भीष्म पर्व · अध्याय 73
अर्जुन की अश्वत्थामा पर करुणा; अभिमन्यु का लक्ष्मण को परास्त करना
विराट और भीष्म एक-दूसरे पर बाण बरसाते हैं, और अश्वत्थामा अर्जुन तथा कृष्ण को घायल करता है; अर्जुन उसका कवच भेद देते हैं, पर यह स्मरण कर कि वह गुरु का पुत्र और ब्राह्मण है, उसे छोड़कर दूसरों से लड़ने चले जाते हैं। भीम और दुर्योधन एक-दूसरे को बुरी तरह घायल करते हैं। अभिमन्यु चित्रसेन, सत्यव्रत, पुरुमित्र और अन्य राजकुमारों से लड़ता है, फिर दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण के घोड़े और सारथि मार डालता है, जिसे कृपाचार्य अपने रथ पर बिठाकर ले जाते हैं। सेनाएँ अव्यवस्थित मार-काट में भिड़ जाती हैं और भीष्म दिव्यास्त्रों से पाण्डव-सेना का संहार करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.73.1)
विराटोऽथ त्रिभिर्बाणैर्भीष्ममार्च्छन्महारथम् । विव्याध तुरगांश्चास्य त्रिभिर्बाणैर्महारथः ॥
virāṭo'tha tribhirbāṇairbhīṣmamārcchanmahāratham | vivyādha turagāṃścāsya tribhirbāṇairmahārathaḥ
तब महारथी विराट ने तीन बाणों से महारथी भीष्म पर प्रहार किया और तीन बाणों से उनके घोड़ों को भी बींध दिया।
श्लोक 2 (6.73.2)
तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीष्मः शान्तनवः शरैः । रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः कृतहस्तो महाबलः ॥
taṃ pratyavidhyaddaśabhirbhīṣmaḥ śāntanavaḥ śaraiḥ | rukmapuṅkhairmaheṣvāsaḥ kṛtahasto mahābalaḥ
सधे हुए हाथ वाले महाबली महाधनुर्धर शान्तनु-पुत्र भीष्म ने बदले में सोने के पंखों वाले दस बाणों से उन्हें बींध दिया।
श्लोक 3 (6.73.3)
द्रौणिर्गाण्डीवधन्वानं भीमधन्वा महारथः । अविध्यदिषुभिः षड्भिर्दृढहस्तः स्तनान्तरे ॥
drauṇirgāṇḍīvadhanvānaṃ bhīmadhanvā mahārathaḥ | avidhyadiṣubhiḥ ṣaḍbhirdṛḍhahastaḥ stanāntare
भयंकर धनुष और दृढ़ हाथ वाले महारथी द्रोणपुत्र ने छह बाणों से गाण्डीवधारी अर्जुन की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 4 (6.73.4)
कार्मुकं तस्य चिच्छेद फल्गुनः परवीरहा । अविध्यच्च भृशं तीक्ष्णैः पत्रिभिः शत्रुकर्शनः ॥
kārmukaṃ tasya ciccheda phalgunaḥ paravīrahā | avidhyacca bhṛśaṃ tīkṣṇaiḥ patribhiḥ śatrukarśanaḥ
शत्रुवीरों के संहारक फल्गुन ने उसका धनुष काट दिया और उस शत्रुदमन ने तीखे पंखदार बाणों से उसे गहरे बींध दिया।
श्लोक 5 (6.73.5)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय वेगवान्क्रोधमूर्च्छितः । अमृष्यमाणः पार्थेन कार्मुकच्छेदमाहवे ॥
so'nyatkārmukamādāya vegavānkrodhamūrcchitaḥ | amṛṣyamāṇaḥ pārthena kārmukacchedamāhave
तब युद्ध में पार्थ द्वारा अपना धनुष काटा जाना सहन न कर पाकर, क्रोध से मूर्च्छित-सा वह वेगवान् योद्धा दूसरा धनुष उठाकर
श्लोक 6 (6.73.6)
अविध्यत्फल्गुनं राजन्नवत्या निशितैः शरैः । वासुदेवं च सप्तत्या विव्याध परमेषुभिः ॥
avidhyatphalgunaṃ rājannavatyā niśitaiḥ śaraiḥ | vāsudevaṃ ca saptatyā vivyādha parameṣubhiḥ
हे राजन्, नब्बे पैने बाणों से फल्गुन को और सत्तर उत्तम बाणों से वासुदेव को बींधने लगा।
श्लोक 7 (6.73.7)
ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कृष्णेन सह फल्गुनः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तयित्वा पुनःपुनः ॥
tataḥ krodhābhitāmrākṣaḥ kṛṣṇena saha phalgunaḥ | dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasya cintayitvā punaḥpunaḥ
तब क्रोध से ताम्रवर्ण नेत्रों वाले फल्गुन ने कृष्ण के साथ लम्बी और गरम साँस लेकर, बार-बार विचार करके,
श्लोक 8 (6.73.8)
धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः । गाण्डीवधन्वा संक्रुद्धः शितान्सन्नतपर्वणः ॥
dhanuḥ prapīḍya vāmena kareṇāmitrakarśanaḥ | gāṇḍīvadhanvā saṃkruddhaḥ śitānsannataparvaṇaḥ
बाएँ हाथ से धनुष को दबाकर, उस शत्रुनाशक गाण्डीवधारी ने क्रोध में भरकर झुकी गाँठों वाले पैने
श्लोक 9 (6.73.9)
जीवितान्तकरान्घोरान्समादत्त शिलीमुखान् । तैस्तूर्णं समरेऽविध्यद्रौणिं बलवतां वरः ॥
jīvitāntakarānghorānsamādatta śilīmukhān | taistūrṇaṃ samare'vidhyadrauṇiṃ balavatāṃ varaḥ
जीवन का अन्त करने वाले भयंकर बाण उठाए, और बलवानों में श्रेष्ठ अर्जुन ने उनसे युद्ध में तुरन्त द्रोणपुत्र को बींध दिया।
श्लोक 10 (6.73.10)
तस्य ते कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे । न विव्यथे च निर्भिन्नो द्रौणिर्गाण्डीवधन्वना ॥
tasya te kavacaṃ bhittvā papuḥ śoṇitamāhave | na vivyathe ca nirbhinno drauṇirgāṇḍīvadhanvanā
वे बाण उसका कवच भेदकर युद्ध में उसका रक्त पीने लगे; फिर भी गाण्डीवधारी से बिंधा हुआ द्रोणपुत्र विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 11 (6.73.11)
तथैव च शरान्द्रौणिः प्रविमुञ्चन्नविह्वलः । तस्थौ च समरे राजंस्त्रातुमिच्छन्महाव्रतम् ॥
tathaiva ca śarāndrauṇiḥ pravimuñcannavihvalaḥ | tasthau ca samare rājaṃstrātumicchanmahāvratam
हे राजन्, वह भी उसी प्रकार निर्भय होकर बाण छोड़ता रहा और महाव्रती भीष्म की रक्षा की इच्छा से युद्ध में डटा रहा।
श्लोक 12 (6.73.12)
तस्य तत्सुमहत्कर्म शशंसुः कुरुसत्तमाः । यत्कृष्णाभ्यां समेताभ्यामभ्यापतत संयुगे ॥
tasya tatsumahatkarma śaśaṃsuḥ kurusattamāḥ | yatkṛṣṇābhyāṃ sametābhyāmabhyāpatata saṃyuge
कुरुश्रेष्ठों ने उसके इस महान् पराक्रम की प्रशंसा की कि उसने युद्ध में एक साथ खड़े दोनों कृष्णों पर धावा बोला।
श्लोक 13 (6.73.13)
स हि नित्यमनीकेषु युध्यतेऽभयमास्थितः । अस्त्रग्रामं ससंहारं द्रोणात्प्राप्य सुदुर्लभम् ॥
sa hi nityamanīkeṣu yudhyate'bhayamāsthitaḥ | astragrāmaṃ sasaṃhāraṃ droṇātprāpya sudurlabham
क्योंकि उसने द्रोण से संहार-विधि सहित वह अस्त्र-समूह पाया था जो अत्यन्त दुर्लभ है, और वह सदा सेनाओं के अग्रभाग में निर्भय होकर लड़ता है।
श्लोक 14 (6.73.14)
ममैष आचार्यसुतो द्रोणस्यापि प्रियः सुतः । ब्राह्मणश्च विशेषेण माननीयो ममेति च ॥
mamaiṣa ācāryasuto droṇasyāpi priyaḥ sutaḥ | brāhmaṇaśca viśeṣeṇa mānanīyo mameti ca
"यह मेरे आचार्य का पुत्र है, द्रोण का प्रिय पुत्र भी है; ब्राह्मण भी है, और विशेष रूप से मेरे लिए आदरणीय है" —
श्लोक 15 (6.73.15)
समास्थाय मतिं वीरो बीभत्सुः शत्रुतापनः । कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति ॥
samāsthāya matiṃ vīro bībhatsuḥ śatrutāpanaḥ | kṛpāṃ cakre rathaśreṣṭho bhāradvājasutaṃ prati
ऐसा मन में ठानकर शत्रुओं को तपाने वाले, रथियों में श्रेष्ठ वीर बीभत्सु ने भरद्वाज-वंशी द्रोण के पुत्र पर दया की।
श्लोक 16 (6.73.16)
द्रौणिं त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेयः श्वेतवाहनः । युयुधे तावकान्निघ्नंस्त्वरमाणः पराक्रमी ॥
drauṇiṃ tyaktvā tato yuddhe kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | yuyudhe tāvakānnighnaṃstvaramāṇaḥ parākramī
तब द्रोणपुत्र को छोड़कर श्वेत घोड़ों वाले पराक्रमी कुन्तीपुत्र शीघ्रता से आपके योद्धाओं का संहार करते हुए युद्ध करने लगे।
श्लोक 17 (6.73.17)
दुर्योधनस्तु दशभिर्गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । भीमसेनं महेष्वासं रुक्मपुङ्खैः समार्पयत् ॥
duryodhanastu daśabhirgārdhrapatraiḥ śilāśitaiḥ | bhīmasenaṃ maheṣvāsaṃ rukmapuṅkhaiḥ samārpayat
दुर्योधन ने गिद्ध के पंखों वाले, पत्थर पर तेज़ किए गए, सोने की पूँछ वाले दस बाणों से महाधनुर्धर भीमसेन पर प्रहार किया।
श्लोक 18 (6.73.18)
भीमसेनः सुसंक्रुद्धः परासुकरणं दृढम् । चित्रं कार्मुकमादत्त शरांश्च निशितान्दश ॥
bhīmasenaḥ susaṃkruddhaḥ parāsukaraṇaṃ dṛḍham | citraṃ kārmukamādatta śarāṃśca niśitāndaśa
अत्यन्त क्रुद्ध भीमसेन ने प्राण हर लेने वाला एक दृढ़ और विचित्र धनुष तथा दस पैने बाण उठाए।
श्लोक 19 (6.73.19)
आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । अविध्यत्तूर्णमव्यग्रः कुरुराजं महोरसि ॥
ākarṇaprahitaistīkṣṇairvegavadbhirajihmagaiḥ | avidhyattūrṇamavyagraḥ kururājaṃ mahorasi
कान तक खींचकर छोड़े गए उन तीखे, वेगवान् और सीधे जाने वाले बाणों से उसने शान्त भाव से तुरन्त कुरुराज की चौड़ी छाती बींध दी।
श्लोक 20 (6.73.20)
तस्य काञ्चनसूत्रस्थः शरैः संछादितो मणिः । रराजोरसि खे सूर्यो ग्रहैरिव समावृतः ॥
tasya kāñcanasūtrasthaḥ śaraiḥ saṃchādito maṇiḥ | rarājorasi khe sūryo grahairiva samāvṛtaḥ
सोने के सूत्र में पिरोई उसकी मणि बाणों से ढककर उसकी छाती पर ऐसे चमक रही थी जैसे आकाश में ग्रहों से घिरा सूर्य।
श्लोक 21 (6.73.21)
पुत्रस्तु तव तेजस्वी भीमसेनेन ताडितः । नामृष्यत यथा नागस्तलशब्दं मदोत्कटः ॥
putrastu tava tejasvī bhīmasenena tāḍitaḥ | nāmṛṣyata yathā nāgastalaśabdaṃ madotkaṭaḥ
भीमसेन से आहत आपका तेजस्वी पुत्र उसे सहन न कर सका, जैसे मदमत्त हाथी ताली की आवाज़ सहन नहीं करता।
श्लोक 22 (6.73.22)
ततः शरैर्महाराज रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः । भीमं विव्याध संक्रुद्धस्त्रासयानो वरूथिनीम् ॥
tataḥ śarairmahārāja rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | bhīmaṃ vivyādha saṃkruddhastrāsayāno varūthinīm
हे महाराज, तब उसने क्रुद्ध होकर सेना को भयभीत करते हुए पत्थर पर तेज़ किए गए सोने के पंखों वाले बाणों से भीम को बींध दिया।
श्लोक 23 (6.73.23)
तौ युध्यमानौ समरे भृशमन्योन्यविक्षतौ । पुत्रौ ते देवसंकाशौ व्यरोचेतां महाबलौ ॥
tau yudhyamānau samare bhṛśamanyonyavikṣatau | putrau te devasaṃkāśau vyarocetāṃ mahābalau
युद्ध में लड़ते हुए और एक-दूसरे से बुरी तरह घायल, आपके कुल के वे दोनों देवतुल्य महाबली पुत्र शोभा पा रहे थे।
श्लोक 24 (6.73.24)
चित्रसेनं नरव्याघ्रं सौभद्रः परवीरहा । अविध्यद्दशभिर्बाणैः पुरुमित्रं च सप्तभिः ॥
citrasenaṃ naravyāghraṃ saubhadraḥ paravīrahā | avidhyaddaśabhirbāṇaiḥ purumitraṃ ca saptabhiḥ
शत्रुवीरों के संहारक सुभद्रा-पुत्र ने नरश्रेष्ठ चित्रसेन को दस बाणों से और पुरुमित्र को सात बाणों से बींधा;
श्लोक 25 (6.73.25)
सत्यव्रतं च सप्तत्या विद्ध्वा शक्रसमो युधि । नृत्यन्निव रणे वीर आर्तिं नः समजीजनत् ॥
satyavrataṃ ca saptatyā viddhvā śakrasamo yudhi | nṛtyanniva raṇe vīra ārtiṃ naḥ samajījanat
और युद्ध में इन्द्र के समान उस वीर ने सत्यव्रत को सत्तर बाणों से बींधकर, मानो रणभूमि में नाचते हुए, हमें व्यथित कर दिया।
श्लोक 26 (6.73.26)
तं प्रत्यविध्यद्दशभिश्चित्रसेनः शिलीमुखैः । सत्यव्रतश्च नवभिः पुरुमित्रश्च सप्तभिः ॥
taṃ pratyavidhyaddaśabhiścitrasenaḥ śilīmukhaiḥ | satyavrataśca navabhiḥ purumitraśca saptabhiḥ
बदले में चित्रसेन ने दस बाणों से, सत्यव्रत ने नौ से और पुरुमित्र ने सात बाणों से उसे बींधा।
श्लोक 27 (6.73.27)
स विद्धो विक्षरन्रक्तं शत्रुसंवारणं महत् । चिच्छेद चित्रसेनस्य चित्रं कार्मुकमार्जुनिः ॥
sa viddho vikṣaranraktaṃ śatrusaṃvāraṇaṃ mahat | ciccheda citrasenasya citraṃ kārmukamārjuniḥ
बिंधकर रक्त बहाते हुए अर्जुन-पुत्र ने चित्रसेन का शत्रुओं को रोकने वाला वह विशाल और विचित्र धनुष काट डाला,
श्लोक 28 (6.73.28)
भित्त्वा चास्य तनुत्राणं शरेणोरस्यताडयत् । ततस्ते तावका वीरा राजपुत्रा महारथाः ॥
bhittvā cāsya tanutrāṇaṃ śareṇorasyatāḍayat | tataste tāvakā vīrā rājaputrā mahārathāḥ
और उसका कवच भेदकर एक बाण से उसकी छाती पर प्रहार किया। तब आपके वे वीर, महारथी राजकुमार,
श्लोक 29 (6.73.29)
समेत्य युधि संरब्धा विव्यधुर्निशितैः शरैः । तांश्च सर्वाञ्शरैस्तीक्ष्णैर्जघान परमास्त्रवित् ॥
sametya yudhi saṃrabdhā vivyadhurniśitaiḥ śaraiḥ | tāṃśca sarvāñśaraistīkṣṇairjaghāna paramāstravit
युद्ध में एकत्र होकर क्रोधपूर्वक उसे पैने बाणों से बींधने लगे; और श्रेष्ठ अस्त्रों के ज्ञाता अभिमन्यु ने तीखे बाणों से उन सब पर प्रहार किया।
श्लोक 30 (6.73.30)
तस्य दृष्ट्वा तु तत्कर्म परिवव्रुः सुतास्तव । दहन्तं समरे सैन्यं वने कक्षं यथोल्बणम् ॥
tasya dṛṣṭvā tu tatkarma parivavruḥ sutāstava | dahantaṃ samare sainyaṃ vane kakṣaṃ yatholbaṇam
उसका यह पराक्रम देखकर आपके पुत्रों ने उसे घेर लिया, जो युद्ध में आपकी सेना को वैसे ही जला रहा था जैसे वन में प्रचण्ड अग्नि सूखे झाड़-झंखाड़ को,
श्लोक 31 (6.73.31)
अपेतशिशिरे काले समिद्धमिव पावकम् । अत्यरोचत सौभद्रस्तव सैन्यानि नाशयन् ॥
apetaśiśire kāle samiddhamiva pāvakam | atyarocata saubhadrastava sainyāni nāśayan
शिशिर ऋतु बीत जाने पर प्रज्वलित अग्नि के समान; और आपकी सेनाओं का नाश करता हुआ सुभद्रा-पुत्र सबसे अधिक प्रकाशित हो उठा।
श्लोक 32 (6.73.32)
तत्तस्य चरितं दृष्ट्वा पौत्रस्तव विशांपते । लक्ष्मणोऽभ्यपतत्तूर्णं सात्वतीपुत्रमाहवे ॥
tattasya caritaṃ dṛṣṭvā pautrastava viśāṃpate | lakṣmaṇo'bhyapatattūrṇaṃ sātvatīputramāhave
हे प्रजानाथ, उसका यह कृत्य देखकर आपका पौत्र लक्ष्मण शीघ्र ही युद्ध में सात्वती-पुत्र अभिमन्यु पर टूट पड़ा।
श्लोक 33 (6.73.33)
अभिमन्युस्तु संक्रुद्धो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । विव्याध निशितैः षड्भिः सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥
abhimanyustu saṃkruddho lakṣmaṇaṃ śubhalakṣaṇam | vivyādha niśitaiḥ ṣaḍbhiḥ sārathiṃ ca tribhiḥ śaraiḥ
अभिमन्यु ने क्रुद्ध होकर शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण को छह पैने बाणों से और उसके सारथि को तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 34 (6.73.34)
तथैव लक्ष्मणो राजन्सौभद्रं निशितैः शरैः । अविध्यत महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tathaiva lakṣmaṇo rājansaubhadraṃ niśitaiḥ śaraiḥ | avidhyata mahārāja tadadbhutamivābhavat
हे राजन्, उसी प्रकार लक्ष्मण ने भी सुभद्रा-पुत्र को पैने बाणों से बींधा; हे महाराज, वह एक अद्भुत-सी बात थी।
श्लोक 35 (6.73.35)
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सारथिं च महाबलः । अभ्यद्रवत सौभद्रो लक्ष्मणं निशितैः शरैः ॥
tasyāśvāṃścaturo hatvā sārathiṃ ca mahābalaḥ | abhyadravata saubhadro lakṣmaṇaṃ niśitaiḥ śaraiḥ
महाबली सुभद्रा-पुत्र ने उसके चारों घोड़ों और सारथि को मार डाला और पैने बाणों के साथ लक्ष्मण पर झपटा।
श्लोक 36 (6.73.36)
हताश्वे तु रथे तिष्ठँल्लक्ष्मणः परवीरहा । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धः सौभद्रस्य रथं प्रति ॥
hatāśve tu rathe tiṣṭham̐llakṣmaṇaḥ paravīrahā | śaktiṃ cikṣepa saṃkruddhaḥ saubhadrasya rathaṃ prati
घोड़ों के मारे जाने पर रथ में खड़े शत्रुवीरों के संहारक लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर सुभद्रा-पुत्र के रथ की ओर एक शक्ति फेंकी।
श्लोक 37 (6.73.37)
तामापतन्तीं सहसा घोररूपां दुरासदाम् । अभिमन्युः शरैस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद भुजगोपमाम् ॥
tāmāpatantīṃ sahasā ghorarūpāṃ durāsadām | abhimanyuḥ śaraistīkṣṇaiściccheda bhujagopamām
सर्प के समान उस भयानक और दुर्धर्ष शक्ति को सहसा आते देख अभिमन्यु ने तीखे बाणों से उसे काट डाला।
श्लोक 38 (6.73.38)
ततः स्वरथमारोप्य लक्ष्मणं गौतमस्तदा । अपोवाह रथेनाजौ सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥
tataḥ svarathamāropya lakṣmaṇaṃ gautamastadā | apovāha rathenājau sarvasainyasya paśyataḥ
तब गौतम (कृपाचार्य) ने लक्ष्मण को अपने रथ पर चढ़ा लिया और सारी सेना के देखते-देखते उसे रथ में युद्धभूमि से दूर ले गए।
श्लोक 39 (6.73.39)
ततः समाकुले तस्मिन्वर्तमाने महाभये । अभ्यद्रवञ्जिघांसन्तः परस्परवधैषिणः ॥
tataḥ samākule tasminvartamāne mahābhaye | abhyadravañjighāṃsantaḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ
तब उस अव्यवस्थित और अत्यन्त भयावह युद्ध में एक-दूसरे का वध चाहने वाले योद्धा मारने की इच्छा से परस्पर टूट पड़े —
श्लोक 40 (6.73.40)
तावकाश्च महेष्वासाः पाण्डवाश्च महारथाः । जुह्वन्तः समरे प्राणान्निजघ्नुरितरेतरम् ॥
tāvakāśca maheṣvāsāḥ pāṇḍavāśca mahārathāḥ | juhvantaḥ samare prāṇānnijaghnuritaretaram
आपके महाधनुर्धर और पाण्डवों के महारथी युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देते हुए एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 41 (6.73.41)
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः । बाहुभिः समयुध्यन्त सृञ्जयाः कुरुभिः सह ॥
muktakeśā vikavacā virathāśchinnakārmukāḥ | bāhubhiḥ samayudhyanta sṛñjayāḥ kurubhiḥ saha
बाल खुले हुए, कवच गिरे हुए, रथ छिने हुए और धनुष कटे हुए सृञ्जय कौरवों से भुजाओं से ही लड़ने लगे।
श्लोक 42 (6.73.42)
ततो भीष्मो महाबाहुः पाण्डवानां महात्मनाम् । सेनां जघान संक्रुद्धो दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः ॥
tato bhīṣmo mahābāhuḥ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | senāṃ jaghāna saṃkruddho divyairastrairmahābalaḥ
तब महाबाहु, महाबली भीष्म ने क्रोध में भरकर दिव्य अस्त्रों से महात्मा पाण्डवों की सेना का संहार किया।
श्लोक 43 (6.73.43)
हतेश्वरैर्गजैस्तत्र नरैरश्वैश्च पातितैः । रथिभिः सादिभिश्चैव समास्तीर्यत मेदिनी ॥
hateśvarairgajaistatra narairaśvaiśca pātitaiḥ | rathibhiḥ sādibhiścaiva samāstīryata medinī
वहाँ सवार-विहीन हाथियों, गिराए गए मनुष्यों और घोड़ों, रथियों और घुड़सवारों से धरती पट गई।