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द्रोण पर्व · अध्याय 161

अश्वत्थामा का उत्तर और धृष्टद्युम्न से उसका द्वन्द्व

दुर्योधन को उत्तर देते हुए अश्वत्थामा कहता है कि वह और कौरव पक्ष के दूसरे प्रमुख वीर पूरी शक्ति से पाण्डवों से लड़ रहे हैं; वह राजा को उसकी शंकालुता के लिए फटकारता है और पाञ्चालों तथा सोमकों का संहार करने रणभूमि में उतरता है। धृष्टद्युम्न उसका सामना करता है; दोनों एक-दूसरे को ललकारते हैं और देर तक बराबरी का द्वन्द्व चलता है, जब तक अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न के घोड़े, सारथि और साज-सामान नष्ट करके पाञ्चालों को खदेड़ नहीं देता और युगान्त की अग्नि के समान चमक उठता है।

अध्याय 160अध्याय-सूचीअध्याय 162

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.161.1)

दुर्योधनेनैवमुक्तो द्रौणिराहवदुर्मदः । चकारारिवधे यत्नमिन्द्रो दैत्यवधे यथा । प्रत्युवाच महाबाहुस्तव पुत्रमिदं वचः ॥

duryodhanenaivamukto drauṇirāhavadurmadaḥ | cakārārivadhe yatnamindro daityavadhe yathā | pratyuvāca mahābāhustava putramidaṃ vacaḥ

दुर्योधन के इस प्रकार कहने पर युद्ध में मदमत्त द्रोणपुत्र ने शत्रुओं के वध का प्रयत्न किया, जैसे इन्द्र ने दैत्यों के वध का किया था; और उस महाबाहु ने आपके पुत्र को यह उत्तर दिया।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 2 (7.161.2)

सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि कौरव । प्रिया हि पाण्डवा नित्यं मम चापि पितुश्च मे ॥

satyametanmahābāho yathā vadasi kaurava | priyā hi pāṇḍavā nityaṃ mama cāpi pituśca me

"हे महाबाहु कौरव! आप जैसा कहते हैं, वह सत्य है। पाण्डव मुझे सदा प्रिय हैं और मेरे पिता को भी प्रिय हैं।

श्लोक 3 (7.161.3)

तथैवावां प्रियौ तेषां न तु युद्धे कुरूद्वह । शक्तितस्तात युध्यामस्त्यक्त्वा प्राणानभीतवत् ॥

tathaivāvāṃ priyau teṣāṃ na tu yuddhe kurūdvaha | śaktitastāta yudhyāmastyaktvā prāṇānabhītavat

हे कुरुश्रेष्ठ! उसी प्रकार हम दोनों भी उन्हें प्रिय हैं; फिर भी हे तात, युद्ध में हम प्राणों को त्यागकर निर्भय की भाँति अपनी पूरी शक्ति से लड़ते हैं।

श्लोक 4 (7.161.4)

अहं कर्णश्च शल्यश्च कृपो हार्दिक्य एव च । निमेषात्पाण्डवीं सेनां क्षपयेम नृपोत्तम ॥

ahaṃ karṇaśca śalyaśca kṛpo hārdikya eva ca | nimeṣātpāṇḍavīṃ senāṃ kṣapayema nṛpottama

हे नृपश्रेष्ठ! मैं, कर्ण, शल्य, कृप और हार्दिक्य (कृतवर्मा) पल भर में पाण्डवों की सेना का संहार कर सकते हैं।

श्लोक 5 (7.161.5)

ते चापि कौरवीं सेनां निमेषार्धात्कुरूद्वह । क्षपयेयुर्महाबाहो न स्याम यदि संयुगे ॥

te cāpi kauravīṃ senāṃ nimeṣārdhātkurūdvaha | kṣapayeyurmahābāho na syāma yadi saṃyuge

और हे महाबाहु कुरुश्रेष्ठ! यदि हम युद्ध में न होते, तो वे भी आधे पल में कौरव सेना का संहार कर डालते।

श्लोक 6 (7.161.6)

युध्याम पाण्डवाच्छक्त्या ते चाप्यस्मान्यथाबलम् । तेजस्तेजः समासाद्य प्रशमं यातु भारत ॥

yudhyāma pāṇḍavācchaktyā te cāpyasmānyathābalam | tejastejaḥ samāsādya praśamaṃ yātu bhārata

हम अपनी शक्ति से पाण्डवों से लड़ते हैं और वे भी अपने बल के अनुसार हमसे लड़ते हैं; हे भारत! तेज से तेज के टकराने पर यह युद्ध शान्त हो जाए।

श्लोक 7 (7.161.7)

अशक्या तरसा जेतुं पाण्डवानामनीकिनी । जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु तद्धि सत्यं ब्रवीमि ते ॥

aśakyā tarasā jetuṃ pāṇḍavānāmanīkinī | jīvatsu pāṇḍuputreṣu taddhi satyaṃ bravīmi te

जब तक पाण्डुपुत्र जीवित हैं, तब तक पाण्डवों की सेना को बल से जीतना सम्भव नहीं है; मैं आपसे यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 8 (7.161.8)

आत्मार्थं युध्यमानास्ते समर्थाः पाण्डुनन्दनाः । किमर्थं तव सैन्यानि न हनिष्यन्ति भारत ॥

ātmārthaṃ yudhyamānāste samarthāḥ pāṇḍunandanāḥ | kimarthaṃ tava sainyāni na haniṣyanti bhārata

अपने प्रयोजन के लिए लड़ते हुए पाण्डुपुत्र समर्थ हैं; हे भारत! फिर वे आपकी सेनाओं का संहार क्यों नहीं करेंगे?

श्लोक 9 (7.161.9)

त्वं तु लुब्धतमो राजन्निकृतिज्ञश्च कौरव । सर्वाभिशङ्की मानी च ततोऽस्मानभिशङ्कसे ॥

tvaṃ tu lubdhatamo rājannikṛtijñaśca kaurava | sarvābhiśaṅkī mānī ca tato'smānabhiśaṅkase

परन्तु हे राजन्! हे कौरव! आप अत्यन्त लोभी हैं, छल-कपट के जानकार हैं, सब पर शंका करने वाले और अभिमानी हैं; इसीलिए आप हम पर भी शंका करते हैं।

श्लोक 10 (7.161.10)

मन्ये त्वं कुत्सितो राजन्पापात्मा पापपूरुषः । अन्यानपि स नः क्षुद्र शङ्कसे पापभावितः ॥

manye tvaṃ kutsito rājanpāpātmā pāpapūruṣaḥ | anyānapi sa naḥ kṣudra śaṅkase pāpabhāvitaḥ

हे राजन्! मैं आपको नीच, पापात्मा और पाप का पुतला मानता हूँ; इसीलिए हे क्षुद्र! पाप से भरे हुए आप दूसरों पर और हम पर भी शंका करते हैं।

श्लोक 11 (7.161.11)

अहं तु यत्नमास्थाय त्वदर्थे त्यक्तजीवितः । एष गच्छामि सङ्ग्रामं त्वत्कृते कुरुनन्दन । योत्स्येऽहं शत्रुभिः सार्धं जेष्यामि च वरान्वरान् ॥

ahaṃ tu yatnamāsthāya tvadarthe tyaktajīvitaḥ | eṣa gacchāmi saṅgrāmaṃ tvatkṛte kurunandana | yotsye'haṃ śatrubhiḥ sārdhaṃ jeṣyāmi ca varānvarān

परन्तु मैं तो निश्चय करके, आपके लिए प्राणों का मोह छोड़कर, हे कुरुनन्दन, आपके ही निमित्त अब युद्ध में जा रहा हूँ। मैं शत्रुओं के साथ लड़ूँगा और उनमें जो श्रेष्ठ हैं, उन्हें एक-एक करके जीतूँगा।

श्लोक 12 (7.161.12)

पाञ्चालैः सह योत्स्यामि सोमकैः केकयैस्तथा । पाण्डवेयैश्च सङ्ग्रामे त्वत्प्रियार्थमरिन्दम ॥

pāñcālaiḥ saha yotsyāmi somakaiḥ kekayaistathā | pāṇḍaveyaiśca saṅgrāme tvatpriyārthamarindama

हे शत्रुदमन! आपकी प्रसन्नता के लिए मैं युद्ध में पाञ्चालों, सोमकों, केकयों तथा पाण्डवों से भी लड़ूँगा।

श्लोक 13 (7.161.13)

अद्य मद्बाणनिर्दग्धाः पाञ्चालाः सोमकास्तथा । सिंहेनेवार्दिता गावो विद्रविष्यन्ति सर्वशः ॥

adya madbāṇanirdagdhāḥ pāñcālāḥ somakāstathā | siṃhenevārditā gāvo vidraviṣyanti sarvaśaḥ

आज मेरे बाणों से जले हुए पाञ्चाल और सोमक सिंह से सताई हुई गायों की तरह सब ओर भाग खड़े होंगे।

श्लोक 14 (7.161.14)

अद्य धर्मसुतो राजा दृष्ट्वा मम पराक्रमम् । अश्वत्थाममयं लोकं मंस्यते सह सोमकैः ॥

adya dharmasuto rājā dṛṣṭvā mama parākramam | aśvatthāmamayaṃ lokaṃ maṃsyate saha somakaiḥ

आज धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मेरा पराक्रम देखकर सोमकों सहित समस्त संसार को अश्वत्थामामय मानेंगे।

श्लोक 15 (7.161.15)

आगमिष्यति निर्वेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । दृष्ट्वा विनिहतान्सङ्ख्ये पाञ्चालान्सोमकैः सह ॥

āgamiṣyati nirvedaṃ dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | dṛṣṭvā vinihatānsaṅkhye pāñcālānsomakaiḥ saha

पाञ्चालों और सोमकों को युद्ध में मारा गया देखकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर को वैराग्य-सा हो जाएगा।

श्लोक 16 (7.161.16)

ये मां युद्धेऽभियोत्स्यन्ति तान्हनिष्यामि भारत । न हि ते वीर मोक्ष्यन्ते मद्बाह्वन्तरमागताः ॥

ye māṃ yuddhe'bhiyotsyanti tānhaniṣyāmi bhārata | na hi te vīra mokṣyante madbāhvantaramāgatāḥ

हे भारत! जो भी युद्ध में मेरा सामना करेंगे, उन्हें मैं मार डालूँगा; हे वीर! मेरी भुजाओं के बीच आ जाने पर वे छूट नहीं पाएँगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (7.161.17)

एवमुक्त्वा महाबाहुः पुत्रं दुर्योधनं तव । अभ्यवर्तत युद्धाय त्रासयन्सर्वधन्विनः । चिकीर्षुस्तव पुत्राणां प्रियं प्राणभृतां वरः ॥

evamuktvā mahābāhuḥ putraṃ duryodhanaṃ tava | abhyavartata yuddhāya trāsayansarvadhanvinaḥ | cikīrṣustava putrāṇāṃ priyaṃ prāṇabhṛtāṃ varaḥ

आपके पुत्र दुर्योधन से ऐसा कहकर प्राणधारियों में श्रेष्ठ वह महाबाहु समस्त धनुर्धारियों को भयभीत करता हुआ, आपके पुत्रों का प्रिय करने की इच्छा से युद्ध के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 18 (7.161.18)

ततोऽब्रवीत्सकैकेयान्पाञ्चालान्गौतमीसुतः ॥

tato'bravītsakaikeyānpāñcālāngautamīsutaḥ

तब गौतमी के पुत्र ने केकयों सहित पाञ्चालों से कहा—

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 19 (7.161.19)

प्रहरध्वमितः सर्वे मम गात्रे महारथाः । स्थिरीभूताश्च युध्यध्वं दर्शयन्तोऽस्त्रलाघवम् ॥

praharadhvamitaḥ sarve mama gātre mahārathāḥ | sthirībhūtāśca yudhyadhvaṃ darśayanto'stralāghavam

"हे महारथियो! तुम सब यहाँ मेरे शरीर पर प्रहार करो और स्थिर होकर लड़ो, अपने अस्त्र-कौशल की फुर्ती दिखाते हुए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (7.161.20)

एवमुक्तास्तु ते सर्वे शस्त्रवृष्टीरपातयन् । द्रौणिं प्रति महाराज जलं जलधरा इव ॥

evamuktāstu te sarve śastravṛṣṭīrapātayan | drauṇiṃ prati mahārāja jalaṃ jaladharā iva

ऐसा कहे जाने पर उन सबने द्रोणपुत्र पर शस्त्रों की वर्षा कर दी, हे महाराज, जैसे बादल जल बरसाते हैं।

श्लोक 21 (7.161.21)

तान्निहत्य शरान्द्रौणिर्दश वीरानपोथयत् । प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां धृष्टद्युम्नस्य च प्रभो ॥

tānnihatya śarāndrauṇirdaśa vīrānapothayat | pramukhe pāṇḍuputrāṇāṃ dhṛṣṭadyumnasya ca prabho

उन बाणों को काटकर द्रोणपुत्र ने पाण्डुपुत्रों और धृष्टद्युम्न के सामने ही दस वीरों को मार गिराया, हे प्रभो।

श्लोक 22 (7.161.22)

ते हन्यमानाः समरे पाञ्चालाः सोमकास्तथा । परित्यज्य रणे द्रौणिं व्यद्रवन्त दिशो दश ॥

te hanyamānāḥ samare pāñcālāḥ somakāstathā | parityajya raṇe drauṇiṃ vyadravanta diśo daśa

रण में मारे जाते हुए पाञ्चाल और सोमक द्रोणपुत्र को छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 23 (7.161.23)

तान्दृष्ट्वा द्रवतः शूरान्पाञ्चालान्सहसोमकान् । धृष्टद्युम्नो महाराज द्रौणिमभ्यद्रवद्रणे ॥

tāndṛṣṭvā dravataḥ śūrānpāñcālānsahasomakān | dhṛṣṭadyumno mahārāja drauṇimabhyadravadraṇe

सोमकों सहित उन पाञ्चाल वीरों को भागते देखकर, हे महाराज, धृष्टद्युम्न युद्ध में द्रोणपुत्र पर टूट पड़ा।

श्लोक 24 (7.161.24)

ततः काञ्चनचित्राणां सजलाम्बुदनादिनाम् । वृतः शतेन शूराणां रथानामनिवर्तिनाम् ॥

tataḥ kāñcanacitrāṇāṃ sajalāmbudanādinām | vṛtaḥ śatena śūrāṇāṃ rathānāmanivartinām

तब सोने से सजे हुए, जल से भरे बादलों की तरह गड़गड़ाने वाले और कभी पीछे न हटने वाले रथों के सौ वीरों से घिरे हुए—

श्लोक 25 (7.161.25)

पुत्रः पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महारथः । द्रौणिमित्यब्रवीद्वाक्यं दृष्ट्वा योधान्निपातितान् ॥

putraḥ pāñcālarājasya dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | drauṇimityabravīdvākyaṃ dṛṣṭvā yodhānnipātitān

पाञ्चालराज के पुत्र महारथी धृष्टद्युम्न ने अपने योद्धाओं को मरा हुआ देखकर द्रोणपुत्र से यह बात कही—

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 26 (7.161.26)

आचार्यपुत्र भद्रं ते किमन्यैर्निहतैस्तव । समागच्छ मया सार्धं यदि शूरोऽसि संयुगे । अहं त्वां निहनिष्यामि तिष्ठेदानीं ममाग्रतः ॥

ācāryaputra bhadraṃ te kimanyairnihataistava | samāgaccha mayā sārdhaṃ yadi śūro'si saṃyuge | ahaṃ tvāṃ nihaniṣyāmi tiṣṭhedānīṃ mamāgrataḥ

"आचार्यपुत्र! तुम्हारा कल्याण हो; दूसरों को मारने से तुम्हें क्या लाभ? यदि तुम युद्ध में शूर हो तो मेरे साथ आकर भिड़ो। मैं तुम्हें मार डालूँगा; अब मेरे सामने ठहरो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 27 (7.161.27)

ततस्तमाचार्यसुतं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । मर्मभिद्भिः शरैस्तीक्ष्णैर्जघान भरतर्षभ ॥

tatastamācāryasutaṃ dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | marmabhidbhiḥ śaraistīkṣṇairjaghāna bharatarṣabha

तब प्रतापी धृष्टद्युम्न ने मर्मस्थानों को भेदने वाले तीखे बाणों से आचार्य के पुत्र को घायल किया, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 28 (7.161.28)

ते तु पङ्क्तीकृता द्रौणिं शरा विविशुराशुगाः । रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्राः सर्वकायावदारणाः । मध्वर्थिन इवोद्दामा भ्रमराः पुष्पितं द्रुमम् ॥

te tu paṅktīkṛtā drauṇiṃ śarā viviśurāśugāḥ | rukmapuṅkhāḥ prasannāgrāḥ sarvakāyāvadāraṇāḥ | madhvarthina ivoddāmā bhramarāḥ puṣpitaṃ drumam

सोने के पंखों और चमकती नोकों वाले, सारे शरीर को चीर देने वाले वे वेगवान् बाण पंक्ति बाँधकर द्रोणपुत्र के शरीर में घुस गए, जैसे मधु चाहने वाले उन्मत्त भौंरे फूले हुए वृक्ष पर जा बैठते हैं।

श्लोक 29 (7.161.29)

सोऽतिविद्धो भृशं क्रुद्धः पदाक्रान्त इवोरगः । मानी द्रौणिरसम्भ्रान्तो बाणपाणिरभाषत ॥

so'tividdho bhṛśaṃ kruddhaḥ padākrānta ivoragaḥ | mānī drauṇirasambhrānto bāṇapāṇirabhāṣata

बुरी तरह घायल होकर पैर से कुचले हुए साँप की तरह क्रोध से भरा हुआ मानी द्रोणपुत्र निश्चल रहकर, हाथ में बाण लिए हुए बोला—

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 30 (7.161.30)

धृष्टद्युम्न स्थिरो भूत्वा मुहूर्तं प्रतिपालय । यावत्त्वां निशितैर्बाणैः प्रेषयामि यमक्षयम् ॥

dhṛṣṭadyumna sthiro bhūtvā muhūrtaṃ pratipālaya | yāvattvāṃ niśitairbāṇaiḥ preṣayāmi yamakṣayam

"धृष्टद्युम्न! स्थिर होकर क्षण भर ठहरो, जब तक मैं अपने तीखे बाणों से तुम्हें यमलोक भेजता हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 31 (7.161.31)

द्रौणिरेवमथाभाष्य पार्षतं परवीरहा । छादयामास बाणौघैः समन्ताल्लघुहस्तवत् ॥

drauṇirevamathābhāṣya pārṣataṃ paravīrahā | chādayāmāsa bāṇaughaiḥ samantāllaghuhastavat

पार्षत (धृष्टद्युम्न) से ऐसा कहकर शत्रु-वीरों का संहार करने वाले उस योद्धा ने हल्के हाथ से बाणों की बाढ़ से उसे चारों ओर से ढक दिया।

श्लोक 32 (7.161.32)

स बाध्यमानः समरे द्रौणिना युद्धदुर्मदः । द्रौणिं पाञ्चालतनयो वाग्भिरातर्जयत्तदा ॥

sa bādhyamānaḥ samare drauṇinā yuddhadurmadaḥ | drauṇiṃ pāñcālatanayo vāgbhirātarjayattadā

युद्ध में द्रोणपुत्र से पीड़ित किया जाता हुआ युद्ध-मदमत्त पाञ्चाल राजकुमार तब द्रोणपुत्र को कठोर वचनों से फटकारने लगा—

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 33 (7.161.33)

न जानीषे प्रतिज्ञां मे विप्रोत्पत्तिं तथैव च । द्रोणं हत्वा किल मया हन्तव्यस्त्वं सुदुर्मते ॥

na jānīṣe pratijñāṃ me viprotpattiṃ tathaiva ca | droṇaṃ hatvā kila mayā hantavyastvaṃ sudurmate

"तू मेरी प्रतिज्ञा को नहीं जानता, और उस ब्राह्मण के सम्बन्ध में मेरे जन्म का प्रयोजन भी नहीं जानता; द्रोण को मारकर ही मुझे तुझे मारना है, अरे दुर्बुद्धि।

श्लोक 34 (7.161.34)

ततस्त्वाऽहं न हन्म्यद्य द्रोणे जीवति संयुगे ॥

tatastvā'haṃ na hanmyadya droṇe jīvati saṃyuge

इसीलिए जब तक रण में द्रोण जीवित हैं, मैं आज तुझे नहीं मारता।

श्लोक 35 (7.161.35)

इमां तु रजनीं प्राप्तामप्रभातां सुदुर्मते । निहत्य पितरं तेऽद्य ततस्त्वामपि संयुगे । नेष्यामि प्रेतलोकाय ह्येतन्मे मनसि स्थितम् ॥

imāṃ tu rajanīṃ prāptāmaprabhātāṃ sudurmate | nihatya pitaraṃ te'dya tatastvāmapi saṃyuge | neṣyāmi pretalokāya hyetanme manasi sthitam

परन्तु अरे दुर्बुद्धि! यह रात आ गई है और अभी सवेरा नहीं हुआ है; आज ही तेरे पिता को मारकर फिर रण में तुझे भी प्रेतलोक पहुँचाऊँगा—ऐसा मेरे मन में निश्चय है।

श्लोक 36 (7.161.36)

यस्ते पार्थेषु विद्वेषो या भक्तिः कौरवेषु च । तां दर्शय स्थिरो भूत्वा न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥

yaste pārtheṣu vidveṣo yā bhaktiḥ kauraveṣu ca | tāṃ darśaya sthiro bhūtvā na me jīvanvimokṣyase

कुन्ती के पुत्रों के प्रति तेरा जो द्वेष है और कौरवों के प्रति जो भक्ति है, उसे स्थिर होकर दिखा; तू मुझसे जीवित नहीं छूटेगा।

श्लोक 37 (7.161.37)

यो हि ब्राह्मण्यमुत्सृज्य क्षत्रधर्मरतो द्विजः । स वध्यः सर्वलोकस्य यथा त्वं पुरुषाधमः ॥

yo hi brāhmaṇyamutsṛjya kṣatradharmarato dvijaḥ | sa vadhyaḥ sarvalokasya yathā tvaṃ puruṣādhamaḥ

जो द्विज ब्राह्मणत्व को छोड़कर क्षत्रिय-धर्म में लगा रहता है, वह सारे संसार के द्वारा वध के योग्य है, जैसे तू, नराधम।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (7.161.38)

इत्युक्तः परुषं वाक्यं पार्षतेन द्विजोत्तमः । क्रोधमाहारयत्तीव्रं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

ityuktaḥ paruṣaṃ vākyaṃ pārṣatena dvijottamaḥ | krodhamāhārayattīvraṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

पृषत के वंशज (धृष्टद्युम्न) के ऐसे कठोर वचन सुनकर उस द्विजश्रेष्ठ को तीव्र क्रोध हो आया और वह बोला, "ठहर, ठहर!"

श्लोक 39 (7.161.39)

निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां पार्षतं सोऽभ्यवैक्षत । छादयामास च शरैर्निःश्वसन्पन्नगो यथा ॥

nirdahanniva cakṣurbhyāṃ pārṣataṃ so'bhyavaikṣata | chādayāmāsa ca śarairniḥśvasanpannago yathā

उसने मानो आँखों से जलाते हुए पार्षत की ओर देखा और साँप की तरह फुँकारते हुए उसे बाणों से ढक दिया।

श्लोक 40 (7.161.40)

स च्छाद्यमानः समरे द्रौणिना राजसत्तम । सर्वपाञ्चालसेनाभिः संवृतो रथसत्तमः ॥

sa cchādyamānaḥ samare drauṇinā rājasattama | sarvapāñcālasenābhiḥ saṃvṛto rathasattamaḥ

हे राजश्रेष्ठ! रण में द्रोणपुत्र के द्वारा ढक दिए जाने पर भी समस्त पाञ्चाल सेनाओं से घिरा हुआ वह रथियों में श्रेष्ठ—

श्लोक 41 (7.161.41)

नाकम्पत महाबाहुः स्ववीर्यं समुपाश्रितः । सायकांश्चैव विविधानश्वत्थाम्नि मुमोच ह ॥

nākampata mahābāhuḥ svavīryaṃ samupāśritaḥ | sāyakāṃścaiva vividhānaśvatthāmni mumoca ha

वह महाबाहु अपने ही पराक्रम का आश्रय लेकर विचलित नहीं हुआ और उसने अश्वत्थामा पर तरह-तरह के बाण छोड़े।

श्लोक 42 (7.161.42)

तौ पुनः सन्न्यवर्तेतां प्राणद्यूतपणे रणे । निपीडयन्तौ बाणौघैः परस्परममर्षिणौ । उत्सृजन्तौ महेष्वासौ शरवृष्टीः समन्ततः ॥

tau punaḥ sannyavartetāṃ prāṇadyūtapaṇe raṇe | nipīḍayantau bāṇaughaiḥ parasparamamarṣiṇau | utsṛjantau maheṣvāsau śaravṛṣṭīḥ samantataḥ

प्राणों की बाज़ी लगाकर लड़े जाने वाले उस युद्ध में वे दोनों फिर आपस में भिड़ गए; एक-दूसरे पर क्रोधित वे दोनों महान् धनुर्धर बाणों की बाढ़ से एक-दूसरे को पीड़ित करते हुए चारों ओर बाणों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 43 (7.161.43)

द्रौणिपार्षतयोर्युद्धं घोररूपं भयानकम् । दृष्ट्वा सम्पूजयामासुः सिद्धचारणवादिकाः ॥

drauṇipārṣatayoryuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayānakam | dṛṣṭvā sampūjayāmāsuḥ siddhacāraṇavādikāḥ

द्रोणपुत्र और पार्षत का वह भयंकर और डरावना युद्ध देखकर सिद्ध, चारण और बन्दीजन उनकी प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 44 (7.161.44)

शरौघैः पूरयन्तौ तावाकाशं च दिशस्तथा । अलक्ष्यौ समयुध्येतां महत्कृत्वा शरैस्तमः ॥

śaraughaiḥ pūrayantau tāvākāśaṃ ca diśastathā | alakṣyau samayudhyetāṃ mahatkṛtvā śaraistamaḥ

बाणों की धाराओं से आकाश और दिशाओं को भरते हुए वे दोनों बाणों से घोर अन्धकार करके अदृश्य रहकर लड़ने लगे।

श्लोक 45 (7.161.45)

नृत्यमानाविव रणे मण्डलीकृतकार्मुकौ । परस्परवधे यत्तौ सर्वभूतभयङ्करौ ॥

nṛtyamānāviva raṇe maṇḍalīkṛtakārmukau | parasparavadhe yattau sarvabhūtabhayaṅkarau

धनुषों को मण्डलाकार खींचे हुए वे दोनों रण में नाचते-से जान पड़ते थे; एक-दूसरे के वध में लगे हुए वे सब प्राणियों के लिए भयंकर थे।

श्लोक 46 (7.161.46)

अयुध्येतां महाबाहू चित्रं लघु च सुष्ठु च । सम्पूज्यमानौ समरे योधमुख्यैः सहस्रशः ॥

ayudhyetāṃ mahābāhū citraṃ laghu ca suṣṭhu ca | sampūjyamānau samare yodhamukhyaiḥ sahasraśaḥ

वे दोनों महाबाहु अद्भुत, फुर्तीले और कुशल ढंग से लड़ रहे थे, और रण में हज़ारों प्रमुख योद्धा उनका सम्मान कर रहे थे।

श्लोक 47 (7.161.47)

तौ प्रबुद्धौ रणे दृष्ट्वा वने वन्यौ गजाविव । उभयोः सेनयोर्हर्षस्तुमुलः समपद्यत ॥

tau prabuddhau raṇe dṛṣṭvā vane vanyau gajāviva | ubhayoḥ senayorharṣastumulaḥ samapadyata

वन में दो जंगली हाथियों की तरह उन दोनों को रण में उत्तेजित देखकर दोनों सेनाओं में भारी हर्ष-कोलाहल छा गया।

श्लोक 48 (7.161.48)

सिंहनादरवाश्चासन्दध्मुः शङ्खांश्च सैनिकाः । वादित्राण्यभ्यवाद्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥

siṃhanādaravāścāsandadhmuḥ śaṅkhāṃśca sainikāḥ | vāditrāṇyabhyavādyanta śataśo'tha sahasraśaḥ

सिंहनाद गूँज उठे, सैनिकों ने शंख बजाए और सैकड़ों-हज़ारों वाद्य बजने लगे।

श्लोक 49 (7.161.49)

तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे भीरुणां भयवर्धने । मुहूर्तमपि तद्युद्धं समरूपं तदाऽभवत् ॥

tasmiṃstu tumule yuddhe bhīruṇāṃ bhayavardhane | muhūrtamapi tadyuddhaṃ samarūpaṃ tadā'bhavat

कायरों का भय बढ़ाने वाले उस घमासान युद्ध में एक क्षण तक वह युद्ध बराबरी का बना रहा।

श्लोक 50 (7.161.50)

ततो द्रौणिर्महाराज पार्षतस्य महात्मनः । ध्वजं धनुस्तथा छत्रमुभौ च पार्ष्णिसारथी । सूतमश्वांश्च चतुरो निहत्याभ्यद्रवद्रणे ॥

tato drauṇirmahārāja pārṣatasya mahātmanaḥ | dhvajaṃ dhanustathā chatramubhau ca pārṣṇisārathī | sūtamaśvāṃśca caturo nihatyābhyadravadraṇe

तब, हे महाराज, द्रोणपुत्र ने महात्मा पार्षत की ध्वजा, धनुष, छत्र, दोनों पार्ष्णिसारथियों, सारथि और चारों घोड़ों को मार गिराया और रण में उस पर टूट पड़ा।

श्लोक 51 (7.161.51)

पाञ्चालांश्चैव तान्सर्वान्बाणैः सन्नतपर्वभिः । व्यद्रावयदमेयात्मा शतशोऽथ सहस्रशः ॥

pāñcālāṃścaiva tānsarvānbāṇaiḥ sannataparvabhiḥ | vyadrāvayadameyātmā śataśo'tha sahasraśaḥ

उस अमेयात्मा ने झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उन सब पाञ्चालों को सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में खदेड़ दिया।

श्लोक 52 (7.161.52)

ततस्तु विव्यथे सेना पाण्डवी भरतर्षभ । दृष्ट्वा द्रौणेर्महत्कर्म वासवस्येव संयुगे ॥

tatastu vivyathe senā pāṇḍavī bharatarṣabha | dṛṣṭvā drauṇermahatkarma vāsavasyeva saṃyuge

तब, हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध में इन्द्र के समान द्रोणपुत्र का वह महान् कर्म देखकर पाण्डवों की सेना व्याकुल हो उठी।

श्लोक 53 (7.161.53)

शतेन च शतं हत्वा पाञ्चालानां महारथः । त्रिभिश्च निशितैर्बाणैर्हत्वा त्रीन्वै महारथान् ॥

śatena ca śataṃ hatvā pāñcālānāṃ mahārathaḥ | tribhiśca niśitairbāṇairhatvā trīnvai mahārathān

उस महारथी ने सौ बाणों से पाञ्चालों के सौ योद्धाओं को मारकर और तीन तीखे बाणों से तीन महारथियों को मारकर—

श्लोक 54 (7.161.54)

द्रौणिर्द्रुपदपुत्रस्य फल्गुनस्य च पश्यतः । नाशयामास पाञ्चालान्भूयिष्ठं ये व्यवस्थिताः ॥

drauṇirdrupadaputrasya phalgunasya ca paśyataḥ | nāśayāmāsa pāñcālānbhūyiṣṭhaṃ ye vyavasthitāḥ

द्रुपदपुत्र और अर्जुन के देखते-देखते द्रोणपुत्र ने पाञ्चालों का संहार कर डाला, विशेषकर उनका जो डटे हुए थे।

श्लोक 55 (7.161.55)

ते वध्यमानाः पाञ्चालाः समरे सह सृञ्जयैः । अगच्छन्द्रौणिमुत्सृज्य विप्रकीर्णरथध्वजाः ॥

te vadhyamānāḥ pāñcālāḥ samare saha sṛñjayaiḥ | agacchandrauṇimutsṛjya viprakīrṇarathadhvajāḥ

रण में मारे जाते हुए पाञ्चाल सृञ्जयों सहित द्रोणपुत्र को छोड़कर चले गए; उनके रथ और ध्वज बिखर गए थे।

श्लोक 56 (7.161.56)

स जित्वा समरे शत्रून्द्रोणपुत्रो महारथः । ननाद सुमहानादं तपान्ते जलदो यथा ॥

sa jitvā samare śatrūndroṇaputro mahārathaḥ | nanāda sumahānādaṃ tapānte jalado yathā

रण में शत्रुओं को जीतकर महारथी द्रोणपुत्र ने ग्रीष्म के अन्त में बादल की तरह बड़ी भारी गर्जना की।

श्लोक 57 (7.161.57)

स निहत्य बहूञ्छूरानश्वत्थामा व्यरोचत । युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ॥

sa nihatya bahūñchūrānaśvatthāmā vyarocata | yugānte sarvabhūtāni bhasma kṛtveva pāvakaḥ

बहुत से शूरों को मारकर अश्वत्थामा युगान्त की अग्नि की तरह चमक उठा, जो सब प्राणियों को भस्म कर देती है।

श्लोक 58 (7.161.58)

सम्पूज्यमानो युधि कौरवेयै- । र्निर्जित्य सङ्ख्येऽरिगणान्सहस्रशः । व्यरोचत द्रोणसुतः प्रतापवा- । न्यथा सुरेन्द्रोऽरिगणान्निहत्य वै ॥

sampūjyamāno yudhi kauraveyai- | rnirjitya saṅkhye'rigaṇānsahasraśaḥ | vyarocata droṇasutaḥ pratāpavā- | nyathā surendro'rigaṇānnihatya vai

युद्ध में कौरवों से सम्मानित होता हुआ, रण में हज़ारों शत्रुदलों को जीतकर प्रतापी द्रोणपुत्र वैसे ही शोभित हुआ, जैसे शत्रु-समूहों को मारकर देवराज इन्द्र शोभित होते हैं।

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