द्रोण पर्व · अध्याय 140
सात्यकि द्वारा अलम्बुस का वध
दिन की क्षति से व्यथित और जयद्रथ का विनाश निश्चित मानकर धृतराष्ट्र सञ्जय से अर्जुन के लिए लड़े सात्यकि के युद्ध का वर्णन माँगते हैं; अध्याय के आरम्भ में चार श्लोकों (जो समालोचित संस्करण के मुख्य पाठ में नहीं हैं) में वे कहते हैं कि पाण्डवों का भाग लौटा देना चाहिए। सञ्जय बताते हैं कि आगे बढ़ते सात्यकि को अलम्बुस रोकता है; घोर युद्ध के बाद सात्यकि अलम्बुस के घोड़े और सारथि को मारकर उसका सिर काट डालते हैं, फिर दुःशासन और घेरने आई सेना को पीछे हटाते हुए अर्जुन के पीछे चल पड़ते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.140.1)
दातव्यमद्य मन्येऽहं पाण्डवानां स्वकं पुनः । न विग्रहो हि बलिना श्रेयसे स्याद्यथातथा ॥
dātavyamadya manye'haṃ pāṇḍavānāṃ svakaṃ punaḥ | na vigraho hi balinā śreyase syādyathātathā
मेरा मत है कि अब पाण्डवों का अपना भाग उन्हें लौटा देना चाहिए। बलवान् के साथ युद्ध करने से किसी प्रकार भी कल्याण नहीं होता।
श्लोक 2 (7.140.2)
पादयोः प्रणतेनापि भुक्त्वाऽप्युच्छिष्टमप्यरेः । अतोऽन्यद्वापि कृत्वैव जीव्यं लोके नरेण वै ॥
pādayoḥ praṇatenāpi bhuktvā'pyucchiṣṭamapyareḥ | ato'nyadvāpi kṛtvaiva jīvyaṃ loke nareṇa vai
चाहे शत्रु के चरणों में झुकना पड़े, उसका जूठा खाना पड़े, या इसके अतिरिक्त कुछ और भी करना पड़े, मनुष्य को इस संसार में जीवित अवश्य रहना चाहिए।
श्लोक 3 (7.140.3)
जीवतैव परो लोकः साध्यते चैव सर्वथा । अजीवतस्तथैवासीन्न सुखं न परा गतिः ॥
jīvataiva paro lokaḥ sādhyate caiva sarvathā | ajīvatastathaivāsīnna sukhaṃ na parā gatiḥ
परलोक भी जीते-जी ही सब प्रकार से सिद्ध किया जाता है; जो जीवित नहीं रहता, उसके लिए न सुख है, न उत्तम गति।
श्लोक 4 (7.140.4)
विनाशे सर्वथोत्पन्ने न बालो बुध्यते क्रियाम् । मिथ्याभिमानदग्धो हि न बुद्ध्येत कृताकृते ॥
vināśe sarvathotpanne na bālo budhyate kriyām | mithyābhimānadagdho hi na buddhyeta kṛtākṛte
जब सर्वनाश सामने आ खड़ा होता है, तब अज्ञानी मनुष्य कर्तव्य को नहीं समझता; मिथ्या अभिमान से जला हुआ वह क्या किया गया और क्या नहीं किया गया, इसे भी नहीं पहचान पाता।
श्लोक 5 (7.140.5)
अहन्यहनि मे दीप्तं यशः पतति सञ्जय । हता मे बहवो योधा मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥
ahanyahani me dīptaṃ yaśaḥ patati sañjaya | hatā me bahavo yodhā manye kālasya paryayam
हे सञ्जय, दिन-दिन मेरा देदीप्यमान यश गिरता जा रहा है। मेरे बहुत-से योद्धा मारे गए हैं; मुझे लगता है कि यह काल का फेर है।
श्लोक 6 (7.140.6)
धनञ्जयः सुसङ्क्रुद्धः प्रविष्टो मामकं बलम् । रक्षितं द्रौणिकर्णाभ्यामप्रवेश्यं सुरैरपि ॥
dhanañjayaḥ susaṅkruddhaḥ praviṣṭo māmakaṃ balam | rakṣitaṃ drauṇikarṇābhyāmapraveśyaṃ surairapi
अत्यन्त क्रुद्ध धनञ्जय मेरी उस सेना में घुस गया है, जिसकी रक्षा द्रोण और कर्ण कर रहे थे और जिसमें देवता भी प्रवेश नहीं कर सकते थे।
श्लोक 7 (7.140.7)
ताभ्यामूर्जितवीर्याभ्यामाप्यायितपराक्रमः । सहितः कृष्णभीमाभ्यां शिनीनामृषभेण च ॥
tābhyāmūrjitavīryābhyāmāpyāyitaparākramaḥ | sahitaḥ kṛṣṇabhīmābhyāṃ śinīnāmṛṣabheṇa ca
उन दोनों बलशाली वीरों से जिसका पराक्रम और बढ़ गया है, वह कृष्ण, भीम और शिनिवंश के श्रेष्ठ सात्यकि के साथ है।
श्लोक 8 (7.140.8)
तदाप्रभृति मां शोको दहत्यग्निरिवाशयम् । ग्रस्तानिव प्रपश्यामि भूमिपालान्ससैन्धवान् ॥
tadāprabhṛti māṃ śoko dahatyagnirivāśayam | grastāniva prapaśyāmi bhūmipālānsasaindhavān
उसी दिन से शोक मुझे इस प्रकार जला रहा है जैसे वृक्ष के कोटर को आग जलाती है। मैं सैन्धव सहित सब राजाओं को मानो पहले ही ग्रसे हुए देख रहा हूँ।
श्लोक 9 (7.140.9)
अप्रियं सुमहत्कृत्वा सिन्धुराजः किरीटिनः । क्रुद्धस्य देवराजस्य शक्रस्येव महाद्युतेः । चक्षुर्विषयमापन्नः कथं जीवितमाप्नुयात् ॥
apriyaṃ sumahatkṛtvā sindhurājaḥ kirīṭinaḥ | kruddhasya devarājasya śakrasyeva mahādyuteḥ | cakṣurviṣayamāpannaḥ kathaṃ jīvitamāpnuyāt
किरीटधारी अर्जुन का, क्रुद्ध हुए महातेजस्वी देवराज इन्द्र के समान, इतना बड़ा अपकार करके सिन्धुराज उसकी दृष्टि के सामने आ गया है; वह प्राण कैसे बचा सकेगा?
श्लोक 10 (7.140.10)
अनुमानाच्च पश्यामि नास्ति सञ्जय सैन्धवः । युद्धं तु तद्यथावृत्तं तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ॥
anumānācca paśyāmi nāsti sañjaya saindhavaḥ | yuddhaṃ tu tadyathāvṛttaṃ tanmamācakṣva tattvataḥ
हे सञ्जय, अनुमान से मैं देख रहा हूँ कि सैन्धव अब नहीं रहा। फिर भी वह युद्ध जैसा हुआ था, मुझे ठीक-ठीक सुनाओ।
श्लोक 11 (7.140.11)
यच्च विक्षोभ्य महतीं सेनामालोड्य चासकृत् । एकः प्रविष्टः सङ्क्रुद्धो नलिनीमिव कुञ्जरः ॥
yacca vikṣobhya mahatīṃ senāmāloḍya cāsakṛt | ekaḥ praviṣṭaḥ saṅkruddho nalinīmiva kuñjaraḥ
जो उस विशाल सेना को क्षुब्ध करके बार-बार मथता हुआ अकेला, क्रोध में भरकर, कमलिनी में हाथी की तरह उसमें घुस गया था, उसके विषय में बताओ।
श्लोक 12 (7.140.12)
तस्य मे वृष्णिवीरस्य ब्रूहि युद्धं यथातथम् । धनञ्जयार्थे यत्तस्य कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥
tasya me vṛṣṇivīrasya brūhi yuddhaṃ yathātatham | dhanañjayārthe yattasya kuśalo hyasi sañjaya
हे सञ्जय, उस वृष्णिवीर का, जिसने धनञ्जय के लिए यह सब किया, युद्ध मुझे यथार्थ रूप में बताओ; तुम इसमें कुशल हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 13 (7.140.13)
तथा तु वैकर्तनपीडितं तं । भीमं प्रयान्तं पुरुषप्रवीरम् । समीक्ष्य राजन्नरवीरमध्ये । शिनिप्रवीरोऽनुययौ रथेन ॥
tathā tu vaikartanapīḍitaṃ taṃ | bhīmaṃ prayāntaṃ puruṣapravīram | samīkṣya rājannaravīramadhye | śinipravīro'nuyayau rathena
हे राजन्, वैकर्तन (कर्ण) से पीड़ित हुए नरवीरों में श्रेष्ठ भीम को आगे बढ़ते देखकर शिनिवंश के वीर सात्यकि रथ से उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 14 (7.140.14)
नदन्यथा वज्रधरस्तपान्ते । ज्वलन्यथा जलदान्ते च सूर्यः । निघ्नन्नमित्रान्धनुषा दृढेन । स कम्पयंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥
nadanyathā vajradharastapānte | jvalanyathā jaladānte ca sūryaḥ | nighnannamitrāndhanuṣā dṛḍhena | sa kampayaṃstava putrasya senām
ग्रीष्म के अन्त में गरजते हुए वज्रधारी इन्द्र की तरह, वर्षा के बाद दहकते हुए सूर्य की तरह, वह अपने दृढ़ धनुष से शत्रुओं को मारता हुआ तुम्हारे पुत्र की सेना को कँपा रहा था।
श्लोक 15 (7.140.15)
तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशैः । आयोधने वीरतरं नदन्तम् । नाशक्नुवन्वारयितुं त्वदीयाः । सर्वे रथा भारत माधवाग्र्यम् ॥
taṃ yāntamaśvai rajataprakāśaiḥ | āyodhane vīrataraṃ nadantam | nāśaknuvanvārayituṃ tvadīyāḥ | sarve rathā bhārata mādhavāgryam
हे भारत, चाँदी-से चमकते घोड़ों के साथ गरजते हुए रणभूमि में जाते हुए उस परम वीर माधवश्रेष्ठ को तुम्हारे सारे रथी रोक न सके।
श्लोक 16 (7.140.16)
अमर्षपूर्णस्त्वनिवृत्तयोधी । शरासनी काञ्चनवर्मधारी । अलम्बुसः सात्यकिं माधवाग्र्यम् । अवारयद्राजवरोऽभिपत्य ॥
amarṣapūrṇastvanivṛttayodhī | śarāsanī kāñcanavarmadhārī | alambusaḥ sātyakiṃ mādhavāgryam | avārayadrājavaro'bhipatya
क्रोध से भरा, युद्ध से कभी न लौटने वाला, धनुर्धारी और सुनहरा कवच पहने हुआ राजश्रेष्ठ अलम्बुस सामने आकर माधवश्रेष्ठ सात्यकि को रोकने लगा।
श्लोक 17 (7.140.17)
तयोरभूद्भारत सम्प्रहारो । यथाविधो नैव बभूव कश्चित् । प्रेक्षन्त एवाहवशोभिनौ तौ । योधास्त्वदीयाश्च परे च सर्वे ॥
tayorabhūdbhārata samprahāro | yathāvidho naiva babhūva kaścit | prekṣanta evāhavaśobhinau tau | yodhāstvadīyāśca pare ca sarve
हे भारत, तब उन दोनों के बीच ऐसा घमासान हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ था; युद्ध में शोभा पाते उन दोनों को तुम्हारे और शत्रु के सभी योद्धा देखते ही रह गए।
श्लोक 18 (7.140.18)
आविध्यदेनं दशभिः पृषत्कैः । अलम्बुसो राजवरः प्रसह्य । अनागतानेव तु तान्पृषत्कांश् । चिच्छेद बाणैः शिनिपुङ्गवोऽपि ॥
āvidhyadenaṃ daśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | alambuso rājavaraḥ prasahya | anāgatāneva tu tānpṛṣatkāṃś | ciccheda bāṇaiḥ śinipuṅgavo'pi
राजश्रेष्ठ अलम्बुस ने बलपूर्वक दस बाणों से उसे बींधा, किन्तु शिनिवंश के उस श्रेष्ठ वीर ने उन बाणों को अपने बाणों से पहुँचने से पहले ही काट डाला।
श्लोक 19 (7.140.19)
पुनः स बाणैस्त्रिभिरग्निकल्पैः । आकर्णपूर्णैर्निशितैः सपुङ्खैः । विव्याध देहावरणं विदार्य । ते सात्यकेराविविशुः शरीरम् ॥
punaḥ sa bāṇaistribhiragnikalpaiḥ | ākarṇapūrṇairniśitaiḥ sapuṅkhaiḥ | vivyādha dehāvaraṇaṃ vidārya | te sātyakerāviviśuḥ śarīram
फिर उसने कान तक खिंचे, अग्नि के समान तेज़, पैने और सुन्दर पंखों वाले तीन बाणों से कवच फाड़कर उसे बींध दिया; वे बाण सात्यकि के शरीर में घुस गए।
श्लोक 20 (7.140.20)
तैः कायमस्याग्न्यनिलप्रभावैः । विदार्य बाणैर्निशितैर्ज्वलद्भिः । आजघ्निवांस्तान्रजतप्रकाशान् । अश्वांश्चतुर्भिश्चतुरः प्रसह्य ॥
taiḥ kāyamasyāgnyanilaprabhāvaiḥ | vidārya bāṇairniśitairjvaladbhiḥ | ājaghnivāṃstānrajataprakāśān | aśvāṃścaturbhiścaturaḥ prasahya
अग्नि और वायु के समान तेज़, पैने और दहकते हुए बाणों से उसने सात्यकि का शरीर चीर डाला, और चाँदी-से चमकते उसके चारों घोड़ों को भी चार बाणों से बलपूर्वक मार गिराया।
श्लोक 21 (7.140.21)
तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी । नप्ता शिनेश्चक्रधरप्रभावः । अलम्बुसस्योत्तमवेगवद्भिः । अश्वांश्चतुर्भिर्निजघान बाणैः ॥
tathā tu tenābhihatastarasvī | naptā śineścakradharaprabhāvaḥ | alambusasyottamavegavadbhiḥ | aśvāṃścaturbhirnijaghāna bāṇaiḥ
उसके द्वारा इस प्रकार घायल किए जाने पर शिनि के पराक्रमी पौत्र ने, जो चक्रधारी के समान प्रभावशाली थे, अलम्बुस के चारों घोड़ों को अत्यन्त वेगवान् चार बाणों से मार डाला।
श्लोक 22 (7.140.22)
अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य । भल्लेन कालानलसन्निभेन । सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं । भ्राजिष्णु वक्त्रं निचकर्त देहात् ॥
athāsya sūtasya śiro nikṛtya | bhallena kālānalasannibhena | sakuṇḍalaṃ pūrṇaśaśiprakāśaṃ | bhrājiṣṇu vaktraṃ nicakarta dehāt
फिर प्रलयाग्नि के समान भल्ल बाण से उसने उसके सारथि का सिर काट डाला, और शरीर से कुण्डलों से सजे, पूर्णचन्द्र के समान दीप्तिमान् मुख को भी अलग कर दिया।
श्लोक 23 (7.140.23)
निहत्य तं पार्थिवपुत्रपौत्रं । सङ्ख्ये यदूनामृषभः प्रमाथी । ततोऽन्वयादर्जुनमेव वीरः । सैन्यानि राजंस्तव सन्निवार्य ॥
nihatya taṃ pārthivaputrapautraṃ | saṅkhye yadūnāmṛṣabhaḥ pramāthī | tato'nvayādarjunameva vīraḥ | sainyāni rājaṃstava sannivārya
हे राजन्, राजपुत्र और राजपौत्र उस अलम्बुस को युद्ध में मारकर यदुवंश के श्रेष्ठ, शत्रुमर्दन वीर सात्यकि तुम्हारी सेनाओं को रोकते हुए अर्जुन के ही पीछे चल पड़े।
श्लोक 24 (7.140.24)
अन्वागतं वृष्णिवीरं समीक्ष्य । तथारिमध्ये परिवर्तमानम् । घ्नन्तं कुरूणामिषुभिर्बलानि । पुनःपुनर्वायुमिवाभ्रपूगान् ॥
anvāgataṃ vṛṣṇivīraṃ samīkṣya | tathārimadhye parivartamānam | ghnantaṃ kurūṇāmiṣubhirbalāni | punaḥpunarvāyumivābhrapūgān
उस वृष्णिवीर को पीछे आया देखकर, जो शत्रुओं के बीच घूमता हुआ कुरुओं की सेनाओं को बार-बार बाणों से वैसे मार रहा था जैसे वायु मेघ-समूहों को उड़ा देती है,
श्लोक 25 (7.140.25)
ततोऽवहन्सैन्धवाः साधुदान्ता । गोक्षीरकुन्देन्दुहिमप्रकाशाः । सुवर्णजालावतताः सदश्वा । यतोयतः कामयते नृसिंहः ॥
tato'vahansaindhavāḥ sādhudāntā | gokṣīrakundenduhimaprakāśāḥ | suvarṇajālāvatatāḥ sadaśvā | yatoyataḥ kāmayate nṛsiṃhaḥ
गोदुग्ध, कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा और हिम के समान श्वेत, सुनहरे जालों से ढके, भलीभाँति सधे हुए सिन्धु देश के घोड़े उस नरसिंह को जहाँ-जहाँ वह चाहता था, वहाँ-वहाँ ले चले।
श्लोक 26 (7.140.26)
अथात्मजास्ते सहिताऽभिपेतुः । अन्ये च योधास्त्वरितास्त्वदीयाः । कृत्वा मुखं भारतयोधमुख्यं । दुःशासनं त्वत्सुतमाजमीढ ॥
athātmajāste sahitā'bhipetuḥ | anye ca yodhāstvaritāstvadīyāḥ | kṛtvā mukhaṃ bhāratayodhamukhyaṃ | duḥśāsanaṃ tvatsutamājamīḍha
हे अजमीढवंशी, तब तुम्हारे पुत्र और तुम्हारे दूसरे योद्धा भी एक साथ शीघ्रता से टूट पड़े और भरतवंशी योद्धाओं में प्रमुख अपने पुत्र दुःशासन को आगे करके चले।
श्लोक 27 (7.140.27)
ते सर्वतः सम्परिवार्य सङ्ख्ये । शैनेयमाजघ्नुरनीकसाहाः । स चापि तान्प्रवरः सात्वतानां । न्यवारयद्बाणजालेन वीरः ॥
te sarvataḥ samparivārya saṅkhye | śaineyamājaghnuranīkasāhāḥ | sa cāpi tānpravaraḥ sātvatānāṃ | nyavārayadbāṇajālena vīraḥ
उन बलवान् सैनिकों ने युद्ध में शैनेय को चारों ओर से घेरकर उस पर प्रहार किया; सात्वतों में श्रेष्ठ उस वीर ने भी बाणों के जाल से उन्हें रोक दिया।
श्लोक 28 (7.140.28)
निवार्य तांस्तूर्णममित्रघाती । नप्ता शिनेः पत्रिभिरग्निकल्पैः । दुःशासनस्याभिजघान वाहान् । जवीयसस्तन्मनसोऽपि बाणैः ॥
nivārya tāṃstūrṇamamitraghātī | naptā śineḥ patribhiragnikalpaiḥ | duḥśāsanasyābhijaghāna vāhān | javīyasastanmanaso'pi bāṇaiḥ
उन्हें शीघ्र रोककर शत्रुनाशक शिनिपौत्र ने अग्नि के समान बाणों से दुःशासन के उन घोड़ों को मार डाला, जो मन से भी अधिक वेगवान् थे।
श्लोक 29 (7.140.29)
ततोऽर्जुनो हर्षमवाप सङ्ख्ये । कृष्णश्च दृष्ट्वा पुरुषप्रवीरम् ॥
tato'rjuno harṣamavāpa saṅkhye | kṛṣṇaśca dṛṣṭvā puruṣapravīram
तब युद्ध में अर्जुन को हर्ष हुआ, और उस नरवीर को देखकर कृष्ण को भी।