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दशम स्कन्ध · अध्याय 33

रास-नृत्य

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (bhagavata.10.33.1)

श्रीशुक उवाच इत्थं भगवतो गोप्यः श्रुत्वा वाचः सुपेशलाः । जहुर्विरहजं तापं तदङ्गोपचिताशिषः ॥ १ ॥

śrī-śuka uvāca ittham bhagavato gopyaḥ śrutvā vācaḥ su-peśalāḥ jahur viraha-jaṁ tāpaṁ tad-aṅgopacitāśiṣaḥ

शुकदेव जी ने कहा — भगवान के इन अत्यन्त मनोहर वचनों को सुनकर गोपियों ने विरह की व्यथा त्याग दी, और उनके अंगों के स्पर्श से उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो गईं।

श्लोक 2 (bhagavata.10.33.2)

तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुव्रतैः । स्त्रीरत्नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्धबाहुभिः ॥ २ ॥

tatrārabhata govindo rāsa-krīḍām anuvrataiḥ strī-ratnair anvitaḥ prītair anyonyābaddha-bāhubhiḥ

वहाँ गोविन्द ने अपनी अनुरागिनी गोपियों के साथ रास-क्रीड़ा आरम्भ की — वे स्त्रियों में रत्नस्वरूप, प्रसन्नचित्त, परस्पर एक-दूसरे की भुजाओं में बाँहें डाले हुए थीं।

श्लोक 3 (bhagavata.10.33.3)

रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः । योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः । प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः । यं मन्येरन् नभस्तावद् विमानशतसङ्कुलम् । दिवौकसां सदाराणामौत्सुक्यापहृतात्मनाम् ॥ ३ ॥

rāsotsavaḥ sampravṛtto gopī-maṇḍala-maṇḍitaḥ yogeśvareṇa kṛṣṇena tāsāṁ madhye dvayor dvayoḥ praviṣṭena gṛhītānāṁ kaṇṭhe sva-nikaṭaṁ striyaḥ yaṁ manyeran nabhas tāvad vimāna-śata-saṅkulam divaukasāṁ sa-dārāṇām autsukyāpahṛtātmanām

इस प्रकार रास का उत्सव आरम्भ हुआ, जिसे गोपियों का घेरा सुशोभित कर रहा था। योगेश्वर कृष्ण ने प्रत्येक दो गोपियों के मध्य प्रवेश करके अपनी भुजा उनके कण्ठ में डाल दी, जिससे प्रत्येक स्त्री यह मानने लगी कि वे उसी के निकट खड़े हैं। उसी समय आकाश देवताओं तथा उनकी पत्नियों के सैकड़ों विमानों से भर गया, जो उत्सुकतावश खिंचे चले आए थे।

श्लोक 4 (bhagavata.10.33.4)

ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्पवृष्टयः । जगुर्गन्धर्वपतयः सस्त्रीकास्तद्यशोऽमलम् ॥ ४ ॥

tato dundubhayo nedur nipetuḥ puṣpa-vṛṣṭayaḥ jagur gandharva-patayaḥ sa-strīkās tad-yaśo ’malam

तब आकाश में नगाड़े गूँज उठे, पुष्पों की वर्षा होने लगी, और गन्धर्वराज अपनी पत्नियों सहित उनकी निर्मल कीर्ति का गान करने लगे।

श्लोक 5 (bhagavata.10.33.5)

वलयानां नूपुराणां किङ्किणीनां च योषिताम् । सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रासमण्डले ॥ ५ ॥

valayānāṁ nūpurāṇāṁ kiṅkiṇīnāṁ ca yoṣitām sa-priyāṇām abhūc chabdas tumulo rāsa-maṇḍale

रास-मण्डल में अपने प्रियतम के साथ नृत्य करती हुई गोपियों की चूड़ियों, नूपुरों और करधनी की घंटियों से एक कोलाहलमय ध्वनि उत्पन्न होने लगी।

श्लोक 6 (bhagavata.10.33.6)

तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः । मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥ ६ ॥

tatrātiśuśubhe tābhir bhagavān devakī-sutaḥ madhye maṇīnāṁ haimānāṁ mahā-marakato yathā

वहाँ उनके बीच देवकीनन्दन भगवान अत्यन्त शोभायमान दिखाई दिए, मानो स्वर्ण के आभूषणों के बीच कोई महामरकत मणि हो।

श्लोक 7 (bhagavata.10.33.7)

पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्भ्रूविलासै- र्भज्यन्मध्यैश्चलकुचपटैः कुण्डलैर्गण्डलोलैः । स्विद्यन्मुख्यः कवररसनाग्रन्थयः कृष्णवध्वो गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥ ७ ॥

pāda-nyāsair bhuja-vidhutibhiḥ sa-smitair bhrū-vilāsair bhajyan madhyaiś cala-kuca-paṭaiḥ kuṇḍalair gaṇḍa-lolaiḥ svidyan-mukhyaḥ kavara-rasanāgranthayaḥ kṛṣṇa-vadhvo gāyantyas taṁ taḍita iva tā megha-cakre virejuḥ

अपने चरणों की गति, भुजाओं के हिलने, मुस्कुराती हुई भौंहों की क्रीड़ा, झुकती हुई कमर, वक्षस्थल के वस्त्रों के लहराने, गालों पर झूलते कुण्डलों, पसीने से चमकते मुखों तथा कसकर बँधी हुई वेणी और करधनी के साथ, कृष्ण की वे वधुएँ उनका गान करती हुई मेघों के समूह में बिजली की चमक के समान शोभायमान हुईं।

श्लोक 8 (bhagavata.10.33.8)

उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः । कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम् ॥ ८ ॥

uccair jagur nṛtyamānā rakta-kaṇṭhyo rati-priyāḥ kṛṣṇābhimarśa-muditā yad-gītenedam āvṛtam

वे उच्च स्वर में गाती हुई नृत्य करने लगीं, उनके कण्ठ रंजित थे, वे प्रेम-विहार में तल्लीन थीं, कृष्ण के स्पर्श से आनन्दित थीं — और उनका यह गान सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करने लगा।

श्लोक 9 (bhagavata.10.33.9)

काचित् समं मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिताः । उन्निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साध्विति । तदेव ध्रुवमुन्निन्ये तस्यै मानं च बह्वदात् ॥ ९ ॥

kācit samaṁ mukundena svara-jātīr amiśritāḥ unninye pūjitā tena prīyatā sādhu sādhv iti tad eva dhruvam unninye tasyai mānaṁ ca bahv adāt

किसी गोपी ने मुकुन्द के साथ गाते हुए उनकी ध्वनि से भिन्न शुद्ध स्वर उठाए; प्रसन्न होकर उन्होंने उसका सम्मान करते हुए कहा — 'साधु, साधु!' तब किसी अन्य ने उसी स्वर-लहरी को ठीक उसी प्रकार उठाया, और उन्होंने उसे भी विशेष आदर दिया।

श्लोक 10 (bhagavata.10.33.10)

काचिद् रासपरिश्रान्ता पार्श्वस्थस्य गदाभृतः । जग्राह बाहुना स्कन्धं श्लथद्वलयमल्लिका ॥ १० ॥

kācid rāsa-pariśrāntā pārśva-sthasya gadā-bhṛtaḥ jagrāha bāhunā skandhaṁ ślathad-valaya-mallikā

रास-नृत्य से थकी हुई किसी गोपी ने अपने पास खड़े गदाधारी कृष्ण के कन्धे पर अपनी भुजा टिका दी, जिससे उसकी चूड़ियाँ और केशों में लगे चमेली के फूल ढीले पड़ गए।

श्लोक 11 (bhagavata.10.33.11)

तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम् । चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह ॥ ११ ॥

tatraikāṁsa-gataṁ bāhuṁ kṛṣṇasyotpala-saurabham candanāliptam āghrāya hṛṣṭa-romā cucumba ha

अपने कन्धे पर रखी हुई कृष्ण की उस भुजा को, जो नीलकमल के समान सुगन्धित थी और चन्दन से लेपित थी, सूँघकर उसने रोमांचित होकर उसे चूम लिया।

श्लोक 12 (bhagavata.10.33.12)

कस्याश्चिन्नाट्यविक्षिप्त कुण्डलत्विषमण्डितम् । गण्डं गण्डे सन्दधत्याः प्रादात्ताम्बूलचर्वितम् ॥ १२ ॥

kasyāścin nāṭya-vikṣipta kuṇḍala-tviṣa-maṇḍitam gaṇḍaṁ gaṇḍe sandadhatyāḥ prādāt tāmbūla-carvitam

किसी गोपी ने नृत्य करते समय हिलते हुए कुण्डलों की चमक से सुशोभित अपना गाल कृष्ण के गाल से सटा दिया, तो उन्होंने अपना चबाया हुआ ताम्बूल उसे प्रदान किया।

श्लोक 13 (bhagavata.10.33.13)

नृत्यती गायती काचित् कूजन्नूपुरमेखला । पार्श्वस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात्स्तनयोः शिवम् ॥ १३ ॥

nṛtyatī gāyatī kācit kūjan nūpura-mekhalā pārśva-sthācyuta-hastābjaṁ śrāntādhāt stanayoḥ śivam

नृत्य और गान करती हुई, अपने नूपुरों और करधनी को झंकृत करती हुई, कोई गोपी थककर पास खड़े अच्युत के मंगलमय कर-कमल को अपने वक्षस्थल पर रख लेती।

श्लोक 14 (bhagavata.10.33.14)

गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं श्रिय एकान्तवल्लभम् । गृहीतकण्ठ्यस्तद्दोर्भ्यां गायन्त्यस्तं विजह्रिरे ॥ १४ ॥

gopyo labdhvācyutaṁ kāntaṁ śriya ekānta-vallabham gṛhīta-kaṇṭhyas tad-dorbhyāṁ gāyantyas tam vijahrire

श्री (लक्ष्मी) के एकमात्र प्रियतम अच्युत को अपने प्रेमी के रूप में पाकर गोपियाँ, जिनके कण्ठ उनकी भुजाओं में बँधे थे, उनका गान करती हुई आनन्दमग्न हो गईं।

श्लोक 15 (bhagavata.10.33.15)

कर्णोत्पलालकविटङ्ककपोलघर्म- वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः । गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश- स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम् ॥ १५ ॥

karṇotpalālaka-viṭaṅka-kapola-gharma- vaktra-śriyo valaya-nūpura-ghoṣa-vādyaiḥ gopyaḥ samaṁ bhagavatā nanṛtuḥ sva-keśa- srasta-srajo bhramara-gāyaka-rāsa-goṣṭhyām

कानों पर सजे कमल-पुष्पों, पसीने से चमकते गालों को घेरे हुए केशों की लटों से सुशोभित मुख-सौन्दर्य के साथ, और चूड़ियों तथा नूपुरों की झंकार के बीच, गोपियाँ रास-सभा में भगवान के साथ नृत्य करने लगीं, उनके केशों की मालाएँ ढीली होकर गिरने लगीं, और भ्रमर गायकों की भाँति गुंजार करने लगे।

श्लोक 16 (bhagavata.10.33.16)

एवं परिष्वङ्गकराभिमर्श- स्निग्धेक्षणोद्दामविलासहासैः । रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि- र्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः ॥ १६ ॥

evaṁ pariṣvaṅga-karābhimarśa- snigdhekṣaṇoddāma-vilāsa-hāsaiḥ reme rameśo vraja-sundarībhir yathārbhakaḥ sva-pratibimba-vibhramaḥ

इस प्रकार आलिंगन, हाथों के स्पर्श, स्नेहभरी चितवन और विस्तृत, क्रीड़ामय मुस्कान के साथ, रमा के स्वामी भगवान व्रज की उन सुन्दरियों के साथ क्रीड़ा करने लगे, जैसे कोई बालक अपने ही प्रतिबिम्ब के साथ खेलता है।

श्लोक 17 (bhagavata.10.33.17)

तदङ्गसङ्गप्रमुदाकुलेन्द्रियाः केशान् दुकूलं कुचपट्टिकां वा । नाञ्जः प्रतिव्योढुमलं व्रजस्त्रियो विस्रस्तमालाभरणाः कुरूद्वह ॥ १७ ॥

tad-aṅga-saṅga-pramudākulendriyāḥ keśān dukūlaṁ kuca-paṭṭikāṁ vā nāñjaḥ prativyoḍhum alaṁ vraja-striyo visrasta-mālābharaṇāḥ kurūdvaha

हे कुरुश्रेष्ठ! उनके शरीर के स्पर्श से उत्पन्न आनन्द से इन्द्रियाँ अभिभूत होने के कारण व्रज की स्त्रियाँ अपने केश, वस्त्र अथवा वक्षस्थल के आवरण को व्यवस्थित नहीं रख पाईं, और उनकी मालाएँ तथा आभूषण बिखर गए।

श्लोक 18 (bhagavata.10.33.18)

कृष्णविक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचरस्त्रियः । कामार्दिताः शशाङ्कश्च सगणो विस्मितोऽभवत् ॥ १८ ॥

kṛṣṇa-vikrīḍitaṁ vīkṣya mumuhuḥ khe-cara-striyaḥ kāmārditāḥ śaśāṅkaś ca sa-gaṇo vismito ’bhavat

कृष्ण की इस क्रीड़ा को देखकर आकाशचारिणी स्त्रियाँ मोहित हो गईं, काम से पीड़ित हो उठीं, और अपने परिवार (तारों) सहित चन्द्रमा भी विस्मित हो गया।

श्लोक 19 (bhagavata.10.33.19)

कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः । रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ॥ १९ ॥

kṛtvā tāvantam ātmānaṁ yāvatīr gopa-yoṣitaḥ reme sa bhagavāṁs tābhir ātmārāmo ’pi līlayā

जितनी गोपांगनाएँ थीं, उतने ही रूपों में स्वयं को विस्तृत करके, आत्मतृप्त होते हुए भी भगवान ने अपनी लीला से उन सबके साथ विहार किया।

श्लोक 20 (bhagavata.10.33.20)

तासां रतिविहारेण श्रान्तानां वदनानि सः । प्रामृजत् करुणः प्रेम्णा शन्तमेनाङ्ग पाणिना ॥ २० ॥

tāsāṁ rati-vihāreṇa śrāntānāṁ vadanāni saḥ prāmṛjat karuṇaḥ premṇā śantamenāṅga pāṇinā

हे तात! करुणामय भगवान ने प्रेमपूर्वक अपने परम सुखद हाथ से, प्रेम-विहार से थकी हुई उन गोपियों के मुखों को पोंछ दिया।

श्लोक 21 (bhagavata.10.33.21)

गोप्यः स्फुरत्पुरटकुण्डलकुन्तलत्विड्- गण्डश्रिया सुधितहासनिरीक्षणेन । मानं दधत्य ऋषभस्य जगुः कृतानि पुण्यानि तत्कररुहस्पर्शप्रमोदाः ॥ २१ ॥

gopyaḥ sphurat-puraṭa-kuṇḍala-kuntala-tviḍ- gaṇḍa-śriyā sudhita-hāsa-nirīkṣaṇena mānaṁ dadhatya ṛṣabhasya jaguḥ kṛtāni puṇyāni tat-kara-ruha-sparśa-pramodāḥ

चमकते हुए स्वर्ण-कुण्डलों और केशों की लटों से आलोकित अपने कपोलों की शोभा के साथ, तथा अमृत-सम मधुर मुस्कान-भरी चितवन से अपने नायक का सम्मान करती हुई गोपियाँ उनके नखों के स्पर्श से रोमांचित होकर उनके मंगलमय चरितों का गान करने लगीं।

श्लोक 22 (bhagavata.10.33.22)

ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग- घृष्टस्रजः स कुचकुङ्कुमरञ्जितायाः । गन्धर्वपालिभिरनुद्रुत आविशद् वाः श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्नसेतुः ॥ २२ ॥

tābhir yutaḥ śramam apohitum aṅga-saṅga- ghṛṣṭa-srajaḥ sa kuca-kuṅkuma-rañjitāyāḥ gandharva-pālibhir anudruta āviśad vāḥ śrānto gajībhir ibha-rāḍ iva bhinna-setuḥ

उनकी थकान दूर करने के लिए, आलिंगन से चूर-चूर हुई तथा उनके वक्षस्थल के कुंकुम से रंजित माला पहने हुए, वे थके हुए भगवान उन गोपियों के साथ जल में उतर गए, गन्धर्व-सम गुनगुनाते भ्रमर उनके पीछे-पीछे चलने लगे — मानो कोई मदमस्त गजराज, खेत की मेड़ें तोड़कर, अपनी हथिनियों के साथ जल में उतर गया हो।

श्लोक 23 (bhagavata.10.33.23)

सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग । वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः ॥ २३ ॥

so ’mbhasy alaṁ yuvatibhiḥ pariṣicyamānaḥ premṇekṣitaḥ prahasatībhir itas tato ’ṅga vaimānikaiḥ kusuma-varṣibhir īdyamāno reme svayaṁ sva-ratir atra gajendra-līlaḥ

हे राजन्! उन युवतियों द्वारा चारों ओर से जल से भिगोए जाते हुए, प्रेम और हास्य भरी दृष्टि से निहारे जाते हुए, तथा आकाश से पुष्प बरसाते हुए देवताओं द्वारा स्तुत होते हुए, वे आत्मतृप्त भगवान वहाँ गजराज की भाँति क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 24 (bhagavata.10.33.24)

ततश्च कृष्णोपवने जलस्थल- प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे । चचार भृङ्गप्रमदागणावृतो यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिः ॥ २४ ॥

tataś ca kṛṣṇopavane jala-sthala prasūna-gandhānila-juṣṭa-dik-taṭe cacāra bhṛṅga-pramadā-gaṇāvṛto yathā mada-cyud dviradaḥ kareṇubhiḥ

फिर कालिन्दी के तट पर स्थित एक उपवन में, जिसका कोना-कोना जल और थल के पुष्पों की सुगन्धित वायु से भरा था, वे भ्रमरों और सुन्दरियों के समूह से घिरे हुए विचरने लगे, मानो मदमस्त गजराज अपनी हथिनियों के साथ विचर रहा हो।

श्लोक 25 (bhagavata.10.33.25)

एवं शशाङ्कांशुविराजिता निशाः स सत्यकामोऽनुरताबलागणः । सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः ॥ २५ ॥

evaṁ śaśāṅkāṁśu-virājitā niśāḥ sa satya-kāmo ’nuratābalā-gaṇaḥ siṣeva ātmany avaruddha-saurataḥ sarvāḥ śarat-kāvya-kathā-rasāśrayāḥ

इस प्रकार चन्द्रमा की किरणों से देदीप्यमान उन रात्रियों में, जिनकी हर कामना सत्य होती है, वे अपनी अनुरागिनी सखियों से घिरे हुए, यद्यपि उनका प्रेम-भाव स्वयं में ही संयत था, उन समस्त रात्रियों का उपभोग करते रहे, जो शरद ऋतु की काव्य-कथाओं के रस का आश्रय थीं।

श्लोक 26 (bhagavata.10.33.26)

श्रीपरीक्षिदुवाच संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च । अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥ २६ ॥

śrī-parīkṣid uvāca saṁsthāpanāya dharmasya praśamāyetarasya ca avatīrṇo hi bhagavān aṁśena jagad-īśvaraḥ

श्री परीक्षित ने कहा — जगदीश्वर भगवान धर्म की स्थापना और अधर्म के दमन के लिए ही अपने अंश सहित इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।

श्लोक 27 (bhagavata.10.33.27)

स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता । प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥ २७ ॥

sa kathaṁ dharma-setūnāṁ vaktā kartābhirakṣitā pratīpam ācarad brahman para-dārābhimarśanam

हे ब्राह्मण! फिर वे, जो धर्म की मर्यादाओं के वक्ता, कर्ता और रक्षक हैं, परस्त्रियों का स्पर्श करके उनके विपरीत आचरण कैसे कर सकते हैं?

श्लोक 28 (bhagavata.10.33.28)

आप्तकामो यदुपतिः कृतवान्वै जुगुप्सितम् । किमभिप्राय एतन्नः शंशयं छिन्धि सुव्रत ॥ २८ ॥

āpta-kāmo yadu-patiḥ kṛtavān vai jugupsitam kim-abhiprāya etan naḥ śaṁśayaṁ chindhi su-vrata

यदुपति, जिनकी सभी कामनाएँ पूर्ण हैं, उन्होंने निश्चय ही कोई निन्दनीय कार्य किया है — किस अभिप्राय से, हे सुव्रत? कृपया हमारे इस संशय को दूर कीजिए।

श्लोक 29 (bhagavata.10.33.29)

श्रीशुक उवाच धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् । तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा ॥ २९ ॥

śrī-śuka uvāca dharma-vyatikramo dṛṣṭa īśvarāṇāṁ ca sāhasam tejīyasāṁ na doṣāya vahneḥ sarva-bhujo yathā

शुकदेव जी ने कहा — शक्तिशाली नियन्ताओं के साहसिक कार्यों में धर्म का उल्लंघन प्रतीत तो होता है, किन्तु वास्तविक तेजस्वी पुरुषों के लिए यह दोषकारक नहीं होता — जैसे अग्नि सब कुछ भस्म करते हुए भी स्वयं अपवित्र नहीं होती।

श्लोक 30 (bhagavata.10.33.30)

नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम् ॥ ३० ॥

naitat samācarej jātu manasāpi hy anīśvaraḥ vinaśyaty ācaran mauḍhyād yathārudro ’bdhi-jaṁ viṣam

जो स्वयं ऐसा नियन्ता नहीं है, उसे मन से भी कभी ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए; यदि वह मूर्खतावश ऐसा करता है, तो स्वयं नष्ट हो जाता है — जैसे रुद्र के अतिरिक्त कोई और समुद्र से उत्पन्न विष पीकर नष्ट हो जाए।

श्लोक 31 (bhagavata.10.33.31)

ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ॥ ३१ ॥

īśvarāṇāṁ vacaḥ satyaṁ tathaivācaritaṁ kvacit teṣāṁ yat sva-vaco-yuktaṁ buddhimāṁs tat samācaret

महान नियन्ताओं के वचन सत्य होते हैं, और कभी-कभी उनका आचरण भी वैसा ही होता है; उनके कार्यों में से जो उनके अपने वचनों के अनुरूप हो, बुद्धिमान पुरुष को केवल उसी का अनुसरण करना चाहिए।

श्लोक 32 (bhagavata.10.33.32)

कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते । विपर्ययेण वानर्थो निरहङ्कारिणां प्रभो ॥ ३२ ॥

kuśalācaritenaiṣām iha svārtho na vidyate viparyayeṇa vānartho nirahaṅkāriṇāṁ prabho

हे प्रभो! इन अहंकार-रहित महापुरुषों के लिए न तो पुण्याचरण से कोई स्वार्थ-सिद्धि होती है और न ही इसके विपरीत आचरण से कोई हानि।

श्लोक 33 (bhagavata.10.33.33)

किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यङ्मर्त्यदिवौकसाम् । ईशितुश्चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वयः ॥ ३३ ॥

kim utākhila-sattvānāṁ tiryaṅ-martya-divaukasām īśituś ceśitavyānāṁ kuśalākuśalānvayaḥ

फिर उस सर्वभूतों — पशु, मनुष्य और देवताओं — के स्वामी और नियन्ता का, तथा उसके द्वारा नियन्त्रित प्राणियों का, शुभ-अशुभ से क्या सम्बन्ध हो सकता है?

श्लोक 34 (bhagavata.10.33.34)

यत्पादपङ्कजपरागनिषेवतृप्ता योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः । स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमाना- स्तस्येच्छयात्तवपुषः कुत एव बन्धः ॥ ३४ ॥

yat-pāda-paṅkaja-parāga-niṣeva-tṛptā yoga-prabhāva-vidhutākhila-karma-bandhāḥ svairaṁ caranti munayo ’pi na nahyamānās tasyecchayātta-vapuṣaḥ kuta eva bandhaḥ

जो मुनि उनके चरण-कमलों की रज के सेवन मात्र से तृप्त हैं, तथा योग-शक्ति से जिनके समस्त कर्म-बन्धन धुल चुके हैं, वे भी स्वच्छन्द विचरते हैं, बन्धन-रहित — तो जो स्वयं अपनी इच्छा से रूप धारण करते हैं, उनके लिए बन्धन कहाँ से हो सकता है?

श्लोक 35 (bhagavata.10.33.35)

गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम् । योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ ३५ ॥

gopīnāṁ tat-patīnāṁ ca sarveṣām eva dehinām yo ’ntaś carati so ’dhyakṣaḥ krīḍaneneha deha-bhāk

जो गोपियों, उनके पतियों तथा समस्त देहधारियों के भीतर साक्षी-रूप में विचरते हैं, उन्होंने ही यहाँ क्रीड़ा के लिए शरीर धारण किया है।

श्लोक 36 (bhagavata.10.33.36)

अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमास्थितः । भजते तादृशीः क्रीडा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥ ३६ ॥

anugrahāya bhaktānāṁ mānuṣaṁ deham āsthitaḥ bhajate tādṛśīḥ krīḍa yāḥ śrutvā tat-paro bhavet

अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए मानव-देह धारण करके वे ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर मनुष्य उनके प्रति परायण हो जाता है।

श्लोक 37 (bhagavata.10.33.37)

नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया । मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान्स्वान्स्वान्दारान् व्रजौकसः ॥ ३७ ॥

nāsūyan khalu kṛṣṇāya mohitās tasya māyayā manyamānāḥ sva-pārśva-sthān svān svān dārān vrajaukasaḥ

व्रज के गोपगण, उनकी माया से मोहित होकर, कृष्ण के प्रति तनिक भी ईर्ष्या नहीं रखते थे, क्योंकि वे यही मानते रहे कि उनकी अपनी-अपनी पत्नियाँ सदा उनके ही पास हैं।

श्लोक 38 (bhagavata.10.33.38)

ब्रह्मरात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिताः । अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्यः स्वगृहान्भगवत्प्रियाः ॥ ३८ ॥

brahma-rātra upāvṛtte vāsudevānumoditāḥ anicchantyo yayur gopyaḥ sva-gṛhān bhagavat-priyāḥ

जब ब्रह्मा की वह रात्रि समाप्त हो गई, तब वासुदेव की ही आज्ञा से भगवान की वे प्रिय गोपियाँ अनिच्छापूर्वक अपने-अपने घर लौट गईं।

श्लोक 39 (bhagavata.10.33.39)

विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः । भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः ॥ ३९ ॥

vikrīḍitaṁ vraja-vadhūbhir idaṁ ca viṣṇoḥ śraddhānvito ’nuśṛṇuyād atha varṇayed yaḥ bhaktiṁ parāṁ bhagavati pratilabhya kāmaṁ hṛd-rogam āśv apahinoty acireṇa dhīraḥ

जो कोई श्रद्धापूर्वक विष्णु की व्रज-वधुओं के साथ इस क्रीड़ा को सुनता या वर्णन करता है, वह भगवान के प्रति परम भक्ति को प्राप्त करके धीर बनता है और शीघ्र ही हृदय के रोग — काम-वासना — को दूर कर देता है।

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