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सौप्तिक पर्व · अध्याय 12

कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को अश्वत्थामा के अस्त्र की चेतावनी

कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि भीम अकेले ही अश्वत्थामा के पीछे गए हैं और उनकी सहायता होनी चाहिए। वे बताते हैं कि द्रोण ने ब्रह्मशिर अस्त्र अर्जुन को दिया था और अपने पुत्र को चेताया था कि इसे मनुष्यों पर कभी न चलाए। फिर वे वह प्रसंग सुनाते हैं जब अश्वत्थामा द्वारका में उनसे इस अस्त्र के बदले उनका चक्र माँगने आया था, पर उसे उठा तक न सका और लज्जित होकर चला गया। अन्त में वे कहते हैं कि अश्वत्थामा उग्र और उतावला है तथा यह अस्त्र जानता है, इसलिए भीम की रक्षा करनी चाहिए।

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (10.12.1)

तस्मिन्प्रयाते दुर्धर्षे यदूनामृषभस्ततः । अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

tasminprayāte durdharṣe yadūnāmṛṣabhastataḥ | abravītpuṇḍarīkākṣaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

उस दुर्धर्ष वीर के चले जाने पर यदुओं में श्रेष्ठ कमलनयन कृष्ण ने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (10.12.2)

एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायणः । जिघांसुर्द्रौणिमाक्रन्दे एक एवाभिधावति ॥

eṣa pāṇḍava te bhrātā putraśokaparāyaṇaḥ | jighāṃsurdrauṇimākrande eka evābhidhāvati

हे पाण्डव, पुत्रशोक में डूबा हुआ आपका यह भाई द्रोणपुत्र को मार डालने की इच्छा से अकेला ही उस रणकोलाहल में उसकी ओर दौड़ा जा रहा है।

श्लोक 3 (10.12.3)

भीमः प्रियस्ते सर्वेभ्यो भ्रातृभ्यो भरतर्षभ । तं कृच्छ्रगतमद्य त्वं कस्मान्नाभ्युपपद्यसे ॥

bhīmaḥ priyaste sarvebhyo bhrātṛbhyo bharatarṣabha | taṃ kṛcchragatamadya tvaṃ kasmānnābhyupapadyase

हे भरतश्रेष्ठ, आपके सब भाइयों में भीम आपको सबसे प्रिय है। फिर संकट में पड़े हुए उसकी सहायता आप आज क्यों नहीं करते?

श्लोक 4 (10.12.4)

यत्तदाचष्ट पुत्राय द्रोणः परपुरञ्जयः । अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम दहेत पृथिवीमपि ॥

yattadācaṣṭa putrāya droṇaḥ parapurañjayaḥ | astraṃ brahmaśiro nāma daheta pṛthivīmapi

शत्रुओं के नगर जीतने वाले द्रोण ने अपने पुत्र को जो ब्रह्मशिर नामक अस्त्र बताया था, जो पृथ्वी तक को जला सकता है —

श्लोक 5 (10.12.5)

तन्महात्मा महाभागः केतुः सर्वधनुष्मताम् । प्रत्यपादयदाचार्यः प्रीयमाणो धनञ्जयम् ॥

tanmahātmā mahābhāgaḥ ketuḥ sarvadhanuṣmatām | pratyapādayadācāryaḥ prīyamāṇo dhanañjayam

वही अस्त्र सब धनुर्धारियों के ध्वजस्वरूप उन महात्मा, महाभाग आचार्य ने प्रसन्न होकर धनञ्जय को सौंप दिया था।

श्लोक 6 (10.12.6)

तं पुत्रोऽप्येक एवैनमन्वयाचदमर्षणः । ततः प्रोवाच पुत्राय नातिहृष्टमना इव ॥

taṃ putro'pyeka evainamanvayācadamarṣaṇaḥ | tataḥ provāca putrāya nātihṛṣṭamanā iva

उनके पुत्र ने भी असहनशील होकर अकेले ही उनसे वह अस्त्र माँगा; तब द्रोण ने, मानो मन में बहुत प्रसन्न न होते हुए, अपने पुत्र से कहा —

श्लोक 7 (10.12.7)

विदितं चापलं ह्यासीदात्मजस्य दुरात्मनः । सर्वधर्मविदाचार्यः सोऽन्वशासत्सुतं ततः ॥

viditaṃ cāpalaṃ hyāsīdātmajasya durātmanaḥ | sarvadharmavidācāryaḥ so'nvaśāsatsutaṃ tataḥ

क्योंकि उन्हें अपने दुष्ट पुत्र की चपलता ज्ञात थी; इसलिए सब धर्मों को जानने वाले आचार्य ने तब पुत्र को शिक्षा दी।

श्लोक 8 (10.12.8)

परमापद्गतेनापि न स्म तात त्वया रणे । इदमस्त्रं प्रयोक्तव्यं मानुषेषु विशेषतः ॥

paramāpadgatenāpi na sma tāta tvayā raṇe | idamastraṃ prayoktavyaṃ mānuṣeṣu viśeṣataḥ

“तात, घोर से घोर संकट में पड़कर भी तुम्हें युद्ध में इस अस्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए, विशेषकर मनुष्यों पर तो कभी नहीं।”

श्लोक 9 (10.12.9)

इत्युक्तवान्गुरुः पुत्रं द्रोणः पश्चादथोक्तवान् । न त्वं जातु सतां मार्गे स्थातेति पुरुषर्षभ ॥

ityuktavānguruḥ putraṃ droṇaḥ paścādathoktavān | na tvaṃ jātu satāṃ mārge sthāteti puruṣarṣabha

पुत्र से यह कहकर गुरु द्रोण ने बाद में यह भी कहा, हे पुरुषश्रेष्ठ — “तुम कभी सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर नहीं रहोगे।”

श्लोक 10 (10.12.10)

स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् । निराशः सर्वकल्याणैः शोकात्पर्यचरन्महीम् ॥

sa tadājñāya duṣṭātmā piturvacanamapriyam | nirāśaḥ sarvakalyāṇaiḥ śokātparyacaranmahīm

पिता के उस अप्रिय वचन को समझकर वह दुष्टात्मा सब कल्याणों से निराश होकर शोक में पृथ्वी पर भटकता रहा।

श्लोक 11 (10.12.11)

ततस्तदा कुरुश्रेष्ठ वनस्थे त्वयि भारत । अवसद्द्वारकामेत्य वृष्णिभिः परमार्चितः ॥

tatastadā kuruśreṣṭha vanasthe tvayi bhārata | avasaddvārakāmetya vṛṣṇibhiḥ paramārcitaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, हे भारत, तब जब आप वन में रह रहे थे, वह द्वारका आकर वृष्णियों से अत्यन्त सम्मान पाता हुआ वहीं रहा।

श्लोक 12 (10.12.12)

स कदाचित्समुद्रान्ते वसन्द्वारवतीमनु । एक एकं समागम्य मामुवाच हसन्निव ॥

sa kadācitsamudrānte vasandvāravatīmanu | eka ekaṃ samāgamya māmuvāca hasanniva

एक बार समुद्र के किनारे द्वारवती में रहते हुए वह अकेले मुझसे मिला और मानो हँसते हुए मुझसे बोला —

श्लोक 13 (10.12.13)

यत्तदुग्रं तपः कृष्ण चरन्नमितविक्रमः । अगस्त्याद्भारताचार्यः प्रत्यपद्यत मे पिता ॥

yattadugraṃ tapaḥ kṛṣṇa carannamitavikramaḥ | agastyādbhāratācāryaḥ pratyapadyata me pitā

“कृष्ण, अपरिमित पराक्रम वाले मेरे पिता, भरतों के आचार्य, उग्र तप करके अगस्त्य से

श्लोक 14 (10.12.14)

अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम देवगन्धर्वपूजितम् । तदद्य मयि दाशार्ह यथा पितरि मे तथा ॥

astraṃ brahmaśiro nāma devagandharvapūjitam | tadadya mayi dāśārha yathā pitari me tathā

ब्रह्मशिर नामक वह अस्त्र पा चुके हैं, जिसे देवता और गन्धर्व पूजते हैं। हे दाशार्ह, वह आज मेरे पास भी वैसा ही है जैसा मेरे पिता के पास था।

श्लोक 15 (10.12.15)

अस्मत्तदुपादाय दिव्यमस्त्रं यदूत्तम । ममाप्यस्त्रं प्रयच्छ त्वं चक्रं रिपुहणं रणे ॥

asmattadupādāya divyamastraṃ yadūttama | mamāpyastraṃ prayaccha tvaṃ cakraṃ ripuhaṇaṃ raṇe

हे यदुश्रेष्ठ, मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर आप भी मुझे अपना अस्त्र दीजिए — रणभूमि में शत्रुओं का संहार करने वाला चक्र।”

श्लोक 16 (10.12.16)

स राजन्प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलिः । याचमानः प्रयत्नेन मत्तोऽस्त्रं भरतर्षभ ॥

sa rājanprīyamāṇena mayāpyuktaḥ kṛtāñjaliḥ | yācamānaḥ prayatnena matto'straṃ bharatarṣabha

हे राजन्, हाथ जोड़े हुए वह यत्नपूर्वक मुझसे अस्त्र माँग रहा था; तब हे भरतश्रेष्ठ, मैंने भी प्रसन्न होकर उससे कहा —

श्लोक 17 (10.12.17)

देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगाः । न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिताः ॥

devadānavagandharvamanuṣyapatagoragāḥ | na samā mama vīryasya śatāṃśenāpi piṇḍitāḥ

“देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और सर्प — ये सब एकत्र हो जाएँ तो भी मेरे बल के सौवें भाग के बराबर नहीं हैं।

श्लोक 18 (10.12.18)

इदं धनुरियं शक्तिरिदं चक्रमियं गदा । यद्यदिच्छसि चेदस्त्रं मत्तस्तत्तद्ददामि ते ॥

idaṃ dhanuriyaṃ śaktiridaṃ cakramiyaṃ gadā | yadyadicchasi cedastraṃ mattastattaddadāmi te

यह धनुष है, यह शक्ति है, यह चक्र है, यह गदा है — इनमें से जो-जो अस्त्र तुम चाहो, वही-वही मैं अपने पास से तुम्हें देता हूँ।

श्लोक 19 (10.12.19)

यच्छक्नोषि समुद्यन्तुं प्रयोक्तुमपि वा रणे । तद्गृहाण विनाऽस्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि ॥

yacchaknoṣi samudyantuṃ prayoktumapi vā raṇe | tadgṛhāṇa vinā'streṇa yanme dātumabhīpsasi

इनमें से जो भी तुम उठा सको या युद्ध में चला सको, उसे ले लो — उस अस्त्र के बिना ही, जो तुम मुझे देना चाहते हो।”

श्लोक 20 (10.12.20)

स सुनाभं सहस्रारं वज्रनाभमयस्मयम् । वव्रे चक्रं महाभागो मत्तः स्पर्धन्मया सह ॥

sa sunābhaṃ sahasrāraṃ vajranābhamayasmayam | vavre cakraṃ mahābhāgo mattaḥ spardhanmayā saha

मुझसे होड़ करते हुए उस भाग्यवान ने मुझसे चक्र माँगा — सुन्दर नाभि वाला, सहस्र अरों वाला, वज्र के समान नाभि से युक्त, लोहे का बना हुआ।

श्लोक 21 (10.12.21)

गृहाण चक्रमित्युक्तो मया तु तदनन्तरम् । जग्राहोत्पत्य सहसा चक्रं सव्येन पाणिना ॥

gṛhāṇa cakramityukto mayā tu tadanantaram | jagrāhotpatya sahasā cakraṃ savyena pāṇinā

“चक्र ले लो” — जब मैंने उससे यह कहा, तो उसने तुरन्त उछलकर बाएँ हाथ से चक्र पकड़ लिया।

श्लोक 22 (10.12.22)

न चैनमशकत्स्थानात्सञ्चालयितुमप्युत । अथैनं दक्षिणेनापि ग्रहीतुमुपचक्रमे ॥

na cainamaśakatsthānātsañcālayitumapyuta | athainaṃ dakṣiṇenāpi grahītumupacakrame

पर वह उसे उसके स्थान से हिला तक न सका, चलाना तो दूर रहा। तब उसने दाहिने हाथ से भी उसे पकड़ने का प्रयत्न किया।

श्लोक 23 (10.12.23)

सर्वयत्नेन तेनापि गृह्य नैनमकम्पयत् ॥

sarvayatnena tenāpi gṛhya nainamakampayat

सारा प्रयत्न करके पकड़ने पर भी वह उसे हिला नहीं सका।

श्लोक 24 (10.12.24)

ततः सर्वबलेनापि यदैनं न शशाक ह । उद्यन्तुं वा चालयितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः । कृत्वा यत्नं परिश्रान्तः स न्यवर्तत भारत ॥

tataḥ sarvabalenāpi yadainaṃ na śaśāka ha | udyantuṃ vā cālayituṃ drauṇiḥ paramadurmanāḥ | kṛtvā yatnaṃ pariśrāntaḥ sa nyavartata bhārata

तब पूरी शक्ति लगाने पर भी जब द्रोणपुत्र उसे न उठा सका, न हिला सका, तो अत्यन्त खिन्न होकर, प्रयत्न से थका हुआ, हे भारत, वह लौट गया।

श्लोक 25 (10.12.25)

निवृत्तमनसं तस्मादभिप्रायाद्विचेतसम् । अहमामन्त्र्य संविग्नमश्वत्थामानमब्रुवम् ॥

nivṛttamanasaṃ tasmādabhiprāyādvicetasam | ahamāmantrya saṃvignamaśvatthāmānamabruvam

उसका मन अपने उस अभिप्राय से लौट गया था और वह घबराया हुआ तथा हतचित्त था; तब मैंने अश्वत्थामा को बुलाकर उससे कहा —

श्लोक 26 (10.12.26)

यः स दैवमनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः । गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः ॥

yaḥ sa daivamanuṣyeṣu pramāṇaṃ paramaṃ gataḥ | gāṇḍīvadhanvā śvetāśvaḥ kapipravaraketanaḥ

“जो देवताओं और मनुष्यों में परम प्रमाणरूप पद को पहुँच चुका है — गाण्डीव धनुष धारण करने वाला, श्वेत अश्वों वाला, श्रेष्ठ वानर के ध्वज वाला —

श्लोक 27 (10.12.27)

यः साक्षाद्देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् । द्वन्द्वयुद्धे पुरा जिष्णुस्तोषयामास शङ्करम् ॥

yaḥ sākṣāddevadeveśaṃ śitikaṇṭhamumāpatim | dvandvayuddhe purā jiṣṇustoṣayāmāsa śaṅkaram

जिसने पूर्वकाल में द्वन्द्वयुद्ध में देवताओं के भी देवेश्वर, नीलकण्ठ, उमापति शंकर को स्वयं प्रसन्न किया था, वह जिष्णु —

श्लोक 28 (10.12.28)

यस्मात्प्रियतरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि । नादेयं यस्य मे किञ्चिदपि प्राणान्महात्मनः ॥

yasmātpriyataro nāsti mamānyaḥ puruṣo bhuvi | nādeyaṃ yasya me kiñcidapi prāṇānmahātmanaḥ

जिससे बढ़कर प्रिय पृथ्वी पर मेरे लिए कोई दूसरा पुरुष नहीं है, और उस महात्मा के लिए मेरा कुछ भी अदेय नहीं है, प्राण तक नहीं —

श्लोक 29 (10.12.29)

तेनापि सुहृदा ब्रह्मन्पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । नोक्तपूर्वमिदं वाक्यं यस्त्वं मामभिभाषसे ॥

tenāpi suhṛdā brahmanpārthenākliṣṭakarmaṇā | noktapūrvamidaṃ vākyaṃ yastvaṃ māmabhibhāṣase

वही मेरा मित्र, अक्लिष्टकर्मा पार्थ भी, हे ब्राह्मण, मुझसे ऐसी बात पहले कभी नहीं बोला जैसी तुम मुझसे कह रहे हो।

श्लोक 30 (10.12.30)

ब्रह्मचर्यं महद्घोरं तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् । हिमवत्पार्श्वमास्थाय यो मया तपसाऽऽर्जितः ॥

brahmacaryaṃ mahadghoraṃ tīrtvā dvādaśavārṣikam | himavatpārśvamāsthāya yo mayā tapasā''rjitaḥ

बारह वर्ष का महान् और घोर ब्रह्मचर्य पूरा करके, हिमालय के पार्श्व में स्थित होकर मैंने तप से जिसे प्राप्त किया था —

श्लोक 31 (10.12.31)

समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ॥

samānavratacāriṇyāṃ rukmiṇyāṃ yo'nvajāyata | sanatkumārastejasvī pradyumno nāma me sutaḥ

वह पुत्र, जो मेरे समान व्रत रखने वाली रुक्मिणी से उत्पन्न हुआ — तेजस्वी सनत्कुमार, मेरा प्रद्युम्न नामक पुत्र।

श्लोक 32 (10.12.32)

तेनाप्येतन्महद्दिव्यं चक्रमप्रतिमं रणे । न प्रार्थितमभून्मूढ तदिदं प्रार्थितं त्वया ॥

tenāpyetanmahaddivyaṃ cakramapratimaṃ raṇe | na prārthitamabhūnmūḍha tadidaṃ prārthitaṃ tvayā

उसने भी रणभूमि में अप्रतिम इस महान् दिव्य चक्र को कभी नहीं माँगा, हे मूढ़; और तुमने इसे माँग लिया है।

श्लोक 33 (10.12.33)

रामेणातिबलेनैतन्नोक्तपूर्वं कदाचन । न गदेन साम्बेन यदिदं प्रार्थितं त्वया ॥

rāmeṇātibalenaitannoktapūrvaṃ kadācana | na gadena sāmbena yadidaṃ prārthitaṃ tvayā

अतिबली राम ने भी कभी ऐसी बात नहीं कही, न गद ने, न साम्ब ने — जो तुमने माँगा है।

श्लोक 34 (10.12.34)

द्वारकावासिभिश्चान्यैर्वृष्ण्यन्धकमहारथैः । नोक्तपूर्वमिदं क्षुद्रं तदिदं प्रार्थितं त्वया ॥

dvārakāvāsibhiścānyairvṛṣṇyandhakamahārathaiḥ | noktapūrvamidaṃ kṣudraṃ tadidaṃ prārthitaṃ tvayā

द्वारका के अन्य निवासियों, वृष्णियों और अन्धकों के महारथियों ने भी कभी यह तुच्छ माँग नहीं की, जो तुमने की है।

श्लोक 35 (10.12.35)

भारताचार्यपुत्रस्त्वं मानितः सर्वयादवैः । चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ कं नु तात युयुत्ससे ॥

bhāratācāryaputrastvaṃ mānitaḥ sarvayādavaiḥ | cakreṇa rathināṃ śreṣṭha kaṃ nu tāta yuyutsase

तुम भरतों के आचार्य के पुत्र हो और सब यादवों से सम्मानित हो। हे रथियों में श्रेष्ठ, इस चक्र से तुम किससे युद्ध करना चाहते हो, तात?”

श्लोक 36 (10.12.36)

एवमुक्तो मया द्रौणिर्मामिदं प्रत्युवाच ह । प्रयुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्वया सह ॥

evamukto mayā drauṇirmāmidaṃ pratyuvāca ha | prayujya bhavate pūjāṃ yotsye kṛṣṇa tvayā saha

मेरे ऐसा कहने पर द्रोणपुत्र ने मुझे उत्तर दिया — “आपका सम्मान करके मैं आपके ही साथ युद्ध करूँगा, कृष्ण।

श्लोक 37 (10.12.37)

प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् । अजेयः स्यामिति विभो सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

prārthitaṃ te mayā cakraṃ devadānavapūjitam | ajeyaḥ syāmiti vibho satyametadbravīmi te

देवताओं और दानवों से पूजित आपका चक्र मैंने इसलिए माँगा था कि उससे मैं अजेय हो जाऊँगा, हे विभो — मैं आपसे यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 38 (10.12.38)

सोऽहं तद्दुर्लभं चक्रमनवाप्यैव केशव । प्रतियास्यामि गोविन्द शिवेनाभिवदस्व माम् ॥

so'haṃ taddurlabhaṃ cakramanavāpyaiva keśava | pratiyāsyāmi govinda śivenābhivadasva mām

सो, केशव, उस दुर्लभ मनोरथ को पाए बिना ही मैं लौट जाऊँगा, गोविन्द; मंगलवाणी के साथ मुझे विदा दीजिए।

श्लोक 39 (10.12.39)

एतत्सुनाभं भोजानामृषभेण त्वया धृतम् । चक्रमप्रतिचक्रेण भुवि नान्योऽभिपद्यते ॥

etatsunābhaṃ bhojānāmṛṣabheṇa tvayā dhṛtam | cakramapraticakreṇa bhuvi nānyo'bhipadyate

सुन्दर नाभि वाले इस चक्र को आप भोजों के श्रेष्ठ ने धारण किया है; पृथ्वी पर आपके सिवा कोई और इसे नहीं सँभाल सकता, क्योंकि आपके समान चक्र किसी का नहीं।”

श्लोक 40 (10.12.40)

एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यानश्वान्धनानि च । आदायोपययौ काले रत्नानि विविधानि च ॥

etāvaduktvā drauṇirmāṃ yugyānaśvāndhanāni ca | ādāyopayayau kāle ratnāni vividhāni ca

इतना कहकर द्रोणपुत्र मुझसे वाहन के योग्य घोड़े, धन और अनेक प्रकार के रत्न लेकर यथासमय चला गया।

श्लोक 41 (10.12.41)

स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च । वेद चास्त्रं ब्रह्मशिरस्तस्माद्रक्ष्यो वृकोदरः ॥

sa saṃrambhī durātmā ca capalaḥ krūra eva ca | veda cāstraṃ brahmaśirastasmādrakṣyo vṛkodaraḥ

वह क्रोधी, दुष्टात्मा, चपल और क्रूर है और ब्रह्मशिर अस्त्र जानता है; इसलिए वृकोदर की उससे रक्षा करनी चाहिए।

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