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द्रोण पर्व · अध्याय 48

द्रोण की सलाह पर कर्ण द्वारा अभिमन्यु का धनुष-भङ्ग

अभिमन्यु और कर्ण एक-दूसरे को घायल करते हैं, और सुभद्रापुत्र कर्ण के छह साथियों, अश्वकेतु तथा भोज मार्तिकावत को मार गिराता है। दौःशासनि, अश्वत्थामा और शल्य से बाण-विनिमय करने और पाँच अन्य योद्धाओं को मारने के बाद कौरव-सेनापति उसे मिलकर कुचलने का निश्चय करते हैं। द्रोण उसकी फुर्ती की प्रशंसा करते हुए कर्ण से कहते हैं कि उसका कवच अभेद्य है, पर धनुष, प्रत्यञ्चा, लगाम, घोड़े और पार्श्व-सारथियों पर प्रहार किया जा सकता है। कर्ण पीछे से उसका धनुष काट देता है, छहों महारथी उसका रथ नष्ट कर देते हैं, और अभिमन्यु तलवार-ढाल लेकर आकाश में उछलता है; अन्त में कर्ण उसकी ढाल भी चूर कर देता है और वह रथ का पहिया उठाकर द्रोण पर दौड़ पड़ता है।

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.48.1)

स कर्णं कर्णिना कर्णे पुनर्विव्याध फाल्गुनिः । शरैः पञ्चाशता चैनमविध्यत्कोपयन्भृशम् ॥

sa karṇaṃ karṇinā karṇe punarvivyādha phālguniḥ | śaraiḥ pañcāśatā cainamavidhyatkopayanbhṛśam

फाल्गुनि ने कर्ण के कान को फिर कर्णी बाण से बींधा, और पचास बाणों से भी उस पर प्रहार किया, जिससे वह अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा।

श्लोक 2 (7.48.2)

प्रतिविव्याध राधेयस्तावद्भिरथ तं पुनः । शरैराचितसर्वाङ्गो बह्वशोभत भारत ॥

prativivyādha rādheyastāvadbhiratha taṃ punaḥ | śarairācitasarvāṅgo bahvaśobhata bhārata

तब राधेय ने उतने ही बाणों से उसे फिर बींध दिया। हे भारत, बाणों से सारा शरीर बिंधा हुआ अभिमन्यु बड़ी शोभा से चमक उठा।

श्लोक 3 (7.48.3)

कर्णं चाप्यकरोत्क्रुद्धो रुधिरोत्पीडवाहिनम् । कर्णोऽपि विबभौ शूरः शरैश्छिन्नोऽसृगाप्लुतः । सन्ध्यानुगतपर्यन्तः शरदीव दिवाकरः ॥

karṇaṃ cāpyakarotkruddho rudhirotpīḍavāhinam | karṇo'pi vibabhau śūraḥ śaraiśchinno'sṛgāplutaḥ | sandhyānugataparyantaḥ śaradīva divākaraḥ

क्रोध में उसने कर्ण को भी रक्त की धार बहाने वाला बना दिया। और वीर कर्ण भी बाणों से कटा हुआ और रक्त से लथपथ होकर शोभित हुआ, जैसे शरद ऋतु का सूर्य, जिसके किनारों पर सन्ध्या की लाली छा गई हो।

श्लोक 4 (7.48.4)

तावुभौ शरचित्राङ्गौ रुधिरेण समुक्षितौ । बभूवतुर्महात्मानौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥

tāvubhau śaracitrāṅgau rudhireṇa samukṣitau | babhūvaturmahātmānau puṣpitāviva kiṃśukau

बाणों से चित्रित अङ्गों वाले और रक्त से भीगे हुए वे दोनों महात्मा खिले हुए दो किंशुक (पलाश) वृक्षों के समान दिखाई देने लगे।

श्लोक 5 (7.48.5)

अथ कर्णस्य सचिवान्षट् शूरांश्चित्रयोधिनः । साश्वसूतध्वजरथान्सौभद्रो निजघान ह ॥

atha karṇasya sacivānṣaṭ śūrāṃścitrayodhinaḥ | sāśvasūtadhvajarathānsaubhadro nijaghāna ha

तब सौभद्र ने कर्ण के छह विचित्र युद्ध करने वाले शूर साथियों को उनके घोड़ों, सारथियों, ध्वजों और रथों के सहित मार गिराया।

श्लोक 6 (7.48.6)

तथेतरान्महेष्वासान्दशभिर्दशभिः शरैः । प्रत्यविध्यदसम्भ्रान्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tathetarānmaheṣvāsāndaśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ | pratyavidhyadasambhrāntastadadbhutamivābhavat

फिर बिना घबराए उसने दूसरे महाधनुर्धरों को भी दस-दस बाणों से बींध दिया; और यह एक अद्भुत बात-सी हुई।

श्लोक 7 (7.48.7)

मागधस्य तथा पुत्रं हत्वा षड्भिरजिह्मगैः । साश्वं ससूतं तरुणमश्वकेतुमपातयत् ॥

māgadhasya tathā putraṃ hatvā ṣaḍbhirajihmagaiḥ | sāśvaṃ sasūtaṃ taruṇamaśvaketumapātayat

उसने छह सीधे जाने वाले बाणों से मगधराज के पुत्र तरुण अश्वकेतु को भी मारकर घोड़ों और सारथि के सहित गिरा दिया।

श्लोक 8 (7.48.8)

मार्तिकावतकं भोजं ततः कुञ्जरकेतनम् । क्षुरप्रेण समुन्मथ्य ननाद विसृजन्शरान् ॥

mārtikāvatakaṃ bhojaṃ tataḥ kuñjaraketanam | kṣurapreṇa samunmathya nanāda visṛjanśarān

फिर उसने क्षुरप्र बाण से हाथी के चिह्न की ध्वजा वाले भोज मार्तिकावत को कुचल डाला, और बाण छोड़ते हुए गर्जना की।

श्लोक 9 (7.48.9)

तस्य दौःशासनिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चतुरो हयान् । सूतमेकेन विव्याध दशभिश्चार्जुनात्मजम् ॥

tasya dauḥśāsanirviddhvā caturbhiścaturo hayān | sūtamekena vivyādha daśabhiścārjunātmajam

दौःशासनि ने चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को बींधकर एक बाण से सारथि को और दस बाणों से अर्जुनपुत्र को बींध दिया।

श्लोक 10 (7.48.10)

ततो दौःशासनिं कार्ष्णिर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । संरम्भाद्रक्तनयनो वाक्यमुच्चैरथाब्रवीत् ॥

tato dauḥśāsaniṃ kārṣṇirviddhvā saptabhirāśugaiḥ | saṃrambhādraktanayano vākyamuccairathābravīt

तब कार्ष्णि (अभिमन्यु) ने सात शीघ्रगामी बाणों से दौःशासनि को बींध दिया, और हे मान्यवर, क्रोध से लाल आँखें किए ऊँचे स्वर में बोला —

अभिमन्युरुवाच

श्लोक 11 (7.48.11)

पिता तवाहवं त्यक्त्वा गतः कापुरुषो यथा । दिष्ट्या त्वमपि जानीषे योद्धुं न त्वद्य मोक्ष्यसे ॥

pitā tavāhavaṃ tyaktvā gataḥ kāpuruṣo yathā | diṣṭyā tvamapi jānīṣe yoddhuṃ na tvadya mokṣyase

"तुम्हारे पिता तो कायर की तरह रणभूमि छोड़कर चले गए। सौभाग्य से तुम भी लड़ना जानते हो — पर आज तुम बच नहीं पाओगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (7.48.12)

एतावदुक्त्वा वचनं कर्मारपरिमार्जितम् । नाराचं विससर्जास्मै तं द्रौणिस्त्रिभिराच्छिनत् ॥

etāvaduktvā vacanaṃ karmāraparimārjitam | nārācaṃ visasarjāsmai taṃ drauṇistribhirācchinat

इतना कहकर उसने लोहार के हाथों चमकाया हुआ एक नाराच बाण उस पर छोड़ा; द्रोणपुत्र ने तीन बाणों से उसे काट डाला।

श्लोक 13 (7.48.13)

तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा शल्यं त्रिभिरताडयत् । तं शल्यो नवभिर्बाणैर्गार्ध्रपत्रैरताडयत् ॥

tasyārjunirdhvajaṃ chittvā śalyaṃ tribhiratāḍayat | taṃ śalyo navabhirbāṇairgārdhrapatrairatāḍayat

अर्जुनपुत्र ने शल्य की ध्वजा काटकर तीन बाणों से शल्य पर प्रहार किया; शल्य ने गीध के पंखों वाले नौ बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 14 (7.48.14)

हृद्यसम्भ्रान्तवद्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् । तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा हत्वोभौ पार्ष्णिसारथी ॥

hṛdyasambhrāntavadrājaṃstadadbhutamivābhavat | tasyārjunirdhvajaṃ chittvā hatvobhau pārṣṇisārathī

हे राजन्, मानो हृदय में ज़रा भी न घबराते हुए — यह अद्भुत बात थी — अर्जुनपुत्र ने उसकी ध्वजा काट दी और उसके दोनों पार्श्व-सारथियों को मार डाला।

श्लोक 15 (7.48.15)

तं विव्याधायसैः षड्भिः सोपाक्रामद्रथान्तरम् । शत्रुञ्जयं चन्द्रकेतुं मेघवेगं सुवर्चसम् ॥

taṃ vivyādhāyasaiḥ ṣaḍbhiḥ sopākrāmadrathāntaram | śatruñjayaṃ candraketuṃ meghavegaṃ suvarcasam

उसने छह लोहे के बाणों से शल्य को बींधा, और शल्य दूसरे रथ पर चला गया। फिर शत्रुञ्जय, चन्द्रकेतु, मेघवेग, सुवर्चा,

श्लोक 16 (7.48.16)

सूर्यभासं च पञ्चैतान्हत्वा विव्याध सौबलम् । तं सौबलस्त्रिभिर्विद्ध्वा दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥

sūryabhāsaṃ ca pañcaitānhatvā vivyādha saubalam | taṃ saubalastribhirviddhvā duryodhanamathābravīt

और सूर्यभास — इन पाँचों को मारकर उसने सौबल (शकुनि) को बींध दिया। सौबल ने तीन बाणों से उसे बींधकर दुर्योधन से कहा —

श्लोक 17 (7.48.17)

सर्व एनं विमथ्नीमः पुरैकैकं हिनस्ति नः । अथाब्रवीत्पुनर्द्रोणं कर्णो वैकर्तनो रणे ॥

sarva enaṃ vimathnīmaḥ puraikaikaṃ hinasti naḥ | athābravītpunardroṇaṃ karṇo vaikartano raṇe

"हम सब मिलकर इसे कुचल डालें; नहीं तो यह हमें एक-एक करके मार डालेगा।" फिर रणभूमि में वैकर्तन कर्ण ने द्रोण से फिर कहा —

श्लोक 18 (7.48.18)

पुरा सर्वान्प्रमथ्नाति ब्रूह्यस्य वधमाशु नः । ततो द्रोणो महेष्वासः सर्वांस्तान्प्रत्यभाषत ॥

purā sarvānpramathnāti brūhyasya vadhamāśu naḥ | tato droṇo maheṣvāsaḥ sarvāṃstānpratyabhāṣata

"इससे पहले कि यह हम सबको कुचल दे, शीघ्र बताइए कि इसका वध कैसे हो।" तब महाधनुर्धर द्रोण ने उन सबको उत्तर दिया —

द्रोण उवाच

श्लोक 19 (7.48.19)

अस्ति वाऽस्यान्तरं किञ्चित्कुमारस्याथ पश्यत । अन्वस्य पितरं चाद्य चरतः सर्वतो दिशम् ॥

asti vā'syāntaraṃ kiñcitkumārasyātha paśyata | anvasya pitaraṃ cādya carataḥ sarvato diśam

"देखो, इस कुमार में कोई छिद्र है या नहीं; क्योंकि आज वह अपने पिता के ही ढङ्ग से चारों दिशाओं में विचर रहा है।

श्लोक 20 (7.48.20)

शीघ्रतां नरसिंहस्य पाण्डवेयस्य पश्यत । धनुर्मण्डलमेवास्य रथमार्गेषु दृश्यते ॥

śīghratāṃ narasiṃhasya pāṇḍaveyasya paśyata | dhanurmaṇḍalamevāsya rathamārgeṣu dṛśyate

इस पाण्डव नरसिंह की शीघ्रता देखो: उसके रथ के मार्गों में केवल उसके धनुष का मण्डल ही दिखाई देता है,

श्लोक 21 (7.48.21)

संदधानस्य विशिखाञ्शीघ्रं चैव विमुञ्चतः । आरुजन्नपि मे प्राणान्मोहयन्नपि सायकैः ॥

saṃdadhānasya viśikhāñśīghraṃ caiva vimuñcataḥ | ārujannapi me prāṇānmohayannapi sāyakaiḥ

जब वह बाण चढ़ाता और शीघ्रता से छोड़ता है। मेरे प्राणों को पीड़ा देता और अपने बाणों से मुझे मोहित करता हुआ भी वह शत्रुवीरों का संहारक सौभद्र मुझे और अधिक हर्षित करता है।

श्लोक 22 (7.48.22)

प्रहर्षयति मां भूयः सौभद्रः परवीरहा । अतिमानं दधात्येष सौभद्रो विचरन्रणे ॥

praharṣayati māṃ bhūyaḥ saubhadraḥ paravīrahā | atimānaṃ dadhātyeṣa saubhadro vicaranraṇe

यह सौभद्र रणभूमि में विचरता हुआ बड़े गर्व से भरा दिखाई देता है —

श्लोक 23 (7.48.23)

अन्तरं यस्य संरब्धा न पश्यन्ति महारथाः । अस्यतो लघुहस्तस्य दिशः सर्वा महेषुभिः । न विशेषं प्रपश्यामि रणे गाण्डीवधन्वनः ॥

antaraṃ yasya saṃrabdhā na paśyanti mahārathāḥ | asyato laghuhastasya diśaḥ sarvā maheṣubhiḥ | na viśeṣaṃ prapaśyāmi raṇe gāṇḍīvadhanvanaḥ

वह, जिसमें क्रोध से भरे महारथी कोई छिद्र नहीं देख पाते। हलके हाथ से सब दिशाओं को बड़े-बड़े बाणों से भरते हुए उसे देखकर मैं रणभूमि में गाण्डीवधारी अर्जुन से उसका कोई भेद नहीं देख पाता।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 24 (7.48.24)

अथ कर्णः पुनर्द्रोणमाहार्जुनिशराहतः । स्थातव्यमिति तिष्ठामि पीड्यमानोऽभिमन्युना ॥

atha karṇaḥ punardroṇamāhārjuniśarāhataḥ | sthātavyamiti tiṣṭhāmi pīḍyamāno'bhimanyunā

तब अर्जुनपुत्र के बाणों से घायल कर्ण ने द्रोण से फिर कहा: "मैं केवल इसलिए डटा हूँ कि डटे रहना ही चाहिए, जबकि अभिमन्यु मुझे बहुत पीड़ा दे रहा है।

कर्ण उवाच

श्लोक 25 (7.48.25)

तेजस्विनः कुमारस्य शराः परमदारुणाः । क्षिण्वन्ति हृदयं मेऽद्य घोराः पावकतेजसः ॥

tejasvinaḥ kumārasya śarāḥ paramadāruṇāḥ | kṣiṇvanti hṛdayaṃ me'dya ghorāḥ pāvakatejasaḥ

इस तेजस्वी कुमार के बाण अत्यन्त भयानक हैं; वे घोर और अग्नि के समान तेजस्वी बाण आज मेरे हृदय को चीरे डालते हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 26 (7.48.26)

तमाचार्योऽब्रवीत्कर्णं शनकैः प्रहसन्निव । अभेद्यमस्य कवचं युवा चाशुपराक्रमः ॥

tamācāryo'bravītkarṇaṃ śanakaiḥ prahasanniva | abhedyamasya kavacaṃ yuvā cāśuparākramaḥ

आचार्य ने कुछ मुसकराते हुए धीरे से कर्ण से कहा: "इसका कवच अभेद्य है; यह युवा है और शीघ्र पराक्रम करने वाला है।

द्रोण उवाच

श्लोक 27 (7.48.27)

उपदिष्टा मया चास्य पितुः कवचधारणा । तामेष निखिलां वेत्ति ध्रुवं परपुरञ्जयः ॥

upadiṣṭā mayā cāsya pituḥ kavacadhāraṇā | tāmeṣa nikhilāṃ vetti dhruvaṃ parapurañjayaḥ

कवच धारण करने की विद्या मैंने इसके पिता को सिखाई थी, और शत्रुओं के नगर जीतने वाला यह निश्चय ही उस सबको पूरी तरह जानता है।

श्लोक 28 (7.48.28)

शक्यं त्वस्य धनुश्छेत्तुं ज्यां च बाणैः समाहितैः । अभीषूंश्च हयांश्चैव तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥

śakyaṃ tvasya dhanuśchettuṃ jyāṃ ca bāṇaiḥ samāhitaiḥ | abhīṣūṃśca hayāṃścaiva tathobhau pārṣṇisārathī

किन्तु सावधानी से चलाए गए बाणों से इसका धनुष और प्रत्यञ्चा काटी जा सकती है, और लगामें, घोड़े तथा दोनों पार्श्व-सारथि भी मारे जा सकते हैं।

श्लोक 29 (7.48.29)

एतत्कुरु महेष्वास राधेय यदि शक्यते । अथैनं विमुखीकृत्य पश्चात्प्रहरणं कुरु ॥

etatkuru maheṣvāsa rādheya yadi śakyate | athainaṃ vimukhīkṛtya paścātpraharaṇaṃ kuru

हे महाधनुर्धर राधेय, यदि हो सके तो यही करो: पहले इसे विमुख कर दो, फिर उस पर प्रहार करो।

श्लोक 30 (7.48.30)

सधनुष्को न शक्योऽयमपि जेतुं सुरासुरैः । विरथं विधनुष्कं च कुरुष्वैनं यदीच्छसि । पुनः स्थितेन केनापि दुःशको जेतुमार्जुनिः ॥

sadhanuṣko na śakyo'yamapi jetuṃ surāsuraiḥ | virathaṃ vidhanuṣkaṃ ca kuruṣvainaṃ yadīcchasi | punaḥ sthitena kenāpi duḥśako jetumārjuniḥ

जब तक उसके हाथ में धनुष है, देवता और असुर भी उसे नहीं जीत सकते। यदि चाहो तो उसे रथहीन और धनुषहीन कर दो। उसके बाद जो भी उसके सामने खड़ा हो, अर्जुनपुत्र को जीतना कठिन ही रहेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 31 (7.48.31)

तदाचार्यवचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनस्त्वरन् । अस्यतो लघुहस्तस्य पृष्ठतो धनुराच्छिनत् ॥

tadācāryavacaḥ śrutvā karṇo vaikartanastvaran | asyato laghuhastasya pṛṣṭhato dhanurācchinat

आचार्य की बात सुनकर वैकर्तन कर्ण ने शीघ्रता से, पीछे की ओर से, हलके हाथ से बाण चलाते हुए अभिमन्यु का धनुष काट दिया।

श्लोक 32 (7.48.32)

अश्वानस्यावधीद्द्रोणो गौतमः पार्ष्णिसारथी । शेषास्तु च्छिन्नधन्वानं शरवर्षैरवाकिरन् ॥

aśvānasyāvadhīddroṇo gautamaḥ pārṣṇisārathī | śeṣāstu cchinnadhanvānaṃ śaravarṣairavākiran

द्रोण ने उसके घोड़ों को मारा और गौतम (कृप) ने दोनों पार्श्व-सारथियों को; शेष योद्धाओं ने धनुषहीन हुए उसे बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 33 (7.48.33)

त्वरमाणास्त्वराकाले विरथं षण्महारथाः । शरवर्षैरकरुणा बालमेकमवाकिरन् ॥

tvaramāṇāstvarākāle virathaṃ ṣaṇmahārathāḥ | śaravarṣairakaruṇā bālamekamavākiran

उस शीघ्रता के समय छहों महारथियों ने, निर्दय होकर, अकेले रथहीन बालक पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 34 (7.48.34)

स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् । खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहायसा ॥

sa cchinnadhanvā virathaḥ svadharmamanupālayan | khaḍgacarmadharaḥ śrīmānutpapāta vihāyasā

धनुष कटा और रथहीन हुआ वह श्रीमान् अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करते हुए तलवार और ढाल लेकर आकाश में उछल पड़ा।

श्लोक 35 (7.48.35)

मार्गैः सकौशिकाद्यैश्च लाघवेन बलेन च । आर्जुनिर्व्यचरव्योम्नि भृशं वै पक्षिराडिव ॥

mārgaiḥ sakauśikādyaiśca lāghavena balena ca | ārjunirvyacaravyomni bhṛśaṃ vai pakṣirāḍiva

कौशिक आदि पैंतरों से, फुर्ती और बल के साथ, अर्जुनपुत्र पक्षिराज (गरुड़) की भाँति आकाश में विचरने लगा।

श्लोक 36 (7.48.36)

मय्येव निपतत्येष सासिरित्यूर्ध्वदृष्टयः । विव्यधुस्तं महेष्वासं समरे छिद्रदर्शिनः ॥

mayyeva nipatatyeṣa sāsirityūrdhvadṛṣṭayaḥ | vivyadhustaṃ maheṣvāsaṃ samare chidradarśinaḥ

"यह तलवार लिए मेरे ही ऊपर गिर रहा है" — ऐसा सोचकर ऊपर की ओर दृष्टि किए, छिद्र ढूँढते हुए उन्होंने रणभूमि में उस महाधनुर्धर को बींध दिया।

श्लोक 37 (7.48.37)

क्षुरप्रेण महातेजास्त्वरमाणः सपत्नजित् । राधेयो निशितैर्बाणैर्व्यधमच्चर्म चोत्तमम् ॥

kṣurapreṇa mahātejāstvaramāṇaḥ sapatnajit | rādheyo niśitairbāṇairvyadhamaccarma cottamam

महातेजस्वी, शत्रुओं को जीतने वाले राधेय ने शीघ्रता से क्षुरप्र बाण तथा तीखे बाणों से उसकी उत्तम ढाल को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 38 (7.48.38)

व्यसिचर्मेषुपूर्णाङ्गः सोऽन्तरिक्षात्पुनः क्षितिम् । आस्थितश्चक्रमुद्यम्य द्रोणं क्रुद्धोऽभ्यधावत ॥

vyasicarmeṣupūrṇāṅgaḥ so'ntarikṣātpunaḥ kṣitim | āsthitaścakramudyamya droṇaṃ kruddho'bhyadhāvata

तलवार और ढाल से रहित, बाणों से भरे शरीर वाला वह आकाश से फिर पृथ्वी पर आ गया, और एक पहिया उठाकर क्रोध में द्रोण पर दौड़ पड़ा।

श्लोक 39 (7.48.39)

स चक्ररेणूज्ज्वलशोभिताङ्गो । बभावतीवोज्ज्वलचक्रपाणिः । रणेऽभिमन्युः क्षणमास रौद्रः । स वासुदेवानुकृतिं प्रकुर्वन् ॥

sa cakrareṇūjjvalaśobhitāṅgo | babhāvatīvojjvalacakrapāṇiḥ | raṇe'bhimanyuḥ kṣaṇamāsa raudraḥ | sa vāsudevānukṛtiṃ prakurvan

पहिए की धूल से दीप्त और सुशोभित अङ्गों वाला, हाथ में चमकता पहिया लिए अभिमन्यु रणभूमि में क्षण भर के लिए ऐसा भयङ्कर दिखाई दिया, मानो वह वासुदेव का अनुकरण कर रहा हो।

श्लोक 40 (7.48.40)

स्रुतरुधिरकृतैकरागवस्त्रो । भ्रुकुटिपुटाकुलितोऽतिसिंहनादः । प्रभुरमितबलो रणेऽभिमन्युर् । नृपवरमध्यगतो भृशं व्यराजत् ॥

srutarudhirakṛtaikarāgavastro | bhrukuṭipuṭākulito'tisiṃhanādaḥ | prabhuramitabalo raṇe'bhimanyur | nṛpavaramadhyagato bhṛśaṃ vyarājat

बहते रक्त से एकसार लाल रंगे हुए वस्त्र वाला, भौंहें चढ़ाए, बड़े सिंहनाद करता हुआ, अपार बलशाली प्रभु अभिमन्यु रणभूमि में श्रेष्ठ राजाओं के बीच खड़ा अत्यन्त शोभित हुआ।

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