द्रोण पर्व · अध्याय 46
अभिमन्यु द्वारा लक्ष्मण का वध
धृतराष्ट्र सौभद्र के पराक्रम पर विस्मय करते हैं और पूछते हैं कि उनके योद्धाओं ने उसका सामना कैसे किया। सञ्जय बताते हैं कि वे भय से भाग रहे थे, तब द्रोण आदि महारथियों ने उन्हें लौटाया; दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण अभिमन्यु पर टूटा और एक ही भल्ल से मारा गया, और दुर्योधन ने उसके वध का बदला लेने के लिए क्षत्रियों को पुकारा। छह महारथियों ने अभिमन्यु को घेर लिया, पर वह उन्हें चीरकर निकल गया, कलिंगों और निषादों की हाथी-सेना को बिखेर दिया और क्राथ के पुत्र को गिरा दिया, जिससे कौरव-वीर फिर विमुख हो गए।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.46.1)
यथा वदसि मे सूत एकस्य बहुभिः सह । सङ्ग्रामं तुमुलं घोरं जयं चैव महात्मनः ॥
yathā vadasi me sūta ekasya bahubhiḥ saha | saṅgrāmaṃ tumulaṃ ghoraṃ jayaṃ caiva mahātmanaḥ
सञ्जय, तुम जैसा बता रहे हो — एक का बहुतों के साथ वह तुमुल और भयंकर संग्राम और उस महात्मा की विजय —
श्लोक 2 (7.46.2)
अश्रद्धेयमिवाश्चर्यं सौभद्रस्याथ विक्रमम् । किन्तु नात्यद्भुतं तेषां येषां धर्मो व्यपाश्रयः ॥
aśraddheyamivāścaryaṃ saubhadrasyātha vikramam | kintu nātyadbhutaṃ teṣāṃ yeṣāṃ dharmo vyapāśrayaḥ
सौभद्र का वह पराक्रम अचरज की बात है, जिस पर विश्वास नहीं होता। फिर भी जिनका आश्रय धर्म है, उनके लिए यह अधिक अद्भुत नहीं।
श्लोक 3 (7.46.3)
दुर्योधने च विमुखे राजपुत्रशते हते । सौभद्रे प्रतिपत्तिं कां प्रत्यपद्यन्त मामकाः ॥
duryodhane ca vimukhe rājaputraśate hate | saubhadre pratipattiṃ kāṃ pratyapadyanta māmakāḥ
जब दुर्योधन विमुख हो गया और सौ राजकुमार मारे गए, तब मेरे योद्धाओं ने सौभद्र के विरुद्ध क्या उपाय किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (7.46.4)
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना रोमहर्षणाः । पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥
saṃśuṣkāsyāścalannetrāḥ prasvinnā romaharṣaṇāḥ | palāyanakṛtotsāhā nirutsāhā dviṣajjaye
सूखे मुँह, घूमती आँखों, पसीने से तर और रोमांचित शरीरों वाले वे योद्धा भागने पर उतारू थे और शत्रु पर विजय पाने का उत्साह खो चुके थे,
श्लोक 5 (7.46.5)
हतान्भ्रातॄन्पितॄन्पुत्रान्सुहृत्सम्बन्धिबान्धवान् । उत्सृज्योत्सृज्य सञ्जग्मुस्त्वरयन्तो हयद्विपान् ॥
hatānbhrātṝnpitṝnputrānsuhṛtsambandhibāndhavān | utsṛjyotsṛjya sañjagmustvarayanto hayadvipān
मारे गए भाइयों, पिताओं, पुत्रों, मित्रों, सम्बन्धियों और बन्धुओं को बार-बार छोड़कर वे घोड़ों और हाथियों को हाँकते हुए एक साथ भाग चले।
श्लोक 6 (7.46.6)
तान्प्रभग्नांस्तथा दृष्ट्वा द्रोणो द्रौणिर्बृहद्बलः । कृपो दुर्योधनः कर्णः कृतवर्माथ सौबलः ॥
tānprabhagnāṃstathā dṛṣṭvā droṇo drauṇirbṛhadbalaḥ | kṛpo duryodhanaḥ karṇaḥ kṛtavarmātha saubalaḥ
उन्हें इस प्रकार टूटा हुआ देखकर द्रोण, द्रौणि, बृहद्बल, कृप, दुर्योधन, कर्ण, कृतवर्मा और सौबल (शकुनि)
श्लोक 7 (7.46.7)
अभ्यधावन्सुसङ्क्रुद्धाः सौभद्रमपराजितम् । ते तु पौत्रेण ते राजन्प्रायशो विमुखीकृताः । सौभद्रेण महाराज शक्रप्रतिमतेजसा ॥
abhyadhāvansusaṅkruddhāḥ saubhadramaparājitam | te tu pautreṇa te rājanprāyaśo vimukhīkṛtāḥ | saubhadreṇa mahārāja śakrapratimatejasā
अपराजित सौभद्र पर बड़े क्रोध से टूट पड़े। परन्तु हे राजन्, आपके पौत्र ने उनमें से अधिकांश को विमुख कर दिया — हे महाराज, इन्द्र के समान तेजस्वी सौभद्र ने।
श्लोक 8 (7.46.8)
एकस्तु सुखसंवृद्धो बाल्याद्दर्पाच्च निर्भयः । इष्वस्त्रविन्महातेजा लक्ष्मणोऽर्जुनिमभ्ययात् ॥
ekastu sukhasaṃvṛddho bālyāddarpācca nirbhayaḥ | iṣvastravinmahātejā lakṣmaṇo'rjunimabhyayāt
किन्तु सुख में पला, बचपन और अभिमान से निर्भय, धनुर्विद्या और अस्त्रों का ज्ञाता, महातेजस्वी लक्ष्मण अर्जुन-पुत्र की ओर बढ़ा।
श्लोक 9 (7.46.9)
तमन्वगेवास्य पिता पुत्रगृद्धी न्यवर्तत । अनुदुर्योधनं चान्ये न्यवर्तन्त महारथाः ॥
tamanvagevāsya pitā putragṛddhī nyavartata | anuduryodhanaṃ cānye nyavartanta mahārathāḥ
पुत्र के मोह में पड़े उसके पिता उसके पीछे-पीछे लौट पड़े, और अन्य महारथी दुर्योधन के पीछे लौट आए।
श्लोक 10 (7.46.10)
तं तेऽभिषिषिचुर्बाणैर्मेघा गिरिमिवाम्बुभिः । स तु तान्प्रममाथैको विष्वग्वातो यथाम्बुदान् ॥
taṃ te'bhiṣiṣicurbāṇairmeghā girimivāmbubhiḥ | sa tu tānpramamāthaiko viṣvagvāto yathāmbudān
जैसे मेघ पर्वत पर जल बरसाते हैं, वैसे ही उन्होंने उस पर बाण बरसाए; परन्तु उसने अकेले ही उन्हें वैसे ही चूर कर दिया जैसे चारों ओर से चलने वाली वायु बादलों को।
श्लोक 11 (7.46.11)
पौत्रं तव च दुर्धर्षं लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् । पितुः समीपे तिष्ठन्तं शूरमुद्यतकार्मुकम् ॥
pautraṃ tava ca durdharṣaṃ lakṣmaṇaṃ priyadarśanam | pituḥ samīpe tiṣṭhantaṃ śūramudyatakārmukam
आपका पौत्र लक्ष्मण, जिसे सहना कठिन था, जो देखने में प्रिय था और धनुष उठाए अपने पिता के समीप खड़ा था —
श्लोक 12 (7.46.12)
अत्यन्तसुखसंवृद्धं धनेश्वरसुतोपमम् । आससाद रणे कार्ष्णिर्मत्तो मत्तमिव द्विपम् । सिंहशाबो वने शश्वत्पुण्डरीकशिशुं यथा ॥
atyantasukhasaṃvṛddhaṃ dhaneśvarasutopamam | āsasāda raṇe kārṣṇirmatto mattamiva dvipam | siṃhaśābo vane śaśvatpuṇḍarīkaśiśuṃ yathā
जो अत्यन्त सुख में पला था और कुबेर के पुत्र के समान था — अर्जुन के पुत्र ने रण में उस पर वैसे ही आक्रमण किया जैसे मतवाला हाथी मतवाले हाथी पर, अथवा जैसे वन में सिंह का बच्चा किसी पुण्डरीक हाथी के बच्चे पर।
श्लोक 13 (7.46.13)
लक्ष्मणेन तु सङ्गम्य सौभद्रः परवीरहा । शरैः सुनिशितैस्तीक्ष्णैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥
lakṣmaṇena tu saṅgamya saubhadraḥ paravīrahā | śaraiḥ suniśitaistīkṣṇairbāhvorurasi cārpayat
शत्रु-वीरों के संहारक सौभद्र ने लक्ष्मण से भिड़कर उसकी भुजाओं और छाती में तीखे, पैने बाण मारे।
श्लोक 14 (7.46.14)
सङ्क्रुद्धौ वै महाराज दण्डाहत इवोरगः । पौत्रस्तव महाराज तव पौत्रमभाषत ॥
saṅkruddhau vai mahārāja daṇḍāhata ivoragaḥ | pautrastava mahārāja tava pautramabhāṣata
हे महाराज, डण्डे से मारे गए सर्प के समान दोनों क्रुद्ध हो गए; आपके पौत्र ने आपके पौत्र से कहा।
अभिमन्युरुवाच
श्लोक 15 (7.46.15)
सुदृष्टः क्रियतां लोको ह्यमुं लोकं गमिष्यसि । पश्यतां बान्धवानां त्वां नयामि यमसादनम् ॥
sudṛṣṭaḥ kriyatāṃ loko hyamuṃ lokaṃ gamiṣyasi | paśyatāṃ bāndhavānāṃ tvāṃ nayāmi yamasādanam
"इस लोक को अच्छी तरह देख लो, क्योंकि तुम अब परलोक जाने वाले हो। तुम्हारे बन्धुओं के देखते-देखते मैं तुम्हें यमलोक पहुँचाता हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (7.46.16)
एवमुक्त्वा ततो भल्लं सौभद्रः परवीरहा । उद्बबर्ह महाबाहुर्निर्मुक्तोरगसन्निभम् ॥
evamuktvā tato bhallaṃ saubhadraḥ paravīrahā | udbabarha mahābāhurnirmuktoragasannibham
यह कहकर शत्रु-वीरों के संहारक महाबाहु सौभद्र ने केंचुली से निकले सर्प के समान दिखने वाला एक भल्ल खींच निकाला।
श्लोक 17 (7.46.17)
स तस्य भुजनिर्मुक्तो लक्ष्मणस्य सुदर्शनम् । सुनसं सुभ्रु केशान्तं शिरोऽहार्षीत्सकुण्डलम् ॥
sa tasya bhujanirmukto lakṣmaṇasya sudarśanam | sunasaṃ subhru keśāntaṃ śiro'hārṣītsakuṇḍalam
उसकी भुजा से छूटा वह बाण लक्ष्मण के सुन्दर मुख वाले, सुन्दर नाक और भौंहों वाले, केशों से घिरे और कुण्डल पहने सिर को काट ले गया।
श्लोक 18 (7.46.18)
पौत्रस्तु तव दुर्धर्षं लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् । पितुः समीपे तिष्ठन्तं प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
pautrastu tava durdharṣaṃ lakṣmaṇaṃ priyadarśanam | pituḥ samīpe tiṣṭhantaṃ prāhiṇodyamasādanam
आपके पौत्र ने दुर्धर्ष, प्रियदर्शन लक्ष्मण को, जो अपने पिता के समीप खड़ा था, यमलोक भेज दिया —
श्लोक 19 (7.46.19)
अत्यन्तसुखसंवृद्धं धनेश्वरसुतोपमम् । लक्ष्मणं निहतं दृष्ट्वा हाहेत्युच्चुक्रुशुर्जनाः ॥
atyantasukhasaṃvṛddhaṃ dhaneśvarasutopamam | lakṣmaṇaṃ nihataṃ dṛṣṭvā hāhetyuccukruśurjanāḥ
जो अत्यन्त सुख में पला था और कुबेर-पुत्र के समान था। लक्ष्मण को मारा गया देखकर लोग "हाय! हाय!" पुकार उठे।
श्लोक 20 (7.46.20)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धः प्रिये पुत्रे निपातिते । हतैनमिति चुक्रोश क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः ॥
tato duryodhanaḥ kruddhaḥ priye putre nipātite | hatainamiti cukrośa kṣatriyānkṣatriyarṣabhaḥ
तब अपने प्रिय पुत्र के गिराए जाने पर क्रुद्ध क्षत्रिय-श्रेष्ठ दुर्योधन ने क्षत्रियों को पुकारा — "इसे मार डालो!"
श्लोक 21 (7.46.21)
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रोणपुत्रो बृहद्बलः । कृतवर्मा च हार्दिक्यः षड्रथाः पर्यवारयन् ॥
tato droṇaḥ kṛpaḥ karṇo droṇaputro bṛhadbalaḥ | kṛtavarmā ca hārdikyaḥ ṣaḍrathāḥ paryavārayan
तब द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोणपुत्र, बृहद्बल और हार्दिक्य कृतवर्मा — इन छह रथियों ने उसे घेर लिया।
श्लोक 22 (7.46.22)
तांस्तु विद्ध्वा शितैर्बाणैर्विमुखीकृत्य चार्जुनिः । वेगेनाभ्यपतत्क्रुद्धः सैन्धवस्य महद्बलम् ॥
tāṃstu viddhvā śitairbāṇairvimukhīkṛtya cārjuniḥ | vegenābhyapatatkruddhaḥ saindhavasya mahadbalam
किन्तु अर्जुनि उन्हें तीखे बाणों से बींधकर और विमुख करके क्रोध से वेगपूर्वक सैन्धव की विशाल सेना पर जा गिरा।
श्लोक 23 (7.46.23)
आवव्रुस्तस्य पन्थानं गजानीकेन दंशिताः । कलिङ्गाश्च निषादाश्च क्राथपुत्रश्च वीर्यवान् । तत्प्रसक्तमिवात्यर्थं युद्धमासीद्विशाम्पते ॥
āvavrustasya panthānaṃ gajānīkena daṃśitāḥ | kaliṅgāśca niṣādāśca krāthaputraśca vīryavān | tatprasaktamivātyarthaṃ yuddhamāsīdviśāmpate
कवच पहने हाथियों की सेना ने उसका मार्ग रोक लिया — कलिंग, निषाद और वीर क्राथ-पुत्र — और हे प्रजापति, युद्ध अत्यन्त घोर हो उठा।
श्लोक 24 (7.46.24)
ततस्तत्कुञ्जरानीकं व्यधमद्धृष्टमार्जुनिः । यथा वायुर्नित्यगतिर्जलदाञ्शतशोऽम्बरे ॥
tatastatkuñjarānīkaṃ vyadhamaddhṛṣṭamārjuniḥ | yathā vāyurnityagatirjaladāñśataśo'mbare
तब अर्जुनि ने उस मदमत्त गज-सेना को वैसे ही तितर-बितर कर दिया जैसे नित्य गतिशील वायु आकाश में सैकड़ों बादलों को।
श्लोक 25 (7.46.25)
ततः क्रुद्धाः शरव्रातै राजानः समवारयन् । अथेतरे सन्निवृत्ताः पुनर्द्रोणमुखा रथाः । परमास्त्राणि धुन्वानाः सौभद्रमभिदुद्रुवुः ॥
tataḥ kruddhāḥ śaravrātai rājānaḥ samavārayan | athetare sannivṛttāḥ punardroṇamukhā rathāḥ | paramāstrāṇi dhunvānāḥ saubhadramabhidudruvuḥ
तब क्रुद्ध राजाओं ने बाणों की झड़ियों से उसे घेर लिया; और द्रोण को आगे करके दूसरे रथी फिर लौट आए और अपने श्रेष्ठ अस्त्र चमकाते हुए सौभद्र पर टूट पड़े।
श्लोक 26 (7.46.26)
तान्निवार्यार्जुनिर्बाणैः क्राथपुत्रमयोधयत् । शरौघेणाप्रमेयेण त्वरमाणो जिघांसया ॥
tānnivāryārjunirbāṇaiḥ krāthaputramayodhayat | śaraugheṇāprameyeṇa tvaramāṇo jighāṃsayā
उन्हें बाणों से रोककर अर्जुनि ने उसे मार डालने की इच्छा से त्वरापूर्वक अपरिमित बाण-वर्षा करते हुए क्राथ-पुत्र से युद्ध किया।
श्लोक 27 (7.46.27)
सधनुर्बाणकेयूरौ बाहू समुकुटं शिरः । सच्छत्रध्वजयन्तारं रथं चाश्वान्न्यपातयत् ॥
sadhanurbāṇakeyūrau bāhū samukuṭaṃ śiraḥ | sacchatradhvajayantāraṃ rathaṃ cāśvānnyapātayat
उसने उसकी धनुष, बाण और बाजूबन्द सहित दोनों भुजाएँ, मुकुट सहित सिर, तथा छत्र, ध्वज और सारथि सहित रथ और घोड़े गिरा दिए।
श्लोक 28 (7.46.28)
कुलशीलश्रुतिबलैः कीर्त्या चास्त्रबलेन च । युक्ते तस्मिन्हते वीराः प्रायशो विमुखाऽभवन् ॥
kulaśīlaśrutibalaiḥ kīrtyā cāstrabalena ca | yukte tasminhate vīrāḥ prāyaśo vimukhā'bhavan
कुल, शील, शास्त्र-ज्ञान और बल से, कीर्ति और अस्त्र-बल से सम्पन्न उसके मारे जाने पर अधिकांश वीर विमुख हो गए।