द्रोण पर्व · अध्याय 96
द्रोण की व्यूह-पंक्ति पर राजाओं के द्वन्द्वयुद्ध
संजय चौदहवें दिन के युद्ध का वर्णन करते हैं, जब पाण्डव द्रोण की व्यूह-पंक्ति पर दबाव डालते हैं और कौरव उसकी रक्षा करते हैं। योद्धा द्वन्द्वयुद्धों में भिड़ते हैं — विन्द और अनुविन्द विराट से, बाह्लीक याज्ञसेनि से, दुःशासन सात्यकि से, अलम्बुष कुन्तिभोज से, माद्री के पुत्र शकुनि से, घटोत्कच अलायुध से, युधिष्ठिर शल्य से, और भीमसेन विविंशति, चित्रसेन तथा विकर्ण से।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.96.1)
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं शृणु कीर्तयतो मम । कुरूणां पाण्डवानां च यथा युद्धमवर्तत ॥
rājansaṅgrāmamāścaryaṃ śṛṇu kīrtayato mama | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yathā yuddhamavartata
हे राजन्, सुनिए — कौरवों और पाण्डवों के बीच जैसा आश्चर्यजनक युद्ध हुआ, वह मैं कहता हूँ।
श्लोक 2 (7.96.2)
भारद्वाजं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् । अयोधयन्रणे पार्था द्रोणानीकं बिभित्सवः ॥
bhāradvājaṃ samāsādya vyūhasya pramukhe sthitam | ayodhayanraṇe pārthā droṇānīkaṃ bibhitsavaḥ
व्यूह के अग्रभाग में खड़े भरद्वाजपुत्र द्रोण के पास पहुँचकर पार्थ उनकी सेना को तोड़ने की इच्छा से युद्ध में उनसे लड़ने लगे।
श्लोक 3 (7.96.3)
रक्षमाणः स्वकं व्यूहं द्रोणोऽपि सह सैनिकैः । अयोधयद्रणे पार्थान्प्रार्थयानो महद्यशः ॥
rakṣamāṇaḥ svakaṃ vyūhaṃ droṇo'pi saha sainikaiḥ | ayodhayadraṇe pārthānprārthayāno mahadyaśaḥ
द्रोण भी अपने सैनिकों के साथ अपने व्यूह की रक्षा करते हुए महान् यश की कामना से युद्ध में पार्थों से लड़े।
श्लोक 4 (7.96.4)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं दशभिः शरैः । आजघ्नतुः सुसङ्क्रुद्धौ तव पुत्रहितैषिणौ ॥
vindānuvindāvāvantyau virāṭaṃ daśabhiḥ śaraiḥ | ājaghnatuḥ susaṅkruddhau tava putrahitaiṣiṇau
अवन्ति के विन्द और अनुविन्द ने, अत्यन्त क्रुद्ध होकर और आपके पुत्रों का हित चाहते हुए, विराट पर दस बाण छोड़कर प्रहार किया।
श्लोक 5 (7.96.5)
विराटश्च महाराज तावुभौ समरे स्थितौ । पराक्रान्तौ पराक्रम्य योधयामास सानुगौ ॥
virāṭaśca mahārāja tāvubhau samare sthitau | parākrāntau parākramya yodhayāmāsa sānugau
और हे महाराज, विराट युद्ध में उन दोनों के सामने डटे रहे, और उन दोनों पराक्रमी वीरों से उनके अनुचरों सहित पराक्रम के साथ लड़े।
श्लोक 6 (7.96.6)
तेषां युद्धं समभवद्दारुणं शोणितोदकम् । सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ॥
teṣāṃ yuddhaṃ samabhavaddāruṇaṃ śoṇitodakam | siṃhasya dvipamukhyābhyāṃ prabhinnābhyāṃ yathā vane
उनके बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें रक्त ही जल था — जैसे वन में एक सिंह का मदमस्त दो श्रेष्ठ हाथियों के साथ युद्ध हो।
श्लोक 7 (7.96.7)
बाह्लीकं रभसं युद्धे याज्ञसेनिर्महाबलः । आजघ्ने विशिखैस्तीक्ष्णैर्घोरैर्मर्मास्थिभेदिभिः ॥
bāhlīkaṃ rabhasaṃ yuddhe yājñasenirmahābalaḥ | ājaghne viśikhaistīkṣṇairghorairmarmāsthibhedibhiḥ
यज्ञसेन के महाबली पुत्र ने वेगवान् बाह्लीक को युद्ध में मर्म और हड्डियों को भेदने वाले तीखे, भयंकर बाणों से घायल किया।
श्लोक 8 (7.96.8)
बाह्लीको याज्ञसेनिं तु हेमपुङ्खैः शिलाशितैः । आजघान भृशं क्रुद्धो नवभिर्नतपर्वभिः ॥
bāhlīko yājñaseniṃ tu hemapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | ājaghāna bhṛśaṃ kruddho navabhirnataparvabhiḥ
बाह्लीक ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर सोने के पंखों वाले, सान पर तेज किए हुए नौ झुकी गाँठों वाले बाणों से याज्ञसेनि पर कठोर प्रहार किया।
श्लोक 9 (7.96.9)
तद्युद्धमभवद्धोरं शरशक्तिसमाकुलम् । भीरूणां त्रासजननं शूराणां हर्षवर्धनम् ॥
tadyuddhamabhavaddhoraṃ śaraśaktisamākulam | bhīrūṇāṃ trāsajananaṃ śūrāṇāṃ harṣavardhanam
वह युद्ध बाणों और शक्तियों से ठसाठस भरा, भयंकर हो उठा; वह डरपोकों में त्रास उत्पन्न करता और शूरों का हर्ष बढ़ाता था।
श्लोक 10 (7.96.10)
ताभ्यां तत्र शरैर्मुक्तैरन्तरिक्षं दिशस्तथा । अभवत्संवृतं सर्वं न प्राज्ञायत किञ्चन ॥
tābhyāṃ tatra śarairmuktairantarikṣaṃ diśastathā | abhavatsaṃvṛtaṃ sarvaṃ na prājñāyata kiñcana
उन दोनों के छोड़े हुए बाणों से आकाश और सारी दिशाएँ ढक गईं, और कुछ भी पहचाना नहीं जा रहा था।
श्लोक 11 (7.96.11)
शैब्यो गोवासनो युद्धे काश्यपुत्रं महारथम् । ससैन्यो योधयामास गजः प्रतिगजं यथा ॥
śaibyo govāsano yuddhe kāśyaputraṃ mahāratham | sasainyo yodhayāmāsa gajaḥ pratigajaṃ yathā
शिबि-देश के राजा गोवासन ने अपनी सेना के साथ काश्य के पुत्र, उस महारथी से युद्ध में उसी प्रकार संग्राम किया, जैसे एक हाथी दूसरे हाथी से लड़ता है।
श्लोक 12 (7.96.12)
बाह्लीकराजः सङ्क्रुद्धो द्रौपदेयान्महारथान् । मनः पञ्चेन्द्रियाणीव शुशुभे योधयन्रणे ॥
bāhlīkarājaḥ saṅkruddho draupadeyānmahārathān | manaḥ pañcendriyāṇīva śuśubhe yodhayanraṇe
बाह्लीकराज ने क्रोध में भरकर द्रौपदी के पुत्र महारथियों से युद्ध करते हुए रणभूमि में उसी प्रकार शोभा पाई, जैसे पाँच इन्द्रियों के बीच मन शोभित होता है।
श्लोक 13 (7.96.13)
अयोधयंस्ते सुभृशं तं शरौघैः समन्ततः । इन्द्रियाणि यथा देहं शश्वद्देहवतां वर ॥
ayodhayaṃste subhṛśaṃ taṃ śaraughaiḥ samantataḥ | indriyāṇi yathā dehaṃ śaśvaddehavatāṃ vara
हे देहधारियों में श्रेष्ठ, उन्होंने उस पर चारों ओर से बाणों की बौछार करके उसे वैसे ही कसकर घेर लिया, जैसे इन्द्रियाँ सदा देह को घेरे रहती हैं।
श्लोक 14 (7.96.14)
वार्ष्णेयं सात्यकिं युद्धे पुत्रो दुःशासनस्तव । आजघ्ने सायकैस्तीक्ष्णैर्नवभिर्नतपर्वभिः ॥
vārṣṇeyaṃ sātyakiṃ yuddhe putro duḥśāsanastava | ājaghne sāyakaistīkṣṇairnavabhirnataparvabhiḥ
आपके पुत्र दुःशासन ने वृष्णिवंशी सात्यकि को युद्ध में झुकी गाँठों वाले नौ तीखे बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 15 (7.96.15)
सोऽतिविद्धो बलवता महेष्वासेन धन्विना । ईषन्मूर्च्छां जगामाशु सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥
so'tividdho balavatā maheṣvāsena dhanvinā | īṣanmūrcchāṃ jagāmāśu sātyakiḥ satyavikramaḥ
उस बलवान् महाधनुर्धर के प्रहार से गहरे बिंधकर सत्यपराक्रमी सात्यकि क्षण-भर के लिए मूर्छित-से हो गए।
श्लोक 16 (7.96.16)
समाश्वस्तस्तु वार्ष्णेयस्तव पुत्रं महारथम् । विव्याध दशभिस्तूर्णं सायकैः कङ्कपत्रिभिः ॥
samāśvastastu vārṣṇeyastava putraṃ mahāratham | vivyādha daśabhistūrṇaṃ sāyakaiḥ kaṅkapatribhiḥ
होश सँभालकर वृष्णिवंशी सात्यकि ने कंक पक्षी के पंखों वाले दस बाणों से आपके महारथी पुत्र को तुरंत बेध दिया।
श्लोक 17 (7.96.17)
तावन्योन्यं दृढं विद्धावन्योन्यशरपीडितौ । रजेतुः समरे राजन्पुष्पिताविव किंशुकौ ॥
tāvanyonyaṃ dṛḍhaṃ viddhāvanyonyaśarapīḍitau | rajetuḥ samare rājanpuṣpitāviva kiṃśukau
एक-दूसरे के बाणों से गहरे बिंधे और पीड़ित वे दोनों रणभूमि में, हे राजन्, खिले हुए दो किंशुक वृक्षों के समान शोभित हुए।
श्लोक 18 (7.96.18)
अलम्बुसस्तु सङ्क्रुद्धः कृन्तिभोजशरार्दितः । अशोभत भृशं लक्ष्म्या पुष्पाढ्य इव किंशुकः ॥
alambusastu saṅkruddhaḥ kṛntibhojaśarārditaḥ | aśobhata bhṛśaṃ lakṣmyā puṣpāḍhya iva kiṃśukaḥ
कुन्तिभोज के बाणों से पीड़ित क्रुद्ध अलम्बुस फूलों से लदे किंशुक वृक्ष के समान अत्यन्त शोभित हुआ।
श्लोक 19 (7.96.19)
कुन्तिभोजं ततो रक्षो विद्ध्वा बहुभिरायसैः । अनदद्भैरवं नादं वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥
kuntibhojaṃ tato rakṣo viddhvā bahubhirāyasaiḥ | anadadbhairavaṃ nādaṃ vāhinyāḥ pramukhe tava
तब राक्षस अलम्बुस ने कुन्तिभोज को लोहे के अनेक बाणों से बेधकर आपकी सेना के अग्रभाग में भयानक गर्जना की।
श्लोक 20 (7.96.20)
ततस्तौ समरे शूरौ योधयन्तौ परस्परम् । ददृशुः सर्वसैन्यानि शक्रजम्भौ यथा पुरा ॥
tatastau samare śūrau yodhayantau parasparam | dadṛśuḥ sarvasainyāni śakrajambhau yathā purā
रणभूमि में एक-दूसरे से लड़ते उन दोनों वीरों को सारी सेनाओं ने वैसे ही देखा, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र और जम्भ को देखा गया था।
श्लोक 21 (7.96.21)
शकुनिं रभसं युद्धे कृतवैरं च भारत । माद्रीपुत्रौ च संरब्धौ शरैश्चार्दयतां भृशम् ॥
śakuniṃ rabhasaṃ yuddhe kṛtavairaṃ ca bhārata | mādrīputrau ca saṃrabdhau śaraiścārdayatāṃ bhṛśam
हे भारत, माद्री के दोनों पुत्रों ने क्रोध में भरकर बाणों से शकुनि को बहुत पीड़ित किया — वही शकुनि, जो युद्ध में वेगवान् था और जिसने उनसे वैर बाँध रखा था।
श्लोक 22 (7.96.22)
तुमुलः स महान्राजन्प्रावर्तत जनक्षयः । त्वया सञ्जनितोऽत्यर्थं कर्णेन च विवर्धितः ॥
tumulaḥ sa mahānrājanprāvartata janakṣayaḥ | tvayā sañjanito'tyarthaṃ karṇena ca vivardhitaḥ
हे राजन्, तब मनुष्यों का भयंकर और विशाल संहार आरम्भ हुआ — जिसे आपने उत्पन्न किया और कर्ण ने बढ़ाया था।
श्लोक 23 (7.96.23)
रक्षितस्तव पुत्रैश्च क्रोधमूलो हुताशनः । य इमां पृथिवीं राजन्दग्धुं सर्वां समुद्यतः ॥
rakṣitastava putraiśca krodhamūlo hutāśanaḥ | ya imāṃ pṛthivīṃ rājandagdhuṃ sarvāṃ samudyataḥ
आपके पुत्रों ने उसे बनाए रखा — क्रोध ही जिसकी जड़ है, वह अग्नि, जो हे राजन्, इस सारी पृथ्वी को जला डालने को उठ खड़ी हुई है।
श्लोक 24 (7.96.24)
शकुनिः पाण्डुपुत्राभ्यां कृतः स विमुखः शरैः । न स्म जानाति कर्तव्यं युद्धे किञ्चित्पराक्रमम् ॥
śakuniḥ pāṇḍuputrābhyāṃ kṛtaḥ sa vimukhaḥ śaraiḥ | na sma jānāti kartavyaṃ yuddhe kiñcitparākramam
पाण्डु के दोनों पुत्रों ने बाणों से शकुनि को युद्ध से विमुख कर दिया; वह यह भी न जान पाया कि युद्ध में क्या करना चाहिए, और कौन-सा पराक्रम दिखाना चाहिए।
श्लोक 25 (7.96.25)
विमुखं चैनमालोक्य माद्रीपुत्रौ महारथौ । ववर्षतुः पुनर्बाणैर्यथा मेघौ महागिरिम् ॥
vimukhaṃ cainamālokya mādrīputrau mahārathau | vavarṣatuḥ punarbāṇairyathā meghau mahāgirim
उसे विमुख देखकर माद्री के दोनों महारथी पुत्रों ने उस पर फिर बाणों की वर्षा की, जैसे दो बादल किसी विशाल पर्वत पर बरसते हों।
श्लोक 26 (7.96.26)
स वध्यमानो बहुभिः शरैः सन्नतपर्वभिः । सम्प्रायाज्जवनैरश्वैर्द्रोणानीकाय सौबलः ॥
sa vadhyamāno bahubhiḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | samprāyājjavanairaśvairdroṇānīkāya saubalaḥ
झुकी गाँठों वाले अनेक बाणों से मारे जाते हुए सुबलपुत्र शकुनि अपने तेज़ घोड़ों पर द्रोण की सेना की ओर भाग गया।
श्लोक 27 (7.96.27)
घटोत्कचस्तथा शूरं राक्षसं तमलायुधम् । अभ्ययाद्रभसं युद्धे वेगमास्थाय मध्यमम् ॥
ghaṭotkacastathā śūraṃ rākṣasaṃ tamalāyudham | abhyayādrabhasaṃ yuddhe vegamāsthāya madhyamam
घटोत्कच मध्यम गति से वेगवान् रणशूर राक्षस अलायुध पर टूट पड़ा।
श्लोक 28 (7.96.28)
तयोर्युद्धं महाराज चित्ररूपमिवाभवत् । यादृशं हि पुरावृत्तं रामरावणयोर्मृधे ॥
tayoryuddhaṃ mahārāja citrarūpamivābhavat | yādṛśaṃ hi purāvṛttaṃ rāmarāvaṇayormṛdhe
हे महाराज, उन दोनों का युद्ध अद्भुत दृश्य-सा था — वैसा ही, जैसा प्राचीन काल में राम और रावण के बीच संग्राम में हुआ था।
श्लोक 29 (7.96.29)
ततो युधिष्ठिरो राजा मद्रराजानमाहवे । विद्ध्वा पञ्चाशता बाणैः पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā madrarājānamāhave | viddhvā pañcāśatā bāṇaiḥ punarvivyādha saptabhiḥ
तब राजा युधिष्ठिर ने मद्रराज शल्य को युद्ध में पचास बाणों से बेधकर फिर सात बाणों से बेध दिया।
श्लोक 30 (7.96.30)
ततः प्रववृते युद्धं तयोरत्यद्भुतं नृप । यथा पूर्वं महद्युद्धं शम्बरामरराजयोः ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tayoratyadbhutaṃ nṛpa | yathā pūrvaṃ mahadyuddhaṃ śambarāmararājayoḥ
हे राजन्, तब उन दोनों के बीच अत्यन्त अद्भुत युद्ध छिड़ गया, जैसा पूर्वकाल में शम्बर और देवराज इन्द्र के बीच हुआ था।
श्लोक 31 (7.96.31)
विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च तवात्मजः । अयोधयन्भीमसेनं महत्या सेनया वृताः ॥
viviṃśatiścitraseno vikarṇaśca tavātmajaḥ | ayodhayanbhīmasenaṃ mahatyā senayā vṛtāḥ
विविंशति, चित्रसेन और आपका पुत्र विकर्ण — ये तीनों विशाल सेना से घिरे हुए भीमसेन से लड़े।