द्रोण पर्व · अध्याय 83
युधिष्ठिर की कृष्ण से विनती; कृष्ण का अर्जुन की विजय का आश्वासन
युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि रात सुख से बीती या नहीं; फिर द्वारपाल पाण्डव-पक्ष के प्रमुख जनों को भीतर लाता है और सब बैठ जाते हैं, कृष्ण और सात्यकि एक ही आसन पर। सबके सामने युधिष्ठिर कृष्ण से विनती करते हैं कि वे पाण्डवों को शोक-सागर से पार उतारने वाली नौका बनें, अर्जुन की प्रतिज्ञा सच करें, और विष्णु के नामों से उनकी स्तुति करते हैं। कृष्ण उत्तर देते हैं कि अर्जुन के समान धनुर्धर किसी लोक में नहीं है, वे स्वयं भी सहायता करेंगे, और अर्जुन आज ही सैन्धव को मारकर लौटेंगे; इसलिए राजा शोक छोड़ दें।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (7.83.1)
सुखेन रजनी व्युष्टा कच्चित्ते मधुसूदन । कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ॥
sukhena rajanī vyuṣṭā kaccitte madhusūdana | kaccijjñānāni sarvāṇi prasannāni tavācyuta
हे मधुसूदन, आपकी रात सुख से बीती न? हे अच्युत, आपकी सभी ज्ञान-शक्तियाँ प्रसन्न और निर्मल तो हैं न?
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (7.83.2)
वासुदेवोऽपि तद्युक्तं प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् । दर्शनादेव ते सौम्य न किञ्चिदशुभं मम ॥
vāsudevo'pi tadyuktaṃ pratyuvāca yudhiṣṭhiram | darśanādeva te saumya na kiñcidaśubhaṃ mama
वासुदेव ने भी युधिष्ठिर को यथोचित उत्तर दिया — "हे सौम्य, आपके दर्शन मात्र से मेरे लिए कुछ भी अशुभ नहीं है।"
श्लोक 3 (7.83.3)
ततश्च प्रकृतीः क्षत्ता न्यवेदयदुपस्थिताः । अनुज्ञातश्च राज्ञा स प्रावेशयत तं जनम् ॥
tataśca prakṛtīḥ kṣattā nyavedayadupasthitāḥ | anujñātaśca rājñā sa prāveśayata taṃ janam
तब द्वारपाल ने उपस्थित प्रमुख जनों की सूचना दी, और राजा की अनुमति पाकर उन लोगों को भीतर बुलाया —
श्लोक 4 (7.83.4)
विराटं भीमसेनं च धृष्टद्युम्नं च सात्यकिम् । चेदिपं धृष्टकेतुं च द्रुपदं च महारथम् ॥
virāṭaṃ bhīmasenaṃ ca dhṛṣṭadyumnaṃ ca sātyakim | cedipaṃ dhṛṣṭaketuṃ ca drupadaṃ ca mahāratham
विराट, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, सात्यकि, चेदिराज धृष्टकेतु और महारथी द्रुपद,
श्लोक 5 (7.83.5)
शिखण्डिनं यमौ चैव चेकितानं सकेकयम् । युयुप्सुं चैव कौरव्यं पाञ्चाल्यं चोत्तमौजसम् ॥
śikhaṇḍinaṃ yamau caiva cekitānaṃ sakekayam | yuyupsuṃ caiva kauravyaṃ pāñcālyaṃ cottamaujasam
शिखण्डी, दोनों जुड़वाँ भाई नकुल और सहदेव, केकय के साथ चेकितान, कुरुवंशी युयुत्सु और पाञ्चाल उत्तमौजा,
श्लोक 6 (7.83.6)
युधामन्यु सुबाहुं च द्रौपदेयांश्च सर्वशः । एतांश्च सुहृदश्चान्यान्दर्शयामास पाण्डवम् ॥
yudhāmanyu subāhuṃ ca draupadeyāṃśca sarvaśaḥ | etāṃśca suhṛdaścānyāndarśayāmāsa pāṇḍavam
युधामन्यु, सुबाहु और द्रौपदी के सभी पुत्र — इन सबको तथा और भी सुहृदों को उसने पाण्डव (युधिष्ठिर) के सामने उपस्थित किया।
श्लोक 7 (7.83.7)
अनुज्ञाताश्च पार्थेन स्वासीना आसनेषु ते । सर्वेष्वथ परार्ध्येषु यथार्हं वन्द्य पाण्डवम् ॥
anujñātāśca pārthena svāsīnā āsaneṣu te | sarveṣvatha parārdhyeṣu yathārhaṃ vandya pāṇḍavam
पार्थ की अनुज्ञा पाकर वे सब पाण्डव को प्रणाम करके यथायोग्य सब बहुमूल्य आसनों पर सुखपूर्वक बैठ गए।
श्लोक 8 (7.83.8)
एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महाबलौ । कृष्णश्च युयुधानश्च वेद्यामिव हुताशनौ ॥
ekasminnāsane vīrāvupaviṣṭau mahābalau | kṛṣṇaśca yuyudhānaśca vedyāmiva hutāśanau
एक ही आसन पर वे दोनों महाबली वीर, कृष्ण और सात्यकि, वेदी पर दो अग्नियों के समान बैठे।
श्लोक 9 (7.83.9)
ततो युधिष्ठिरस्तेषां शृण्वतां मधुसूदनम् । अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षमाभाष्य मधुरं वचः ॥
tato yudhiṣṭhirasteṣāṃ śṛṇvatāṃ madhusūdanam | abravītpuṇḍarīkākṣamābhāṣya madhuraṃ vacaḥ
तब सबके सुनते हुए युधिष्ठिर ने कमलनयन मधुसूदन को सम्बोधित करके मधुर वचन कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (7.83.10)
एकं त्वां वयमाश्रित्य सहस्राक्षमिवामराः । प्रार्थयामो जयं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च ॥
ekaṃ tvāṃ vayamāśritya sahasrākṣamivāmarāḥ | prārthayāmo jayaṃ yuddhe śāśvatāni sukhāni ca
जैसे देवता सहस्राक्ष इन्द्र का आश्रय लेते हैं, वैसे ही हम केवल आपका आश्रय लेकर युद्ध में विजय और शाश्वत सुखों की कामना करते हैं।
श्लोक 11 (7.83.11)
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रियाम् । क्लेशांश्च विविधान्कृष्ण सर्वांस्तानपि वेत्थ नः ॥
tvaṃ hi rājyavināśaṃ ca dviṣadbhiśca nirākriyām | kleśāṃśca vividhānkṛṣṇa sarvāṃstānapi vettha naḥ
हे कृष्ण, आप हमारे राज्य के नाश को, शत्रुओं द्वारा हमें निकाल दिए जाने को और हमारे सब नाना प्रकार के क्लेशों को जानते हैं।
श्लोक 12 (7.83.12)
त्वयि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल । सुखमायत्तमत्यर्थं यात्रा च मधुसूदन ॥
tvayi sarveśa sarveṣāmasmākaṃ bhaktavatsala | sukhamāyattamatyarthaṃ yātrā ca madhusūdana
हे सर्वेश्वर, हे भक्तवत्सल मधुसूदन, हम सबका सुख और हमारा जीवन-निर्वाह भी पूर्णतः आप पर ही निर्भर है।
श्लोक 13 (7.83.13)
स तथा कुरु वार्ष्णेय यथा त्वयि मनो मम । अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्याच्चिकीर्षिता ॥
sa tathā kuru vārṣṇeya yathā tvayi mano mama | arjunasya yathā satyā pratijñā syāccikīrṣitā
इसलिए हे वार्ष्णेय, आप वैसा कीजिए कि मेरा मन आप पर टिका रहे और अर्जुन की जो प्रतिज्ञा है, वह सत्य हो।
श्लोक 14 (7.83.14)
स भवांस्तारयत्वस्माद्दुःखामर्षमहार्णवात् । परां तितीर्षतामद्य प्लुवो नो भव माधव ॥
sa bhavāṃstārayatvasmādduḥkhāmarṣamahārṇavāt | parāṃ titīrṣatāmadya pluvo no bhava mādhava
आप हमें दुःख और क्रोध के इस महासागर से पार उतारिए; हे माधव, पार जाने की इच्छा करने वाले हम लोगों के लिए आज नौका बन जाइए।
श्लोक 15 (7.83.15)
नहि तत्कुरुते योधः कार्तवीर्यसमोऽपि यः । युधि यत्कुरुषे कृष्ण सारथ्यं त्वं समास्थितः ॥
nahi tatkurute yodhaḥ kārtavīryasamo'pi yaḥ | yudhi yatkuruṣe kṛṣṇa sārathyaṃ tvaṃ samāsthitaḥ
हे कृष्ण, कार्तवीर्य के समान योद्धा भी युद्ध में वह नहीं कर पाता जो आप सारथि का कार्य सँभालकर करते हैं।
श्लोक 16 (7.83.16)
यथैव सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीञ्जनार्दन । तथैवास्मान्महाबाहो वृजिनात्त्रातुमर्हसि ॥
yathaiva sarvāsvāpatsu pāsi vṛṣṇīñjanārdana | tathaivāsmānmahābāho vṛjināttrātumarhasi
हे जनार्दन, जैसे आप सब विपत्तियों में वृष्णियों की रक्षा करते हैं, वैसे ही हे महाबाहो, आपको हमें भी इस संकट से बचाना चाहिए।
श्लोक 17 (7.83.17)
त्वमगाधेऽप्लवे मग्नान्पाण्डवान्कुरुसागरे । समुद्धर प्लुवो भूत्वा शङ्खचक्रगदाधर ॥
tvamagādhe'plave magnānpāṇḍavānkurusāgare | samuddhara pluvo bhūtvā śaṅkhacakragadādhara
हे शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, कुरुओं के इस अथाह, नौकाहीन सागर में डूबे हुए पाण्डवों को नौका बनकर उबार लीजिए।
श्लोक 18 (7.83.18)
नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥
namaste devadeveśa sanātana viśātana | viṣṇo jiṣṇo hare kṛṣṇa vaikuṇṭha puruṣottama
हे देवों के देव, हे सनातन, हे संहारक, आपको नमस्कार! हे विष्णु, जिष्णु, हरि, कृष्ण, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम!
श्लोक 19 (7.83.19)
नारदस्त्वां समाचख्यौ पुराणमृषिसत्तमम् । वरदं शार्ङ्गिणं श्रेष्ठं तत्सत्यं कुरु माधव ॥
nāradastvāṃ samācakhyau purāṇamṛṣisattamam | varadaṃ śārṅgiṇaṃ śreṣṭhaṃ tatsatyaṃ kuru mādhava
नारद ने आपको पुराणपुरुष, ऋषिश्रेष्ठ, वरदाता, शार्ङ्गधारी और सर्वश्रेष्ठ बताया है; हे माधव, उसे सत्य कीजिए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (7.83.20)
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो धर्मराजेन संसदि । तोयमेघस्वनो वाग्मी प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥
ityuktaḥ puṇḍarīkākṣo dharmarājena saṃsadi | toyameghasvano vāgmī pratyuvāca yudhiṣṭhiram
सभा में धर्मराज के ऐसा कहने पर मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले, वाक्पटु कमलनयन कृष्ण ने युधिष्ठिर को उत्तर दिया —
वासुदेव उवाच
श्लोक 21 (7.83.21)
सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविधः । शरासनधरः कश्चिद्यथा पार्थो धनञ्जयः ॥
sāmareṣvapi lokeṣu sarveṣu na tathāvidhaḥ | śarāsanadharaḥ kaścidyathā pārtho dhanañjayaḥ
देवताओं सहित सभी लोकों में पार्थ धनंजय के समान धनुर्धर कोई नहीं है।
श्लोक 22 (7.83.22)
वीर्यवानस्त्रसम्पन्नः पराक्रान्तो महाबलः । युद्धशौण्डः सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम् ॥
vīryavānastrasampannaḥ parākrānto mahābalaḥ | yuddhaśauṇḍaḥ sadāmarṣī tejasā paramo nṛṇām
वह पराक्रमी है, अस्त्रों से सम्पन्न है, साहसी और महाबली है; युद्ध का शौकीन है, अपमान सहन न करने वाला है और तेज में मनुष्यों में सर्वोपरि है।
श्लोक 23 (7.83.23)
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घबाहुर्महाबलः । सिंहर्षभगतिः श्रीमान्द्विषतस्ते हनिष्यति ॥
sa yuvā vṛṣabhaskandho dīrghabāhurmahābalaḥ | siṃharṣabhagatiḥ śrīmāndviṣataste haniṣyati
वह तरुण है, उसके कन्धे बैल जैसे हैं, भुजाएँ लम्बी हैं और बल महान् है; सिंह और वृषभ जैसी चाल वाला वह श्रीमान् तुम्हारे शत्रुओं को मारेगा।
श्लोक 24 (7.83.24)
अहं च तत्करिष्यामि तथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः । धार्तराष्ट्रस्य सैन्यानि धक्ष्यत्यग्निरिवेन्धनम् ॥
ahaṃ ca tatkariṣyāmi tathā kuntīsuto'rjunaḥ | dhārtarāṣṭrasya sainyāni dhakṣyatyagnirivendhanam
मैं भी वही करूँगा, और कुन्तीपुत्र अर्जुन भी करेगा; वह धृतराष्ट्र के पुत्र की सेनाओं को अग्नि जैसे ईंधन को जलाती है, वैसे जला डालेगा।
श्लोक 25 (7.83.25)
अद्य तं पापकर्माणं क्षुद्रं सौभद्रघातिनम् । अपुनर्दर्शनं मार्गमिषुभिः क्षेप्स्यतेऽर्जुनः ॥
adya taṃ pāpakarmāṇaṃ kṣudraṃ saubhadraghātinam | apunardarśanaṃ mārgamiṣubhiḥ kṣepsyate'rjunaḥ
आज अर्जुन अपने बाणों से सुभद्रा-पुत्र के उस घातक, उस पापी और नीच को उस मार्ग पर भेज देगा जहाँ से कोई फिर दिखाई नहीं देता।
श्लोक 26 (7.83.26)
तस्याद्य गृध्राः श्येनाश्च चण्डगोमायवस्तथा । भक्षयिष्यन्ति मांसानि ये चान्ये पुरुषादकाः ॥
tasyādya gṛdhrāḥ śyenāśca caṇḍagomāyavastathā | bhakṣayiṣyanti māṃsāni ye cānye puruṣādakāḥ
आज गिद्ध, बाज, भयंकर सियार और अन्य मांसभक्षी जीव उसका मांस खाएँगे।
श्लोक 27 (7.83.27)
यद्यस्य देवा गोप्तारः सेन्द्राः सर्वे तथाऽप्यसौ । राजधानीं यमस्याद्य हतः प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥
yadyasya devā goptāraḥ sendrāḥ sarve tathā'pyasau | rājadhānīṃ yamasyādya hataḥ prāpsyati durmatiḥ
यदि इन्द्र सहित सब देवता भी उसके रक्षक हों, तब भी वह दुर्बुद्धि आज मारा जाकर यम की राजधानी पहुँचेगा।
श्लोक 28 (7.83.28)
निहत्य सैन्धवं जिष्णुरद्य त्वामुपयास्यति । विशोको विज्वरो राजन्भव शान्ति पुरस्कृतः ॥
nihatya saindhavaṃ jiṣṇuradya tvāmupayāsyati | viśoko vijvaro rājanbhava śānti puraskṛtaḥ
जिष्णु सैन्धव को मारकर आज आपके पास आएँगे। हे राजन्, शोक और सन्ताप से मुक्त हो जाइए और शान्त रहिए।