhṛṣṭāvubhau yuddhābhinandinau | nirviśeṣamayudhyetāṃ kṛtapratikṛtaiṣiṇau
दोनों अत्यन्त हर्षित थे, दोनों युद्ध का आनन्द ले रहे थे; प्रहार का प्रत्युत्तर देने को उत्सुक वे बिना किसी अन्तर के बराबरी से लड़ते रहे।
श्लोक 46 (6.52.46)
भीष्मचापविमुक्तानि शरजालानि सङ्घशः । शीर्यमाणान्यदृश्यन्त भिन्नान्यर्जुनसायकैः ॥
bhīṣmacāpavimuktāni śarajālāni saṅghaśaḥ | śīryamāṇānyadṛśyanta bhinnānyarjunasāyakaiḥ
भीष्म के धनुष से झुण्ड के झुण्ड छूटे बाण-जाल अर्जुन के बाणों से कटकर बिखरते दिखाई दिए।
श्लोक 47 (6.52.47)
तथैवार्जुनमुक्तानि शरजालानि सर्वशः । गाङ्गेयशरनुन्नानि प्रापतन्त महीतले ॥
tathaivārjunamuktāni śarajālāni sarvaśaḥ | gāṅgeyaśaranunnāni prāpatanta mahītale
इसी प्रकार अर्जुन के छोड़े हुए बाण-जाल गंगापुत्र के बाणों से टकराकर सब ओर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 48 (6.52.48)
अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममार्च्छच्छितैः शरैः । भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध निशितैः शरैः ॥
arjunaḥ pañcaviṃśatyā bhīṣmamārcchacchitaiḥ śaraiḥ | bhīṣmo'pi samare pārthaṃ vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ
अर्जुन ने पच्चीस तीखे बाणों से भीष्म को घायल किया, और भीष्म ने भी युद्ध में तीखे बाणों से पार्थ को बींधा।
श्लोक 49 (6.52.49)
अन्योन्यस्य हयान्विद्ध्वा ध्वजौ च सुमहाबलौ । रथेषां रथचक्रे च चिक्रीडतुररिन्दमौ ॥
anyonyasya hayānviddhvā dhvajau ca sumahābalau | ratheṣāṃ rathacakre ca cikrīḍaturarindamau
एक-दूसरे के घोड़ों और ध्वजाओं, रथ के ईषादण्ड और पहियों को बींधते हुए वे दोनों महाबली शत्रुदमन युद्ध में क्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 50 (6.52.50)
ततः क्रुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतां वरः । वासुदेवं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥
tataḥ kruddho mahārāja bhīṣmaḥ praharatāṃ varaḥ | vāsudevaṃ tribhirbāṇairājaghāna stanāntare
तब हे महाराज, प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ भीष्म ने क्रोध में आकर वासुदेव की छाती पर तीन बाण मारे।
श्लोक 51 (6.52.51)
भीष्मचापच्युतैस्तैस्तु निर्विद्धो मधुसूदनः । विरराज रणे राजन्सपुष्प इव किंशुकः ॥
bhīṣmacāpacyutaistaistu nirviddho madhusūdanaḥ | virarāja raṇe rājansapuṣpa iva kiṃśukaḥ
भीष्म के धनुष से छूटे उन बाणों से बिंधे मधुसूदन, हे राजन्, रणभूमि में फूले हुए किंशुक (पलाश) वृक्ष के समान शोभा पाने लगे।
श्लोक 52 (6.52.52)
ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निर्विद्धं प्रेक्ष्य माधवम् । सारथिं कुरुवृद्धस्य निर्बिभेद शितैः शरैः ॥
tato'rjuno bhṛśaṃ kruddho nirviddhaṃ prekṣya mādhavam | sārathiṃ kuruvṛddhasya nirbibheda śitaiḥ śaraiḥ
तब माधव को घायल देखकर अत्यन्त क्रुद्ध अर्जुन ने कुरुवृद्ध भीष्म के सारथि को तीखे बाणों से बींध डाला।
श्लोक 53 (6.52.53)
यतमानौ तु तौ वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति । नाशक्नुतां तदाऽन्योन्यमभिसन्धातुमाहवे ॥
yatamānau tu tau vīrāvanyonyasya vadhaṃ prati | nāśaknutāṃ tadā'nyonyamabhisandhātumāhave
एक-दूसरे का वध करने का यत्न करते हुए भी वे दोनों वीर उस समय युद्ध में एक-दूसरे पर हावी न हो सके।
श्लोक 54 (6.52.54)
तौ मण्डलानि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च । अदर्शयेतां बहुधा सूतसामर्थ्यलाघवात् ॥
tau maṇḍalāni citrāṇi gatapratyāgatāni ca | adarśayetāṃ bahudhā sūtasāmarthyalāghavāt
अपने सारथियों की कुशलता और फुर्ती के बल पर वे बार-बार अद्भुत मण्डल, आगे बढ़ने और पीछे लौटने की चालें दिखाने लगे।
श्लोक 55 (6.52.55)
अन्तरं च प्रहारेषु तर्कयन्तौ परस्परम् । राजन्नन्तरमार्गस्थौ स्थितावास्तां मुहुर्मुहुः ॥
antaraṃ ca prahāreṣu tarkayantau parasparam | rājannantaramārgasthau sthitāvāstāṃ muhurmuhuḥ
हे राजन्, एक-दूसरे पर प्रहार करने के लिए छिद्र की ताक में रहते हुए वे दोनों बार-बार अवसर खोजते हुए ठहर जाते थे।
श्लोक 56 (6.52.56)
उभौ सिंहरवोन्मिश्रं शङ्खशब्दं च चक्रतुः । तथैव चापनिर्घोषं चक्रतुस्तौ महारथौ ॥
ubhau siṃharavonmiśraṃ śaṅkhaśabdaṃ ca cakratuḥ | tathaiva cāpanirghoṣaṃ cakratustau mahārathau
दोनों ने सिंहनाद से मिली शंखध्वनि की, और उसी प्रकार उन दोनों महारथियों ने धनुष की टंकार की।
श्लोक 57 (6.52.57)
तयोः शङ्खनिनादेन रथनेमिस्वनेन च । दारिता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च ॥
tayoḥ śaṅkhaninādena rathanemisvanena ca | dāritā sahasā bhūmiścakampe ca nanāda ca
उनके शंखों के नाद और रथ के पहियों की घरघराहट से पृथ्वी सहसा फट-सी गई; वह काँप उठी और गूँज उठी।
श्लोक 58 (6.52.58)
नोभयोरन्तरं कश्चिद्ददृशे भरतर्षभ । बलिनौ युद्धदुर्धर्षावन्योन्यसदृशावुभौ ॥
nobhayorantaraṃ kaściddadṛśe bharatarṣabha | balinau yuddhadurdharṣāvanyonyasadṛśāvubhau
हे भरतश्रेष्ठ, कोई भी उन दोनों में अन्तर नहीं देख पाया; दोनों बलवान थे, युद्ध में दुर्जय थे और एक-दूसरे के समान थे।
श्लोक 59 (6.52.59)
चिह्नमात्रेण भीष्मं तु प्रजज्ञुस्तत्र कौरवाः । तथा पाण्डुसुताः पार्थं चिह्नमात्रेण जज्ञिरे ॥
cihnamātreṇa bhīṣmaṃ tu prajajñustatra kauravāḥ | tathā pāṇḍusutāḥ pārthaṃ cihnamātreṇa jajñire
वहाँ कौरव केवल ध्वज के चिह्न से भीष्म को पहचान पाते थे, और पाण्डव भी केवल ध्वज के चिह्न से पार्थ को पहचानते थे।
श्लोक 60 (6.52.60)
तयोर्नृवरयोर्दृष्ट्वा तादृशं तं पराक्रमम् । विस्मयं सर्वभूतानि जग्मुर्भारतसंयुगे ॥
tayornṛvarayordṛṣṭvā tādṛśaṃ taṃ parākramam | vismayaṃ sarvabhūtāni jagmurbhāratasaṃyuge
उन दोनों नरश्रेष्ठों का वैसा पराक्रम देखकर भरतवंशियों के उस युद्ध में सब प्राणी विस्मित हो गए।
श्लोक 61 (6.52.61)
न तयोर्विवरं कश्चिद्रणे पश्यति भारत । धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद्वृजिनं क्वचित् ॥
na tayorvivaraṃ kaścidraṇe paśyati bhārata | dharme sthitasya hi yathā na kaścidvṛjinaṃ kvacit
हे भारत, रण में कोई भी उन दोनों में कोई कमज़ोरी नहीं देख पाता था, जैसे धर्म में स्थित पुरुष में कहीं कोई दोष नहीं दिखता।
श्लोक 62 (6.52.62)
उभौ च शरजालेन तावदृश्यौ बभूवतुः । प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभौ रणे ॥
ubhau ca śarajālena tāvadṛśyau babhūvatuḥ | prakāśau ca punastūrṇaṃ babhūvaturubhau raṇe
दोनों बाण-जालों से ढककर अदृश्य हो जाते थे, और फिर शीघ्र ही दोनों रण में दिखाई देने लगते थे।
श्लोक 63 (6.52.63)
तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्चर्षिभिः सह । अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम् ॥
tatra devāḥ sagandharvāścāraṇāścarṣibhiḥ saha | anyonyaṃ pratyabhāṣanta tayordṛṣṭvā parākramam
उनका पराक्रम देखकर वहाँ गन्धर्वों सहित देवता और ऋषियों सहित चारण आपस में कहने लगे —
देवा ऊचुः
श्लोक 64 (6.52.64)
न शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथंचन । सदेवासुरगन्धर्वैर्लोकैरपि महारथौ ॥
na śakyau yudhi saṃrabdhau jetumetau kathaṃcana | sadevāsuragandharvairlokairapi mahārathau
"युद्ध में क्रोध से भरे ये दोनों महारथी किसी प्रकार जीते नहीं जा सकते — देवताओं, असुरों और गन्धर्वों सहित सारे लोक भी इन्हें नहीं जीत सकते।
श्लोक 65 (6.52.65)
आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम् । नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथंचन ॥
āścaryabhūtaṃ lokeṣu yuddhametanmahādbhutam | naitādṛśāni yuddhāni bhaviṣyanti kathaṃcana
"यह अत्यन्त अद्भुत युद्ध सब लोकों में आश्चर्यरूप है; ऐसे युद्ध फिर कभी नहीं होंगे।
श्लोक 66 (6.52.66)
न हि शक्यो रणे जेतुं भीष्मः पार्थेन धीमता । सधनुः सरथः साश्वः प्रवपन्सायकान्रणे ॥
na hi śakyo raṇe jetuṃ bhīṣmaḥ pārthena dhīmatā | sadhanuḥ sarathaḥ sāśvaḥ pravapansāyakānraṇe
"धनुष, रथ और घोड़ों सहित रण में बाण बरसाते भीष्म को बुद्धिमान पार्थ युद्ध में नहीं जीत सकते।
श्लोक 67 (6.52.67)
तथैव पाण्डवं युद्धे देवैरपि दुरासदम् । न विजेतुं रणे भीष्म उत्सहेत धनुर्धरम् ॥
tathaiva pāṇḍavaṃ yuddhe devairapi durāsadam | na vijetuṃ raṇe bhīṣma utsaheta dhanurdharam
"उसी प्रकार देवताओं के लिए भी दुर्जय उस धनुर्धर पाण्डुपुत्र को भीष्म भी युद्ध में जीतने का साहस नहीं कर सकते।
सञ्जय उवाच
श्लोक 68 (6.52.68)
आलोकादपि युद्धं हि सममेतद्भविष्यति । इति स्म वाचोऽश्रूयन्त प्रोच्चरन्त्यस्ततस्ततः । गाङ्गेयार्जुनयोः सङ्ख्ये स्तवयुक्ता विशांपते ॥
ālokādapi yuddhaṃ hi samametadbhaviṣyati | iti sma vāco'śrūyanta proccarantyastatastataḥ | gāṅgeyārjunayoḥ saṅkhye stavayuktā viśāṃpate
"जब तक संसार रहेगा, यह युद्ध बराबरी का ही रहेगा।" हे प्रजानाथ, युद्ध में गंगापुत्र और अर्जुन की प्रशंसा से भरे ऐसे वचन इधर-उधर से उठते सुनाई देते थे।
श्लोक 69 (6.52.69)
त्वदीयास्तु तदा योधाः पाण्डवेयाश्च भारत । अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तयोस्तत्र समागमे ॥
tvadīyāstu tadā yodhāḥ pāṇḍaveyāśca bhārata | anyonyaṃ samare jaghnustayostatra samāgame
इसी बीच हे भारत, उन दोनों के उस संघर्ष के समय आपके योद्धा और पाण्डव-पक्ष के योद्धा युद्ध में एक-दूसरे को मार रहे थे।
श्लोक 70 (6.52.70)
शितधारैस्तथा खड्गैर्विमलैश्च परश्वधैः । शरैरन्यैश्च बहुभिः शस्त्रैर्नानाविधैरपि ॥
śitadhāraistathā khaḍgairvimalaiśca paraśvadhaiḥ | śarairanyaiśca bahubhiḥ śastrairnānāvidhairapi
तीखी धार वाली तलवारों और चमचमाते फरसों से, बहुत-से अन्य बाणों और नाना प्रकार के शस्त्रों से
श्लोक 71 (6.52.71)
उभयोः सेनयोः शूरा न्यकृन्तन्त परस्परम् । वर्तमाने तथा घोरे तस्मिन्युद्धे सुदारुणे । द्रोणपाञ्चाल्ययो राजन्महानासीत्समागमः ॥
ubhayoḥ senayoḥ śūrā nyakṛntanta parasparam | vartamāne tathā ghore tasminyuddhe sudāruṇe | droṇapāñcālyayo rājanmahānāsītsamāgamaḥ
दोनों सेनाओं के शूरवीर एक-दूसरे को काटने लगे। और जब वह भयंकर, अत्यन्त दारुण युद्ध चल रहा था, तब हे राजन्, द्रोण और पाञ्चालराजकुमार का भारी आमना-सामना हुआ।