द्रोण पर्व · अध्याय 145
सात्यकि द्वारा कर्ण का रथहीन होना
अर्जुन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ तक पहुँचने के लिए कृष्ण से रथ बढ़ाने को कहते हैं, पर कर्ण सात्यकि की ओर मुड़ जाता है, और कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्ण के पास वासवी शक्ति है, इसलिए अभी उससे न भिड़ो, उसे सात्यकि की ओर जाने दो। कृष्ण, जिन्होंने यह पहले ही सोच रखा था, दारुक के साथ अपना रथ सात्यकि के लिए भेजते हैं। सात्यकि और कर्ण में ऐसा युद्ध होता है जिसे देवता और गन्धर्व आकाश से देखते हैं; सात्यकि कर्ण के घोड़ों और सारथि को मारकर उसे रथहीन कर देता है, पर भीम और अर्जुन की प्रतिज्ञाओं के कारण उसे जीवित छोड़ देता है। दोनों नए रथ लेते हैं, और अन्त में सञ्जय धृतराष्ट्र की अपनी ही मन्त्रणा से हुई हानि गिनाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.145.1)
तदवस्थे हते तस्मिन्भूरिश्रवसि कौरवे । यथा भूयोऽभवद्युद्धं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
tadavasthe hate tasminbhūriśravasi kaurave | yathā bhūyo'bhavadyuddhaṃ tanmamācakṣva sañjaya
कुरुवंशी भूरिश्रवा के उस दशा को पहुँचकर मारे जाने के बाद युद्ध आगे कैसे चला? हे सञ्जय, यह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (7.145.2)
भूरिश्रवसि सङ्क्रान्ते परलोकाय भारत । वासुदेवं महाबाहुरर्जुनः समचूचुदत् ॥
bhūriśravasi saṅkrānte paralokāya bhārata | vāsudevaṃ mahābāhurarjunaḥ samacūcudat
हे भारत! भूरिश्रवा के परलोक चले जाने पर महाबाहु अर्जुन ने वासुदेव को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (7.145.3)
चोदयाश्वान्भृशं कृष्ण यतो राजा जयद्रथः । श्रूयते पुण्डरीकाक्ष त्रिषु धर्मेषु वर्तते । प्रतिज्ञां सफलां चापि कर्तुमर्हसि मेऽनघ ॥
codayāśvānbhṛśaṃ kṛṣṇa yato rājā jayadrathaḥ | śrūyate puṇḍarīkākṣa triṣu dharmeṣu vartate | pratijñāṃ saphalāṃ cāpi kartumarhasi me'nagha
हे कृष्ण! घोड़ों को तेज़ हाँको, जहाँ राजा जयद्रथ है। हे कमलनयन! सुना जाता है कि वह तीन धर्मों में स्थित है। हे निष्पाप! तुम्हें मेरी प्रतिज्ञा को सफल करना चाहिए।
श्लोक 4 (7.145.4)
अस्तमेति महाबाहो त्वरमाणो दिवाकरः ॥
astameti mahābāho tvaramāṇo divākaraḥ
हे महाबाहो! सूर्य शीघ्रता से अस्त की ओर जा रहा है।
श्लोक 5 (7.145.5)
एतद्धि पुरुषव्याघ्र महदभ्युद्यतं मया । कार्यं संरक्ष्यते चैष कुरुसेनामहारथैः ॥
etaddhi puruṣavyāghra mahadabhyudyataṃ mayā | kāryaṃ saṃrakṣyate caiṣa kurusenāmahārathaiḥ
हे पुरुषव्याघ्र! मैंने यह बहुत बड़ा कार्य उठाया है, और कुरुसेना के महारथी मेरे इस कार्य की रक्षा कर रहे हैं।
श्लोक 6 (7.145.6)
यथा नाभ्येति सूर्योऽस्तं यथा सत्यं भवेद्वचः । चोदयाश्वांस्तथा कृष्ण यथा हन्यां जयद्रथम् ॥
yathā nābhyeti sūryo'staṃ yathā satyaṃ bhavedvacaḥ | codayāśvāṃstathā kṛṣṇa yathā hanyāṃ jayadratham
हे कृष्ण! घोड़ों को ऐसे हाँको कि सूर्य अस्त न होने पाए, मेरा वचन सत्य हो और मैं जयद्रथ को मार सकूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (7.145.7)
ततः कृष्णो महाबाहुरश्वान्रजतसन्निभान् । हयज्ञश्चोदयामास जयद्रथवधं प्रति ॥
tataḥ kṛṣṇo mahābāhuraśvānrajatasannibhān | hayajñaścodayāmāsa jayadrathavadhaṃ prati
तब महाबाहु कृष्ण ने, जो घोड़ों के मर्म को जानते थे, चाँदी-से श्वेत घोड़ों को जयद्रथ के वध की ओर बढ़ाया।
श्लोक 8 (7.145.8)
तं प्रयान्तममोघेषुमुत्पतद्भिरिवाशुगैः । त्वरमाणा महाराज सेनामुख्याः समाद्रवन् ॥
taṃ prayāntamamogheṣumutpatadbhirivāśugaiḥ | tvaramāṇā mahārāja senāmukhyāḥ samādravan
हे महाराज! अचूक बाणों वाले उन अर्जुन के आगे बढ़ने पर सेना के प्रमुख वीर पवन के झोंकों की तरह उठते हुए शीघ्रता से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 9 (7.145.9)
दुर्योधनश्च कर्णश्च वृषसेनोऽथ मद्रराट् । अश्वत्थामा कृपश्चैव स्वयमेव च सैन्धवः ॥
duryodhanaśca karṇaśca vṛṣaseno'tha madrarāṭ | aśvatthāmā kṛpaścaiva svayameva ca saindhavaḥ
दुर्योधन, कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और स्वयं सिन्धुराज जयद्रथ।
श्लोक 10 (7.145.10)
समासाद्य च बीभत्सुः सैन्धवं समुपस्थितम् । नेत्राभ्यां क्रोधदीप्ताभ्यां सम्प्रैक्षन्निर्दहन्निव ॥
samāsādya ca bībhatsuḥ saindhavaṃ samupasthitam | netrābhyāṃ krodhadīptābhyāṃ sampraikṣannirdahanniva
बीभत्सु ने सामने खड़े सैन्धव के पास पहुँचकर क्रोध से जलती हुई आँखों से उसे ऐसे देखा मानो भस्म कर देना चाहते हों।
श्लोक 11 (7.145.11)
यथाग्निरिन्धनेद्धो वै क्रोधेन्धनसमीरितः । सैन्धवस्य मुखं त्यक्त्वा कर्णः सात्वतमभ्ययात् ॥
yathāgnirindhaneddho vai krodhendhanasamīritaḥ | saindhavasya mukhaṃ tyaktvā karṇaḥ sātvatamabhyayāt
ईंधन से प्रज्वलित और क्रोध-रूपी ईंधन से भड़की अग्नि के समान कर्ण सैन्धव के सामने का स्थान छोड़कर सात्यकि की ओर बढ़ा।
श्लोक 12 (7.145.12)
उपायान्तं तु राधेयं दृष्ट्वा पार्थो महारथः । प्रहसन्देवकीपुत्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥
upāyāntaṃ tu rādheyaṃ dṛṣṭvā pārtho mahārathaḥ | prahasandevakīputramidaṃ vacanamabravīt
राधेय को पास आते देखकर महारथी पार्थ ने हँसते हुए देवकीपुत्र से यह बात कही।
अर्जुन उवाच
श्लोक 13 (7.145.13)
एष प्रयात्याधिरथिः सात्यकेः स्यन्दनं प्रति । न मृष्यति हतं नूनं भूरिश्रवसमाहवे ॥
eṣa prayātyādhirathiḥ sātyakeḥ syandanaṃ prati | na mṛṣyati hataṃ nūnaṃ bhūriśravasamāhave
यह अधिरथपुत्र सात्यकि के रथ की ओर जा रहा है; भूरिश्रवा के युद्ध में मारे जाने को वह सह नहीं पा रहा है।
श्लोक 14 (7.145.14)
यत्र यात्येष तत्र त्वं चोदयाश्वाञ्जनार्दन । न सौमदत्तिपदवीं गमयेत्सात्यकिं वृषः ॥
yatra yātyeṣa tatra tvaṃ codayāśvāñjanārdana | na saumadattipadavīṃ gamayetsātyakiṃ vṛṣaḥ
हे जनार्दन! यह जहाँ जाए, वहीं तुम घोड़े ले चलो, ऐसा न हो कि वृष (कर्ण) सात्यकि को सोमदत्त के पुत्र के मार्ग पर पहुँचा दे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (7.145.15)
एवमुक्तो महाबाहुः केशवः सव्यसाचिना । प्रत्युवाच महातेजाः कालयुक्तमिदं वचः ॥
evamukto mahābāhuḥ keśavaḥ savyasācinā | pratyuvāca mahātejāḥ kālayuktamidaṃ vacaḥ
सव्यसाची के ऐसा कहने पर महाबाहु महातेजस्वी केशव ने समय के अनुकूल यह उत्तर दिया।
वासुदेव उवाच
श्लोक 16 (7.145.16)
अलमेष महाबाहुः कर्णायैकोऽपि पाण्डव । किं पुनर्द्रौपदेयाभ्यां सहितः सात्वतर्षभः ॥
alameṣa mahābāhuḥ karṇāyaiko'pi pāṇḍava | kiṃ punardraupadeyābhyāṃ sahitaḥ sātvatarṣabhaḥ
हे पाण्डव! यह महाबाहु सात्यकि अकेला भी कर्ण के लिए पर्याप्त है; फिर जब यह सात्वतश्रेष्ठ द्रौपदी के दोनों पुत्रों के साथ है, तब तो कहना ही क्या।
श्लोक 17 (7.145.17)
न च तावत्क्षमः पार्थ तव कर्णेन सङ्गरः । प्रज्वलन्ती महोल्केव तिष्ठत्यस्मिन्हि वासवी । त्वदर्थं पूज्यमानैषा रक्ष्यते परवीरहन् ॥
na ca tāvatkṣamaḥ pārtha tava karṇena saṅgaraḥ | prajvalantī maholkeva tiṣṭhatyasminhi vāsavī | tvadarthaṃ pūjyamānaiṣā rakṣyate paravīrahan
और हे पार्थ! अभी कर्ण के साथ तुम्हारा युद्ध करना उचित नहीं है। उसके पास वासवी शक्ति है, जो बड़ी उल्का के समान जल रही है। हे शत्रुवीरों का नाश करने वाले! वह उसे पूजता हुआ तुम्हारे लिए ही सँभालकर रखे हुए है।
श्लोक 18 (7.145.18)
न कर्णं प्राकृतं मन्ये तेन योद्धुं न साम्प्रतम् । यः कर्णो बलवानेष शक्तोऽस्माञ्जेतुमोजसा ॥
na karṇaṃ prākṛtaṃ manye tena yoddhuṃ na sāmpratam | yaḥ karṇo balavāneṣa śakto'smāñjetumojasā
मैं कर्ण को साधारण पुरुष नहीं मानता, इसलिए अभी उससे युद्ध करना ठीक नहीं है। यह कर्ण बलवान् है और अपने पराक्रम से हमें जीतने में समर्थ है।
श्लोक 19 (7.145.19)
कर्णस्यैष महान्दोषो यद्दूयेत पदेपदे । प्रमादाच्च घृणित्वाच्च तेन शोचति मे मनः ॥
karṇasyaiṣa mahāndoṣo yaddūyeta padepade | pramādācca ghṛṇitvācca tena śocati me manaḥ
कर्ण में एक बड़ा दोष है कि वह पग-पग पर प्रमाद और दया से पीड़ित होता रहता है; इसी कारण मेरा मन चिन्तित है।
श्लोक 20 (7.145.20)
अतः कर्णः प्रयात्वत्र सात्वतस्य यथा तथा । अहं ज्ञास्यामि कौन्तेय कालमस्य दुरात्मनः ॥
ataḥ karṇaḥ prayātvatra sātvatasya yathā tathā | ahaṃ jñāsyāmi kaunteya kālamasya durātmanaḥ
इसलिए कर्ण जैसे भी हो सात्यकि की ओर जाए; हे कौन्तेय! इस दुष्ट का समय मैं जान लूँगा।
श्लोक 21 (7.145.21)
यत्रैनं विशिखैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यसि भूतले । तदा गन्तासि पार्थ त्वं तेन योद्धुं दुरात्मना ॥
yatrainaṃ viśikhaistīkṣṇaiḥ pātayiṣyasi bhūtale | tadā gantāsi pārtha tvaṃ tena yoddhuṃ durātmanā
जब तुम तीखे बाणों से इसे भूमि पर गिरा दोगे, तब हे पार्थ! तुम उस दुष्ट से युद्ध करने जाना।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 22 (7.145.22)
योऽसौ कर्णेन वीरस्य वार्ष्णेयस्य समागमः । हते तु भूरिश्रवसि तद्युद्धमभवत्कथम् ॥
yo'sau karṇena vīrasya vārṣṇeyasya samāgamaḥ | hate tu bhūriśravasi tadyuddhamabhavatkatham
भूरिश्रवा के मारे जाने पर वीर वार्ष्णेय सात्यकि का कर्ण से जो मिलन हुआ, वह युद्ध कैसे हुआ?
श्लोक 23 (7.145.23)
सात्यकिश्चापि विरथः कं समारूढवान्रथम् । चक्ररक्षौ च पाञ्चाल्यौ तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
sātyakiścāpi virathaḥ kaṃ samārūḍhavānratham | cakrarakṣau ca pāñcālyau tanmamācakṣva sañjaya
और रथहीन हुए सात्यकि किस रथ पर चढ़े? और चक्ररक्षक दोनों पाञ्चाल वीर क्या करते रहे? हे सञ्जय! यह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (7.145.24)
हन्त ते कथयिष्यामि यथावृत्तं महारणे । पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवार्जुनयोरपि । शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा दुराचरितमात्मनः ॥
hanta te kathayiṣyāmi yathāvṛttaṃ mahāraṇe | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ keśavārjunayorapi | śuśrūṣasva sthiro bhūtvā durācaritamātmanaḥ
सुनिए, उस महायुद्ध में सब सेनाओं के देखते-देखते तथा केशव और अर्जुन के सामने जैसा हुआ, वह मैं आपको बताता हूँ। स्थिर होकर अपने ही पक्ष के उस अनुचित आचरण को सुनिए।
श्लोक 25 (7.145.25)
पूर्वमेव हि कृष्णस्य मनोगतमिदं प्रभो । विजेतव्यो यथा वीरः सात्यकिः सौमदत्तिना ॥
pūrvameva hi kṛṣṇasya manogatamidaṃ prabho | vijetavyo yathā vīraḥ sātyakiḥ saumadattinā
हे प्रभो! कृष्ण के मन में पहले से ही यह बात थी कि वीर सात्यकि सोमदत्त के पुत्र से पराजित होने वाला है।
श्लोक 26 (7.145.26)
अतीतानागते राजन्स हि वेत्ति जनार्दनः । ततः सूतं समाहूय दारुकं संदिदेश ह । रथो मे युज्यतां कल्यमिति राजन्महाबलः ॥
atītānāgate rājansa hi vetti janārdanaḥ | tataḥ sūtaṃ samāhūya dārukaṃ saṃdideśa ha | ratho me yujyatāṃ kalyamiti rājanmahābalaḥ
हे राजन्! जनार्दन भूत और भविष्य दोनों को जानते हैं। इसलिए उन्होंने सारथि दारुक को बुलाकर आज्ञा दी: "कल प्रातः मेरा रथ जोत दिया जाए", हे राजन्, ऐसा उन महाबली ने कहा।
श्लोक 27 (7.145.27)
न हि देवा न गन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । मानवा वाऽपि जेतारः कृष्णयोः सन्ति केचन ॥
na hi devā na gandharvā na yakṣoragarākṣasāḥ | mānavā vā'pi jetāraḥ kṛṣṇayoḥ santi kecana
क्योंकि न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष, नाग या राक्षस, और न कोई मनुष्य ही उन दोनों कृष्णों को जीतने में समर्थ हैं।
श्लोक 28 (7.145.28)
पितामहपुरोगाश्च देवाः सिद्धाश्च तं विदुः । तयोः प्रभावमतुलं शृणु युद्धं तु तत्तथा ॥
pitāmahapurogāśca devāḥ siddhāśca taṃ viduḥ | tayoḥ prabhāvamatulaṃ śṛṇu yuddhaṃ tu tattathā
पितामह ब्रह्मा के नेतृत्व में देवता और सिद्ध उन दोनों को जानते हैं। उनके अतुल प्रभाव को सुनिए, और यह भी कि वह युद्ध कैसे हुआ।
श्लोक 29 (7.145.29)
सात्यकिं विरथं दृष्ट्वा कर्णं चाभ्युद्यतं रणे । दध्मौ शङ्खं महानादमार्षभेणाथ माधवः ॥
sātyakiṃ virathaṃ dṛṣṭvā karṇaṃ cābhyudyataṃ raṇe | dadhmau śaṅkhaṃ mahānādamārṣabheṇātha mādhavaḥ
सात्यकि को रथहीन और कर्ण को उस पर आक्रमण के लिए उद्यत देखकर माधव ने ऋषभ स्वर में अपना शंख बड़े नाद के साथ बजाया।
श्लोक 30 (7.145.30)
दारुकोऽवेत्य सन्देशं श्रुत्वा शङ्खस्य च स्वनम् । रथमन्वानयत्तस्मै सुपर्णोच्छ्रितकेतनम् ॥
dāruko'vetya sandeśaṃ śrutvā śaṅkhasya ca svanam | rathamanvānayattasmai suparṇocchritaketanam
दारुक ने आदेश समझ लिया और शंख की ध्वनि सुनकर उनके लिए वह रथ ला दिया जिस पर सुपर्ण (गरुड़) का ऊँचा ध्वज फहरा रहा था।
श्लोक 31 (7.145.31)
स केशवस्यानुमते रथं दारुकसंयुतम् । आरुरोह शिनेः पौत्रो ज्वलनादित्यसन्निभम् ॥
sa keśavasyānumate rathaṃ dārukasaṃyutam | āruroha śineḥ pautro jvalanādityasannibham
केशव की अनुमति से शिनि के पौत्र सात्यकि उस रथ पर चढ़े, जिसमें दारुक सारथि था और जो जलती अग्नि तथा सूर्य के समान चमक रहा था।
श्लोक 32 (7.145.32)
कामगैः शैव्यसुग्रीवमेघपुष्पवलाहकैः । हयोदग्रैर्महावेगैर्हेमभाण्डविभूषितैः ॥
kāmagaiḥ śaivyasugrīvameghapuṣpavalāhakaiḥ | hayodagrairmahāvegairhemabhāṇḍavibhūṣitaiḥ
उसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और वलाहक नामक इच्छानुसार चलने वाले घोड़े जुते थे, जो ऊँचे उठे हुए सिर वाले, अति वेगवान् और सोने के साज से सजे थे।
श्लोक 33 (7.145.33)
युक्तं समारुह्य च तं विमानप्रतिमं रथम् । अभ्यद्रवत राधेयं प्रवपन्सायकान्बहून् ॥
yuktaṃ samāruhya ca taṃ vimānapratimaṃ ratham | abhyadravata rādheyaṃ pravapansāyakānbahūn
इस प्रकार जुते हुए विमान-तुल्य उस रथ पर चढ़कर वे बहुत-से बाण बरसाते हुए राधेय पर टूट पड़े।
श्लोक 34 (7.145.34)
चक्ररक्षावपि तदा युधामन्यूत्तमौजसौ । धनञ्जयरथं हित्वा राधेयं प्रत्युदीयतुः ॥
cakrarakṣāvapi tadā yudhāmanyūttamaujasau | dhanañjayarathaṃ hitvā rādheyaṃ pratyudīyatuḥ
तब चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजा भी धनञ्जय का रथ छोड़कर राधेय की ओर बढ़ चले।
श्लोक 35 (7.145.35)
राधेयोऽपि महाराज शरवर्षं समुत्सृजन् । अभ्यद्रवत्सुसङ्क्रुद्धो रणे शैनेयमच्युतम् ॥
rādheyo'pi mahārāja śaravarṣaṃ samutsṛjan | abhyadravatsusaṅkruddho raṇe śaineyamacyutam
हे महाराज! राधेय भी बाणों की वर्षा करता हुआ अत्यन्त क्रुद्ध होकर रण में अटल शैनेय पर टूट पड़ा।
श्लोक 36 (7.145.36)
नैव दैवं न गान्धर्वं नासुरं न च राक्षसम् । तादृशं भुवि नो युद्धं दिवि वा श्रुतमित्युत । उपारमत तत्सैन्यं सरथाश्वनरद्विपम् ॥
naiva daivaṃ na gāndharvaṃ nāsuraṃ na ca rākṣasam | tādṛśaṃ bhuvi no yuddhaṃ divi vā śrutamityuta | upāramata tatsainyaṃ sarathāśvanaradvipam
न देवताओं में, न गन्धर्वों में, न असुरों में और न राक्षसों में ही ऐसा युद्ध पृथ्वी या स्वर्ग में सुना गया है। रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों सहित वह सारी सेना थम गई।
श्लोक 37 (7.145.37)
तयोर्दृष्ट्वा महाराज कर्म सम्मूढचेतसः । सर्वे च समपश्यन्त तद्युद्धमतिमानुषम् ॥
tayordṛṣṭvā mahārāja karma sammūḍhacetasaḥ | sarve ca samapaśyanta tadyuddhamatimānuṣam
हे महाराज! उन दोनों के कर्म को देखकर सब मोह में पड़ गए और सबने उस अतिमानवीय युद्ध को देखा।
श्लोक 38 (7.145.38)
तयोर्नृवरयो राजन्सारथ्यं दारुकस्य च ॥
tayornṛvarayo rājansārathyaṃ dārukasya ca
हे राजन्! उन दोनों नरश्रेष्ठों को और दारुक के सारथ्य को वे देखते रहे,
श्लोक 39 (7.145.39)
गतप्रत्यागतावृत्तैर्मण्डलैः सन्निवर्तनैः । सारथेस्तु रथस्थस्य काश्यपेयस्य विस्मिताः ॥
gatapratyāgatāvṛttairmaṇḍalaiḥ sannivartanaiḥ | sārathestu rathasthasya kāśyapeyasya vismitāḥ
और रथ पर खड़े काश्यपवंशी सारथि दारुक के आगे-पीछे जाने, चक्कर काटने और मुड़ने के कौशल को देखकर विस्मित हुए।
श्लोक 40 (7.145.40)
नभस्तलगताश्चैव देवगान्धर्वदानवाः । अतीवावहिता द्रष्टुं कर्णशैनेययो रणम् ॥
nabhastalagatāścaiva devagāndharvadānavāḥ | atīvāvahitā draṣṭuṃ karṇaśaineyayo raṇam
आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व और दानव कर्ण और शैनेय के उस युद्ध को अत्यन्त ध्यान से देख रहे थे।
श्लोक 41 (7.145.41)
मित्रार्थे तौ पराक्रान्तौ शुष्मिणौ स्पर्धिनौ रणे ॥
mitrārthe tau parākrāntau śuṣmiṇau spardhinau raṇe
वे दोनों बलशाली और एक-दूसरे से होड़ करने वाले वीर अपने मित्रों के लिए युद्ध में पराक्रम दिखा रहे थे।
श्लोक 42 (7.145.42)
कर्णश्चामरसङ्काशो युयुधानश्च सात्यकिः । अन्योन्यं तौ महाराज शरवर्षैरवर्षताम् ॥
karṇaścāmarasaṅkāśo yuyudhānaśca sātyakiḥ | anyonyaṃ tau mahārāja śaravarṣairavarṣatām
हे महाराज! देवतुल्य तेजस्वी कर्ण और युयुधान सात्यकि एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 43 (7.145.43)
प्रममाथ शिनेः पौत्रं कर्णः सायकवृष्टिभिः । अमृष्यमाणो निधनं कौरव्यजलसन्धयोः ॥
pramamātha śineḥ pautraṃ karṇaḥ sāyakavṛṣṭibhiḥ | amṛṣyamāṇo nidhanaṃ kauravyajalasandhayoḥ
कौरव्य और जलसन्ध के वध को न सह पाने वाले कर्ण ने शिनि के पौत्र को बाणों की वर्षा से पीड़ित कर दिया।
श्लोक 44 (7.145.44)
कर्णः शोकसमाविष्टो महोरग इव श्वसन् । स शैनेयं रणे क्रुद्धः प्रदहन्निव चक्षुषा । अभ्यधावत वेगेन पुनःपुनररिन्दम ॥
karṇaḥ śokasamāviṣṭo mahoraga iva śvasan | sa śaineyaṃ raṇe kruddhaḥ pradahanniva cakṣuṣā | abhyadhāvata vegena punaḥpunararindama
शोक से भरा हुआ कर्ण महासर्प की तरह फुफकारता हुआ क्रोध से मानो दृष्टि से ही शैनेय को जलाता हुआ, हे शत्रुदमन, बार-बार वेग से उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 45 (7.145.45)
तं तु सक्रोधमालोक्य सात्यकिः प्रत्ययुध्यत । महता शरवर्षेण गजं प्रतिगजो यथा ॥
taṃ tu sakrodhamālokya sātyakiḥ pratyayudhyata | mahatā śaravarṣeṇa gajaṃ pratigajo yathā
उसे क्रोध से भरा देखकर सात्यकि ने बाणों की भारी वर्षा से उसका सामना किया, जैसे एक हाथी दूसरे हाथी का सामना करता है।
श्लोक 46 (7.145.46)
तौ समेतौ नरव्याघ्रौ व्याघ्राविव तरस्विनौ । अन्योन्यं सन्ततक्षाते रणेऽनुपमविक्रमौ ॥
tau sametau naravyāghrau vyāghrāviva tarasvinau | anyonyaṃ santatakṣāte raṇe'nupamavikramau
वे दोनों नरव्याघ्र, व्याघ्रों के समान तेजस्वी होकर, भिड़ गए और अनुपम पराक्रम वाले वे रण में एक-दूसरे को काटने लगे।
श्लोक 47 (7.145.47)
ततः कर्णं शिनेः पौत्रः सर्वपारशवैः शरैः । बिभेद सर्वगात्रेषु पुनःपुनररिन्दम ॥
tataḥ karṇaṃ śineḥ pautraḥ sarvapāraśavaiḥ śaraiḥ | bibheda sarvagātreṣu punaḥpunararindama
तब शिनि के पौत्र ने लोहे के बाणों से कर्ण के सारे अंगों को बार-बार बींध दिया, हे शत्रुदमन।
श्लोक 48 (7.145.48)
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् । अश्वांश्च चतुरः श्वेतान्निजघान शितैः शरैः ॥
sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat | aśvāṃśca caturaḥ śvetānnijaghāna śitaiḥ śaraiḥ
उसने भल्ल से कर्ण के सारथि को रथ के आसन से गिरा दिया और तीखे बाणों से उसके चारों श्वेत घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 49 (7.145.49)
छित्त्वा ध्वजं रथं चैव शतधा पुरुषर्षभ । चकार विरथं कर्णं तव पुत्रस्य पश्यतः ॥
chittvā dhvajaṃ rathaṃ caiva śatadhā puruṣarṣabha | cakāra virathaṃ karṇaṃ tava putrasya paśyataḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ! उसने कर्ण की ध्वजा और रथ के सौ टुकड़े कर दिए और आपके पुत्र के देखते-देखते कर्ण को रथहीन कर दिया।
श्लोक 50 (7.145.50)
ततो विमनसो राजंस्तावकास्ते महारथाः । वृषसेनः कर्णसुतः शल्यो मद्राधिपस्तथा ॥
tato vimanaso rājaṃstāvakāste mahārathāḥ | vṛṣasenaḥ karṇasutaḥ śalyo madrādhipastathā
हे राजन्! तब आपके वे महारथी उदास हो गए, कर्ण का पुत्र वृषसेन और मद्रराज शल्य,
श्लोक 51 (7.145.51)
द्रोणपुत्रश्च शैनेयं सर्वतः पर्यवारयन् । ततः पर्याकुलं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥
droṇaputraśca śaineyaṃ sarvataḥ paryavārayan | tataḥ paryākulaṃ sarvaṃ na prājñāyata kiṃcana
और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने सब ओर से शैनेय को घेर लिया। तब सब कुछ उथल-पुथल हो गया और कुछ भी पहचाना नहीं जा सका।
श्लोक 52 (7.145.52)
तथा सात्यकिना वीरे विरथे सूतजे कृते । हाहाकारस्ततो राजन्सर्वसैन्येष्वभून्महान् ॥
tathā sātyakinā vīre virathe sūtaje kṛte | hāhākārastato rājansarvasainyeṣvabhūnmahān
हे राजन्! वीर सात्यकि द्वारा सूतपुत्र के रथहीन कर दिए जाने पर सारी सेनाओं में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 53 (7.145.53)
कर्णोऽपि विरथो राजन्सात्वतेन कृतः शरैः । दुर्योधनरथं तूर्णमारुरोह विनिःश्वसन् ॥
karṇo'pi viratho rājansātvatena kṛtaḥ śaraiḥ | duryodhanarathaṃ tūrṇamāruroha viniḥśvasan
सात्वत सात्यकि के बाणों से रथहीन किया गया कर्ण भी लम्बी साँस लेता हुआ शीघ्र दुर्योधन के रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 54 (7.145.54)
मानयंस्तव पुत्रस्य बाल्यात्प्रभृति सौहृदम् । कृतां राज्यप्रदानेन प्रतिज्ञां परिपालयन् ॥
mānayaṃstava putrasya bālyātprabhṛti sauhṛdam | kṛtāṃ rājyapradānena pratijñāṃ paripālayan
वह बचपन से चली आती आपके पुत्र की मित्रता का आदर करता था, और राज्य दिए जाने के बदले की हुई अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर रहा था।
श्लोक 55 (7.145.55)
तथा तु विरथं कर्णं पुत्रांश्च परिपालयन् । दुःशासनमुखान्वीरान्नावधीत्सात्यकिर्वशी ॥
tathā tu virathaṃ karṇaṃ putrāṃśca paripālayan | duḥśāsanamukhānvīrānnāvadhītsātyakirvaśī
इस प्रकार कर्ण के रथहीन हो जाने पर संयमी सात्यकि ने उसे और दुःशासन आदि आपके वीर पुत्रों को भी बचाते हुए नहीं मारा।
श्लोक 56 (7.145.56)
रक्षन्प्रतिज्ञां भीमेन पार्थेन च पुराकृताम् । विरथान्विह्वलांश्चक्रे न तु प्राणैर्व्ययोजयत् ॥
rakṣanpratijñāṃ bhīmena pārthena ca purākṛtām | virathānvihvalāṃścakre na tu prāṇairvyayojayat
भीमसेन और पार्थ की पहले की हुई प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए उसने उन्हें रथहीन और व्याकुल तो कर दिया, पर प्राणों से वियुक्त नहीं किया।
श्लोक 57 (7.145.57)
भीमसेनेन तु वधः पुत्राणां ते प्रतिश्रुतः । अनुद्यूते च पार्थेन वधः कर्णस्य संश्रुतः ॥
bhīmasenena tu vadhaḥ putrāṇāṃ te pratiśrutaḥ | anudyūte ca pārthena vadhaḥ karṇasya saṃśrutaḥ
क्योंकि भीमसेन ने आपके पुत्रों के वध की और अर्जुन ने बाद के द्यूत के समय कर्ण के वध की प्रतिज्ञा की थी।
श्लोक 58 (7.145.58)
वधे त्वकुर्वन्यत्नं ते तस्य कर्णमुखास्तदा । नाशक्नुवंस्ततो हन्तुं सात्यकिं प्रवरा रथाः ॥
vadhe tvakurvanyatnaṃ te tasya karṇamukhāstadā | nāśaknuvaṃstato hantuṃ sātyakiṃ pravarā rathāḥ
कर्ण आदि वे प्रमुख रथी उस समय उसे मारने का यत्न तो करते रहे, पर सात्यकि को मार नहीं सके।
श्लोक 59 (7.145.59)
द्रौणिश्च कृतवर्मा च तथैवान्ये महारथाः । निर्जिता धनुषैकेन शतशः क्षत्रियर्षभाः । काङ्क्षता परलोकं च धर्मराजस्य च प्रियम् ॥
drauṇiśca kṛtavarmā ca tathaivānye mahārathāḥ | nirjitā dhanuṣaikena śataśaḥ kṣatriyarṣabhāḥ | kāṅkṣatā paralokaṃ ca dharmarājasya ca priyam
द्रोणपुत्र, कृतवर्मा और अन्य महारथी तथा सैकड़ों क्षत्रियश्रेष्ठ उस एक ही धनुष से हरा दिए गए, उस वीर के द्वारा जो परलोक की और धर्मराज के प्रिय की कामना कर रहा था।
श्लोक 60 (7.145.60)
कृष्णयोः सदृशो वीर्ये सात्यकिः शत्रुतापनः । जितवान्सर्वसैन्यानि तावकानि हसन्निव ॥
kṛṣṇayoḥ sadṛśo vīrye sātyakiḥ śatrutāpanaḥ | jitavānsarvasainyāni tāvakāni hasanniva
दोनों कृष्णों के समान पराक्रमी शत्रुतापन सात्यकि ने आपकी सारी सेनाओं को मानो हँसते-हँसते जीत लिया।
श्लोक 61 (7.145.61)
कृष्णो वाऽपि भवेल्लोके पार्थो बाऽपि धनुर्धरः । शैनेयो वा नरव्याघ्र चतुर्थस्तु न विद्यते ॥
kṛṣṇo vā'pi bhavelloke pārtho bā'pi dhanurdharaḥ | śaineyo vā naravyāghra caturthastu na vidyate
संसार में कृष्ण हो सकते हैं, या धनुर्धर पार्थ, या हे नरव्याघ्र, शैनेय; पर चौथा कोई नहीं मिलता।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 62 (7.145.62)
अजय्यं वासुदेवस्य रथमास्थाय सात्यकिः । विरथं कृतवान्कर्णं वासुदेवसमो युधि । दारुकेण समायुक्तः स्वबाहुबलदर्पितः ॥
ajayyaṃ vāsudevasya rathamāsthāya sātyakiḥ | virathaṃ kṛtavānkarṇaṃ vāsudevasamo yudhi | dārukeṇa samāyuktaḥ svabāhubaladarpitaḥ
वासुदेव के समान पराक्रमी सात्यकि ने वासुदेव के अजेय रथ पर चढ़कर, दारुक को सारथि बनाकर, अपनी भुजाओं के बल पर गर्व करते हुए कर्ण को रथहीन कर दिया।
श्लोक 63 (7.145.63)
कच्चिदन्यं समारूढः सात्यकिः शत्रुतापनः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कुशलो ह्यसि भाषितुम् । असह्यं तमहं मन्ये तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
kaccidanyaṃ samārūḍhaḥ sātyakiḥ śatrutāpanaḥ | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ kuśalo hyasi bhāṣitum | asahyaṃ tamahaṃ manye tanmamācakṣva sañjaya
क्या शत्रुतापन सात्यकि किसी दूसरे रथ पर चढ़ा? मैं यह सुनना चाहता हूँ; तुम कहने में कुशल हो। मैं उसे अजेय मानता हूँ। हे सञ्जय! यह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 64 (7.145.64)
शृणु राजन्यथावृत्तं रथमन्यं महामतिः । दारुकस्यानुजस्तूर्णं कल्पनाविधिकल्पितम् ॥
śṛṇu rājanyathāvṛttaṃ rathamanyaṃ mahāmatiḥ | dārukasyānujastūrṇaṃ kalpanāvidhikalpitam
हे राजन्! जैसा हुआ वह सुनिए: दारुक के बुद्धिमान् छोटे भाई ने, जो रथ-निर्माण की विधि जानता था, शीघ्र ही विधिपूर्वक बना हुआ दूसरा रथ तैयार किया,
श्लोक 65 (7.145.65)
आयसैः काञ्चनैश्चापि पट्टैः सन्नद्धकूबरम् । तारासहस्रखचितं सिंहध्वजपताकिनम् ॥
āyasaiḥ kāñcanaiścāpi paṭṭaiḥ sannaddhakūbaram | tārāsahasrakhacitaṃ siṃhadhvajapatākinam
जिसकी धुरी का आवरण लोहे और सोने की पट्टियों से कसा था, जिसमें हज़ारों तारे जड़े थे और जिस पर सिंह के चिह्न वाली ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं,
श्लोक 66 (7.145.66)
अश्वैर्वातजवैर्युक्तं हेमभाण्डपरिच्छदैः । सैन्धवैरिन्दुसङ्काशैः सर्वशब्दातिगैर्दृढैः ॥
aśvairvātajavairyuktaṃ hemabhāṇḍaparicchadaiḥ | saindhavairindusaṅkāśaiḥ sarvaśabdātigairdṛḍhaiḥ
जिसमें वायु के समान वेग वाले, सोने के साज से सजे, चन्द्रमा-से उजले, दृढ़ और किसी भी शब्द से न घबराने वाले सैन्धव घोड़े जुते थे,
श्लोक 67 (7.145.67)
चित्रकाञ्चनसन्नाहैर्वाजिमुख्यैर्विशाम्पते । घण्टाजालाकुलरवं शक्तितोमरविद्युतम् ॥
citrakāñcanasannāhairvājimukhyairviśāmpate | ghaṇṭājālākularavaṃ śaktitomaravidyutam
हे राजन्! सोने के विचित्र कवच वाले उत्तम घोड़ों से युक्त, घण्टियों के जाल से गूँजता हुआ और शक्ति तथा तोमर से बिजली-सा चमकता हुआ,
श्लोक 68 (7.145.68)
युक्तं साङ्ग्रामिकैर्द्रव्यैर्बहुशस्त्रपरिच्छदैः । रथं सम्पादयामास मेघगम्भीरनिःस्वनम् ॥
yuktaṃ sāṅgrāmikairdravyairbahuśastraparicchadaiḥ | rathaṃ sampādayāmāsa meghagambhīraniḥsvanam
युद्ध की सामग्री और अनेक शस्त्रों से सुसज्जित, मेघ के समान गम्भीर घोष वाला, ऐसा रथ उसने तैयार कर दिया।
श्लोक 69 (7.145.69)
तं समारुह्य शैनेयस्तव सैन्यमुपाद्रवत् । दारुकोऽपि यथाकामं प्रययौ केशवान्तिकम् ॥
taṃ samāruhya śaineyastava sainyamupādravat | dāruko'pi yathākāmaṃ prayayau keśavāntikam
उस पर चढ़कर शैनेय आपकी सेना पर टूट पड़ा, और दारुक अपनी इच्छा से केशव के पास लौट गया।
श्लोक 70 (7.145.70)
कर्णस्यापि रथं राजञ्शङ्खगोक्षीरपाण्डुरैः । चित्रकाञ्चनसन्नाहैः सदश्वैर्वेगवत्तरैः ॥
karṇasyāpi rathaṃ rājañśaṅkhagokṣīrapāṇḍuraiḥ | citrakāñcanasannāhaiḥ sadaśvairvegavattaraiḥ
हे राजन्! कर्ण के लिए भी एक रथ लाया गया, जिसमें शंख और गोदुग्ध के समान श्वेत, सोने के विचित्र कवच वाले उत्तम और अति वेगवान् घोड़े जुते थे,
श्लोक 71 (7.145.71)
हेमकक्ष्याध्वजोपेतं क्लृप्तयन्त्रपताकिनम् । अग्र्यं रथं सुयन्तारं बहुशस्त्रपरिच्छदम् । उपाजह्रुस्तमास्थाय कर्णोऽप्यभ्यद्रवद्रिपून् ॥
hemakakṣyādhvajopetaṃ klṛptayantrapatākinam | agryaṃ rathaṃ suyantāraṃ bahuśastraparicchadam | upājahrustamāsthāya karṇo'pyabhyadravadripūn
सोने की कमरबन्दों और ध्वजा से युक्त, यन्त्रों और पताकाओं से सजा, कुशल सारथि और अनेक शस्त्रों वाला उत्तम रथ वे ले आए; उस पर चढ़कर कर्ण भी शत्रुओं पर टूट पड़ा।
श्लोक 72 (7.145.72)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । भूयश्चापि निबोधेमं तवापन्नयजं क्षयम् ॥
etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | bhūyaścāpi nibodhemaṃ tavāpannayajaṃ kṣayam
आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया। अब आपकी ही नीतिगत भूल से उत्पन्न विनाश को और सुनिए।
श्लोक 73 (7.145.73)
एकत्रिंशत्तव सुता भीमसेनेन पातिताः । दुर्मुखं प्रमुखे कृत्वा सततं चित्रयोधिनम् ॥
ekatriṃśattava sutā bhīmasenena pātitāḥ | durmukhaṃ pramukhe kṛtvā satataṃ citrayodhinam
भीमसेन ने आपके इकतीस पुत्रों को मार गिराया, जिनमें सदा अद्भुत युद्ध करने वाला दुर्मुख सबसे आगे था।
श्लोक 74 (7.145.74)
शतशो निहताः शूराः सात्वतेनार्जुनेन च । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा भगदत्तं च भारत । एवमेष क्षयो वृत्तो राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥
śataśo nihatāḥ śūrāḥ sātvatenārjunena ca | bhīṣmaṃ pramukhataḥ kṛtvā bhagadattaṃ ca bhārata | evameṣa kṣayo vṛtto rājandurmantrite tava
सात्यकि और अर्जुन ने सैकड़ों वीरों को मार डाला, जिनमें भीष्म और भगदत्त सबसे आगे थे, हे भारत। हे राजन्! इस प्रकार आपकी बुरी मन्त्रणा के कारण यह विनाश हुआ है।