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सभा पर्व · अध्याय 1

मय का सभा-निर्माण का प्रस्ताव

जनमेजय के पूछने पर कि खाण्डव-दाह में मय को बचाने के बाद अर्जुन ने क्या किया, वैशम्पायन बताते हैं कि दानवों का शिल्पी, कृतज्ञ असुर मय अर्जुन का कोई उपकार करना चाहता है। प्राण-रक्षा के बदले कुछ न लेने वाले अर्जुन उसका संकल्प व्यर्थ न जाए, इसलिए उसे श्रीकृष्ण के पास भेजते हैं, और श्रीकृष्ण उससे युधिष्ठिर के लिए ऐसी सभा बनाने को कहते हैं जिसकी नकल कोई मनुष्य न कर सके। युधिष्ठिर से सम्मानित होकर मय शुभ दिन ब्राह्मणों को तृप्त करता है और दस हजार किष्कु विस्तार वाली सभा का माप करवाता है।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (2.1.1)

अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो मोचयित्वा मयं तदा । किं चकार महातेजास्तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ॥

arjuno jayatāṃ śreṣṭho mocayitvā mayaṃ tadā | kiṃ cakāra mahātejāstanme brūhi dvijottama

"विजेताओं में श्रेष्ठ, महातेजस्वी अर्जुन ने उस समय मय को छुड़ाकर फिर क्या किया? हे द्विजश्रेष्ठ, यह मुझे बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (2.1.2)

शृणु राजन्नवहितश्चरितं पूर्वकस्य ते । मोक्षयित्वा मयं तत्र पार्थः शस्त्रभृतां वरः ॥

śṛṇu rājannavahitaścaritaṃ pūrvakasya te | mokṣayitvā mayaṃ tatra pārthaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ

"हे राजन्, अपने पूर्वज का चरित्र ध्यान से सुनो। वहाँ मय को छुड़ाकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पार्थ ने

श्लोक 3 (2.1.3)

गाण्डिवं कार्मुकश्रेष्ठं तूणी चाक्षयसायकौ । दिव्यान्यस्त्राणि राजेन्द्र दुर्लभानि नृपैर्भुवि ॥

gāṇḍivaṃ kārmukaśreṣṭhaṃ tūṇī cākṣayasāyakau | divyānyastrāṇi rājendra durlabhāni nṛpairbhuvi

धनुषों में श्रेष्ठ गाण्डीव, अक्षय बाणों वाले दो तरकस और, हे राजेन्द्र, पृथ्वी के राजाओं के लिए दुर्लभ दिव्य अस्त्र पाए;

श्लोक 4 (2.1.4)

रथध्वजपताकाश्च श्वेताश्वांश्च स वीर्यवान् । एतानि पावकात्प्राप्य मुदा परमया युतः । तस्थौ पार्थो महावीर्यस्तदा सह मयेन सः ॥

rathadhvajapatākāśca śvetāśvāṃśca sa vīryavān | etāni pāvakātprāpya mudā paramayā yutaḥ | tasthau pārtho mahāvīryastadā saha mayena saḥ

साथ ही ध्वजा-पताकाओं सहित रथ और श्वेत घोड़े भी। अग्निदेव से ये सब पाकर वे पराक्रमी, महाबली पार्थ परम आनन्द से भरकर तब मय के साथ वहीं ठहरे।

श्लोक 5 (2.1.5)

ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य सन्निधौ । पाण्डवेन परित्रातस्तत्कृतं प्रत्यनुस्मरन् ॥

tato'bravīnmayaḥ pārthaṃ vāsudevasya sannidhau | pāṇḍavena paritrātastatkṛtaṃ pratyanusmaran

तब पाण्डुपुत्र द्वारा बचाए गए मय ने उनके उपकार को स्मरण करते हुए वासुदेव की उपस्थिति में पार्थ से कहा,

श्लोक 6 (2.1.6)

प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः ॥

prāñjaliḥ ślakṣṇayā vācā pūjayitvā punaḥ punaḥ

हाथ जोड़कर, मधुर वाणी में, बार-बार उनका सम्मान करते हुए—

मय उवाच

श्लोक 7 (2.1.7)

अस्माच्च कृष्णात्सङ्क्रुद्धात्पावकाच्च दिधक्षतः ॥

asmācca kṛṣṇātsaṅkruddhātpāvakācca didhakṣataḥ

"इन क्रुद्ध श्रीकृष्ण से और मुझे जला डालने को उद्यत अग्नि से

श्लोक 8 (2.1.8)

त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते । अहं हि विश्वकर्मा वै असुराणां परन्तप ॥

tvayā trāto'smi kaunteya brūhi kiṃ karavāṇi te | ahaṃ hi viśvakarmā vai asurāṇāṃ parantapa

हे कुन्तीपुत्र, तुमने मेरी रक्षा की है। बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? हे परन्तप, मैं असुरों का विश्वकर्मा (शिल्पी) हूँ।

श्लोक 9 (2.1.9)

तस्मात्ते विस्मयं किञ्चित्कुर्यामन्यैः सुदुष्करम् ॥

tasmātte vismayaṃ kiñcitkuryāmanyaiḥ suduṣkaram

इसलिए मैं तुम्हारे लिए कोई ऐसी अद्भुत रचना करूँ जो दूसरों के लिए अत्यन्त कठिन हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (2.1.10)

एवमुक्तो महावीर्यः पार्थो मायाविदं मयम् । ध्यात्वा मुहूर्तं कौन्तेयः प्रहसन्वाक्यमब्रवीत् ॥

evamukto mahāvīryaḥ pārtho māyāvidaṃ mayam | dhyātvā muhūrtaṃ kaunteyaḥ prahasanvākyamabravīt

ऐसा कहे जाने पर महापराक्रमी कुन्तीपुत्र पार्थ ने क्षण भर विचार किया और फिर मुस्कराते हुए माया के ज्ञाता मय से यह वचन कहा—

अर्जुन उवाच

श्लोक 11 (2.1.11)

कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महाऽसुर । प्रीतिमान्भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥

kṛtameva tvayā sarvaṃ svasti gaccha mahā'sura | prītimānbhava me nityaṃ prītimanto vayaṃ ca te

"तुमने सब कुछ कर ही दिया है। हे महासुर, कुशलपूर्वक जाओ। मुझ पर सदा प्रेम रखना, जैसे हम भी तुम पर प्रेम रखते हैं।

श्लोक 12 (2.1.12)

प्राप्तोपकारादर्थं हि नादास्यामीति मे व्रतम् ॥

prāptopakārādarthaṃ hi nādāsyāmīti me vratam

क्योंकि मेरा यह व्रत है कि जिसका मैंने उपकार किया हो, उससे मैं कोई प्रतिफल नहीं लूँगा।"

मय उवाच

श्लोक 13 (2.1.13)

युक्तमेतत्त्वयि विभो यदात्थ पुरुषर्षभ ॥

yuktametattvayi vibho yadāttha puruṣarṣabha

"हे प्रभो, हे पुरुषश्रेष्ठ, तुम जो कहते हो वह तुम्हारे योग्य ही है।

श्लोक 14 (2.1.14)

प्रीतिपूर्वमहं किञ्चित्कर्तुमिच्छामि तेऽर्जुन । अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः ॥

prītipūrvamahaṃ kiñcitkartumicchāmi te'rjuna | ahaṃ hi viśvakarmā vai dānavānāṃ mahākaviḥ

फिर भी, हे अर्जुन, मैं प्रेमपूर्वक तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूँ। मैं दानवों का विश्वकर्मा, उनका महान् शिल्पी हूँ।

श्लोक 15 (2.1.15)

सोऽहं वै त्वत्कृते किञ्चित्कर्तुमिच्छामि पाण्डव । दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृताः ॥

so'haṃ vai tvatkṛte kiñcitkartumicchāmi pāṇḍava | dānavānāṃ purā pārtha prāsādā hi mayā kṛtāḥ

ऐसा मैं, हे पाण्डुपुत्र, तुम्हारे लिए कुछ बनाना चाहता हूँ। हे पार्थ, पूर्वकाल में दानवों के महल मैंने ही बनाए थे—

श्लोक 16 (2.1.16)

रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रशः । उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च ॥

ramyāṇi sukhagarbhāṇi bhogāḍhyāni sahasraśaḥ | udyānāni ca ramyāṇi sarāṃsi vividhāni ca

हजारों की संख्या में, सुन्दर, सुख से भरे और भोग-सामग्री से सम्पन्न; साथ ही रमणीय उद्यान और भाँति-भाँति के सरोवर भी;

श्लोक 17 (2.1.17)

विचित्राणि च वस्त्राणि कामगानि रथानि च । नगराणि विशालानि साट्टप्राकारवन्ति च ॥

vicitrāṇi ca vastrāṇi kāmagāni rathāni ca | nagarāṇi viśālāni sāṭṭaprākāravanti ca

अद्भुत वस्त्र, इच्छानुसार चलने वाले रथ, और अटारियों तथा परकोटों से युक्त विशाल नगर;

श्लोक 18 (2.1.18)

वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रशः । बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् । एते कृता मया सर्वे तस्मादिच्छामि फल्गुन ॥

vāhanāni ca mukhyāni vicitrāṇi sahasraśaḥ | bilāni ramaṇīyāni sukhayuktāni vai bhṛśam | ete kṛtā mayā sarve tasmādicchāmi phalguna

हजारों उत्तम और विचित्र वाहन, तथा अत्यन्त सुखदायक, रमणीय भूगर्भ-निवास भी। ये सब मैंने ही बनाए थे; इसलिए, हे फाल्गुन, मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूँ।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 19 (2.1.19)

प्राणकृच्छ्राद्विनिर्मुक्तमात्मानं मन्यसे मया । एवं गते न शक्ष्यामि किञ्चित्कारयितुं त्वया ॥

prāṇakṛcchrādvinirmuktamātmānaṃ manyase mayā | evaṃ gate na śakṣyāmi kiñcitkārayituṃ tvayā

"तुम मानते हो कि मैंने तुम्हें प्राण-संकट से छुड़ाया है। ऐसी स्थिति में मैं तुमसे अपना कोई काम नहीं करवा सकता।

श्लोक 20 (2.1.20)

न चापि तव सङ्कल्पं मोघमिच्छामि दानव । कृष्णस्य क्रियतां किञ्चित्तथा प्रतिकृतं मयि ॥

na cāpi tava saṅkalpaṃ moghamicchāmi dānava | kṛṣṇasya kriyatāṃ kiñcittathā pratikṛtaṃ mayi

फिर भी, हे दानव, मैं नहीं चाहता कि तुम्हारा संकल्प व्यर्थ हो। श्रीकृष्ण के लिए कुछ कर दो; वही मेरे प्रति किया गया प्रत्युपकार होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (2.1.21)

चोदितो वासुदेवस्तु मयं प्रति नरर्षभ । मुहूर्तमिव सन्दध्यौ किमयं चोद्यतामिति ॥

codito vāsudevastu mayaṃ prati nararṣabha | muhūrtamiva sandadhyau kimayaṃ codyatāmiti

हे नरश्रेष्ठ, मय के विषय में इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर वासुदेव ने क्षण भर विचार किया कि इसे किस कार्य के लिए कहा जाए।

श्लोक 22 (2.1.22)

ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः । चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ॥

tato vicintya manasā lokanāthaḥ prajāpatiḥ | codayāmāsa taṃ kṛṣṇaḥ sabhā vai kriyatāmiti

तब मन में विचार करके लोकनाथ, प्रजापति श्रीकृष्ण ने उसे आदेश दिया—"एक सभा-भवन बनाया जाए।"

कृष्ण उवाच

श्लोक 23 (2.1.23)

यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर । धर्मराजस्य दयितां यादृशीमिह मन्यसे ॥

yadi tvaṃ kartukāmo'si priyaṃ śilpavatāṃ vara | dharmarājasya dayitāṃ yādṛśīmiha manyase

"हे शिल्पियों में श्रेष्ठ, यदि तुम हमारा प्रिय करना चाहते हो, तो धर्मराज के लिए ऐसी मनभावन सभा बनाओ जैसी तुम यहाँ उचित समझो;

श्लोक 24 (2.1.24)

यां क्रियां नानुकुर्युस्ते मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः । मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम् ॥

yāṃ kriyāṃ nānukuryuste mānavāḥ prekṣya vismitāḥ | manuṣyaloke sakale tādṛśīṃ kuru vai sabhām

ऐसी रचना, जिसे देखकर सम्पूर्ण मनुष्यलोक के लोग विस्मित रह जाएँ पर उसकी नकल न कर सकें। ऐसी ही सभा बनाओ,

श्लोक 25 (2.1.25)

यत्र दिव्यानभिप्रायान्पश्येम विहितांस्त्वया । आसुरान्मानुषांश्चैव तादृशीं कुरु वै सभाम् ॥

yatra divyānabhiprāyānpaśyema vihitāṃstvayā | āsurānmānuṣāṃścaiva tādṛśīṃ kuru vai sabhām

जिसमें हम तुम्हारे द्वारा रचे गए दिव्य, आसुरी और मानवी, सभी प्रकार के शिल्प-विधान देख सकें। ऐसी ही सभा बनाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (2.1.26)

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा । विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम् ॥

pratigṛhya tu tadvākyaṃ samprahṛṣṭo mayastadā | vimānapratimāṃ cakre pāṇḍavasya śubhāṃ sabhām

उस वचन को स्वीकार कर मय अत्यन्त हर्षित हुआ और उसने तब पाण्डुपुत्र के लिए देव-विमान के समान एक सुन्दर सभा की रचना की।

श्लोक 27 (2.1.27)

ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे । सर्वमेतत्समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ॥

tataḥ kṛṣṇaśca pārthaśca dharmarāje yudhiṣṭhire | sarvametatsamāvedya darśayāmāsaturmayam

तब श्रीकृष्ण और अर्जुन ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह सब बताकर मय को उनसे मिलवाया।

श्लोक 28 (2.1.28)

तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत्तदा । स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ॥

tasmai yudhiṣṭhiraḥ pūjāṃ yathārhamakarottadā | sa tu tāṃ pratijagrāha mayaḥ satkṛtya bhārata

तब युधिष्ठिर ने उसका यथोचित सत्कार किया, और हे भारत, मय ने आदरपूर्वक उस सत्कार को स्वीकार किया।

श्लोक 29 (2.1.29)

स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते । कथयामास दैतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत ॥

sa pūrvadevacaritaṃ tadā tatra viśāmpate | kathayāmāsa daiteyaḥ pāṇḍuputreṣu bhārata

हे प्रजानाथ, हे भारत, उस दैत्य ने तब वहाँ पाण्डुपुत्रों को पूर्वदेवों (प्राचीन असुरों) का चरित सुनाया।

श्लोक 30 (2.1.30)

स कालं कञ्चिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु । सभां प्रचक्रमे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥

sa kālaṃ kañcidāśvasya viśvakarmā vicintya tu | sabhāṃ pracakrame kartuṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām

कुछ समय विश्राम करके और भली-भाँति विचार करके उस विश्वकर्मा ने महात्मा पाण्डवों के लिए सभा बनाना आरम्भ किया,

श्लोक 31 (2.1.31)

अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः । पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकौतुकमङ्गलः ॥

abhiprāyeṇa pārthānāṃ kṛṣṇasya ca mahātmanaḥ | puṇye'hani mahātejāḥ kṛtakautukamaṅgalaḥ

पार्थों और महात्मा श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार। एक पवित्र दिन उस महातेजस्वी ने मंगल-अनुष्ठान सम्पन्न किए,

श्लोक 32 (2.1.32)

तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान्पायसेन सहस्रशः । धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ॥

tarpayitvā dvijaśreṣṭhānpāyasena sahasraśaḥ | dhanaṃ bahuvidhaṃ dattvā tebhya eva ca vīryavān

हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को खीर से तृप्त किया और उन्हें अनेक प्रकार का धन भी दिया; फिर उस पराक्रमी ने

श्लोक 33 (2.1.33)

सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् । दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वतः ॥

sarvartuguṇasampannāṃ divyarūpāṃ manoramām | daśakiṣkusahasrāṃ tāṃ māpayāmāsa sarvataḥ

सब ऋतुओं के गुणों से सम्पन्न, दिव्य रूप वाली और मनोहर उस सभा को चारों ओर से दस हजार किष्कु के माप में नपवाया।

अध्याय-सूचीअध्याय 2