भीष्म पर्व · अध्याय 60
भीष्म और अर्जुन का द्वैरथ युद्ध
चौथे दिन प्रातःकाल भीष्म कौरव-सेना को लेकर निकलते हैं, और श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं वे अर्जुन दूर से उस विशाल व्यूह को देखकर पाण्डव-सेना के अग्रभाग में निकल पड़ते हैं; पाण्डव-सेना पिछले दिन की तरह ही व्यूह में खड़ी है। नगाड़े, शंख और धनुष गूँज उठते हैं, और रथी, हाथी, घुड़सवार तथा पैदल आपस में भिड़कर गिरने लगते हैं। अपनी ओर झपटे द्रोण, कृप, शल्य आदि कौरव वीरों को अभिमन्यु रोक देता है, और भीष्म उसे लाँघकर अर्जुन से जा भिड़ते हैं; दोनों सेनाओं के देखते-देखते दोनों में बाणों का द्वैरथ युद्ध होता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.60.1)
व्युष्टां निशां भारत भारताना- । मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान्प्रति जातकोपो । वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः ॥
vyuṣṭāṃ niśāṃ bhārata bhāratānā- | manīkinīnāṃ pramukhe mahātmā | yayau sapatnānprati jātakopo | vṛtaḥ samagreṇa balena bhīṣmaḥ
हे भारत, रात बीतकर जब सवेरा हुआ, तब क्रोध से भरे महात्मा भीष्म अपनी समूची सेना से घिरे हुए, भरतवंशियों की सेनाओं के अग्रभाग में शत्रुओं की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (6.60.2)
तं द्रोणदुर्योधनबाह्लिकाश्च । तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ । जयद्रथश्चातिबलो बलौघै- । र्नृपास्तथान्ये प्रययुः समन्तात् ॥
taṃ droṇaduryodhanabāhlikāśca | tathaiva durmarṣaṇacitrasenau | jayadrathaścātibalo balaughai- | rnṛpāstathānye prayayuḥ samantāt
द्रोण, दुर्योधन और बाह्लीक, वैसे ही दुर्मर्षण और चित्रसेन, अत्यन्त बलवान जयद्रथ तथा अन्य राजा भी अपनी विशाल सेनाओं के साथ चारों ओर से उनके संग चले।
श्लोक 3 (6.60.3)
स तैर्महद्भिश्च महारथैश्च । तेजस्विभिर्वीर्यवद्भिश्च राजन् । रराज राजा स तु राजमुख्यै- । र्वृतः सदेवैरिव वज्रपाणिः ॥
sa tairmahadbhiśca mahārathaiśca | tejasvibhirvīryavadbhiśca rājan | rarāja rājā sa tu rājamukhyai- | rvṛtaḥ sadevairiva vajrapāṇiḥ
हे राजन्, उन तेजस्वी और पराक्रमी महान महारथियों से तथा श्रेष्ठ राजाओं से घिरे हुए वे ऐसे शोभित हुए जैसे देवताओं के बीच वज्रधारी इन्द्र।
श्लोक 4 (6.60.4)
तस्मिन्ननीकप्रमुखे विषक्ता । दोधूयमानाश्च महापताकाः । सुरक्तपीतासितपाण्डुराभा । महागजस्कन्धगता विरेजुः ॥
tasminnanīkapramukhe viṣaktā | dodhūyamānāśca mahāpatākāḥ | suraktapītāsitapāṇḍurābhā | mahāgajaskandhagatā virejuḥ
उस सेना के अग्रभाग में बड़े-बड़े हाथियों के कन्धों पर लगी हुई लाल, पीली, काली और श्वेत आभा वाली विशाल पताकाएँ हवा में फहराती हुई शोभा पा रही थीं।
श्लोक 5 (6.60.5)
सा वाहिनी शान्तनवेन गुप्ता । महारथैर्वारणवाजिभिश्च । बभौ सविद्युत्स्तनयित्नुकल्पा । जलागमे द्यौरिव जातमेघा ॥
sā vāhinī śāntanavena guptā | mahārathairvāraṇavājibhiśca | babhau savidyutstanayitnukalpā | jalāgame dyauriva jātameghā
शान्तनुनन्दन भीष्म से रक्षित वह सेना अपने महारथियों, हाथियों और घोड़ों के साथ वर्षा ऋतु के उस आकाश के समान दिख रही थी जिसमें बादल घिर आए हों, बिजली चमक रही हो और मेघ गरज रहे हों।
श्लोक 6 (6.60.6)
ततो रणायाभिमुखी प्रयाता । प्रत्यर्जुनं शान्तनवाभिगुप्ता । सेनामहोग्रा सहसा कुरूणां । वेगो यथा भीम इवापगायाः ॥
tato raṇāyābhimukhī prayātā | pratyarjunaṃ śāntanavābhiguptā | senāmahogrā sahasā kurūṇāṃ | vego yathā bhīma ivāpagāyāḥ
तब शान्तनुनन्दन से रक्षित कौरवों की वह अत्यन्त भयंकर सेना नदी के भीषण वेग के समान सहसा अर्जुन से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ी।
श्लोक 7 (6.60.7)
तं व्यालनानाविधगूढसारं । गजाश्वपादातरथौघपक्षम् । व्यूहं महामेघसमं महात्मा । ददर्श दूरात्कपिराजकेतुः ॥
taṃ vyālanānāvidhagūḍhasāraṃ | gajāśvapādātarathaughapakṣam | vyūhaṃ mahāmeghasamaṃ mahātmā | dadarśa dūrātkapirājaketuḥ
अनेक प्रकार के व्याल-व्यूहों में जिसकी शक्ति छिपी थी, हाथियों, घोड़ों, पैदलों और रथों के समूह जिसके पंख थे, ऐसे महामेघ के समान उस व्यूह को कपिध्वज महात्मा अर्जुन ने दूर से देखा।
श्लोक 8 (6.60.8)
विनिर्ययौ केतुमता रथेन । नरर्षभः श्वेतहयेन काले । जये धृतः शत्रुवरूथिनीनां । यथा सुरेन्द्रोऽसुरवाहिनीनाम् ॥
viniryayau ketumatā rathena | nararṣabhaḥ śvetahayena kāle | jaye dhṛtaḥ śatruvarūthinīnāṃ | yathā surendro'suravāhinīnām
नरश्रेष्ठ अर्जुन ठीक समय पर श्वेत घोड़ों वाले ध्वजयुक्त रथ पर सवार होकर शत्रु-सेनाओं को जीतने का संकल्प लिए निकले, जैसे देवराज इन्द्र असुरों की सेनाओं पर चढ़ाई करते हैं।
श्लोक 9 (6.60.9)
नारायणेनेन्द्र इवाभिगुप्तः । शशीव सूर्येण समेयिवान्यथा । तथा महात्मा सह केशवेन । वरूथिनीनां प्रमुखे रराज ॥
nārāyaṇenendra ivābhiguptaḥ | śaśīva sūryeṇa sameyivānyathā | tathā mahātmā saha keśavena | varūthinīnāṃ pramukhe rarāja
जैसे नारायण से रक्षित इन्द्र और जैसे सूर्य से मिला हुआ चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही महात्मा अर्जुन केशव के साथ सेनाओं के अग्रभाग में शोभित हुए।
श्लोक 10 (6.60.10)
सोपस्करं सोत्तरबन्धुरेषं । यत्तं यदूनामृषभेण सङ्ख्ये । कपिध्वजं प्रेक्ष्य रथं विषेदुः । सहैव पुत्रैस्तव कौरवेयाः ॥
sopaskaraṃ sottarabandhureṣaṃ | yattaṃ yadūnāmṛṣabheṇa saṅkhye | kapidhvajaṃ prekṣya rathaṃ viṣeduḥ | sahaiva putraistava kauraveyāḥ
यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध के लिए सजाए गए, सब सामग्री से युक्त, ऊपर के आवरण से सुन्दर ईषा (धुरी-दण्ड) वाले उस कपिध्वज रथ को देखकर आपके पुत्रों सहित आपके पक्ष के कौरव उदास हो गए।
श्लोक 11 (6.60.11)
प्रकल्पितं गुप्तमुदायुधेन । किरीटिना लोकमहारथेन । तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीया- । श्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकीर्णम् ॥
prakalpitaṃ guptamudāyudhena | kirīṭinā lokamahārathena | taṃ vyūharājaṃ dadṛśustvadīyā- | ścatuścaturvyālasahasrakīrṇam
आपके सैनिकों ने उस व्यूहराज को देखा, जिसे संसार के महारथी, आयुध उठाए किरीटधारी अर्जुन ने रचा और जिसकी वे रक्षा कर रहे थे, और जो चारों ओर चार-चार हज़ार व्यालों से भरा हुआ था।
श्लोक 12 (6.60.12)
यथैव पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा । व्यूहः कृतः कौरवसत्तमेन । यथा न भूतो भुवि मानुषेषु । न दृष्टपूर्वो न च संश्रुतश्च ॥
yathaiva pūrve'hani dharmarājñā | vyūhaḥ kṛtaḥ kauravasattamena | yathā na bhūto bhuvi mānuṣeṣu | na dṛṣṭapūrvo na ca saṃśrutaśca
धर्मराज कौरवश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने पिछले दिन की तरह ही व्यूह रचा था, ऐसा व्यूह जैसा पृथ्वी पर मनुष्यों में न कभी हुआ था, न पहले देखा गया था और न सुना गया था।
श्लोक 13 (6.60.13)
ततो यथादेशमुपेत्य तस्थुः । पाञ्चालमुख्याः सह चेदिमुख्यैः । ततः समादेशसमाहतानि । भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ ॥
tato yathādeśamupetya tasthuḥ | pāñcālamukhyāḥ saha cedimukhyaiḥ | tataḥ samādeśasamāhatāni | bherīsahasrāṇi vinedurājau
तब पाञ्चालों के प्रमुख वीर चेदि-प्रमुखों के साथ आदेश के अनुसार अपने-अपने स्थानों पर जाकर डट गए। फिर आज्ञा पाकर बजाए गए हज़ारों नगाड़े रणभूमि में गूँज उठे।
श्लोक 14 (6.60.14)
शङ्खस्वनास्तूर्यरवाः प्रणेदुः । सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः । ततः सबाणानि महास्वनानि । विस्फार्यमाणानि धनूंषि वीरैः ॥
śaṅkhasvanāstūryaravāḥ praṇeduḥ | sarveṣvanīkeṣu sasiṃhanādāḥ | tataḥ sabāṇāni mahāsvanāni | visphāryamāṇāni dhanūṃṣi vīraiḥ
सभी सेनाओं में सिंहनाद के साथ शंखों की ध्वनि और तुरहियों का स्वर गूँज उठा। फिर वीरों द्वारा खींचे जाते हुए, बाण चढ़े और ज़ोर से टंकार करते धनुषों ने
श्लोक 15 (6.60.15)
क्षणेन भेरीपणवप्रणादा- । नन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनांश्च । तच्छङ्खशब्दावृतमन्तरिक्ष- । मुद्धूतभौमद्रुतरेणुजालम् ॥
kṣaṇena bherīpaṇavapraṇādā- | nantardadhuḥ śaṅkhamahāsvanāṃśca | tacchaṅkhaśabdāvṛtamantarikṣa- | muddhūtabhaumadrutareṇujālam
क्षण भर में नगाड़ों और पणवों के नाद को तथा शंखों की महाध्वनि को दबा दिया। शंखों के शब्द से भरा हुआ आकाश, धरती से तेज़ी से उठी धूल के जाल से ढक गया।
श्लोक 16 (6.60.16)
महानुभावाश्च ततः प्रकाश- । मालोक्य वीराः सहसाऽभिपेतुः । रथी रथेनाभिहतः ससूतः । पपात साश्वः सरथः सकेतुः ॥
mahānubhāvāśca tataḥ prakāśa- | mālokya vīrāḥ sahasā'bhipetuḥ | rathī rathenābhihataḥ sasūtaḥ | papāta sāśvaḥ sarathaḥ saketuḥ
उस उजाले में यह देखकर महापराक्रमी वीर सहसा टूट पड़े। रथी से मारा गया रथी अपने सारथि, घोड़ों, रथ और ध्वजा सहित गिर पड़ा।
श्लोक 17 (6.60.17)
गजो गजेनाभिहतः पपात । पदातिना चाभिहतः पदातिः । आवर्तमानान्यभिवर्तमानै- । र्घोरीकृतान्यद्भुतदर्शनानि ॥
gajo gajenābhihataḥ papāta | padātinā cābhihataḥ padātiḥ | āvartamānānyabhivartamānai- | rghorīkṛtānyadbhutadarśanāni
हाथी से मारा गया हाथी गिर पड़ा और पैदल से मारा गया पैदल। चक्कर काटते और आगे झपटते, भयंकर और अद्भुत दिखने वाले
श्लोक 18 (6.60.18)
प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि । सदश्वबृन्दानि सदश्वबृन्दैः । सुवर्णतारागणभूषितानि । सूर्यप्रभाभानि शरावराणि ॥
prāsaiśca khaḍgaiśca samāhatāni | sadaśvabṛndāni sadaśvabṛndaiḥ | suvarṇatārāgaṇabhūṣitāni | sūryaprabhābhāni śarāvarāṇi
उत्तम घोड़ों के झुंड उत्तम घोड़ों के झुंडों द्वारा भालों और तलवारों से मारे गए। सोने के तारों के समूहों से सजे, सूर्य के समान चमकते कवच
श्लोक 19 (6.60.19)
विदार्यमाणानि परश्वथैश्च । प्रासैश्च खड्गैश्च निपेतुरुर्व्याम् । गजैर्विषाणापरगात्ररुग्णाः । केचित्ससूता रथिनः प्रपेतुः ॥
vidāryamāṇāni paraśvathaiśca | prāsaiśca khaḍgaiśca nipetururvyām | gajairviṣāṇāparagātrarugṇāḥ | kecitsasūtā rathinaḥ prapetuḥ
फरसों, भालों और तलवारों से चिरकर धरती पर गिर पड़े। हाथियों के दाँतों और दूसरे अंगों से कुचले गए कुछ रथी अपने सारथियों सहित गिर पड़े।
श्लोक 20 (6.60.20)
गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण । निपातिता बाणहताः पृथिव्याम् । गजौघवेगोद्धतसादितानां । श्रुत्वा विषेदुः सहसा मनुष्याः ॥
gajarṣabhāścāpi ratharṣabheṇa | nipātitā bāṇahatāḥ pṛthivyām | gajaughavegoddhatasāditānāṃ | śrutvā viṣeduḥ sahasā manuṣyāḥ
एक श्रेष्ठ रथी के बाणों से मारे गए गजराज भी धरती पर गिरा दिए गए। हाथियों के झुंडों के वेग से उछाले और कुचले गए लोगों की पुकार सुनकर मनुष्य सहसा उदास हो गए,
श्लोक 21 (6.60.21)
आर्तस्वनं सादिपदातियूनां । विषाणगात्रावरताडितानाम् । संभ्रान्तनागाश्वरथे मुहूर्ते । महाक्षये सादिपदातियूनाम् ॥
ārtasvanaṃ sādipadātiyūnāṃ | viṣāṇagātrāvaratāḍitānām | saṃbhrāntanāgāśvarathe muhūrte | mahākṣaye sādipadātiyūnām
दाँतों और हाथियों के शरीर की चोट खाए युवा घुड़सवारों और पैदलों का वह आर्तनाद सुनकर, उस महासंहार की घड़ी में, जब हाथी, घोड़े और रथ घबराकर इधर-उधर भाग रहे थे।
श्लोक 22 (6.60.22)
महारथैः संपरिवार्यमाणं । संदृश्य दूरात्कपिराजकेतुम् । तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः । सदश्ववेगाद्भुतवीर्ययानः ॥
mahārathaiḥ saṃparivāryamāṇaṃ | saṃdṛśya dūrātkapirājaketum | taṃ pañcatālocchritatālaketuḥ | sadaśvavegādbhutavīryayānaḥ
दूर से महारथियों द्वारा घेरे जाते कपिध्वज अर्जुन को देखकर, जिनकी ताड़ के चिह्न वाली ध्वजा पाँच ताड़ ऊँची थी और जिनका रथ उत्तम घोड़ों के वेग से अद्भुत बल के साथ चलता था,
श्लोक 23 (6.60.23)
महास्त्रबाणाशनिदीप्तिमन्तं । किरीटिनं शान्तनवोऽभ्यधावत् । तथैव शक्रप्रतिमप्रभाव- । मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखाभिसस्रुः ॥
mahāstrabāṇāśanidīptimantaṃ | kirīṭinaṃ śāntanavo'bhyadhāvat | tathaiva śakrapratimaprabhāva- | mindrātmajaṃ droṇamukhābhisasruḥ
शान्तनुनन्दन भीष्म महान अस्त्रों, बाणों और वज्रों से दमकते किरीटधारी अर्जुन की ओर दौड़े। उसी प्रकार द्रोण आदि वीर इन्द्र के समान प्रभाव वाले इन्द्रपुत्र अर्जुन पर टूट पड़े,
श्लोक 24 (6.60.24)
कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च । दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् । ततो रथानां प्रमुखादुपेत्य । सर्वास्त्रिवित्काञ्चनचित्रवर्मा ॥
kṛpaśca śalyaśca viviṃśatiśca | duryodhanaḥ saumadattiśca rājan | tato rathānāṃ pramukhādupetya | sarvāstrivitkāñcanacitravarmā
हे राजन्, कृप, शल्य और विविंशति, दुर्योधन और सोमदत्त का पुत्र (भूरिश्रवा)। तब रथों के अग्रभाग से निकलकर, सब अस्त्रों के ज्ञाता, सोने से चित्रित कवच पहने
श्लोक 25 (6.60.25)
जवेन शूरोऽभिससार सर्वां- । स्तानर्जुनस्यात्मभवोऽभिमन्युः । तेषां महास्त्राणि महारथाना- । मसह्यकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः ॥
javena śūro'bhisasāra sarvāṃ- | stānarjunasyātmabhavo'bhimanyuḥ | teṣāṃ mahāstrāṇi mahārathānā- | masahyakarmā vinihatya kārṣṇiḥ
अर्जुन के अपने पुत्र शूरवीर अभिमन्यु ने वेग से उन सब पर धावा बोल दिया। उन महारथियों के महान अस्त्रों को नष्ट करके, असह्य पराक्रम वाला अर्जुनपुत्र
श्लोक 26 (6.60.26)
बभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली । सदोगतः सन्भगवानिवाग्निः । ततः स तूर्णं रुधिरोदफेनां । कृत्वा नदीमाशु रणे रिपूणाम् ॥
babhau mahāmantrahutārcimālī | sadogataḥ sanbhagavānivāgniḥ | tataḥ sa tūrṇaṃ rudhirodaphenāṃ | kṛtvā nadīmāśu raṇe ripūṇām
यज्ञशाला में महामन्त्रों से दी गई आहुतियों की ज्वालाओं की माला पहने भगवान अग्नि के समान शोभित हुआ। तब युद्ध में शत्रुओं के रक्त की, जिसका जल और फेन रक्त ही था, नदी शीघ्र बहाकर
श्लोक 27 (6.60.27)
जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो । महारथं पार्थमदीनसत्त्वः । ततः प्रहस्याद्भुतविक्रमेण । गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन ॥
jagāma saubhadramatītya bhīṣmo | mahārathaṃ pārthamadīnasattvaḥ | tataḥ prahasyādbhutavikrameṇa | gāṇḍīvamuktena śilāśitena
अदीन-हृदय भीष्म सुभद्रानन्दन को लाँघकर महारथी पार्थ की ओर गए। तब अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए हँसकर, गाण्डीव से छूटे और पत्थर पर तेज़ किए गए
श्लोक 28 (6.60.28)
विपाठजालेन महास्त्रजालं । विनाशयामास किरीटमाली । तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा- । मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः ॥
vipāṭhajālena mahāstrajālaṃ | vināśayāmāsa kirīṭamālī | tamuttamaṃ sarvadhanurdharāṇā- | masaktakarmā kapirājaketuḥ
विपाठ बाणों के जाल से किरीटधारी अर्जुन ने (भीष्म के) महान अस्त्रजाल को नष्ट कर दिया। कभी न रुकने वाले पराक्रम वाले कपिध्वज
श्लोक 29 (6.60.29)
भीष्मं महात्माऽभिववर्ष तूर्णं । शरौघजालैर्विमलैश्च भल्लैः । तथैव भीष्माहतमन्तरिक्षे । महास्त्रजालं कपिराजकेतोः ॥
bhīṣmaṃ mahātmā'bhivavarṣa tūrṇaṃ | śaraughajālairvimalaiśca bhallaiḥ | tathaiva bhīṣmāhatamantarikṣe | mahāstrajālaṃ kapirājaketoḥ
महात्मा अर्जुन ने सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ भीष्म पर बाणों के समूहों के जाल और चमकते भल्लों की शीघ्र वर्षा की। उसी प्रकार भीष्म द्वारा आकाश में काटे गए कपिध्वज अर्जुन के महान अस्त्रजाल को
श्लोक 30 (6.60.30)
विशीर्यमाणं ददृशुस्त्वदीया । दिवाकरेणेव तमोऽभिभूतम् । एवंविधं कार्मुकभीमनाद- । मदीनवत्सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् । ददर्श लोकः कुरुसृञ्जयाश्च । तद्द्वैरथं भीष्मधनञ्जयाभ्याम् ॥
viśīryamāṇaṃ dadṛśustvadīyā | divākareṇeva tamo'bhibhūtam | evaṃvidhaṃ kārmukabhīmanāda- | madīnavatsatpuruṣottamābhyām | dadarśa lokaḥ kurusṛñjayāśca | taddvairathaṃ bhīṣmadhanañjayābhyām
आपके सैनिकों ने ऐसे बिखरते देखा, जैसे सूर्य से पराजित अन्धकार। धनुषों की भयंकर टंकार से भरा, उन दोनों श्रेष्ठ सत्पुरुषों द्वारा बिना हिचके लड़ा गया भीष्म और धनंजय का वह ऐसा द्वैरथ युद्ध संसार ने, कौरवों ने और सृंजयों ने देखा।