कर्ण पर्व · अध्याय 80
विशोक भीम को अर्जुन के आगमन की सूचना देता है
भीम अपने सारथि विशोक से रथ कौरव-सेना में बढ़वाते हैं और आक्रमण करने वाले राजाओं को भगा देते हैं। युधिष्ठिर और अर्जुन की चिन्ता में वे विशोक से पूछते हैं कि कितने बाण बचे हैं; विशोक उन्हें घेरने वाले जनों के नाम बताता और बाणों की गिनती करता है। भीम सेना का नाश करने या स्वयं गिरने की प्रतिज्ञा करते हैं और पूछते हैं कि कौरव क्यों भाग रहे हैं। विशोक अर्जुन का वानर-ध्वज, गाण्डीव, कृष्ण का शंख और चक्र तथा अर्जुन द्वारा किया जा रहा संहार दिखाकर उनके आने की सूचना देता है; भीम उसे गाँव, दासियाँ और रथ देते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.80.1)
अथ त्विदानीं तुमुले विमर्दे । द्विषद्भिरेको बहुभिः समावृतः । महाभये सारथिमित्युवाच । भीमश्चमूं वारयन्धार्तराष्ट्रीम् । त्वं सारथे याहि जवेन वाहैः । नयाम्येतान्धार्तराष्ट्रान्यमाय ॥
atha tvidānīṃ tumule vimarde | dviṣadbhireko bahubhiḥ samāvṛtaḥ | mahābhaye sārathimityuvāca | bhīmaścamūṃ vārayandhārtarāṣṭrīm | tvaṃ sārathe yāhi javena vāhaiḥ | nayāmyetāndhārtarāṣṭrānyamāya
तब उस घोर संग्राम में अकेले भीम, जो बहुत-से शत्रुओं से घिरे थे और धृतराष्ट्र की सेना को रोक रहे थे, उस महान् भय के समय सारथि से बोले—"सारथे! घोड़ों को तेज़ी से हाँको; मैं इन धृतराष्ट्र-पुत्रों को यमराज के पास पहुँचाऊँगा।"
श्लोक 2 (8.80.2)
सञ्चोदितो भीमसेनेन चैवं । स सारथिः पुत्रबलं त्वदीयम् । प्रायात्ततः सत्वरमुग्रवेगो । यतो भीमस्तद्बलं गन्तुमैच्छत् ॥
sañcodito bhīmasenena caivaṃ | sa sārathiḥ putrabalaṃ tvadīyam | prāyāttataḥ satvaramugravego | yato bhīmastadbalaṃ gantumaicchat
भीमसेन के इस प्रकार प्रेरित करने पर सारथि उग्र वेग से आपके पुत्र की सेना की ओर चल पड़ा—उसी ओर, जहाँ भीम उस सेना पर पहुँचना चाहते थे।
श्लोक 3 (8.80.3)
ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः । प्रत्युद्ययुस्तं कुरवः समन्तात् । भीमस्य वाहाग्र्यमुदारवेगं । समन्ततो बाणगणैर्निजघ्नुः ॥
tato'pare nāgarathāśvapattibhiḥ | pratyudyayustaṃ kuravaḥ samantāt | bhīmasya vāhāgryamudāravegaṃ | samantato bāṇagaṇairnijaghnuḥ
तब अन्य कौरव हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदलों के साथ चारों ओर से उनकी ओर बढ़े और भीम के अग्रगामी, महावेग वाले घोड़ों पर सब ओर से बाणों के समूहों से प्रहार किया।
श्लोक 4 (8.80.4)
ततः शरानापततो महात्मा । चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुङ्खैः । ते वै निपेतुस्तपनीयपुङ्खा । द्विधा त्रिधा भीमशरैर्निकृत्ताः ॥
tataḥ śarānāpatato mahātmā | ciccheda bāṇaistapanīyapuṅkhaiḥ | te vai nipetustapanīyapuṅkhā | dvidhā tridhā bhīmaśarairnikṛttāḥ
तब महात्मा भीम ने आते हुए उन बाणों को स्वर्णपंखी बाणों से काट डाला; वे सुनहरे पंखों वाले बाण भीम के बाणों से दो-दो, तीन-तीन टुकड़े होकर गिर पड़े।
श्लोक 5 (8.80.5)
ततो राजन्नागरथाश्वयूनां । भीमाहतानां वरराजमध्ये । घोरो निनादः सुमहानभूत्तदा । वज्राहतानामिव पर्वतानाम् ॥
tato rājannāgarathāśvayūnāṃ | bhīmāhatānāṃ vararājamadhye | ghoro ninādaḥ sumahānabhūttadā | vajrāhatānāmiva parvatānām
राजन्! तब श्रेष्ठ राजाओं के बीच भीम के मारे हुए हाथी, रथ और घोड़ों पर सवार युवा योद्धाओं का घोर और भारी नाद उठा, मानो वज्र से आहत पर्वतों का हो।
श्लोक 6 (8.80.6)
ते वध्यमानाश्च नरेन्द्रमुख्या । निर्भिद्यन्तो भीमशरप्रवेकैः । भीमं समन्तात्समरेऽभ्यरोहन् । वृक्षं शकुन्ता इव पुष्पहेतोः ॥
te vadhyamānāśca narendramukhyā | nirbhidyanto bhīmaśarapravekaiḥ | bhīmaṃ samantātsamare'bhyarohan | vṛkṣaṃ śakuntā iva puṣpahetoḥ
मारे जाते और भीम के श्रेष्ठ बाणों से बिंधते हुए प्रमुख राजा रण में चारों ओर से भीम पर चढ़ आए, जैसे पक्षी फूलों के लिए किसी वृक्ष पर चढ़ आते हैं।
श्लोक 7 (8.80.7)
ततोऽभियाते तव सैन्ये स भीमः । प्रादुश्चक्रे वेगमनन्तवेगः । यथाऽन्तकाले क्षपयन्दिधक्षुः । भूतान्तकृत्काल इवात्तदण्डः ॥
tato'bhiyāte tava sainye sa bhīmaḥ | prāduścakre vegamanantavegaḥ | yathā'ntakāle kṣapayandidhakṣuḥ | bhūtāntakṛtkāla ivāttadaṇḍaḥ
तब आपकी सेना के टूट पड़ने पर अनन्त वेग वाले भीम ने अपना वेग प्रकट किया—जैसे प्रलयकाल में सबको जलाकर नष्ट करने की इच्छा से दण्ड उठाए हुए प्राणियों का अन्त करने वाला काल।
श्लोक 8 (8.80.8)
तस्यातिवेगस्य रणेऽतिवेगं । नाशक्नुवन्धारयितुं त्वदीयाः । व्यात्ताननस्यापततो यथैव । कालस्य काले हरतः प्रजा वै ॥
tasyātivegasya raṇe'tivegaṃ | nāśaknuvandhārayituṃ tvadīyāḥ | vyāttānanasyāpatato yathaiva | kālasya kāle harataḥ prajā vai
रण में उस अतिवेगवान् का अतिवेग आपके योद्धा रोक न सके, जैसे अपने समय पर प्राणियों को हर ले जाने वाले, मुँह फाड़े आते हुए काल का वेग कोई नहीं रोक सकता।
श्लोक 9 (8.80.9)
ततो बलं भारत भारतानां । प्रदह्यमानं समरे महात्मना । भीतं दिशोऽकीर्यत भीमनुन्नं । महानिलेनाभ्रगणा यथैव ॥
tato balaṃ bhārata bhāratānāṃ | pradahyamānaṃ samare mahātmanā | bhītaṃ diśo'kīryata bhīmanunnaṃ | mahānilenābhragaṇā yathaiva
भारत! तब उस महात्मा से रण में जलती हुई और भीम से खदेड़ी हुई भरतों की सेना भयभीत होकर चारों ओर बिखर गई, जैसे प्रचण्ड वायु से बादलों के समूह।
श्लोक 10 (8.80.10)
ततो धीमान्सारथिमब्रवीद्बली । स भीमसेनः पुनरेव हृष्टः ॥
tato dhīmānsārathimabravīdbalī | sa bhīmasenaḥ punareva hṛṣṭaḥ
तब बलवान् और बुद्धिमान् भीमसेन ने फिर हर्षित होकर अपने सारथि से कहा—
भीमसेन उवाच
श्लोक 11 (8.80.11)
सूताभिजानीहि परान्स्वकान्वा । रथान्ध्वजांश्चापततः समेतान् । युध्यन्ह्यहं नाभिजानामि किञ्चित् । मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये प्रमत्तः ॥
sūtābhijānīhi parānsvakānvā | rathāndhvajāṃścāpatataḥ sametān | yudhyanhyahaṃ nābhijānāmi kiñcit | mā sainyaṃ svaṃ chādayiṣye pramattaḥ
सूत! देखकर पहचानो कि ये आक्रमण करते और मिलते हुए रथ और ध्वज शत्रुओं के हैं या अपनों के; लड़ते हुए मैं कुछ भी नहीं पहचान पाता। कहीं असावधानी में मैं अपनी ही सेना को बाणों से न ढक दूँ।
श्लोक 12 (8.80.12)
अरीन्विशोकान्हि निरीक्ष्य सर्वतो । महांश्च मन्युः पुनरेति मां भृशम् । राजातुरो नागमद्यत्किरीटी । बहूनि दुःखान्यभिचिन्तयामि ॥
arīnviśokānhi nirīkṣya sarvato | mahāṃśca manyuḥ punareti māṃ bhṛśam | rājāturo nāgamadyatkirīṭī | bahūni duḥkhānyabhicintayāmi
शत्रुओं को चारों ओर निश्चिन्त देखकर मुझे बार-बार भारी क्रोध आता है। राजा पीड़ित हैं और किरीटी अर्जुन नहीं आए—मैं बहुत-से दुःखों का चिन्तन कर रहा हूँ।
श्लोक 13 (8.80.13)
एतद्दुःखं धारये धर्मराजो । यन्मां हित्वा यातवाञ्शत्रुमध्ये । नैनं जीवं नाभिजानाम्यजीवं । बीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ॥
etadduḥkhaṃ dhāraye dharmarājo | yanmāṃ hitvā yātavāñśatrumadhye | nainaṃ jīvaṃ nābhijānāmyajīvaṃ | bībhatsuṃ vā tanmamādyātiduḥkham
मैं यह दुःख सह रहा हूँ कि धर्मराज मुझे छोड़कर शत्रुओं के बीच चले गए। मैं न उन्हें जीवित जानता हूँ, न मृत, और बीभत्सु को भी नहीं जानता—यही आज मेरा बड़ा दुःख है।
श्लोक 14 (8.80.14)
सोऽहं द्विषत्सैन्यमुदग्रकल्पं । विनाशयिष्ये परमप्रतीतः । एतन्निहत्याजिमध्ये समेतं । प्रीतो भविष्यामि सह त्वयाद्य ॥
so'haṃ dviṣatsainyamudagrakalpaṃ | vināśayiṣye paramapratītaḥ | etannihatyājimadhye sametaṃ | prīto bhaviṣyāmi saha tvayādya
इसलिए मैं अत्यन्त दृढ़ विश्वास के साथ शत्रु की इस उमड़ी हुई सेना का नाश करूँगा; युद्ध के बीच एकत्र हुए इन सबको मारकर आज तुम्हारे साथ मैं प्रसन्न होऊँगा।
श्लोक 15 (8.80.15)
सर्वांस्तूणीरान्मार्गणान्वान्ववेक्ष्य । किं शिष्टं स्यात्सायकानां रथे मे । का वा जातिः किं प्रमाणं च तेषां । ज्ञात्वा व्यक्तं तन्ममाचक्ष्व सूत । कति वा सहस्राणि कति वा शतानि । ह्याचक्ष्व मे सारथे क्षिप्रमेव ॥
sarvāṃstūṇīrānmārgaṇānvānvavekṣya | kiṃ śiṣṭaṃ syātsāyakānāṃ rathe me | kā vā jātiḥ kiṃ pramāṇaṃ ca teṣāṃ | jñātvā vyaktaṃ tanmamācakṣva sūta | kati vā sahasrāṇi kati vā śatāni | hyācakṣva me sārathe kṣiprameva
सब तरकशों और बाणों को देखकर बताओ कि मेरे रथ में कितने बाण बचे हैं; उनकी जाति क्या है और संख्या क्या है—यह ठीक-ठीक जानकर मुझे बताओ, सूत! कितने सहस्र हैं और कितने सौ? सारथे, मुझे शीघ्र ही बताओ।
विशोक उवाच
श्लोक 16 (8.80.16)
सर्वं विदित्वैवमहं वदामि । तवार्थसिद्धिप्रदमद्य वीर । कैकेयकाम्भोजसुराष्ट्रबाह्लिका । म्लेच्छाश्च सुह्माः परतङ्कणाश्च ॥
sarvaṃ viditvaivamahaṃ vadāmi | tavārthasiddhipradamadya vīra | kaikeyakāmbhojasurāṣṭrabāhlikā | mlecchāśca suhmāḥ parataṅkaṇāśca
यह सब जानकर मैं आपसे वह कहता हूँ, वीर! जो आज आपका कार्य सिद्ध करने वाला है: कैकेय, काम्बोज, सुराष्ट्र के लोग, बाह्लीक, म्लेच्छ, सुह्म और परतङ्कण,
श्लोक 17 (8.80.17)
मद्राश्च वङ्गा मगधाः कुणिन्दा । आनर्तकावर्तकाः पार्वतीयाः । सर्वे गृहीतप्रवरायुधास्त्वां । संवेष्ट्य संवेष्ट्य ततो विनेदुः ॥
madrāśca vaṅgā magadhāḥ kuṇindā | ānartakāvartakāḥ pārvatīyāḥ | sarve gṛhītapravarāyudhāstvāṃ | saṃveṣṭya saṃveṣṭya tato vineduḥ
मद्र, वंग, मगध, कुणिन्द, आनर्तक, आवर्तक और पर्वतीय—ये सब श्रेष्ठ आयुध लेकर आपको बार-बार घेरकर तब गरज उठे।
श्लोक 18 (8.80.18)
रथे तवास्मिन्निशिताः सुपीताः । ततो भल्ला द्वादश वै सहस्राः । षण्मार्गणानामयुतानि वीर । क्षुराश्च भल्लाश्च तथायुताख्याः ॥
rathe tavāsminniśitāḥ supītāḥ | tato bhallā dvādaśa vai sahasrāḥ | ṣaṇmārgaṇānāmayutāni vīra | kṣurāśca bhallāśca tathāyutākhyāḥ
आपके इस रथ में तीखे और भली-भाँति पानी चढ़ाए हुए बारह हज़ार भल्ल हैं; वीर! छह अयुत (साठ हज़ार) बाण हैं, और क्षुर तथा भल्ल भी अयुतों की गिनती में हैं।
श्लोक 19 (8.80.19)
नाराचानां द्वे सहस्रे च वीर । त्रीण्येव च प्रदराणां स्म पार्थ । अस्त्यायुधं पाण्डवेयावशिष्टं । न यद्वहेच्छकटं षड्गवीयम् ॥
nārācānāṃ dve sahasre ca vīra | trīṇyeva ca pradarāṇāṃ sma pārtha | astyāyudhaṃ pāṇḍaveyāvaśiṣṭaṃ | na yadvahecchakaṭaṃ ṣaḍgavīyam
वीर! नाराच दो हज़ार हैं और पार्थ! प्रदर तीन हज़ार। पाण्डुपुत्र! अब भी इतने शस्त्र बचे हैं कि छह बैलों वाली गाड़ी भी उन्हें न ढो सके।
श्लोक 20 (8.80.20)
एतद्विद्वन्मुञ्च सहस्रशोऽपि । गदासिबाहुद्रविणं च तेऽस्ति । प्रासाश्च मुद्गराः शक्तयस्तोमराश्च । माभैषीस्त्वं संक्षयादायुधानाम् ॥
etadvidvanmuñca sahasraśo'pi | gadāsibāhudraviṇaṃ ca te'sti | prāsāśca mudgarāḥ śaktayastomarāśca | mābhaiṣīstvaṃ saṃkṣayādāyudhānām
हे विद्वन्! यह जानकर इन्हें हज़ारों की संख्या में छोड़िए; गदा, तलवार और भुजाओं का बल भी आपके पास है। प्रास, मुद्गर, शक्ति और तोमर भी हैं; शस्त्रों के समाप्त होने से आप न डरें।
भीमसेन उवाच
श्लोक 21 (8.80.21)
अद्यैव नूनं कथयन्तु सिद्धां । मम प्रतिज्ञां सर्वलोके विशोक । न मोक्ष्यते वा समरे भीमसेन । एकः शत्रून्समरे वाप्यजैषीत् । आशंसितानामिदमेकमस्तु । तन्मे देवाः सकलं साधयन्तु ॥
adyaiva nūnaṃ kathayantu siddhāṃ | mama pratijñāṃ sarvaloke viśoka | na mokṣyate vā samare bhīmasena | ekaḥ śatrūnsamare vāpyajaiṣīt | āśaṃsitānāmidamekamastu | tanme devāḥ sakalaṃ sādhayantu
विशोक! आज ही सब लोग कहें कि मेरी प्रतिज्ञा सिद्ध हो गई—या तो भीमसेन इस रण से जीवित नहीं लौटेगा, या अकेला ही शत्रुओं को जीत लेगा। आशा रखने वालों की इतनी ही एक बात पूरी हो; देवता वह सब मेरे लिए सिद्ध करें।
श्लोक 22 (8.80.22)
सूताद्य मद्बाहुयुतैः समस्तान् । समाहनद्भिः पार्थिवानाशुवेगैः । आच्छन्नं बाणैराहवं घोररूपं । नष्टादित्यं मृत्युलोकेन तुल्यम् ॥
sūtādya madbāhuyutaiḥ samastān | samāhanadbhiḥ pārthivānāśuvegaiḥ | ācchannaṃ bāṇairāhavaṃ ghorarūpaṃ | naṣṭādityaṃ mṛtyulokena tulyam
सूत! आज देखो यह रणभूमि, जो मेरी भुजाओं से छोड़े गए, सब राजाओं को मारते हुए तीव्र वेग वाले बाणों से ढकी है—भयंकर रूप वाली, जहाँ सूर्य अदृश्य हो गया है, मृत्युलोक के समान।
श्लोक 23 (8.80.23)
अद्यैतद्वै विदितं पार्थिवानां । भविष्यति ह्याकुमारं च सूत । निमग्नो वा समरे भीमसेन । एकः कुरून्वा समरे व्यजैषीत् ॥
adyaitadvai viditaṃ pārthivānāṃ | bhaviṣyati hyākumāraṃ ca sūta | nimagno vā samare bhīmasena | ekaḥ kurūnvā samare vyajaiṣīt
सूत! आज यह सब राजाओं को—बच्चों तक को—विदित हो जाएगा कि भीमसेन रण में डूब गया या अकेले ही कौरवों को जीत गया।
श्लोक 24 (8.80.24)
सर्वे सङ्ख्ये कुरवो निष्पतन्तु । मां वा लोकाः कीर्तयन्त्वाकुमारम् । सर्वानेकस्तानहं पातयिष्ये । ते वा सर्वे भीमसेनं तुदन्तु ॥
sarve saṅkhye kuravo niṣpatantu | māṃ vā lokāḥ kīrtayantvākumāram | sarvānekastānahaṃ pātayiṣye | te vā sarve bhīmasenaṃ tudantu
सारे कौरव रण में मुझ पर टूट पड़ें, या लोक बच्चों तक मेरा यश गाएँ; मैं अकेला ही उन सबको गिरा दूँगा, या वे सब मिलकर भीमसेन को मार डालें।
श्लोक 25 (8.80.25)
आशास्तारः कर्म चाप्युत्तमं ये । तन्मे देवाः सफलं साधयन्तु । आयातीह केशवसारथी रथी । शक्रस्तूर्णं यज्ञ इवोपहूतः ॥
āśāstāraḥ karma cāpyuttamaṃ ye | tanme devāḥ saphalaṃ sādhayantu | āyātīha keśavasārathī rathī | śakrastūrṇaṃ yajña ivopahūtaḥ
जो लोग उत्तम कर्म की आशा रखते हैं, उसे देवता मेरे लिए सफल करें। देखो, केशव जिसके सारथि हैं, वह रथी यहाँ शीघ्र आ रहा है, जैसे यज्ञ में बुलाया हुआ इन्द्र आता है।
श्लोक 26 (8.80.26)
ईक्षस्वैतां भारतीं दीर्यमाणाम् । एते कस्माद्विद्रवन्ते नरेन्द्राः । व्यक्तं धीमान्सव्यसाची नराग्र्यः । सैन्यं ह्येतच्छादयत्याशु बाणैः ॥
īkṣasvaitāṃ bhāratīṃ dīryamāṇām | ete kasmādvidravante narendrāḥ | vyaktaṃ dhīmānsavyasācī narāgryaḥ | sainyaṃ hyetacchādayatyāśu bāṇaiḥ
देखो, भरतों की यह सेना फटी जा रही है। ये राजा क्यों भाग रहे हैं? स्पष्ट है कि मनुष्यों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान् सव्यसाची इस सेना को तेज़ी से बाणों से ढक रहे हैं।
श्लोक 27 (8.80.27)
पश्य ध्वजांश्च द्रवतो विशोक । नागान्हयान्पत्तिसङ्घांश्च सङ्ख्ये । रथान्विकीर्णाञ्शरशक्तिताडितान् । पश्यस्वैतान्रथिनश्चैव सूत ॥
paśya dhvajāṃśca dravato viśoka | nāgānhayānpattisaṅghāṃśca saṅkhye | rathānvikīrṇāñśaraśaktitāḍitān | paśyasvaitānrathinaścaiva sūta
विशोक! देखो, भागते हुए ध्वज, हाथी, घोड़े और पैदलों के झुंड, तथा बाणों और शक्तियों से मारे गए बिखरे हुए रथ; और सूत! इन रथियों को भी देखो।
श्लोक 28 (8.80.28)
आपूर्यते कौरवी चाप्यभीक्ष्णं । सेना ह्यसौ सुभृशं हन्यमाना । धनञ्जयस्याशनितुल्यवेगैः । ग्रस्ता शरैः काञ्चनबर्हजालैः ॥
āpūryate kauravī cāpyabhīkṣṇaṃ | senā hyasau subhṛśaṃ hanyamānā | dhanañjayasyāśanitulyavegaiḥ | grastā śaraiḥ kāñcanabarhajālaiḥ
वह कौरव सेना, जो बुरी तरह मारी जा रही है, बार-बार सिमट रही है; धनंजय के वज्र के समान वेग वाले, सुनहरे मोर-पंख लगे बाणों के समूहों ने उसे ग्रस लिया है।
श्लोक 29 (8.80.29)
एते द्रवन्ति स्म रथाश्वनागाः । पदातिसङ्घानतिमर्दयन्तः । सम्मुह्यमानाः कौरवाः सर्व एव । द्रवन्ति नागा इव दाहभीताः ॥
ete dravanti sma rathāśvanāgāḥ | padātisaṅghānatimardayantaḥ | sammuhyamānāḥ kauravāḥ sarva eva | dravanti nāgā iva dāhabhītāḥ
ये रथ, घोड़े और हाथी पैदल सैनिकों के झुंडों को कुचलते हुए भाग रहे हैं; सब कौरव घबराकर वन की आग से डरे हुए हाथियों की तरह भाग रहे हैं।
श्लोक 30 (8.80.30)
हाहाकृताश्चैव रणे विशोक । मुञ्चन्ति नादान्विपुलान्गजेन्द्राः ॥
hāhākṛtāścaiva raṇe viśoka | muñcanti nādānvipulāngajendrāḥ
विशोक! रण में 'हाय-हाय' करते हुए गजराज बड़े-बड़े चीत्कार कर रहे हैं।
विशोक उवाच
श्लोक 31 (8.80.31)
किं भीम नैनं त्वमिहाशृणोषि । विस्फारितं गाण्डिवस्यातिघोरम् । क्रुद्धेन पार्थेन विकृष्यतोऽद्य । कच्चिन्नेमौ तव कर्णौ विनष्टौ ॥
kiṃ bhīma nainaṃ tvamihāśṛṇoṣi | visphāritaṃ gāṇḍivasyātighoram | kruddhena pārthena vikṛṣyato'dya | kaccinnemau tava karṇau vinaṣṭau
भीम! क्या तुम यहाँ क्रुद्ध पार्थ द्वारा खींचे जाते हुए गाण्डीव का यह अत्यन्त घोर टंकार नहीं सुन रहे? कहीं तुम्हारे दोनों कान फूट तो नहीं गए?
श्लोक 32 (8.80.32)
सर्वे कामाः पाण्डव ते समृद्धाः । कपिर्ह्यसौ दृश्यते हस्तिसैन्ये । नीलाद्धनाद्विद्युतमुच्चरन्तीं । तथा पश्य विस्फुरन्तीं धनुर्ज्याम् ॥
sarve kāmāḥ pāṇḍava te samṛddhāḥ | kapirhyasau dṛśyate hastisainye | nīlāddhanādvidyutamuccarantīṃ | tathā paśya visphurantīṃ dhanurjyām
पाण्डव! आपकी सब कामनाएँ सिद्ध हो गईं—वह हाथियों की सेना में वानर-ध्वज दिखाई दे रहा है; और काले मेघ से निकलती बिजली की तरह चमकती हुई उसकी धनुष की प्रत्यंचा को देखिए।
श्लोक 33 (8.80.33)
कपिर्ह्यसौ वीक्षते सर्वतो वै । ध्वजाग्रमारुह्य धनञ्जयस्य । वित्रासयन्रिपुसङ्घान्विमर्दे । बिभेम्यस्मादात्मनैवाभिवीक्ष्य ॥
kapirhyasau vīkṣate sarvato vai | dhvajāgramāruhya dhanañjayasya | vitrāsayanripusaṅghānvimarde | bibhemyasmādātmanaivābhivīkṣya
वह वानर धनंजय के ध्वज के अग्रभाग पर चढ़कर चारों ओर देख रहा है और संग्राम में शत्रु-समूहों को डरा रहा है; उसे अपनी आँखों से देखकर मैं स्वयं उससे डर रहा हूँ।
श्लोक 34 (8.80.34)
विभ्राजते चातिमात्रं किरीटं । विचित्रमेतच्च धनञ्जयस्य । दिवाकराभो मणिरेष दिव्यो । विभ्राजते चैव किरीटसंस्थः ॥
vibhrājate cātimātraṃ kirīṭaṃ | vicitrametacca dhanañjayasya | divākarābho maṇireṣa divyo | vibhrājate caiva kirīṭasaṃsthaḥ
धनंजय का यह विचित्र किरीट अत्यन्त चमक रहा है, और किरीट में जड़ा यह दिव्य मणि सूर्य के समान दमक रहा है।
श्लोक 35 (8.80.35)
पार्श्वे भीमं पाण्डुराभ्रप्रकाशं । पश्यस्व शङ्खं देवदत्तं सुघोषम् । अभीषुहस्तस्य जनार्दनस्य । विगाहमानस्य चमूं परेषाम् ॥
pārśve bhīmaṃ pāṇḍurābhraprakāśaṃ | paśyasva śaṅkhaṃ devadattaṃ sughoṣam | abhīṣuhastasya janārdanasya | vigāhamānasya camūṃ pareṣām
उन जनार्दन के पास, जो हाथ में लगाम लिए शत्रुओं की सेना में घुस रहे हैं, श्वेत बादल के समान चमकते, सुन्दर घोष वाले भीषण देवदत्त शंख को देखिए।
श्लोक 36 (8.80.36)
रविप्रभं वज्रनाभं क्षुरान्तं । पार्श्वे स्थितं पश्य जनार्दनस्य । चक्रं यशोवर्धनं केशवस्य । सदार्चितं यदुभिः पश्य वीर ॥
raviprabhaṃ vajranābhaṃ kṣurāntaṃ | pārśve sthitaṃ paśya janārdanasya | cakraṃ yaśovardhanaṃ keśavasya | sadārcitaṃ yadubhiḥ paśya vīra
वीर! जनार्दन के पास रखे उस चक्र को देखिए, जो सूर्य के समान प्रभा वाला है, जिसकी नाभि वज्र-सी और धार छुरे जैसी है, जो केशव का यश बढ़ाने वाला है और यादवों द्वारा सदा पूजित है।
श्लोक 37 (8.80.37)
महाद्विपानां सरलद्रुमोपमाः । करा निकृत्ताः प्रपतन्त्यमी क्षुरैः । किरीटिना तेन पुनः ससादिनः । शरैर्निकृत्ताः कुलिशैरिवाद्रयः ॥
mahādvipānāṃ saraladrumopamāḥ | karā nikṛttāḥ prapatantyamī kṣuraiḥ | kirīṭinā tena punaḥ sasādinaḥ | śarairnikṛttāḥ kuliśairivādrayaḥ
देखो, विशाल हाथियों की सरल वृक्षों जैसी सूँडें छुरे जैसे बाणों से कटकर गिर रही हैं, और किरीटी के बाणों से कटे घुड़सवार वज्रों से कटे पर्वतों की भाँति गिर रहे हैं।
श्लोक 38 (8.80.38)
तथैव कृष्णस्य च पाञ्चजन्यं । महार्हमेतद्द्विजराजवर्णम् । कौन्तेय पश्योरसि कौस्तुभं च । जाज्वल्यमानं विजयां स्रजं च ॥
tathaiva kṛṣṇasya ca pāñcajanyaṃ | mahārhametaddvijarājavarṇam | kaunteya paśyorasi kaustubhaṃ ca | jājvalyamānaṃ vijayāṃ srajaṃ ca
कुन्तीपुत्र! कृष्ण का वह बहुमूल्य, चन्द्रमा के समान श्वेत पाञ्चजन्य, उनके वक्ष पर चमकती कौस्तुभ मणि और विजयमाला को भी देखिए।
श्लोक 39 (8.80.39)
ध्रुवं रथाग्र्यः समुपैति पार्थः । विद्रावयन्सैन्यमिदं परेषाम् । सिताभ्रवर्णैरसितप्रयुक्तैः । हयैर्महार्है रथिनां वरिष्ठः ॥
dhruvaṃ rathāgryaḥ samupaiti pārthaḥ | vidrāvayansainyamidaṃ pareṣām | sitābhravarṇairasitaprayuktaiḥ | hayairmahārhai rathināṃ variṣṭhaḥ
निश्चय ही रथियों में श्रेष्ठ, रथ पर अग्रणी पार्थ इस शत्रु-सेना को भगाते हुए आ रहे हैं—श्वेत बादलों के रंग के बहुमूल्य घोड़ों से, जिन्हें श्याम (कृष्ण) हाँक रहे हैं।
श्लोक 40 (8.80.40)
रथान्हयान्पत्तिगणांश्च सायकैः । विदारितान्पश्य पतन्त्यमी यथा । तवानुजेनामरराजतेजसा । महावनानीव सुपर्णवायुना ॥
rathānhayānpattigaṇāṃśca sāyakaiḥ | vidāritānpaśya patantyamī yathā | tavānujenāmararājatejasā | mahāvanānīva suparṇavāyunā
देखिए, आपके छोटे भाई के इन्द्र जैसे तेज से बाणों द्वारा चीरे गए रथ, घोड़े और पैदलों के दल गिर रहे हैं, जैसे गरुड़ की वायु से बड़े-बड़े वन।
श्लोक 41 (8.80.41)
चतुः शतान्पश्य रथानिमान्हतान् । सवाजिसूतान्समरे किरीटिना । महेषुभिः सप्तशतानि दन्तिनां । पदातिसादींश्च रथाननेकशः ॥
catuḥ śatānpaśya rathānimānhatān | savājisūtānsamare kirīṭinā | maheṣubhiḥ saptaśatāni dantināṃ | padātisādīṃśca rathānanekaśaḥ
देखिए, किरीटी ने रण में इन चार सौ रथों को घोड़ों और सारथियों सहित मार गिराया है, और अपने महाबाणों से सात सौ हाथियों तथा पैदलों, घुड़सवारों और अनेक रथों को भी।
श्लोक 42 (8.80.42)
अयं समभ्येति तवान्तिकं बली । निघ्नन्कुरूंश्चित्र इव ग्रहोऽर्जुनः । समृद्धकामोऽसि हतास्तवाहिता । बलं तवायुश्च चिराय वर्धताम् ॥
ayaṃ samabhyeti tavāntikaṃ balī | nighnankurūṃścitra iva graho'rjunaḥ | samṛddhakāmo'si hatāstavāhitā | balaṃ tavāyuśca cirāya vardhatām
कौरवों का संहार करता हुआ, चित्र नामक ग्रह के समान बलशाली अर्जुन आपके पास आ रहा है। आपकी कामनाएँ पूरी हुईं, आपके शत्रु मारे गए; आपका बल और आयु चिरकाल तक बढ़ें।
भीमसेन उवाच
श्लोक 43 (8.80.43)
ददानि ते ग्रामवरांश्चतुर्दश । प्रियाख्याने सारथे सुप्रसन्नः । दासीशतं चापि रथांश्च विंशतिं । यदर्जुनं वेदयसे विशोक ॥
dadāni te grāmavarāṃścaturdaśa | priyākhyāne sārathe suprasannaḥ | dāsīśataṃ cāpi rathāṃśca viṃśatiṃ | yadarjunaṃ vedayase viśoka
सारथे! इस प्रिय समाचार से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ; विशोक! अर्जुन के विषय में जो तुमने बताया, उसके बदले मैं तुम्हें चौदह श्रेष्ठ गाँव, सौ दासियाँ और बीस रथ दूँगा।