सभा पर्व · अध्याय 62
सहदेव की चुनौती और शिशुपाल का विद्रोह
भीष्म के चुप होने पर सहदेव कृष्ण की पूजा से असहमत किसी भी राजा को उत्तर देने की चुनौती देते हैं और बलवानों के सिर पर अपना पैर रखते हैं। कोई उत्तर नहीं देता; सहदेव पर फूल बरसते हैं, और नारद घोषणा करते हैं कि जो कृष्ण की पूजा नहीं करते वे जीते-जी मृत हैं। सहदेव पूजा-कर्म पूरा करते हैं, पर शिशुपाल (सुनीथ) क्रुद्ध राजाओं को यज्ञ भंग करने के लिए उकसाता है, और कृष्ण देखते हैं कि वह विशाल राजसमूह युद्ध की तैयारी कर रहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.62.1)
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबलः । व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवद्वचः ॥
evamuktvā tato bhīṣmo virarāma mahābalaḥ | vyājahārottaraṃ tatra sahadevo'rthavadvacaḥ
ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गए। तब सहदेव ने वहाँ सार्थक वचनों में उत्तर दिया—
सहदेव उवाच
श्लोक 2 (2.62.2)
केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् । पूज्यमानं मया यो वः कृष्णं न सहते नृपाः ॥
keśavaṃ keśihantāramaprameyaparākramam | pūjyamānaṃ mayā yo vaḥ kṛṣṇaṃ na sahate nṛpāḥ
"हे राजाओ, केशी का वध करने वाले, अप्रमेय पराक्रमी केशव कृष्ण की मेरे द्वारा की जा रही पूजा को तुममें से जो सहन नहीं करता,
श्लोक 3 (2.62.3)
सर्वेषां बलिनां मूर्ध्नि मयेदं निहितं पदम् । एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रब्रवीतु सः ॥
sarveṣāṃ balināṃ mūrdhni mayedaṃ nihitaṃ padam | evamukte mayā samyaguttaraṃ prabravītu saḥ
उन सब बलवानों के सिर पर मैंने यह अपना पैर रखा है। मेरे इतना स्पष्ट कह देने पर वह उत्तर दे।
श्लोक 4 (2.62.4)
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशयः । मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् ॥
sa eva hi mayā vadhyo bhaviṣyati na saṃśayaḥ | matimantaśca ye kecidācāryaṃ pitaraṃ gurum
वह निश्चय ही मेरे हाथों मारा जाएगा, इसमें संशय नहीं। और जो राजा बुद्धिमान हैं, वे आचार्य, पिता और गुरु रूप
श्लोक 5 (2.62.5)
अर्च्यमर्चितमर्घार्हमनुजानन्तु ते नृपाः ॥
arcyamarcitamarghārhamanujānantu te nṛpāḥ
पूजनीय, अर्घ्य के योग्य कृष्ण की पूजा को उचित मानें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (2.62.6)
ततो न व्याजहारैषां कश्चिद्बुद्धिमतां सताम् ॥
tato na vyājahāraiṣāṃ kaścidbuddhimatāṃ satām
तब उन बुद्धिमान, सज्जन, अभिमानी और बलवान राजाओं में से किसी ने कुछ नहीं कहा,
श्लोक 7 (2.62.7)
मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे । ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि ॥
mānināṃ balināṃ rājñāṃ madhye vai darśite pade | tato'patatpuṣpavṛṣṭiḥ sahadevasya mūrdhani
यद्यपि उनके बीच वह पैर दिखाया गया था। तब सहदेव के सिर पर फूलों की वर्षा हुई
श्लोक 8 (2.62.8)
अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन्साधुसाध्विति । आविध्यदजिनं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पनः ॥
adṛśyarūpā vācaścāpyabruvansādhusādhviti | āvidhyadajinaṃ kṛṣṇaṃ bhaviṣyadbhūtajalpanaḥ
और अदृश्य वाणियों ने कहा — "साधु, साधु!" भविष्य और भूत का कथन करने वाले नारद ने अपना काला मृगचर्म फहराया।
श्लोक 9 (2.62.9)
सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित् । उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः ॥
sarvasaṃśayanirmoktā nāradaḥ sarvalokavit | uvācākhilabhūtānāṃ madhye spaṣṭataraṃ vacaḥ
सब लोकों के ज्ञाता और सब संशयों को मिटाने वाले नारद ने समस्त प्राणियों के बीच अत्यन्त स्पष्ट वचन कहे—
नारद उवाच
श्लोक 10 (2.62.10)
कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः । जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सभाष्याः कदाचन ॥
kṛṣṇaṃ kamalapatrākṣaṃ nārcayiṣyanti ye narāḥ | jīvanmṛtāstu te jñeyā na sabhāṣyāḥ kadācana
"जो मनुष्य कमलनयन कृष्ण की पूजा नहीं करेंगे, उन्हें जीते-जी मरा हुआ समझना चाहिए; उनसे कभी बात भी नहीं करनी चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (2.62.11)
पूजयित्वा च पूजार्हान्ब्रह्मक्षत्रविशेषवित् । सहदेवो नृणां देवः समापयत कर्म तत् ॥
pūjayitvā ca pūjārhānbrahmakṣatraviśeṣavit | sahadevo nṛṇāṃ devaḥ samāpayata karma tat
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के भेद को जानने वाले, मनुष्यों में देवतुल्य सहदेव ने पूजनीय जनों की पूजा करके वह कर्म पूरा किया।
श्लोक 12 (2.62.12)
तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः । अतिताम्रेक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान् ॥
tasminnabhyarcite kṛṣṇe sunīthaḥ śatrukarṣaṇaḥ | atitāmrekṣaṇaḥ kopāduvāca manujādhipān
कृष्ण की पूजा हो जाने पर शत्रुओं को सताने वाला सुनीथ क्रोध से अत्यन्त लाल आँखें करके राजाओं से बोला—
शिशुपाल उवाच
श्लोक 13 (2.62.13)
स्थितः सेनापतिर्योऽहं मन्यध्वं किं तु साम्प्रतम् । युधि तिष्ठाम सन्नह्य समेतान्वृष्णिपाण्डवान् ॥
sthitaḥ senāpatiryo'haṃ manyadhvaṃ kiṃ tu sāmpratam | yudhi tiṣṭhāma sannahya sametānvṛṣṇipāṇḍavān
"मैं सेनापति के रूप में खड़ा हूँ; बताओ, अब तुम क्या सोचते हो? आओ, कवच बाँधकर हम एकत्र हुए वृष्णियों और पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध में डट जाएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (2.62.14)
इति सर्वान्समुत्साह्य राज्ञस्तांश्चेदिपुङ्गवः । यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः ॥
iti sarvānsamutsāhya rājñastāṃścedipuṅgavaḥ | yajñopaghātāya tataḥ so'mantrayata rājabhiḥ
इस प्रकार उन सब राजाओं को उकसाकर चेदिश्रेष्ठ ने तब यज्ञ को भंग करने के लिए राजाओं के साथ मन्त्रणा की।
श्लोक 15 (2.62.15)
तत्राहूतागताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः । समदृश्यन्त सङ्क्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा ॥
tatrāhūtāgatāḥ sarve sunīthapramukhā gaṇāḥ | samadṛśyanta saṅkruddhā vivarṇavadanāstathā
वहाँ बुलाए गए सुनीथ आदि सभी दल आ पहुँचे; वे क्रोध से भरे और उतरे हुए चेहरों वाले दिखाई देते थे।
श्लोक 16 (2.62.16)
युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम् । न स्याद्यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाऽब्रुवन् ॥
yudhiṣṭhirābhiṣekaṃ ca vāsudevasya cārhaṇam | na syādyathā tathā kāryamevaṃ sarve tadā'bruvan
"ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे युधिष्ठिर का अभिषेक और वासुदेव की पूजा न हो सके" — तब सबने यही कहा।
श्लोक 17 (2.62.17)
निष्कर्षान्निश्चयात्सर्वे राजानः क्रोधमूर्छिताः । अब्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात् ॥
niṣkarṣānniścayātsarve rājānaḥ krodhamūrchitāḥ | abruvaṃstatra rājāno nirvedādātmaniścayāt
सोच-विचारकर निश्चय कर लेने पर क्रोध से मूर्छित सब राजा वहाँ खेद और अपने निश्चय के कारण बोलने लगे।
श्लोक 18 (2.62.18)
सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ । आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् ॥
suhṛdbhirvāryamāṇānāṃ teṣāṃ hi vapurābabhau | āmiṣādapakṛṣṭānāṃ siṃhānāmiva garjatām
मित्रों द्वारा रोके जाते हुए वे ऐसे लगते थे जैसे शिकार से खींचकर हटाए गए गरजते सिंह हों।
श्लोक 19 (2.62.19)
तं बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् । कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा ॥
taṃ balaughamaparyantaṃ rājasāgaramakṣayam | kurvāṇaṃ samayaṃ kṛṣṇo yuddhāya bubudhe tadā
तब कृष्ण ने समझ लिया कि सेनाओं का वह असीम प्रवाह, राजाओं का वह अक्षय सागर, युद्ध के लिए आपस में संकल्प कर रहा है।