शान्ति पर्व · अध्याय 96
धर्म से ही विजय
भीष्म सिखाते हैं कि राजा को अधर्म से पृथ्वी जीतने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी विजय अस्थिर होती है और राजा तथा भूमि दोनों को गिराती है। वे हारकर शरण में आए शत्रु पर दया, पराजितों और उनके धन के लिए एक वर्ष की रक्षा-अवधि, राजा से राजा के ही लड़ने का नियम, और दोनों सेनाओं के बीच ब्राह्मण के आ जाने पर युद्ध रोकने का विधान बताते हैं। जीते हुओं को शीघ्र कृपा से अपनाना चाहिए, नहीं तो वे शत्रुओं से मिल जाएँगे; प्रतर्दन, दिवोदास और नाभाग के उदाहरण पुराने राजाओं के कर्मों को दिखाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.96.1)
नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः । अधर्मविजयं लब्ध्वा को नु मन्येत भूमिपः ॥
nādharmeṇa mahīṃ jetuṃ lipseta jagatīpatiḥ | adharmavijayaṃ labdhvā ko nu manyeta bhūmipaḥ
राजा को अधर्म से पृथ्वी को जीतने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। अधर्म से विजय पाकर कौन-सा राजा उसे अच्छा मान सकता है?
श्लोक 2 (12.96.2)
अधर्मयुक्तो विजयो ह्यध्रुवोऽस्वर्ग्य एव च । पातयत्येव राजानं महीं च भरतर्षभ ॥
adharmayukto vijayo hyadhruvo'svargya eva ca | pātayatyeva rājānaṃ mahīṃ ca bharatarṣabha
अधर्म से युक्त विजय अस्थिर होती है और स्वर्ग का मार्ग रोकने वाली है; हे भरतश्रेष्ठ! वह राजा को और पृथ्वी को भी गिरा देती है।
श्लोक 3 (12.96.3)
विशीर्णकवचं चैव तवास्मीति च वादिनम् । कृताञ्जलिं न्यस्तशस्त्रं गृहीत्वा न विहिंसयेत् ॥
viśīrṇakavacaṃ caiva tavāsmīti ca vādinam | kṛtāñjaliṃ nyastaśastraṃ gṛhītvā na vihiṃsayet
जिसका कवच टूट गया हो, जो कहे ‘मैं आपका हूँ’, जो हाथ जोड़े हो और शस्त्र रख चुका हो — उसे पकड़कर भी मारना नहीं चाहिए।
श्लोक 4 (12.96.4)
बलेन विजितो यश्च न तं युध्येत भूमिपः । संवत्सरं विप्रणयेत्तस्माज्जातः पुनर्भवेत् ॥
balena vijito yaśca na taṃ yudhyeta bhūmipaḥ | saṃvatsaraṃ vipraṇayettasmājjātaḥ punarbhavet
राजा को चाहिए कि बल से पराजित हुए व्यक्ति से और न लड़े; उसे एक वर्ष तक अपने संरक्षण में रखे, उसके बाद वह मानो नया जन्म पाया हुआ हो जाता है।
श्लोक 5 (12.96.5)
नार्वाक्संवत्सरात्कन्या प्रष्टव्या विक्रमाहृता । एवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसा हृतम् ॥
nārvāksaṃvatsarātkanyā praṣṭavyā vikramāhṛtā | evameva dhanaṃ sarvaṃ yaccānyatsahasā hṛtam
बल से हरी गई कन्या के पास एक वर्ष पूरा होने से पहले नहीं जाना चाहिए; इसी प्रकार सारे धन और अन्य जो कुछ अचानक छीना गया हो, उसके विषय में भी यही नियम है।
श्लोक 6 (12.96.6)
न तु वन्ध्यं धनं तिष्ठेत्पिबेयुर्ब्राह्मणाः पयः । युञ्जीरन्नप्यनडुहः क्षन्तव्यं वा पुनर्भवेत् ॥
na tu vandhyaṃ dhanaṃ tiṣṭhetpibeyurbrāhmaṇāḥ payaḥ | yuñjīrannapyanaḍuhaḥ kṣantavyaṃ vā punarbhavet
धन निष्फल होकर पड़ा न रहे: ब्राह्मण दूध पिएँ, बैल हल-गाड़ी में जोते जाएँ; अथवा बाद में क्षमा करके उसे छोड़ दिया जाए।
श्लोक 7 (12.96.7)
राज्ञा राजैव योद्धव्यस्तथा धर्मो विधीयते । नान्यो राजानमभ्यस्येदराजन्यः कथंचन ॥
rājñā rājaiva yoddhavyastathā dharmo vidhīyate | nānyo rājānamabhyasyedarājanyaḥ kathaṃcana
राजा से राजा को ही लड़ना चाहिए — ऐसा धर्म ठहराया गया है। जो राजवंश का न हो, वह किसी प्रकार राजा पर आक्रमण न करे।
श्लोक 8 (12.96.8)
अनीकयोः संहतयोर्यदीयाद्ब्राह्मणोऽन्तरा । शान्तिमिच्छन्नुभयतो न योद्धव्यं तदा भवेत् ॥
anīkayoḥ saṃhatayoryadīyādbrāhmaṇo'ntarā | śāntimicchannubhayato na yoddhavyaṃ tadā bhavet
यदि आपस में भिड़ी हुई दो सेनाओं के बीच कोई ब्राह्मण शान्ति की इच्छा से आ जाए, तो दोनों ओर से तब युद्ध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 9 (12.96.9)
मर्यादां शाश्वतीं भिन्द्याद्ब्राह्मणं योऽभिलङ्घयेत् । अथ चेल्लङ्घयेदेव मर्यादां क्षत्रियब्रुवः । असङ्ख्येयस्तदूर्ध्वं स्यादनादेयश्च संसदि ॥
maryādāṃ śāśvatīṃ bhindyādbrāhmaṇaṃ yo'bhilaṅghayet | atha cellaṅghayedeva maryādāṃ kṣatriyabruvaḥ | asaṅkhyeyastadūrdhvaṃ syādanādeyaśca saṃsadi
जो ब्राह्मण का उल्लंघन करता है, वह सनातन मर्यादा को तोड़ता है। और यदि नाम मात्र का क्षत्रिय उस मर्यादा को लाँघे, तो उसके बाद वह गणना के योग्य न रहे और सभा में अग्राह्य हो।
श्लोक 10 (12.96.10)
या तु धर्मविलोपेन मर्यादाभेदनेन च । तां वृत्तिं नानुवर्तेत विजिगीषुर्महीपतिः ॥
yā tu dharmavilopena maryādābhedanena ca | tāṃ vṛttiṃ nānuvarteta vijigīṣurmahīpatiḥ
जो वृत्ति धर्म का लोप करने और मर्यादा तोड़ने से प्राप्त होती है, उस वृत्ति का विजय चाहने वाला राजा अनुसरण न करे।
श्लोक 11 (12.96.11)
धर्मलब्धाद्धि विजयाल्लाभः कोऽभ्यधिको भवेत् ॥
dharmalabdhāddhi vijayāllābhaḥ ko'bhyadhiko bhavet
धर्म से प्राप्त विजय से बढ़कर और कौन-सा लाभ हो सकता है?
श्लोक 12 (12.96.12)
सहसा न्याय्यभूतानि क्षिप्रमेव प्रसादयेत् । सान्त्वेन भोगदानेन स राज्ञां परमो नयः ॥
sahasā nyāyyabhūtāni kṣiprameva prasādayet | sāntvena bhogadānena sa rājñāṃ paramo nayaḥ
जो लोग अचानक उसके न्यायसंगत प्रजाजन बन गए हों, उन्हें वह शीघ्र ही मधुर वचन और भोग-सामग्री के दान से प्रसन्न करे; यही राजाओं की सर्वोत्तम नीति है।
श्लोक 13 (12.96.13)
भुज्यमाना ह्यभोगेन स्वराष्ट्रादभितापिताः । अमित्रान्पर्युपासीरन्व्यसनौघप्रतीक्षिणः ॥
bhujyamānā hyabhogena svarāṣṭrādabhitāpitāḥ | amitrānparyupāsīranvyasanaughapratīkṣiṇaḥ
जो प्रजा बिना भोग पाए ही शोषित हो रही हो और अपने ही राष्ट्र से पीड़ित हो, वह विपत्तियों की बाढ़ की प्रतीक्षा करती हुई उसके शत्रुओं की सेवा में लग जाएगी।
श्लोक 14 (12.96.14)
अमित्रोपग्रहं चास्य ते कुर्युः क्षिप्रमापदि । संतुष्टाः सर्वतो राजन्राजव्यसनकाङ्क्षिणः ॥
amitropagrahaṃ cāsya te kuryuḥ kṣipramāpadi | saṃtuṣṭāḥ sarvato rājanrājavyasanakāṅkṣiṇaḥ
और वे संकट के समय शीघ्र ही उसके शत्रुओं का साथ देंगे — हे राजन्! सब ओर से सन्तुष्ट, राजा पर विपत्ति की कामना करते हुए।
श्लोक 15 (12.96.15)
नामित्रो विनिकर्तव्यो नातिच्छेद्यः कथंचन । जीवितं ह्यप्यतिच्छिन्नः संत्यजेदेकदा नरः ॥
nāmitro vinikartavyo nāticchedyaḥ kathaṃcana | jīvitaṃ hyapyaticchinnaḥ saṃtyajedekadā naraḥ
शत्रु को न छलना चाहिए और न किसी प्रकार उसे अत्यन्त काट देना चाहिए; क्योंकि अत्यन्त काटा गया मनुष्य अपना जीवन भी एक साथ त्याग सकता है।
श्लोक 16 (12.96.16)
अल्पेनापि च संयुक्तस्तुष्यते नापराधितः । शुद्धं जीवितमेवापि तादृशो बहुमन्यते ॥
alpenāpi ca saṃyuktastuṣyate nāparādhitaḥ | śuddhaṃ jīvitamevāpi tādṛśo bahumanyate
थोड़े से भी युक्त मनुष्य सन्तुष्ट रहता है, यदि उसके साथ अपराध न किया जाए; ऐसा मनुष्य निर्दोष जीवन को भी बहुत मानता है।
श्लोक 17 (12.96.17)
यस्य स्फीतो जनपदः संपन्नः प्रियराजकः । संतुष्टभृत्यसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥
yasya sphīto janapadaḥ saṃpannaḥ priyarājakaḥ | saṃtuṣṭabhṛtyasacivo dṛḍhamūlaḥ sa pārthivaḥ
जिसका देश समृद्ध और सम्पन्न है, जिसके शासक प्रजा को प्रिय हैं, और जिसके सेवक तथा मन्त्री सन्तुष्ट हैं, वह राजा दृढ़ जड़ वाला है।
श्लोक 18 (12.96.18)
ऋत्विक्पुरोहिताचार्या ये चान्ये श्रुतसत्तमाः । पूजार्हाः पूजिता यस्य स वै लोकविदुच्यते ॥
ṛtvikpurohitācāryā ye cānye śrutasattamāḥ | pūjārhāḥ pūjitā yasya sa vai lokaviducyate
ऋत्विज, पुरोहित, आचार्य और अन्य जो शास्त्रज्ञों में श्रेष्ठ तथा पूजा के योग्य हैं, वे जिसके द्वारा पूजित होते हैं, वही राजा सचमुच लोक को जानने वाला कहा जाता है।
श्लोक 19 (12.96.19)
एतेनैव च वृत्तेन महीं प्राप सुरोत्तमः । अन्येऽपि चैव विजयं विजिगीषन्ति पार्थिवाः ॥
etenaiva ca vṛttena mahīṃ prāpa surottamaḥ | anye'pi caiva vijayaṃ vijigīṣanti pārthivāḥ
इसी आचरण से देवश्रेष्ठ ने पृथ्वी प्राप्त की थी, और अन्य राजा भी इसी प्रकार विजय की इच्छा करते हैं।
श्लोक 20 (12.96.20)
भूमिवर्जं धनं राजा जित्वा राजन्महाहवे । अपि चान्नोषधीः शश्वदाजहार प्रतर्दनः ॥
bhūmivarjaṃ dhanaṃ rājā jitvā rājanmahāhave | api cānnoṣadhīḥ śaśvadājahāra pratardanaḥ
हे राजन्! भूमि को छोड़कर, महायुद्ध में धन जीतकर राजा प्रतर्दन अन्न और ओषधियाँ भी सदा ले आता था।
श्लोक 21 (12.96.21)
अग्निहोत्राग्निशेषं च हविर्भोजनमेव च । आजहार दिवोदासस्ततो विप्रकृतोऽभवत् ॥
agnihotrāgniśeṣaṃ ca havirbhojanameva ca | ājahāra divodāsastato viprakṛto'bhavat
दिवोदास अग्निहोत्र की अग्नि का शेष हविष्य, हवि और पका हुआ भोजन ले आया, और उससे वह अपमानित हुआ।
श्लोक 22 (12.96.22)
सराजकानि राष्ट्राणि नाभागो दक्षिणां ददौ । अन्यत्र श्रोत्रियस्वाच्च तापसार्थाच्च भारत ॥
sarājakāni rāṣṭrāṇi nābhāgo dakṣiṇāṃ dadau | anyatra śrotriyasvācca tāpasārthācca bhārata
नाभाग ने राजाओं सहित राष्ट्र दक्षिणा में दिए — हे भारत! केवल श्रोत्रियों की सम्पत्ति और तपस्वियों के लिए निर्धारित भाग को छोड़कर।
श्लोक 23 (12.96.23)
उच्चावचानि वित्तानि धर्मज्ञानां युधिष्ठिर । आसन्राज्ञां पुराणानां सर्वं तन्मम रोचते ॥
uccāvacāni vittāni dharmajñānāṃ yudhiṣṭhira | āsanrājñāṃ purāṇānāṃ sarvaṃ tanmama rocate
हे युधिष्ठिर! धर्म को जानने वाले पुराने राजाओं के पास ऊँची-नीची सब प्रकार की सम्पत्तियाँ थीं; वह सब मुझे उचित लगता है।
श्लोक 24 (12.96.24)
सर्वविद्यातिरेकेण जयमिच्छेन्महीपतिः । न मायया न दम्भेन य इच्छेद्भूतिमात्मनः ॥
sarvavidyātirekeṇa jayamicchenmahīpatiḥ | na māyayā na dambhena ya icchedbhūtimātmanaḥ
जो अपना कल्याण चाहता है, वह राजा सब विद्याओं में श्रेष्ठता के द्वारा विजय की इच्छा करे; माया या छल-कपट से नहीं।