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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7

इन्द्र के कमलनाल-प्रवेश के पश्चात् नहुष का इन्द्रपद-अभिषेक

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (devibhagavatam.6.7.1)

व्यास उवाच । अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ । मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम्

vyāsa uvāca | atha taṁ patitaṁ dṛṣṭvā viṣṇurviṣṇupurīṁ yayau | manasā śaṅkamānastu tasya hatyākṛtaṁ bhayam

व्यास ने कहा — तब उसे गिरा हुआ देखकर विष्णु अपनी पुरी (वैकुण्ठ) को चले गए; परन्तु मन ही मन उस हत्या से उत्पन्न भय की आशंका करते रहे।

श्लोक 2 (devibhagavatam.6.7.2)

इन्द्रोऽपि भयसन्त्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः । मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ

indro'pi bhayasantrasto yayāvindrapurīṁ tataḥ | munayo bhayasaṁvignā hyabhavannihate ripau

इन्द्र भी भय से त्रस्त होकर तब अपनी पुरी (अमरावती) को चले गए; और शत्रु के मारे जाने पर मुनिगण भी भय से व्याकुल हो उठे।

श्लोक 3 (devibhagavatam.6.7.3)

किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल । मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात्

kimasmābhiḥ kṛtaṁ pāpaṁ yadasau vañcitaḥ kila | muniśabdo vṛthā jātaḥ sureśasya ca saṅgamāt

'हमने यह कैसा पाप किया, कि उसे इस प्रकार छला गया? देवेश्वर के साथ हमारे संगम के कारण 'मुनि' शब्द ही व्यर्थ हो गया।'

श्लोक 4 (devibhagavatam.6.7.4)

अस्माकं वचनाद्वृत्रो विश्वासमगमत्किल । विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः

asmākaṁ vacanādvṛtro viśvāsamagamatkila | viśvāsaghātinaḥ saṅgādvayaṁ viśvāsaghātakāḥ

'हमारे ही वचन से वृत्र को विश्वास हुआ था; विश्वासघाती के संग से हम स्वयं भी विश्वासघाती हो गए।'

श्लोक 5 (devibhagavatam.6.7.5)

धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत् । यदस्माभिश्छलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः

dhigiyaṁ mamatā pāpamūlamevamanarthakṛt | yadasmābhiśchalaṁ kṛtvā śapathairvañcito'suraḥ

'धिक्कार है इस ममता को, जो पाप का मूल और अनर्थकारी है — जिसके कारण हमने ही छल करके शपथों से उस असुर को छला।'

श्लोक 6 (devibhagavatam.6.7.6)

मन्त्रकृद्बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम् । पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च

mantrakṛdbuddhidātā ca prerakaḥ pāpakāriṇām | pāpabhāksa bhavennūnaṁ pakṣakartā tathaiva ca

'जो षड्यंत्र रचता है, बुद्धि देता है, या पापकर्मियों को प्रेरित करता है, वह निश्चय ही पाप का भागी होता है; तथा पक्षधर बनने वाला भी वैसा ही।'

श्लोक 7 (devibhagavatam.6.7.7)

विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान् । वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्तिना

viṣṇunāpi kṛtaṁ pāpaṁ yatsāhāyyamavāptavān | vajraṁ praviśya yenāsau pātitaḥ sattvamūrtinā

'विष्णु ने भी पाप किया, जिन्होंने सहायता की; वज्र में प्रवेश कर उस सत्त्वमूर्ति ने ही उसे गिरा दिया।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.6.7.8)

नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात्त्रासमश्नुते । हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम्

nūnaṁ svārthaparaḥ prāṇī na pāpāttrāsamaśnute | hariṇā harisaṅgena sarvathā duṣkṛtaṁ kṛtam

'सचमुच स्वार्थपरायण प्राणी पाप से भय नहीं मानता; हरि द्वारा और हरि के संग से यह दुष्कर्म सर्वथा किया गया।'

श्लोक 9 (devibhagavatam.6.7.9)

द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ । प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ

dvāveva staḥ padārthānāṁ dvāveva nidhanaṁ gatau | prathamaśca turīyaśca yau trilokyāṁ tu durlabhau

'पदार्थों में से केवल दो ही सुलभ हैं, दो तो लुप्तप्राय हो चुके हैं; वे हैं प्रथम (धर्म) और चतुर्थ (मोक्ष), जो त्रिलोक में दुर्लभ हैं।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.6.7.10)

अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ । धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि

arthakāmau praśastau dvau sarveṣāṁ sammatau priyau | dharmādharmeti vāgvādo dambho'yaṁ mahatāmapi

'अर्थ और काम — ये दोनों प्रशंसित हैं, सबके लिए प्रिय और सम्मत हैं; 'धर्म-अधर्म' की बात तो केवल वाग्विलास है, महापुरुषों में भी यह पाखण्ड ही है।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.6.7.11)

मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः । जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः

munayo'pi manastāpamevaṁ kṛtvā punaḥ punaḥ | jagmuḥ svānāśramāneva vimanaskā hatodyamāḥ

मुनिगण भी इस प्रकार बार-बार अपने मन को संतप्त कर, उदासीन और उत्साहहीन होकर अपने-अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 12 (devibhagavatam.6.7.12)

त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत । रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः

tvaṣṭā tu nihataṁ śrutvā putramindreṇa bhārata | ruroda duḥkhasantapto nirvedamagamatpunaḥ

हे भारत! त्वष्टा अपने पुत्र को इन्द्र द्वारा मारा गया सुनकर, दुःख से संतप्त होकर रोए और पुनः वैराग्य को प्राप्त हुए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.6.7.13)

यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम् । संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम्

yatrāsau patitastatra gatvā vīkṣya tathāgatam | saṁskāraṁ kārayāmāsa vidhivatpāralaukikam

जहाँ वह गिरा था, वहाँ जाकर उसे उस दशा में देखकर, उन्होंने विधिवत् पारलौकिक संस्कार करवाया।

श्लोक 14 (devibhagavatam.6.7.14)

स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम् । शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम्

snātvāsya salilaṁ dattvā kṛtvā caivaurdhvadaihikam | śaśāpendraṁ sa śokārtaḥ pāpiṣṭhaṁ mitraghātakam

स्नान कर, उसे जल अर्पित कर तथा ऊर्ध्वदैहिक संस्कार करके, शोकसंतप्त त्वष्टा ने अत्यंत पापी, मित्रघाती इन्द्र को शाप दिया।

श्लोक 15 (devibhagavatam.6.7.15)

यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम् । तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम्

yathā me nihataḥ putraḥ pralobhya śapathairbhṛśam | tathendro'pi mahadduḥkhaṁ prāpnotu vidhinirmitam

'जिस प्रकार मेरा पुत्र शपथों से प्रलोभित होकर मारा गया, उसी प्रकार इन्द्र भी विधि-निर्मित महान् दुःख प्राप्त करे।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.6.7.16)

इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः । मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्

iti śaptvā sureśānaṁ tvaṣṭā tāpasamanvitaḥ | meroḥ śikharamāsthāya tapastepe suduṣkaram

इस प्रकार देवेश्वर को शाप देकर, त्वष्टा तापस बनकर मेरु के शिखर पर स्थित होकर अत्यंत दुष्कर तपस्या करने लगे।

श्लोक 17 (devibhagavatam.6.7.17)

जनमेजय उवाच । हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान् । सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह

janamejaya uvāca | hatvā tvāṣṭraṁ sureśo'tha kāmavasthāmavāptavān | sukhaṁ vā duḥkhamevāgre tanme brūhi pitāmaha

जनमेजय ने कहा — 'त्वष्टापुत्र को मारकर क्या देवेश्वर ने अपनी अभीष्ट स्थिति प्राप्त की? आगे उन्हें सुख मिला या दुःख ही मिला? हे पितामह! मुझे यह बताइए।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.6.7.18)

व्यास उवाच । किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्

vyāsa uvāca | kiṁ pṛcchasi mahābhāga sandehaḥ kīdṛśastava | avaśyameva bhoktavyaṁ kṛtaṁ karma śubhāśubham

व्यास ने कहा — 'हे महाभाग! तुम क्या पूछ रहे हो? तुम्हें कैसा संदेह है? किए हुए कर्म का फल, शुभ हो या अशुभ, अवश्य ही भोगना पड़ता है।'

श्लोक 19 (devibhagavatam.6.7.19)

बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम् । सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः

baliṣṭhairdurbalairvāpi svalpaṁ vā bahu vā kṛtam | sarvathaiva hi bhoktavyaṁ sadevāsuramānuṣaiḥ

'बलवानों द्वारा हो या दुर्बलों द्वारा, थोड़ा किया हो या अधिक — देवों, असुरों और मनुष्यों सभी को उसे सर्वथा भोगना ही पड़ता है।'

श्लोक 20 (devibhagavatam.6.7.20)

शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने । प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत

śakrāyetthaṁ matirdattā hariṇā vṛtraghātine | praviṣṭo'tha paviṁ viṣṇuḥ sahāyaḥ pratyapadyata

'हरि द्वारा वृत्र के वध हेतु शक्र को इस प्रकार बुद्धि दी गई; तब विष्णु वज्र में प्रवेश कर सहायक बने।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.6.7.21)

न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन । समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप

na cāpadi sahāyo'bhūdvāsudevaḥ kathañcana | samaye svajanaḥ sarvaḥ saṁsāre'sminnarādhipa

'परंतु आपत्ति के समय वासुदेव किसी भी प्रकार उसके सहायक नहीं बने; हे नराधिप! इस संसार में सभी स्वजन सुसमय में ही अपने होते हैं।'

श्लोक 22 (devibhagavatam.6.7.22)

दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान् । पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः

daive vimukhatāṁ prāpte na ko'pyasti sahāyavān | pitā mātā tathā bhāryā bhrātā vātha sahodaraḥ

'दैव के विमुख होने पर कोई भी सहायक नहीं रहता — न पिता, न माता, न पत्नी, न भाई, न ही सगा भाई।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.6.7.23)

सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः । प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम्

sevako vāpi mitraṁ vā putraścaiva tathaurasaḥ | pratikūle gate daive na ko'pyeti sahāyatām

'न सेवक, न मित्र, न पुत्र, अपना औरस पुत्र भी नहीं; दैव के प्रतिकूल होने पर कोई भी सहायता के लिए नहीं आता।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.6.7.24)

भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा । वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः

bhoktā pāpasya puṇyasya kartā bhavati sarvathā | vṛtraṁ hatvā gatāḥ sarve nistejaskaḥ śacīpatiḥ

'पाप और पुण्य का कर्ता ही सर्वथा उसका भोक्ता होता है। वृत्र का वध कर सभी चले गए; शचीपति अकेले तेजोहीन रह गए।'

श्लोक 25 (devibhagavatam.6.7.25)

शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महेत्यब्रुवञ्छनैः । को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः

śepustaṁ tridaśāḥ sarve brahmahetyabruvañchanaiḥ | ko nāma śapathānkṛtvā satyaṁ dattvā vacaḥ punaḥ

सभी देवताओं ने चुपचाप उसे कोसा, उसे 'ब्रह्महत्यारा' कहकर धीरे-धीरे — 'शपथ लेकर, सत्य वचन देकर, कौन भला —'

श्लोक 26 (devibhagavatam.6.7.26)

जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम् । देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे

jighāṁsati suviśvastaṁ muniṁ mitratvamāgatam | devagoṣṭhyāṁ surodyāne gandharvāṇāṁ samāgame

'— एक पूर्ण विश्वासपात्र, मित्र बने हुए मुनि को मार डालने की इच्छा करे?' देवसभा में, देवोद्यान में, गंधर्वों के समागम में —

श्लोक 27 (devibhagavatam.6.7.27)

सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल । किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता

sarvatraiva kathā tasya vistāramagamatkila | kiṁ kṛtaṁ duṣkṛtaṁ karma śakreṇādya jighāṁsatā

— सर्वत्र ही इसकी कथा विस्तार को प्राप्त हुई — 'शक्र ने आज मारने की इच्छा से यह कैसा दुष्कर्म किया —'

श्लोक 28 (devibhagavatam.6.7.28)

वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम् । वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम्

vṛtraṁ chalena viśvastaṁ munibhiśca pratāritam | vedapramāṇamutsṛjya svīkṛtaṁ saugataṁ matam

'— वृत्र को, जो छल से विश्वस्त था, और मुनियों द्वारा भी छला गया; वेद-प्रमाण को त्यागकर उसने बौद्ध मत को अपना लिया है।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.6.7.29)

यदयं निहतः शनुर्वञ्चयित्वातिसाहसात् । को नाम वचनं दत्त्वा विपरीतमथाचरेत्

yadayaṁ nihataḥ śanurvañcayitvātisāhasāt | ko nāma vacanaṁ dattvā viparītamathācaret

'— क्योंकि इस शत्रु को अत्यंत दुःसाहसपूर्वक छलकर मारा गया। वचन देकर फिर कौन उसके विपरीत आचरण करेगा?'

श्लोक 30 (devibhagavatam.6.7.30)

विना शक्रं हरिं वापि यथायं विनिपातितः । एवंविधाः कथाश्चान्याः समाजेष्वभवन्भृशम्

vinā śakraṁ hariṁ vāpi yathāyaṁ vinipātitaḥ | evaṁvidhāḥ kathāścānyāḥ samājeṣvabhavanbhṛśam

'शक्र या हरि के बिना यह किस प्रकार गिराया गया?' इसी प्रकार की अनेक कथाएँ हर सभा में अत्यंत फैलने लगीं।

श्लोक 31 (devibhagavatam.6.7.31)

शुश्रावेन्द्रोऽपि विविधाः स्वकीर्तेर्हानिकारकाः । यस्य कीर्तिर्हता लोके धिक्तस्यैव कुजीवितम्

śuśrāvendro'pi vividhāḥ svakīrterhānikārakāḥ | yasya kīrtirhatā loke dhiktasyaiva kujīvitam

इन्द्र ने भी अपनी कीर्ति को हानि पहुँचाने वाली अनेक बातें सुनीं; जिसकी कीर्ति लोक में नष्ट हो जाए, उसके ऐसे जीवन को धिक्कार है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.6.7.32)

यं दृष्ट्वा पथि गच्छन्तं शत्रुः स्मेरमुखो भवेत् । इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिः पतितः कीर्तिसङ्क्षयात्

yaṁ dṛṣṭvā pathi gacchantaṁ śatruḥ smeramukho bhavet | indradyumno'pi rājarṣiḥ patitaḥ kīrtisaṅkṣayāt

जिसे मार्ग पर जाते देखकर शत्रु मुस्कुरा उठे — ऐसा जीवन धिक्कार्य है। राजर्षि इन्द्रद्युम्न भी कीर्ति के क्षय से पतित हो गए थे।

श्लोक 33 (devibhagavatam.6.7.33)

स्वर्गादकृतपापोऽसौ पापकृत्किं न पात्यते । स्वल्पेऽपराधेऽपि नृपो ययातिः पतितः किल

svargādakṛtapāpo'sau pāpakṛtkiṁ na pātyate | svalpe'parādhe'pi nṛpo yayātiḥ patitaḥ kila

वह निष्पाप होते हुए भी स्वर्ग से गिरा — फिर पापी क्यों न गिरे? सामान्य से अपराध पर भी राजा ययाति गिर गए थे।

श्लोक 34 (devibhagavatam.6.7.34)

नृपः कर्कटतां प्राप्तो युगानष्टादशैव तु । भृगुपत्नीशिरश्छेदाद्भगवान्हरिरच्युतः

nṛpaḥ karkaṭatāṁ prāpto yugānaṣṭādaśaiva tu | bhṛgupatnīśiraśchedādbhagavānhariracyutaḥ

वह राजा अठारह युगों तक केकड़ा बना रहा; भृगु-पत्नी का सिर काटने के कारण भगवान् अच्युत हरि —

श्लोक 35 (devibhagavatam.6.7.35)

ब्रह्मशापात्पशोर्योनौ सञ्जातो मकरादिषु । विष्णुश्च वामनो भूत्वा याचनार्थं बलेर्गृहे

brahmaśāpātpaśoryonau sañjāto makarādiṣu | viṣṇuśca vāmano bhūtvā yācanārthaṁ balergṛhe

— ब्राह्मण के शाप से मकर आदि पशु-योनियों में जन्म ले चुके हैं; तथा विष्णु ने वामन बनकर याचना के लिए बलि के घर —

श्लोक 36 (devibhagavatam.6.7.36)

गतः किमपरं दुःखं प्राप्नोति दुष्कृती नरः । रामोऽपि वनवासेषु सीताविरहजं बहु

gataḥ kimaparaṁ duḥkhaṁ prāpnoti duṣkṛtī naraḥ | rāmo'pi vanavāseṣu sītāvirahajaṁ bahu

— गए। पापकर्मी मनुष्य को और कौन-सा दुःख प्राप्त नहीं होता? राम भी वनवास में सीता-वियोग से उत्पन्न अत्यंत दुःख —

श्लोक 37 (devibhagavatam.6.7.37)

दुःखं च प्राप्तवान्घोरं भृगुशापेन भारत । तथेन्द्रोऽपि ब्रह्महत्याकृतं प्राप्य महद्भयम्

duḥkhaṁ ca prāptavānghoraṁ bhṛguśāpena bhārata | tathendro'pi brahmahatyākṛtaṁ prāpya mahadbhayam

— तथा भृगु के शाप से घोर दुःख पाया, हे भारत! उसी प्रकार इन्द्र भी ब्रह्महत्या से उत्पन्न महान् भय प्राप्त कर —

श्लोक 38 (devibhagavatam.6.7.38)

न स्वास्थ्यं प्राप गेहेऽसौ सर्वसिद्धिसमन्विते । पौलोमी तं सभाहीनं दृष्ट्वा प्रोवाच वासवम्

na svāsthyaṁ prāpa gehe'sau sarvasiddhisamanvite | paulomī taṁ sabhāhīnaṁ dṛṣṭvā provāca vāsavam

— अपने ही घर में, जो समस्त सिद्धियों से युक्त था, कोई शांति नहीं पा सका। पौलोमी (शची) ने उसे सभा से दूर देखकर वासव से कहा।

श्लोक 39 (devibhagavatam.6.7.39)

निःश्वसन्तं भयत्रस्तं नष्टसंज्ञं विचेतसम् । किं प्रभोऽद्य भयार्तोऽसि मृतस्ते दारुणो रिपुः

niḥśvasantaṁ bhayatrastaṁ naṣṭasaṁjñaṁ vicetasam | kiṁ prabho'dya bhayārto'si mṛtaste dāruṇo ripuḥ

सिसकते हुए, भयभीत, चेतनाहीन और विक्षिप्त उसे देखकर वह बोली — 'हे प्रभो! आज आप क्यों भयार्त हैं? आपका भयंकर शत्रु तो मर चुका है।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.6.7.40)

का चिन्ता वर्तते कान्त तव शत्रुनिषूदन । कस्माच्छोचसि लोकेश निःश्वसन्प्राकृतो यथा

kā cintā vartate kānta tava śatruniṣūdana | kasmācchocasi lokeśa niḥśvasanprākṛto yathā

'हे शत्रुनिषूदन प्रियतम! आपको कौन-सी चिंता है? हे लोकेश! सामान्यजन के समान सिसकते हुए आप क्यों शोक कर रहे हैं?'

श्लोक 41 (devibhagavatam.6.7.41)

नान्योऽस्ति बलवाञ्छत्रुर्येन चिन्तापरो भवान् । इन्द्र उवाच । नारातिर्बलवान्मेऽस्ति न शान्तिर्न सुखं तथा

nānyo'sti balavāñchatruryena cintāparo bhavān | indra uvāca | nārātirbalavānme'sti na śāntirna sukhaṁ tathā

'ऐसा कोई अन्य बलवान् शत्रु नहीं है, जिसके कारण आप इतने चिंतित हों।' इन्द्र ने कहा — 'मेरा कोई बलवान् शत्रु नहीं है, न शांति है और न सुख ही है।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.6.7.42)

ब्रह्महत्याभयाद्राज्ञि बिभेमि सततं गृहे । न नन्दनं सुखकरं नामृतं न गृहं वनम्

brahmahatyābhayādrājñi bibhemi satataṁ gṛhe | na nandanaṁ sukhakaraṁ nāmṛtaṁ na gṛhaṁ vanam

'हे रानी! ब्रह्महत्या के भय से मैं घर में भी सदैव भयभीत रहता हूँ; न नंदनवन सुखकर लगता है, न अमृत, न घर, न वन।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.6.7.43)

गन्धर्वाणां तथा गेयं नृत्यमप्सरसां पुनः । न त्वं सुखकरा नारी नाना च सुरयोषितः

gandharvāṇāṁ tathā geyaṁ nṛtyamapsarasāṁ punaḥ | na tvaṁ sukhakarā nārī nānā ca surayoṣitaḥ

'न गंधर्वों का गायन, न अप्सराओं का नृत्य; न तुम ही सुखकर लगती हो, न अन्य कोई देव-स्त्रियाँ।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.6.7.44)

न तथा कामधेनुश्च देववृक्षः सुखप्रदः । किं करोमि क्व गच्छामि क्व शर्म मम जायते

na tathā kāmadhenuśca devavṛkṣaḥ sukhapradaḥ | kiṁ karomi kva gacchāmi kva śarma mama jāyate

'न कामधेनु और न ही देववृक्ष सुख देता है। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे शांति कहाँ प्राप्त होगी?'

श्लोक 45 (devibhagavatam.6.7.45)

इति चिन्तापरः कान्ते न लभे सुखमात्मनि । व्यास उवाच । इत्युक्त्वा वचनं शक्रः प्रियां परमकातराम्

iti cintāparaḥ kānte na labhe sukhamātmani | vyāsa uvāca | ityuktvā vacanaṁ śakraḥ priyāṁ paramakātarām

'इस प्रकार चिंतामग्न होकर, हे प्रिये! मुझे अपने भीतर कोई सुख नहीं मिलता।' व्यास ने कहा — यह वचन कहकर शक्र और उनकी अत्यंत व्याकुल प्रिया —

श्लोक 46 (devibhagavatam.6.7.46)

निर्जगाम गृहान्मन्दो मानसं सर उत्तमम् । पद्मनाले प्रविष्टोऽसौ भयार्तः शोककर्षितः

nirjagāma gṛhānmando mānasaṁ sara uttamam | padmanāle praviṣṭo'sau bhayārtaḥ śokakarṣitaḥ

— वे उदास होकर घर से निकलकर उत्तम मानसरोवर को गए; भयार्त और शोक से क्षीण होकर वे कमलनाल में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.6.7.47)

न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतश्च कल्मषैः । प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः

na prājñāyata devendrastvabhibhūtaśca kalmaṣaiḥ | praticchanno vasatyapsu ceṣṭamāna ivoragaḥ

पापों से अभिभूत हुआ देवेन्द्र पहचाना नहीं जा सका; छिपा हुआ वह जल में सर्प के समान चेष्टा करता हुआ रहने लगा।

श्लोक 48 (devibhagavatam.6.7.48)

असहायस्तुराषाडैच्चिन्तार्तो विकलेन्द्रियः । ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते

asahāyasturāṣāḍaiccintārto vikalendriyaḥ | tataḥ pranaṣṭe devendre brahmahatyābhayārdite

सहायताविहीन, चिंतित और इन्द्रियशून्य हुए तुराषाट् वहाँ गए। इस प्रकार ब्रह्महत्या के भय से पीड़ित देवेन्द्र के लुप्त हो जाने पर —

श्लोक 49 (devibhagavatam.6.7.49)

सुराश्चिन्तातुराश्चासन्नुत्पाताश्चाभवन्नथ । ऋषयः सिद्धगन्धर्वा भयार्ताश्चाभवन्भृशम्

surāścintāturāścāsannutpātāścābhavannatha | ṛṣayaḥ siddhagandharvā bhayārtāścābhavanbhṛśam

— देवगण चिंतित हो उठे, और उत्पात होने लगे; ऋषि, सिद्ध और गंधर्व भी अत्यंत भयभीत हो गए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.6.7.50)

अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः । अवर्षणं तदा जातं पृथिवी क्षीणवैभवा

arājakaṁ jagatsarvamabhibhūtamupadravaiḥ | avarṣaṇaṁ tadā jātaṁ pṛthivī kṣīṇavaibhavā

सम्पूर्ण संसार राजाविहीन होकर उत्पातों से अभिभूत हो गया; तब अनावृष्टि हुई और पृथ्वी का वैभव क्षीण हो गया।

श्लोक 51 (devibhagavatam.6.7.51)

विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि वै । एवं त्वराजके जाते देवता मुनयस्तथा

vicchinnasrotaso nadyaḥ sarāṁsyanudakāni vai | evaṁ tvarājake jāte devatā munayastathā

नदियों की धाराएँ टूट गईं और सरोवर जलहीन हो गए। इस प्रकार राज्य के अराजक हो जाने पर देवगण और मुनिगण —

श्लोक 52 (devibhagavatam.6.7.52)

विचार्य नहुषं चक्रुः शक्रं सर्वे दिवौकसः । सम्प्राप्य नहुषो राजा धर्मिष्ठोऽपि रजोबलात्

vicārya nahuṣaṁ cakruḥ śakraṁ sarve divaukasaḥ | samprāpya nahuṣo rājā dharmiṣṭho'pi rajobalāt

— विचार-विमर्श कर सभी देववासियों ने नहुष को शक्र बना दिया; धार्मिक होते हुए भी राजा नहुष ने उस पद को पाकर, रजोगुण के बल से —

श्लोक 53 (devibhagavatam.6.7.53)

बभूव विषयासक्तः पञ्चबाणशराहतः । अप्सरोभिर्वृतः क्रीडन्देवोद्यानेषु भारत

babhūva viṣayāsaktaḥ pañcabāṇaśarāhataḥ | apsarobhirvṛtaḥ krīḍandevodyāneṣu bhārata

— विषयासक्त हो गए, पञ्चबाण (कामदेव) के बाणों से आहत होकर; हे भारत! अप्सराओं से घिरे हुए देवोद्यानों में क्रीड़ा करते हुए —

श्लोक 54 (devibhagavatam.6.7.54)

शक्रपत्नीगुणाञ्छ्रुत्वा चकमे तां स पार्थिवः । ऋषीनाह किमिन्द्राणी नोपगच्छति मां किल

śakrapatnīguṇāñchrutvā cakame tāṁ sa pārthivaḥ | ṛṣīnāha kimindrāṇī nopagacchati māṁ kila

— शक्र की पत्नी के गुणों को सुनकर उस राजा ने उसकी कामना की। उसने ऋषियों से कहा — 'इन्द्राणी मेरे पास क्यों नहीं आती?'

श्लोक 55 (devibhagavatam.6.7.55)

भवद्भिश्चामरैः सर्वैः कृतोऽहं वासवस्त्विह । प्रेषयध्वं सुराः कामं सेवार्थं मम वै शचीम्

bhavadbhiścāmaraiḥ sarvaiḥ kṛto'haṁ vāsavastviha | preṣayadhvaṁ surāḥ kāmaṁ sevārthaṁ mama vai śacīm

'आप सबने तथा सभी अमरों ने मुझे यहाँ वासव बनाया है; हे देवगण! मेरी सेवा के लिए मेरी इच्छानुसार शची को भेज दो।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.6.7.56)

प्रियं चेन्मम कर्तव्यं सर्वथा मुनयोऽमराः । अहमिन्द्रोऽद्य देवानां लोकानां च तथेश्वरः

priyaṁ cenmama kartavyaṁ sarvathā munayo'marāḥ | ahamindro'dya devānāṁ lokānāṁ ca tatheśvaraḥ

'हे मुनियो! हे अमरो! यदि तुम्हें मेरा प्रिय करना है, तो सर्वथा करो — मैं आज देवताओं का इन्द्र हूँ, और वैसे ही लोकों का ईश्वर भी हूँ।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.6.7.57)

आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा देवर्षयस्तथा

āgacchatu śacī mahyaṁ kṣipramadya niveśanam | iti tasya vacaḥ śrutvā devā devarṣayastathā

'शची मेरे निवासस्थान में आज ही शीघ्र आ जाए।' उसके इस वचन को सुनकर देवगण तथा देवर्षिगण —

श्लोक 58 (devibhagavatam.6.7.58)

गत्वा चिन्तातुराः प्रोचुः पौलोमीं प्रणतास्ततः । इन्द्रपत्नि दुराचारो नहुषस्त्वामिहेच्छति

gatvā cintāturāḥ procuḥ paulomīṁ praṇatāstataḥ | indrapatni durācāro nahuṣastvāmihecchati

— चिंतातुर होकर गए और प्रणाम कर पौलोमी (शची) से बोले — 'हे इन्द्रपत्नी! दुराचारी नहुष आपकी इच्छा करता है।'

श्लोक 59 (devibhagavatam.6.7.59)

कुपितोऽस्मानुवाचेदं प्रेषयध्वं शचीमिह । किं कुर्मस्तदधीनाः स्मो येनेन्द्रोऽयं कृतः किल

kupito'smānuvācedaṁ preṣayadhvaṁ śacīmiha | kiṁ kurmastadadhīnāḥ smo yenendro'yaṁ kṛtaḥ kila

'क्रोधित होकर उसने हमें यह कहा — 'शची को यहाँ भेजो।' अब हम क्या करें? हम तो उसके अधीन हैं, जिसे हमने ही इन्द्र बनाया है।'

श्लोक 60 (devibhagavatam.6.7.60)

तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह । रक्ष मां नहुषाद्ब्रह्मंस्तवास्मि शरणं गता

tacchrutvā durmanā devī bṛhaspatimuvāca ha | rakṣa māṁ nahuṣādbrahmaṁstavāsmi śaraṇaṁ gatā

यह सुनकर व्यथित मन वाली देवी ने बृहस्पति से कहा — 'हे ब्रह्मन्! नहुष से मेरी रक्षा कीजिए, मैं आपकी शरण में आई हूँ।'

श्लोक 61 (devibhagavatam.6.7.61)

बृहस्पतिरुवाच । न भेतव्यं त्वया देवि नहुषात्पापमोहितात् । न त्वां दास्याम्यहं वत्से त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्

bṛhaspatiruvāca | na bhetavyaṁ tvayā devi nahuṣātpāpamohitāt | na tvāṁ dāsyāmyahaṁ vatse tyaktvā dharmaṁ sanātanam

बृहस्पति ने कहा — 'हे देवी! पापमोहित नहुष से भयभीत मत होओ; हे वत्से! मैं सनातन धर्म को त्यागकर तुम्हें नहीं दूँगा।'

श्लोक 62 (devibhagavatam.6.7.62)

शरणागतमार्तं च यो ददाति नराधमः । स एव नरकं याति यावदाभूतसम्प्लवम् । स्वस्था भव पृथुश्रोणि न त्यक्ष्ये त्वां कदाचन

śaraṇāgatamārtaṁ ca yo dadāti narādhamaḥ | sa eva narakaṁ yāti yāvadābhūtasamplavam | svasthā bhava pṛthuśroṇi na tyakṣye tvāṁ kadācana

'जो नराधम शरणागत पीड़ित को सौंप देता है, वह प्रलयकाल तक नरक में जाता है। हे पृथुश्रोणि! स्वस्थ रहो, मैं तुम्हें कभी नहीं त्यागूँगा।'

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