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शल्य पर्व · अध्याय 16

युधिष्ठिर के हाथों शल्य और उसके भाई का वध

शल्य और युधिष्ठिर का द्वन्द्व होता है। शल्य युधिष्ठिर का धनुष काटकर उनके घोड़े और सारथि को मार डालता है; भीम और सहदेव उस पर टूट पड़ते हैं और भीम उसके कवच, ढाल और तलवार को काट डालते हैं। कृष्ण की सलाह का स्मरण कर युधिष्ठिर दहकती शक्ति फेंकते हैं, जो शल्य का हृदय भेदकर उसे गिरा देती है। शल्य का छोटा भाई चढ़ आता है और उसका सिर काट दिया जाता है, कौरवसेना टूट जाती है, सात्यकि और कृतवर्मा लड़ते हैं और कृतवर्मा को हटा लिया जाता है; दुर्योधन अकेले पाण्डवों को रोकता है, और पाण्डव शंख बजाकर युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हैं।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.16.1)

तं भीमसेनश्च शिनेश्च नप्ता । माद्र्याश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ । समागतं भीमबलेन राज्ञा । पर्यापुरन्योन्यमथाह्वयन्त ॥

taṃ bhīmasenaśca śineśca naptā | mādryāśca putrau puruṣapravīrau | samāgataṃ bhīmabalena rājñā | paryāpuranyonyamathāhvayanta

भीमसेन, शिनि के पौत्र सात्यकि और माद्री के दोनों पुत्र, जो पुरुषों में परम वीर थे, शल्य को घेरकर आ पहुँचे, जो भयंकर बलशाली राजा युधिष्ठिर से भिड़ा हुआ था; वे एक-दूसरे को पुकार रहे थे।

श्लोक 2 (9.16.2)

ततस्तु शूराः समरे नरेन्द्र । नरेश्वरं प्राप्य युधां वरिष्ठम् । आवार्य चैनं समरे नृवीरा । जघ्नुः शितैः पत्रिभिरुग्रवेगैः ॥

tatastu śūrāḥ samare narendra | nareśvaraṃ prāpya yudhāṃ variṣṭham | āvārya cainaṃ samare nṛvīrā | jaghnuḥ śitaiḥ patribhirugravegaiḥ

तब हे नरेन्द्र, उन शूरवीर योद्धाओं ने युद्ध में योद्धाओं में श्रेष्ठ उस नरेश्वर के पास पहुँचकर उसे घेर लिया और तीखे, प्रचण्ड वेग वाले बाणों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 3 (9.16.3)

संरक्षितो भीमसेनेन राजा । माद्रीसुताभ्यामथ माधवेन । मद्राधिपं पत्रिभिरुग्रवेगैः । स्तनान्तरे धर्मसुतो निजघ्ने ॥

saṃrakṣito bhīmasenena rājā | mādrīsutābhyāmatha mādhavena | madrādhipaṃ patribhirugravegaiḥ | stanāntare dharmasuto nijaghne

भीमसेन, माद्री के दोनों पुत्रों और माधव से रक्षित धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने प्रचण्ड वेग वाले बाणों से मद्रराज की छाती के बीच प्रहार किया।

श्लोक 4 (9.16.4)

ततो रणे तावकानां रथौघाः । समीक्ष्य मद्राधिपतिं शरार्तम् । पर्यावव्रुः प्रवराः सर्वयोधा । दुर्योधनस्यानुमते पुरस्तात् ॥

tato raṇe tāvakānāṃ rathaughāḥ | samīkṣya madrādhipatiṃ śarārtam | paryāvavruḥ pravarāḥ sarvayodhā | duryodhanasyānumate purastāt

तब आपके पक्ष के रथसमूहों के सभी श्रेष्ठ योद्धाओं ने मद्रराज को बाणों से पीड़ित देखकर दुर्योधन की सम्मति से उसे सामने से घेर लिया।

श्लोक 5 (9.16.5)

ततो द्रुतं मद्रजनाधिपो रणे । युधिष्ठिरं सप्तभिरभ्यविध्यत् । तं चापि पार्थो नवभिः पृषत्कैः । विव्याध राजंस्तुमुले महात्मा ॥

tato drutaṃ madrajanādhipo raṇe | yudhiṣṭhiraṃ saptabhirabhyavidhyat | taṃ cāpi pārtho navabhiḥ pṛṣatkaiḥ | vivyādha rājaṃstumule mahātmā

तब मद्रजनों के स्वामी ने युद्ध में शीघ्र ही युधिष्ठिर को सात बाणों से बींध दिया; हे राजन्, उस घोर संग्राम में महात्मा पार्थ ने भी उसे नौ बाणों से घायल कर दिया।

श्लोक 6 (9.16.6)

आकर्णपूर्णायतसम्प्रयुक्तैः । शरैस्तदा संयति तैलधौतैः । अन्योन्यमाच्छादयतां महारथौ । मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्च ॥

ākarṇapūrṇāyatasamprayuktaiḥ | śaraistadā saṃyati tailadhautaiḥ | anyonyamācchādayatāṃ mahārathau | madrādhipaścāpi yudhiṣṭhiraśca

कान तक पूरी खिंची प्रत्यंचा से छूटे, तेल से चमकाए हुए बाणों से उस समय वे दोनों महारथी, मद्रराज और युधिष्ठिर, युद्ध में एक-दूसरे को ढकने लगे।

श्लोक 7 (9.16.7)

ततस्तु तूर्णं समरे महारथौ । परस्परस्यान्तरमीक्षमाणौ । शरैर्भृशं विव्यधतुर्नृपोत्तमौ । महाबलौ शत्रुभिरप्रधृष्यौ ॥

tatastu tūrṇaṃ samare mahārathau | parasparasyāntaramīkṣamāṇau | śarairbhṛśaṃ vivyadhaturnṛpottamau | mahābalau śatrubhirapradhṛṣyau

तब वे दोनों महारथी, नृपश्रेष्ठ, महाबली और शत्रुओं के लिए अजेय, एक-दूसरे की चूक की ताक में रहते हुए युद्ध में शीघ्रता से बाणों द्वारा परस्पर अत्यन्त घायल करने लगे।

श्लोक 8 (9.16.8)

तयोर्धनुर्ज्यातलनिःस्वनो महान् । महेन्द्रवज्राशनितुल्यनिःस्वनः । परस्परं बाणगणैर्महात्मनोः । प्रवर्षतोर्मद्रपपाण्डुवीरयोः ॥

tayordhanurjyātalaniḥsvano mahān | mahendravajrāśanitulyaniḥsvanaḥ | parasparaṃ bāṇagaṇairmahātmanoḥ | pravarṣatormadrapapāṇḍuvīrayoḥ

जब वे दोनों महात्मा वीर, मद्रराज और पाण्डुपुत्र, एक-दूसरे पर बाणों के समूह बरसा रहे थे, तब उनकी प्रत्यंचा और हथेलियों का महान् घोष महेन्द्र के वज्र की गर्जना के समान गूँज उठा।

श्लोक 9 (9.16.9)

तौ चेरतुर्व्याघ्रशिशुप्रकाशौ । महावनेष्वामिषगृद्धिनाविव । विषाणिनौ नागवराविवोभौ । ततक्षतुः संयति जातदर्पौ ॥

tau ceraturvyāghraśiśuprakāśau | mahāvaneṣvāmiṣagṛddhināviva | viṣāṇinau nāgavarāvivobhau | tatakṣatuḥ saṃyati jātadarpau

व्याघ्र-शावकों के समान दीप्त वे दोनों घने वन में मांस के लोभी दो शावकों की भाँति विचरने लगे; और युद्ध में उमड़े दर्प से भरे दो श्रेष्ठ दन्तैल हाथियों की भाँति एक-दूसरे को क्षत-विक्षत करने लगे।

श्लोक 10 (9.16.10)

ततस्तु मद्राधिपतिर्महात्मा । युधिष्ठिरं भीमबलं प्रसह्य । विव्याध वीरं हृदयेऽतिवेगं । शरेण सूर्याग्निसमप्रभेण ॥

tatastu madrādhipatirmahātmā | yudhiṣṭhiraṃ bhīmabalaṃ prasahya | vivyādha vīraṃ hṛdaye'tivegaṃ | śareṇa sūryāgnisamaprabheṇa

तब महात्मा मद्रराज ने भयंकर बल वाले वीर युधिष्ठिर पर बलपूर्वक टूटकर उनके हृदय में सूर्य और अग्नि के समान चमकते बाण से बड़े वेग से प्रहार किया।

श्लोक 11 (9.16.11)

ततोऽतिविद्धोऽथ युधिष्ठिरोऽपि । सुसम्प्रयुक्तेन शरेण राजन् । जघान मद्राधिपतिं महात्मा । मुदं च लेभे वृषभः कुरूणाम् ॥

tato'tividdho'tha yudhiṣṭhiro'pi | susamprayuktena śareṇa rājan | jaghāna madrādhipatiṃ mahātmā | mudaṃ ca lebhe vṛṣabhaḥ kurūṇām

तब अत्यन्त घायल हुए युधिष्ठिर ने भी, हे राजन्, भली-भाँति सधे हुए बाण से मद्रराज को मारा, और कुरुओं के वे महात्मा वृषभ हर्षित हुए।

श्लोक 12 (9.16.12)

ततो मुहूर्तादिव पार्थिवेन्द्रो । लब्ध्वा संज्ञां क्रोधसंरक्तनेत्रः । शरेण पार्थं त्वरितो जघान । सहस्रनेत्रप्रतिमप्रभावः ॥

tato muhūrtādiva pārthivendro | labdhvā saṃjñāṃ krodhasaṃraktanetraḥ | śareṇa pārthaṃ tvarito jaghāna | sahasranetrapratimaprabhāvaḥ

क्षण भर बाद होश सँभालकर क्रोध से लाल आँखों वाले, सहस्रनेत्र इन्द्र के समान तेजस्वी राजा शल्य ने शीघ्रता से पार्थ पर बाण चलाया।

श्लोक 13 (9.16.13)

त्वरंस्ततो धर्मसुतो महात्मा । शल्यस्य कोपान्नवभिः पृषत्कैः । भित्त्वा ह्युरस्तपनीयं च वर्म । जघान षड्भिस्त्वपरैः पृषत्कैः ॥

tvaraṃstato dharmasuto mahātmā | śalyasya kopānnavabhiḥ pṛṣatkaiḥ | bhittvā hyurastapanīyaṃ ca varma | jaghāna ṣaḍbhistvaparaiḥ pṛṣatkaiḥ

तब धर्मपुत्र महात्मा ने शीघ्रता से क्रोधित होकर शल्य की छाती और उसके स्वर्णमय कवच को नौ बाणों से बींध दिया और छह और बाणों से उसे घायल किया।

श्लोक 14 (9.16.14)

ततस्तु मद्राधिपतिः प्रकृष्टं । धनुर्विकृष्य व्यसृजत्पृषत्कान् । द्वाभ्यां शराभ्यां च तथैव राज्ञः । चिच्छेद चापं कुरुपुङ्गवस्य ॥

tatastu madrādhipatiḥ prakṛṣṭaṃ | dhanurvikṛṣya vyasṛjatpṛṣatkān | dvābhyāṃ śarābhyāṃ ca tathaiva rājñaḥ | ciccheda cāpaṃ kurupuṅgavasya

तब मद्रराज ने धनुष को जोर से खींचकर बाण छोड़े और दो बाणों से कुरुश्रेष्ठ राजा का धनुष काट डाला।

श्लोक 15 (9.16.15)

नवं ततोऽन्यत्समरे प्रगृह्य । राजा धनुर्घोरतरं महात्मा । शल्यं तु विव्याध शरैः समन्ताद् । यथा महेन्द्रो नमुचिं शिताग्रैः ॥

navaṃ tato'nyatsamare pragṛhya | rājā dhanurghorataraṃ mahātmā | śalyaṃ tu vivyādha śaraiḥ samantād | yathā mahendro namuciṃ śitāgraiḥ

तब महात्मा राजा युधिष्ठिर ने रण में दूसरा, और भी भयंकर नया धनुष लेकर शल्य को चारों ओर से तीखी नोक वाले बाणों से वैसे बींध दिया जैसे महेन्द्र ने नमुचि को बींधा था।

श्लोक 16 (9.16.16)

ततस्तु शल्यो नवभिः पृषत्कैः । भीमस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य । निकृत्य रौक्मे पटुवर्मणी तयोः । विदारयामास भुजौ महात्मा ॥

tatastu śalyo navabhiḥ pṛṣatkaiḥ | bhīmasya rājñaśca yudhiṣṭhirasya | nikṛtya raukme paṭuvarmaṇī tayoḥ | vidārayāmāsa bhujau mahātmā

तब महात्मा शल्य ने नौ बाणों से भीम और राजा युधिष्ठिर के सुनहरे, दृढ़ कवच काट डाले और दोनों की भुजाओं को चीर दिया।

श्लोक 17 (9.16.17)

ततोऽपरेण ज्वलनार्कतेजसा । क्षुरेण राज्ञो धनुरुन्ममाथ । कृपश्च तस्यैव जघान सूतं । षड्भिः शरैः सोऽभिमुखः पपात ॥

tato'pareṇa jvalanārkatejasā | kṣureṇa rājño dhanurunmamātha | kṛpaśca tasyaiva jaghāna sūtaṃ | ṣaḍbhiḥ śaraiḥ so'bhimukhaḥ papāta

फिर अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी एक और क्षुर-बाण से उसने राजा का धनुष तोड़ डाला; और कृप ने उसके सारथि को छह बाणों से मारा, वह मुँह के बल गिर पड़ा।

श्लोक 18 (9.16.18)

मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरस्य । शरैश्चतुर्भिर्निजघान वाहान् । वाहांश्च हत्वा व्यकरोन्महात्मा । योधक्षयं धर्मसुतस्य राज्ञः ॥

madrādhipaścāpi yudhiṣṭhirasya | śaraiścaturbhirnijaghāna vāhān | vāhāṃśca hatvā vyakaronmahātmā | yodhakṣayaṃ dharmasutasya rājñaḥ

मद्रराज ने चार बाणों से युधिष्ठिर के घोड़े भी मार डाले, और घोड़ों को मारकर उन महात्मा ने धर्मपुत्र राजा के योद्धाओं का संहार मचा दिया।

श्लोक 19 (9.16.19)

यदद्भुतं कर्म न शक्यमन्यैः । सुदुःसहं तत्कृतवन्तमेकम् । शल्यं नरेन्द्रः सविषण्णभावाद् । विचिन्तयामास मृदङ्गकेतुः ॥

yadadbhutaṃ karma na śakyamanyaiḥ | suduḥsahaṃ tatkṛtavantamekam | śalyaṃ narendraḥ saviṣaṇṇabhāvād | vicintayāmāsa mṛdaṅgaketuḥ

जो अद्भुत कर्म दूसरों के लिए असम्भव और अत्यन्त असह्य था, उसे अकेले कर दिखाने वाले शल्य को देखकर मृदंग-ध्वज वाले राजा युधिष्ठिर अत्यन्त विषाद में पड़कर सोचने लगे:

श्लोक 20 (9.16.20)

किमेतदिन्द्रावरजस्य वाक्यं । मोघं भवत्यद्य विधेर्बलेन । जहीति शल्यं ह्यवदत्तदाऽऽजौ । न लोकनाथस्य वचोऽन्यथा स्यात् ॥

kimetadindrāvarajasya vākyaṃ | moghaṃ bhavatyadya vidherbalena | jahīti śalyaṃ hyavadattadā''jau | na lokanāthasya vaco'nyathā syāt

"क्या इन्द्र के छोटे भाई का वचन आज दैव के बल से व्यर्थ हो जाएगा? उन्होंने तो रणभूमि में मुझसे कहा था, 'शल्य को मार डालो।' लोकनाथ का वचन अन्यथा नहीं हो सकता।"

श्लोक 21 (9.16.21)

तथा कृते राजनि भीमसेनो । मद्राधिपस्याथ ततो महात्मा । छित्त्वा धनुर्वेगवता शरेण । द्वाभ्यामविध्यत्सुभृशं नरेन्द्रम् ॥

tathā kṛte rājani bhīmaseno | madrādhipasyātha tato mahātmā | chittvā dhanurvegavatā śareṇa | dvābhyāmavidhyatsubhṛśaṃ narendram

राजा के इस दशा में पहुँचने पर महात्मा भीमसेन ने तुरंत वेगवान् बाण से मद्रराज का धनुष काट दिया और दो बाणों से उस नरेन्द्र को गहरा घायल किया।

श्लोक 22 (9.16.22)

तथापरेणास्य जहार यन्तुः । कायाच्छिरः संहननीयमध्यात् । जघान चाश्वांश्चतुरः सुशीघ्रं । तथा भृशं कुपितो भीमसेनः ॥

tathāpareṇāsya jahāra yantuḥ | kāyācchiraḥ saṃhananīyamadhyāt | jaghāna cāśvāṃścaturaḥ suśīghraṃ | tathā bhṛśaṃ kupito bhīmasenaḥ

फिर एक और बाण से उसने शल्य के सारथि का सिर कवच से कसे उसके धड़ से उड़ा दिया; और अत्यन्त कुपित भीमसेन ने शीघ्र ही चारों घोड़े भी मार डाले।

श्लोक 23 (9.16.23)

तमग्रणीः सर्वधनुर्धराणाम् । एकं चरन्तं समरेऽतिवेगम् । भीमः शतेन व्यकिरच्छराणां । माद्रीपुत्रः सहदेवस्तथैव ॥

tamagraṇīḥ sarvadhanurdharāṇām | ekaṃ carantaṃ samare'tivegam | bhīmaḥ śatena vyakiraccharāṇāṃ | mādrīputraḥ sahadevastathaiva

रण में अकेले अत्यन्त वेग से विचरते हुए उस शल्य को सब धनुर्धारियों में अग्रणी भीम ने सौ बाणों से ढक दिया, और माद्री-पुत्र सहदेव ने भी वैसा ही किया।

श्लोक 24 (9.16.24)

तैः सायकैर्मोहितं वीक्ष्य शल्यं । भीमः शरैरस्य चकर्त वर्म । स भीमसेनेन निकृत्तवर्मा । मद्राधिपश्चर्म सहस्रतारम् ॥

taiḥ sāyakairmohitaṃ vīkṣya śalyaṃ | bhīmaḥ śarairasya cakarta varma | sa bhīmasenena nikṛttavarmā | madrādhipaścarma sahasratāram

उन बाणों से शल्य को मूर्छित-सा देखकर भीम ने बाणों से उसका कवच काट डाला; और भीमसेन से कवच कट जाने पर मद्रराज ने हज़ार तारों से जड़ी ढाल उठा ली,

श्लोक 25 (9.16.25)

प्रगृह्य खड्गं च रथान्महात्मा । प्रस्कन्द्य कुन्तीसुतमभ्यधावत् । छित्त्वा रथेषां नकुलस्य सोऽथ । युधिष्ठिरं भीमबलोऽभ्यधावत् ॥

pragṛhya khaḍgaṃ ca rathānmahātmā | praskandya kuntīsutamabhyadhāvat | chittvā ratheṣāṃ nakulasya so'tha | yudhiṣṭhiraṃ bhīmabalo'bhyadhāvat

और तलवार भी लेकर उन महात्मा ने रथ से कूदकर कुन्तीपुत्र पर धावा बोला; नकुल के रथ का ईषादण्ड तोड़ते हुए वह भयंकर बलशाली युधिष्ठिर की ओर दौड़ा।

श्लोक 26 (9.16.26)

तं चापि राजानमथोत्पतन्तं । क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम् । धृष्टद्युम्नो द्रौपदेयाः शिखण्डी । शिनेश्च नप्ता सहसा परीयुः ॥

taṃ cāpi rājānamathotpatantaṃ | kruddhaṃ yathaivāntakamāpatantam | dhṛṣṭadyumno draupadeyāḥ śikhaṇḍī | śineśca naptā sahasā parīyuḥ

क्रोध से भरे, काल की भाँति टूटते हुए उस राजा को आक्रमण करता देखकर धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्रों, शिखण्डी और शिनि के पौत्र सात्यकि ने सहसा उसे घेर लिया।

श्लोक 27 (9.16.27)

अथास्य चर्माप्रतिमं न्यकृन्तद् । भीमो महात्मा नवभिः पृषत्कैः । खड्गं च भल्लैर्निचकर्त मुष्टौ । नदन्प्रहृष्टस्तव सैन्यमध्ये ॥

athāsya carmāpratimaṃ nyakṛntad | bhīmo mahātmā navabhiḥ pṛṣatkaiḥ | khaḍgaṃ ca bhallairnicakarta muṣṭau | nadanprahṛṣṭastava sainyamadhye

तब महात्मा भीम ने नौ बाणों से उसकी अनुपम ढाल काट डाली और भल्लों से मुट्ठी में थमी तलवार के टुकड़े कर दिए, और आपकी सेना के बीच हर्ष से गर्जना की।

श्लोक 28 (9.16.28)

तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य हृष्टाः । ते पाण्डवानां प्रवरा रथौघाः । नादं च चक्रुर्भृशमुत्स्मयन्तः । शङ्खांश्च दध्मुः शशिसन्निकाशान् ॥

tatkarma bhīmasya samīkṣya hṛṣṭāḥ | te pāṇḍavānāṃ pravarā rathaughāḥ | nādaṃ ca cakrurbhṛśamutsmayantaḥ | śaṅkhāṃśca dadhmuḥ śaśisannikāśān

भीम का वह कर्म देखकर पाण्डवों के श्रेष्ठ रथसमूह हर्षित हो उठे; मुस्कराते हुए उन्होंने जोर का नाद किया और चन्द्रमा के समान उजले शंख बजाए।

श्लोक 29 (9.16.29)

तेनाथ शब्देन विभीषणेन । तथाऽभितप्तं बलमप्रधृष्यम् । स्वेदाभिभूतं रुधिरोक्षिताङ्गं । विसञ्ज्ञकल्पं च तदा विषण्णम् ॥

tenātha śabdena vibhīṣaṇena | tathā'bhitaptaṃ balamapradhṛṣyam | svedābhibhūtaṃ rudhirokṣitāṅgaṃ | visañjñakalpaṃ ca tadā viṣaṇṇam

उस भयंकर ध्वनि से आपकी सेना, जो अब तक अजेय थी, सन्तप्त हो उठी; पसीने से तर, लहू से सने अंगों वाली, लगभग मूर्छित-सी वह विषाद में डूब गई।

श्लोक 30 (9.16.30)

स मद्रराजः सहसा विकीर्णो । भीमाग्रगैः पाण्डवयोधमुख्यैः । युधिष्ठिरस्याभिमुखं जवेन । सिंहो यथा मृगहेतोः प्रयातः ॥

sa madrarājaḥ sahasā vikīrṇo | bhīmāgragaiḥ pāṇḍavayodhamukhyaiḥ | yudhiṣṭhirasyābhimukhaṃ javena | siṃho yathā mṛgahetoḥ prayātaḥ

भीम को आगे किए पाण्डवों के प्रमुख योद्धाओं से अचानक घिर जाने पर वह मद्रराज वेग से युधिष्ठिर की ओर बढ़ा, जैसे सिंह अपने शिकार पर झपटता है।

श्लोक 31 (9.16.31)

स धर्मराजो निहताश्वसूतः । क्रोधेन दीप्तो ज्वलनप्रकाशः । दृष्ट्वा च मद्राधिपतिं स्म तूर्णं । समभ्यधावत्तमरिं बलेन ॥

sa dharmarājo nihatāśvasūtaḥ | krodhena dīpto jvalanaprakāśaḥ | dṛṣṭvā ca madrādhipatiṃ sma tūrṇaṃ | samabhyadhāvattamariṃ balena

घोड़े और सारथि के मारे जाने पर क्रोध से अग्नि के समान दहकते धर्मराज ने मद्रराज को देखा और बल के साथ उस शत्रु पर तुरंत झपट पड़े।

श्लोक 32 (9.16.32)

गोविन्दवाक्यं त्वरितं विचिन्त्य । दध्रे मतिं शल्यविनाशनाय । स धर्मराजो निहताश्वसूतो । रथे तिष्ठञ्शक्तिमथान्वकर्षत् ॥

govindavākyaṃ tvaritaṃ vicintya | dadhre matiṃ śalyavināśanāya | sa dharmarājo nihatāśvasūto | rathe tiṣṭhañśaktimathānvakarṣat

गोविन्द के वचन का शीघ्र स्मरण कर उन्होंने शल्य के विनाश का निश्चय किया; और घोड़े-सारथि के मारे जाने पर भी रथ में खड़े धर्मराज ने शक्ति निकाल ली।

श्लोक 33 (9.16.33)

तच्चापि शल्यस्य निशाम्य कर्म । तमात्मनो भागमथावशिष्टम् । कृत्वा मनः शल्यवधे महात्मा । यथोक्तमिन्द्रावरजस्य चक्रे ॥

taccāpi śalyasya niśāmya karma | tamātmano bhāgamathāvaśiṣṭam | kṛtvā manaḥ śalyavadhe mahātmā | yathoktamindrāvarajasya cakre

शल्य का वह कर्म देखकर और अपने कार्य का जो भाग शेष रह गया था उसे ध्यान में रखकर उन महात्मा ने शल्य-वध में मन लगाया और इन्द्र के छोटे भाई के कहे अनुसार किया।

श्लोक 34 (9.16.34)

स धर्मराजो मणिहेमदण्डां । जग्राह शक्तिं कनकप्रकाशाम् । नेत्रे च दीप्ते सहसा विवृत्य । मद्राधिपं क्रुद्धमना निरैक्षत् ॥

sa dharmarājo maṇihemadaṇḍāṃ | jagrāha śaktiṃ kanakaprakāśām | netre ca dīpte sahasā vivṛtya | madrādhipaṃ kruddhamanā niraikṣat

धर्मराज ने मणि और स्वर्ण के दण्ड वाली, सोने जैसी दीप्ति वाली शक्ति उठा ली और सहसा दहकती आँखें फाड़कर क्रोध भरे मन से मद्रराज की ओर देखा।

श्लोक 35 (9.16.35)

निरीक्षितो धर्मसुतेन राज्ञा । पूतात्मना निर्हृतकल्मषेण । आसीन्न यद्भस्मसान्मद्रराजः । तदद्भुतं मे प्रतिभाति राजन् ॥

nirīkṣito dharmasutena rājñā | pūtātmanā nirhṛtakalmaṣeṇa | āsīnna yadbhasmasānmadrarājaḥ | tadadbhutaṃ me pratibhāti rājan

धर्मपुत्र उस पवित्रात्मा, निष्पाप राजा की दृष्टि पड़ने पर भी मद्रराज भस्म नहीं हुआ; हे राजन्, मुझे यह अद्भुत प्रतीत होता है।

श्लोक 36 (9.16.36)

ततस्तु शक्तिं रुचिरोग्रदण्डां । मणिप्रवेकोज्ज्वलितां प्रदीप्ताम् । चिक्षेप वेगात्सुभृशं महात्मा । मद्राधिपाय प्रवरः कुरूणाम् ॥

tatastu śaktiṃ rucirogradaṇḍāṃ | maṇipravekojjvalitāṃ pradīptām | cikṣepa vegātsubhṛśaṃ mahātmā | madrādhipāya pravaraḥ kurūṇām

तब कुरुओं में श्रेष्ठ उन महात्मा ने मनोहर और भयंकर दण्ड वाली, उत्तम मणियों से जगमगाती, दहकती हुई शक्ति को बड़े वेग से मद्रराज की ओर फेंका।

श्लोक 37 (9.16.37)

दीप्तामथैनां प्रहितां बलेन । सविस्फुलिङ्गां सहसापतन्तीम् । प्रैक्षन्त सर्वे कुरवः समेता । दिवो युगान्ते महतीमिवोल्काम् ॥

dīptāmathaināṃ prahitāṃ balena | savisphuliṅgāṃ sahasāpatantīm | praikṣanta sarve kuravaḥ sametā | divo yugānte mahatīmivolkām

बड़े बल से छोड़ी गई, दहकती, चिनगारियाँ बिखेरती, सहसा गिरती उस शक्ति को सब एकत्र कौरवों ने ऐसे देखा जैसे युग के अन्त में आकाश से कोई महान् उल्का गिरती हो।

श्लोक 38 (9.16.38)

तां कालरात्रीमिव पाशहस्तां । यमस्य धात्रीमिव चोग्ररूपाम् । स ब्रह्मदण्डप्रतिमाममोघां । ससर्ज यत्तो युधि धर्मराजः ॥

tāṃ kālarātrīmiva pāśahastāṃ | yamasya dhātrīmiva cograrūpām | sa brahmadaṇḍapratimāmamoghāṃ | sasarja yatto yudhi dharmarājaḥ

पाश हाथ में लिए कालरात्रि के समान, यम की उग्र रूप वाली धात्री के समान, ब्रह्मदण्ड के तुल्य उस अमोघ शक्ति को धर्मराज ने सावधान होकर युद्ध में छोड़ा।

श्लोक 39 (9.16.39)

गन्धस्रगग्र्यासनपानभोजनैः । अभ्यर्चितां पाण्डुसुतैः प्रयत्नात् । सांवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं । कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्राम् ॥

gandhasragagryāsanapānabhojanaiḥ | abhyarcitāṃ pāṇḍusutaiḥ prayatnāt | sāṃvartakāgnipratimāṃ jvalantīṃ | kṛtyāmatharvāṅgirasīmivogrām

पाण्डवों ने जिसे गन्ध, मालाओं, उत्तम आसनों, पेय और भोजन से यत्नपूर्वक पूजा था, जो प्रलयाग्नि के समान जल रही थी और अथर्वाङ्गिरस मन्त्रों से उत्पन्न भयंकर कृत्या के समान थी।

श्लोक 40 (9.16.40)

ईशानहेतोः प्रतिनिर्मितां तां । त्वष्ट्रा रिपूणामसुदेहभक्ष्याम् । भूम्यन्तरिक्षद्युजलाश्रयाणि । प्रसह्य भूतानि निहन्तुमीशाम् ॥

īśānahetoḥ pratinirmitāṃ tāṃ | tvaṣṭrā ripūṇāmasudehabhakṣyām | bhūmyantarikṣadyujalāśrayāṇi | prasahya bhūtāni nihantumīśām

त्वष्टा ने जिसे ईशान के लिए फिर से रचा था, जो शत्रुओं के प्राण और शरीर को खा जाती थी, और पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा जल में रहने वाले प्राणियों को भी बलपूर्वक मार डालने में समर्थ थी।

श्लोक 41 (9.16.41)

घण्टापताकां मणिवज्रभूषां । वैदूर्यचित्रां तपनीयदण्डाम् । त्वष्ट्रा प्रयत्नान्नियमेन क्लृप्तां । ब्रह्मद्विषामन्तकरीममोघाम् ॥

ghaṇṭāpatākāṃ maṇivajrabhūṣāṃ | vaidūryacitrāṃ tapanīyadaṇḍām | tvaṣṭrā prayatnānniyamena klṛptāṃ | brahmadviṣāmantakarīmamoghām

उस पर घण्टे और पताका लगी थीं, वह मणियों और हीरों से सजी थी, वैदूर्य से चित्रित थी, उसका दण्ड स्वर्ण का था; त्वष्टा ने उसे यत्न और नियम से बनाया था, और वह ब्राह्मणद्रोहियों का अन्त करने वाली अमोघ शक्ति थी।

श्लोक 42 (9.16.42)

बलप्रयत्नादनिरोधवेगां । मन्त्रैश्च घोरैरपि पूरयित्वा । ससर्ज मार्गेण च तां खगानां । वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम् ॥

balaprayatnādanirodhavegāṃ | mantraiśca ghorairapi pūrayitvā | sasarja mārgeṇa ca tāṃ khagānāṃ | vadhāya madrādhipatestadānīm

अपने बल और प्रयत्न से जिसे अप्रतिहत वेग देकर और घोर मन्त्रों से भी अभिमन्त्रित कर, उन्होंने उस समय मद्रराज के वध के लिए आकाश-मार्ग से उसे छोड़ा।

श्लोक 43 (9.16.43)

हतो ह्यसावित्यभिगर्जमानो । रुद्रोऽन्धकायान्तकरं यथेषुम् । प्रसार्य बाहुं सुदृढं सुपाणिं । क्रोधेन नृत्यन्निव धर्मराजः ॥

hato hyasāvityabhigarjamāno | rudro'ndhakāyāntakaraṃ yatheṣum | prasārya bāhuṃ sudṛḍhaṃ supāṇiṃ | krodhena nṛtyanniva dharmarājaḥ

"यह मारा गया!" इस प्रकार गरजते हुए धर्मराज ने अपनी सुदृढ़, सुन्दर हथेली वाली भुजा फैलाई, मानो क्रोध से नाच रहे हों, जैसे रुद्र ने अन्धक का अन्त करने वाला बाण छोड़ते समय किया था।

श्लोक 44 (9.16.44)

स्फुरत्प्रभामण्डलिनोंऽशुजालैः । धर्मात्मनो मद्रविनाशकाले । पुरत्रयप्रोत्सरणे पुरस्तात् । माहेश्वरं रूपमभूत्तदानीम् ॥

sphuratprabhāmaṇḍalinoṃ'śujālaiḥ | dharmātmano madravināśakāle | puratrayaprotsaraṇe purastāt | māheśvaraṃ rūpamabhūttadānīm

उस समय मद्रराज के विनाश के क्षण में धर्मात्मा युधिष्ठिर किरणों के जाल से दमकते प्रभामण्डल से घिरकर वैसे ही महेश्वर के रूप में प्रकट हुए, जैसे त्रिपुर पर चढ़ाई करते समय महादेव सामने खड़े हुए थे।

श्लोक 45 (9.16.45)

आवर्तनाकुञ्चितबाहुदण्डः । सन्ध्याविहारी तनुवृत्तमध्यः । विशालवक्षा भगवान्हरो यथा । सुदुर्निरीक्ष्योऽभवदर्जुनाग्रजः ॥

āvartanākuñcitabāhudaṇḍaḥ | sandhyāvihārī tanuvṛttamadhyaḥ | viśālavakṣā bhagavānharo yathā | sudurnirīkṣyo'bhavadarjunāgrajaḥ

घुमाव से मुड़ी हुई दण्ड-सी भुजा वाले, सन्ध्याकाल के नृत्य में विचरते-से, पतली गोल कमर और विशाल वक्ष वाले अर्जुन के बड़े भाई उस समय भगवान् हर के समान दुर्निरीक्ष्य हो गए।

श्लोक 46 (9.16.46)

तां सर्वशक्त्या प्रहितां सुशक्तिं । युधिष्ठिरेणाप्रतिवार्यवीर्याम् । प्रतिग्रहायाभिननन्द शल्यः । सम्यग्घुतामग्निरिवाज्यधाराम् ॥

tāṃ sarvaśaktyā prahitāṃ suśaktiṃ | yudhiṣṭhireṇāprativāryavīryām | pratigrahāyābhinananda śalyaḥ | samyagghutāmagnirivājyadhārām

युधिष्ठिर के द्वारा पूरी शक्ति से छोड़ी गई उस अप्रतिरोध्य बल वाली उत्तम शक्ति को ग्रहण करने के लिए शल्य ने ऐसे आनन्द से स्वागत किया जैसे अग्नि विधिवत् डाली गई घी की धारा का करती है।

श्लोक 47 (9.16.47)

सा तस्य वर्माभिविदार्य शुभ्रम् । उरो विशालं च तथैव भित्त्वा । विवेश गां तोयमिवाप्रसक्ता । यशो विशालं नृपतेर्हरन्ती ॥

sā tasya varmābhividārya śubhram | uro viśālaṃ ca tathaiva bhittvā | viveśa gāṃ toyamivāprasaktā | yaśo viśālaṃ nṛpaterharantī

उसने उसके चमकते कवच को चीरकर और उसकी विशाल छाती को भी भेदकर, जल की भाँति बिना रुके पृथ्वी में प्रवेश किया, और राजा का विशाल यश हर लिया।

श्लोक 48 (9.16.48)

नासाक्षिकर्णास्यविनिःसृतेन । प्रस्यन्दता च व्रणसम्भवेन । संसिक्तगात्रो रुधिरेण सोऽभूत् । क्रौञ्चो यथा स्कन्दहतो महाद्रिः ॥

nāsākṣikarṇāsyaviniḥsṛtena | prasyandatā ca vraṇasambhavena | saṃsiktagātro rudhireṇa so'bhūt | krauñco yathā skandahato mahādriḥ

नाक, आँख, कान और मुँह से निकले तथा घाव से बहते रक्त से उसका शरीर तर हो गया; वह स्कन्द के मारे हुए महान् क्रौञ्च पर्वत जैसा दिखाई दिया।

श्लोक 49 (9.16.49)

प्रसार्य बाहू च रथाद्गतो गां । सञ्छिन्नवर्मा कुरुनन्दनेन । महेन्द्रवाहप्रतिमो महात्मा । वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ॥

prasārya bāhū ca rathādgato gāṃ | sañchinnavarmā kurunandanena | mahendravāhapratimo mahātmā | vajrāhataṃ śṛṅgamivācalasya

कुरुनन्दन के द्वारा कवच टूट जाने पर वह महात्मा दोनों भुजाएँ फैलाकर रथ से पृथ्वी पर आ गिरा, महेन्द्र के हाथी के समान, या वज्र से टूटे हुए पर्वत-शिखर के समान।

श्लोक 50 (9.16.50)

ततो निपतितः सोऽभूदिन्द्रध्वज इवोच्छ्रितः । बाहू प्रसार्याभिमुखो धर्मराजस्य मद्रराट् । स तथा भिन्नसर्वाङ्गो रुधिरेण समुक्षितः ॥

tato nipatitaḥ so'bhūdindradhvaja ivocchritaḥ | bāhū prasāryābhimukho dharmarājasya madrarāṭ | sa tathā bhinnasarvāṅgo rudhireṇa samukṣitaḥ

तब वह मद्रराज इन्द्रध्वज की भाँति ऊँचा उठा हुआ गिर पड़ा, धर्मराज की ओर मुँह किए, भुजाएँ फैलाए; उसका सारा शरीर फट चुका था और वह रक्त से नहाया हुआ था।

श्लोक 51 (9.16.51)

प्रत्युद्गत इव प्रेम्णा भूम्या स नरपुङ्गवः । प्रियया कान्तया कान्तः पतमान इवोरसि ॥

pratyudgata iva premṇā bhūmyā sa narapuṅgavaḥ | priyayā kāntayā kāntaḥ patamāna ivorasi

ऐसा लगता था कि पृथ्वी प्रेम से उस नरश्रेष्ठ की अगवानी को उठ आई है और वह किसी प्रेमी की भाँति अपनी प्रिय प्रेयसी की छाती पर गिर रहा है।

श्लोक 52 (9.16.52)

चिरं भुक्त्वा वसुमतीं प्रियां कान्तामिव प्रभुः । सर्वैरङ्गैः समाश्लिष्य प्रसुप्त इव चाभवत् ॥

ciraṃ bhuktvā vasumatīṃ priyāṃ kāntāmiva prabhuḥ | sarvairaṅgaiḥ samāśliṣya prasupta iva cābhavat

बहुत समय तक वसुन्धरा का भोग कर चुका वह प्रभु अपनी प्रिय पत्नी की तरह उसे सब अंगों से आलिंगन करके मानो सो गया।

श्लोक 53 (9.16.53)

धर्म्ये धर्मात्मना युद्धे निहतो धर्मसूनुना । सम्यक्स्फीत इवोत्सृष्टः प्रशान्तोऽग्निरिवाध्वरे ॥

dharmye dharmātmanā yuddhe nihato dharmasūnunā | samyaksphīta ivotsṛṣṭaḥ praśānto'gnirivādhvare

धर्मात्मा धर्मपुत्र के हाथों धर्मयुद्ध में मारा गया वह यज्ञ में भली-भाँति पोषित होकर छोड़ी गई और फिर शान्त हुई अग्नि के समान पड़ा था।

श्लोक 54 (9.16.54)

शक्त्या विभिन्नहृदयं विप्रविद्धायुधध्वजम् । संशान्तमपि मद्रेशं लक्ष्मीर्नैव विमुञ्चति ॥

śaktyā vibhinnahṛdayaṃ vipraviddhāyudhadhvajam | saṃśāntamapi madreśaṃ lakṣmīrnaiva vimuñcati

शक्ति से हृदय फट जाने पर, अस्त्र और ध्वजा के बिखर जाने पर, शान्त पड़े हुए भी मद्रराज को लक्ष्मी ने नहीं छोड़ा।

श्लोक 55 (9.16.55)

ततो युधिष्ठिरश्चापमादायेन्द्रधनुष्प्रभम् । व्यधमद्द्विषतः सङ्ख्ये खगराडिव पन्नगान् । देहान्सुनिशितैर्भल्लै रिपूणां नाशयन्क्षणात् ॥

tato yudhiṣṭhiraścāpamādāyendradhanuṣprabham | vyadhamaddviṣataḥ saṅkhye khagarāḍiva pannagān | dehānsuniśitairbhallai ripūṇāṃ nāśayankṣaṇāt

तब युधिष्ठिर ने इन्द्रधनुष की-सी आभा वाला धनुष उठाकर युद्ध में शत्रुओं को वैसे चीर डाला जैसे गरुड़ सर्पों को; तीखे भल्लों से उन्होंने क्षण भर में शत्रुओं के शरीर नष्ट कर दिए।

श्लोक 56 (9.16.56)

ततः पार्थस्य बाणौघैरावृताः सैनिकास्तव । निमीलिताक्षाः क्षिण्वन्तो भृशमन्योन्यकर्शिताः । क्षरन्तो रुधिरं देहैर्विशस्त्रायुधजीविताः ॥

tataḥ pārthasya bāṇaughairāvṛtāḥ sainikāstava | nimīlitākṣāḥ kṣiṇvanto bhṛśamanyonyakarśitāḥ | kṣaranto rudhiraṃ dehairviśastrāyudhajīvitāḥ

तब पार्थ के बाणसमूहों से ढके आपके सैनिक आँखें मूँदे, क्षीण होते हुए, एक-दूसरे से अत्यन्त पीड़ित होकर, शरीरों से रक्त बहाते, शस्त्र और प्राण से रहित हो गए।

श्लोक 57 (9.16.57)

ततः शल्ये निपतिते मद्रराजानुजो युवा । भ्रातुस्तुल्यो गुणैः सर्वै रथी पाण्डवमभ्ययात् ॥

tataḥ śalye nipatite madrarājānujo yuvā | bhrātustulyo guṇaiḥ sarvai rathī pāṇḍavamabhyayāt

तब शल्य के गिर जाने पर मद्रराज का छोटा भाई, जो युवा था और सब गुणों में भाई के समान था, रथ पर चढ़कर पाण्डव पर चढ़ आया।

श्लोक 58 (9.16.58)

विव्याध च नरश्रेष्ठो नाराचैर्बहुभिस्त्वरन् । हतस्यापचितिं भ्रातुश्चिकीर्षुर्युद्धदुर्मदः ॥

vivyādha ca naraśreṣṭho nārācairbahubhistvaran | hatasyāpacitiṃ bhrātuścikīrṣuryuddhadurmadaḥ

वह नरश्रेष्ठ, युद्ध के मद से उन्मत्त, मारे गए भाई का बदला लेने की इच्छा से शीघ्रता करता हुआ अनेक नाराचों से उन्हें बींधने लगा।

श्लोक 59 (9.16.59)

तं विव्याधाशुगैः षड्भिर्धर्मराजस्त्वरन्निव । कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च ॥

taṃ vivyādhāśugaiḥ ṣaḍbhirdharmarājastvaranniva | kārmukaṃ cāsya ciccheda kṣurābhyāṃ dhvajameva ca

धर्मराज ने मानो शीघ्रता से छह तीव्र बाणों से उसे बींधा, और दो क्षुरों से उसका धनुष तथा ध्वज भी काट डाला।

श्लोक 60 (9.16.60)

ततोऽस्य दीप्यमानेन सुदृढेन शितेन च । प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरच्छिरः ॥

tato'sya dīpyamānena sudṛḍhena śitena ca | pramukhe vartamānasya bhallenāpāharacchiraḥ

फिर सामने खड़े उस वीर का सिर उन्होंने दहकते, दृढ़ और तीखे भल्ल से काट गिराया।

श्लोक 61 (9.16.61)

सकुण्डलं तद्ददृशे पतमानं शिरो रथात् । पुण्यक्षयमनुप्राप्य पतन्स्वर्गादिव च्युतः ॥

sakuṇḍalaṃ taddadṛśe patamānaṃ śiro rathāt | puṇyakṣayamanuprāpya patansvargādiva cyutaḥ

कुण्डलों सहित वह सिर रथ से गिरता दिखाई दिया, जैसे पुण्य के क्षीण होने पर स्वर्ग से च्युत होकर कोई गिर रहा हो।

श्लोक 62 (9.16.62)

तस्यापकृत्तशीर्षं तु शरीरं पतितं रथात् । रुधिरेणावसिक्ताङ्गं दृष्ट्वा सैन्यमभज्यत ॥

tasyāpakṛttaśīrṣaṃ tu śarīraṃ patitaṃ rathāt | rudhireṇāvasiktāṅgaṃ dṛṣṭvā sainyamabhajyata

सिर कट जाने पर उसका शरीर भी, लहू से भीगे अंगों सहित, रथ से गिर पड़ा; यह देखकर सेना टूट गई।

श्लोक 63 (9.16.63)

विचित्रकवचे तस्मिन्हते मद्रनृपानुजे । हाहाकारं प्रकुर्वाणाः कुरवोऽभिप्रदुद्रुवुः ॥

vicitrakavace tasminhate madranṛpānuje | hāhākāraṃ prakurvāṇāḥ kuravo'bhipradudruvuḥ

विचित्र कवच वाले उस मद्रराज के छोटे भाई के मारे जाने पर कौरव हाहाकार करते हुए भाग खड़े हुए।

श्लोक 64 (9.16.64)

शल्यानुजं हतं दृष्ट्वा तावकास्त्यक्तजीविताः । वित्रेसुः पाण्डवभयात्प्रविध्वस्तास्तदा भृशम् ॥

śalyānujaṃ hataṃ dṛṣṭvā tāvakāstyaktajīvitāḥ | vitresuḥ pāṇḍavabhayātpravidhvastāstadā bhṛśam

शल्य के छोटे भाई को मरा देखकर आपके योद्धा, जिन्होंने जीवन की आशा छोड़ दी थी, पाण्डवों के भय से काँप उठे और अत्यन्त तितर-बितर हो गए।

श्लोक 65 (9.16.65)

तांस्तथा भज्यमानांस्तु कौरवान्भरतर्षभ । शिनेर्नप्ताऽकिरन्बाणैरभ्यवर्तत सात्यकिः ॥

tāṃstathā bhajyamānāṃstu kauravānbharatarṣabha | śinernaptā'kiranbāṇairabhyavartata sātyakiḥ

हे भरतश्रेष्ठ! उन कौरवों को इस प्रकार टूटते और भयभीत होते देख शिनि के पौत्र सात्यकि बाण बरसाते हुए उन पर चढ़ आए।

श्लोक 66 (9.16.66)

तमायान्तं महेष्वासं दुष्प्रसह्यं दुरासदम् । हार्दिक्यस्त्वरितो राजन्प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥

tamāyāntaṃ maheṣvāsaṃ duṣprasahyaṃ durāsadam | hārdikyastvarito rājanpratyagṛhṇādabhītavat

उस महाधनुर्धर को, जो दुर्धर्ष और दुर्जेय था, आते देख, हे राजन्, हार्दिक्य ने निर्भय की भाँति शीघ्रता से उसका सामना किया।

श्लोक 67 (9.16.67)

तौ समेतौ महात्मानौ वार्ष्णेयौ वरवाजिनौ । हार्दिक्यः सात्यकिश्चैव सिंहाविव बलोत्कटौ ॥

tau sametau mahātmānau vārṣṇeyau varavājinau | hārdikyaḥ sātyakiścaiva siṃhāviva balotkaṭau

वे दोनों महात्मा वृष्णिवंशी, हार्दिक्य और सात्यकि, उत्तम घोड़ों वाले, बल से उन्मत्त दो सिंहों की भाँति आपस में भिड़ गए।

श्लोक 68 (9.16.68)

इषुभिर्विमलाभासैश्छादयन्तौ परस्परम् । अर्चिर्भिरिव सूर्यस्य दिवाकरसमप्रभौ ॥

iṣubhirvimalābhāsaiśchādayantau parasparam | arcirbhiriva sūryasya divākarasamaprabhau

निर्मल चमक वाले बाणों से वे एक-दूसरे को ढकने लगे, मानो सूर्य की किरणों से; दोनों सूर्य के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 69 (9.16.69)

चापमार्गबलोद्धूतान्मार्गणान्वृष्णिसिंहयोः । आकाशगानपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् ॥

cāpamārgabaloddhūtānmārgaṇānvṛṣṇisiṃhayoḥ | ākāśagānapaśyāma pataṅgāniva śīghragān

उन दोनों वृष्णि-सिंहों के धनुषों की शक्ति से छूटे बाणों को हमने आकाश में तेज उड़ने वाले पक्षियों की भाँति जाते देखा।

श्लोक 70 (9.16.70)

सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः । चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा ॥

sātyakiṃ daśabhirviddhvā hayāṃścāsya tribhiḥ śaraiḥ | cāpamekena ciccheda hārdikyo nataparvaṇā

हार्दिक्य ने सात्यकि को दस बाणों से और उसके घोड़ों को तीन बाणों से बींधा, और एक नतपर्व बाण से उसका धनुष काट दिया।

श्लोक 71 (9.16.71)

तन्निकृत्तं धनुःश्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः । अन्यदादत्त वेगेन धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥

tannikṛttaṃ dhanuḥśreṣṭhamapāsya śinipuṅgavaḥ | anyadādatta vegena dhanurjaladaniḥsvanam

शिनियों में श्रेष्ठ सात्यकि ने कटे हुए उस श्रेष्ठ धनुष को फेंककर वेग से दूसरा धनुष उठाया, जो मेघ-गर्जना जैसा शब्द करता था।

श्लोक 72 (9.16.72)

तदादाय धनुःश्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् । हार्दिक्यं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥

tadādāya dhanuḥśreṣṭhaṃ variṣṭhaḥ sarvadhanvinām | hārdikyaṃ daśabhirbāṇaiḥ pratyavidhyatstanāntare

उस श्रेष्ठ धनुष को लेकर, सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ सात्यकि ने हार्दिक्य की छाती में दस बाणों से पलटकर प्रहार किया।

श्लोक 73 (9.16.73)

ततो युगं रथेषां च च्छित्त्वा भल्लैः सुसंयतैः । अश्वांस्तस्यावधीत्तूर्णमुभौ च पार्ष्णिसारथी ॥

tato yugaṃ ratheṣāṃ ca cchittvā bhallaiḥ susaṃyataiḥ | aśvāṃstasyāvadhīttūrṇamubhau ca pārṣṇisārathī

फिर सधे हुए भल्लों से उसने रथ का जुआ और ईषादण्ड काट डाला और शीघ्र ही घोड़ों तथा दोनों पार्ष्णि-सारथियों को मार डाला।

श्लोक 74 (9.16.74)

हार्दिक्यं विरथं दृष्ट्वा कृपः शारद्वतः प्रभो । अपोवाह ततः क्षिप्रं रथमारोप्य वीर्यवान् ॥

hārdikyaṃ virathaṃ dṛṣṭvā kṛpaḥ śāradvataḥ prabho | apovāha tataḥ kṣipraṃ rathamāropya vīryavān

हे प्रभो, हार्दिक्य को रथहीन देखकर वीर्यवान् कृप शारद्वत ने उसे अपने रथ पर चढ़ाकर शीघ्र वहाँ से हटा लिया।

श्लोक 75 (9.16.75)

मद्रराजे हते राजन्विरथे कृतवर्मणि । दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत्पराङ्मुखम् ॥

madrarāje hate rājanvirathe kṛtavarmaṇi | duryodhanabalaṃ sarvaṃ punarāsītparāṅmukham

हे राजन्! मद्रराज के मारे जाने और कृतवर्मा के रथहीन हो जाने पर दुर्योधन की सारी सेना फिर विमुख हो गई।

श्लोक 76 (9.16.76)

स्व परे नान्वबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृते । बलं तु हतभूयिष्ठं त्रस्तमासीत्पराङ्मुखम् ॥

sva pare nānvabudhyanta sainyena rajasā vṛte | balaṃ tu hatabhūyiṣṭhaṃ trastamāsītparāṅmukham

सेना की धूल से ढके होने के कारण वे अपने और पराये को न पहचान सके; अधिकांश मारी जा चुकी वह सेना भयभीत होकर पीठ फेरे हुए थी।

श्लोक 77 (9.16.77)

ततो मुहूर्तात्तेऽपश्यन्रजो भौमं समुत्थितम् । विविधैः शोणितस्रावैः प्रशान्तं पुरुषर्षभ ॥

tato muhūrtātte'paśyanrajo bhaumaṃ samutthitam | vividhaiḥ śoṇitasrāvaiḥ praśāntaṃ puruṣarṣabha

फिर थोड़ी देर बाद, हे पुरुषश्रेष्ठ, उन्होंने देखा कि पृथ्वी से जो धूल उठी थी वह रक्त की अनेक धाराओं से बैठ गई है।

श्लोक 78 (9.16.78)

ततो दुर्योधनो दृष्ट्वा भग्नं स्वबलमन्तिकात् । जवेनापततः पार्थानेकः सर्वानवारयत् ॥

tato duryodhano dṛṣṭvā bhagnaṃ svabalamantikāt | javenāpatataḥ pārthānekaḥ sarvānavārayat

तब दुर्योधन ने अपनी सेना को पास ही टूटते देख, वेग से आते हुए सभी पार्थों को अकेले रोक लिया।

श्लोक 79 (9.16.79)

पाण्डवान्सरथान्दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । आनर्त्तं च दुराधर्षं शितैर्बाणैरवारयत् ॥

pāṇḍavānsarathāndṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | ānarttaṃ ca durādharṣaṃ śitairbāṇairavārayat

रथों सहित पाण्डवों को, पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न को और दुर्जेय आनर्त को देखकर उसने तीखे बाणों से उन्हें रोका।

श्लोक 80 (9.16.80)

तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम् । अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्योऽपि न्यवर्तत ॥

taṃ pare nābhyavartanta martyā mṛtyumivāgatam | athānyaṃ rathamāsthāya hārdikyo'pi nyavartata

जैसे आती हुई मृत्यु का सामना मनुष्य नहीं कर सकते, वैसे ही शत्रु उसका सामना न कर सके; और हार्दिक्य भी दूसरे रथ पर चढ़कर लौट आया।

श्लोक 81 (9.16.81)

ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः । चतुर्भिर्निजघानाश्वान्पत्रिभिः कृतवर्मणः । विव्याध गौतमं चापि षड्भिर्भल्लैः सुतेजनैः ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā tvaramāṇo mahārathaḥ | caturbhirnijaghānāśvānpatribhiḥ kṛtavarmaṇaḥ | vivyādha gautamaṃ cāpi ṣaḍbhirbhallaiḥ sutejanaiḥ

तब महारथी राजा युधिष्ठिर ने शीघ्रता से चार बाणों से कृतवर्मा के घोड़े मार डाले और छह तीखे भल्लों से गौतम को भी बींधा।

श्लोक 82 (9.16.82)

अश्वत्थामा ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम् । तमपोवाह हार्दिक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात् ॥

aśvatthāmā tato rājñā hatāśvaṃ virathīkṛtam | tamapovāha hārdikyaṃ svarathena yudhiṣṭhirāt

तब अश्वत्थामा ने उस हार्दिक्य को, जिसके घोड़े राजा ने मार डाले थे और जिसे रथहीन कर दिया था, अपने रथ में युधिष्ठिर के सामने से हटा लिया।

श्लोक 83 (9.16.83)

ततः शारद्वतः षड्भिः प्रत्यविध्यद्युधिष्ठिरम् । विव्याध चाश्वान्निशितैस्तस्याष्टाभिः शिलीमुखैः ॥

tataḥ śāradvataḥ ṣaḍbhiḥ pratyavidhyadyudhiṣṭhiram | vivyādha cāśvānniśitaistasyāṣṭābhiḥ śilīmukhaiḥ

फिर शारद्वत ने छह बाणों से युधिष्ठिर को पलटकर बींधा और आठ तीखे शिलीमुखों से उनके घोड़ों को भी बींध दिया।

श्लोक 84 (9.16.84)

एवमेतन्महाराज युद्धशेषमवर्तत । तव दुर्मन्त्रिते राजन्सहपुत्रस्य भारत ॥

evametanmahārāja yuddhaśeṣamavartata | tava durmantrite rājansahaputrasya bhārata

हे महाराज, इस प्रकार शेष युद्ध चलता रहा; हे राजन्, हे भारत, यह आपकी और आपके पुत्र की बुरी मन्त्रणा का फल था।

श्लोक 85 (9.16.85)

तस्मिन्महेष्वासधरे विशस्ते । सङ्ग्राममध्ये कुरुपुङ्गवेन । पार्थाः समेताः परमप्रहृष्टाः । शङ्खान्प्रदध्मुर्हतमीक्ष्य शल्यम् ॥

tasminmaheṣvāsadhare viśaste | saṅgrāmamadhye kurupuṅgavena | pārthāḥ sametāḥ paramaprahṛṣṭāḥ | śaṅkhānpradadhmurhatamīkṣya śalyam

उस महाधनुर्धर शल्य को रण के बीच कुरुश्रेष्ठ के हाथों मारा गया देख, इकट्ठे हुए पार्थ अत्यन्त प्रसन्न होकर शंख बजाने लगे।

श्लोक 86 (9.16.86)

युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ । पुरा सुरा वृत्रवधे यथेन्द्रम् । चक्रुश्च नानाविधवाद्यशब्दान् । निनादयन्तो वसुधां समन्तात् ॥

yudhiṣṭhiraṃ ca praśaśaṃsurājau | purā surā vṛtravadhe yathendram | cakruśca nānāvidhavādyaśabdān | ninādayanto vasudhāṃ samantāt

और जैसे वृत्र-वध के समय देवताओं ने इन्द्र की स्तुति की थी, वैसे ही उन्होंने युद्ध में युधिष्ठिर की प्रशंसा की, और नाना प्रकार के वाद्यों की ध्वनि करते हुए सारी पृथ्वी को चारों ओर गुँजा दिया।

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