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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 176

केश-वृद्धि आदि का वर्णन

अध्याय 175अध्याय-सूचीअध्याय 177

श्लोक 1 (garuda.1.176.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १७६ श्रीभगवानुवाच । सप्तरात्रात्प्रजायन्ते खल्वाटस्य कचाः शुभाः । दग्धहस्तिदन्तलेपात्साजाक्षीररसाञ्जनात्

śrīgaruḍamahāpurāṇam 176 śrībhagavānuvāca saptarātrātprajāyante khalvāṭasya kacāḥ śubhāḥ dagdhahastidantalepātsājākṣīrarasāñjanāt

श्रीभगवान ने कहा — सात रात्रियों में गंजे व्यक्ति के सुन्दर बाल उत्पन्न हो जाते हैं — जले हुए हाथी-दाँत के लेप से, बकरी के दूध के रस और रसाञ्जन से,

श्लोक 2 (garuda.1.176.2)

भृङ्गराजरसेनैव चतुर्भागेन साधितम् । केशवृद्धिकरं तैलं गुञ्जाचूर्णान्वितेन च

bhṛṅgarājarasenaiva caturbhāgena sādhitam keśavṛddhikaraṁ tailaṁ guñjācūrṇānvitena ca

— भृंगराज के रस से ही, चौथाई भाग में सिद्ध किया गया बाल-वर्धक तेल, गुंजा के चूर्ण से युक्त होकर —

श्लोक 3 (garuda.1.176.3)

एलामांसीकुष्ठमुरायुक्तमभ्यङ्गतः शिवम् । गुञ्जाफलं समादेयं लेपनं चन्द्रलुप्तनुत्

elāmāṁsīkuṣṭhamurāyuktamabhyaṅgataḥ śivam guñjāphalaṁ samādeyaṁ lepanaṁ candraluptanut

— इलायची, जटामांसी, कूठ और मुरा से युक्त होकर मालिश करने पर मंगलकारी होता है। गुंजा का फल भी लेना चाहिए — इसका लेप 'चन्द्र-लुप्त' (गंजेपन के एक भेद) का नाशक है।

श्लोक 4 (garuda.1.176.4)

आम्रास्थिचूर्णलेपाद्वै केशाः सूक्ष्मा भवन्ति च । करञ्जामलकैलाललाक्षालेपोऽरुणापहः

āmrāsthicūrṇalepādvai keśāḥ sūkṣmā bhavanti ca karañjāmalakailālalākṣālepo'ruṇāpahaḥ

आम की गुठली के चूर्ण का लेप लगाने से बाल महीन हो जाते हैं। करंज, आँवला, इलायची और लाख के लेप से त्वचा की लाली दूर होती है।

श्लोक 5 (garuda.1.176.5)

आम्रास्थिमज्जामलकलेपात्केशा भवन्ति वै । बद्धमूला घना दीर्घाः स्नग्धाः स्युर्नोत्पतन्ति च

āmrāsthimajjāmalakalepātkeśā bhavanti vai baddhamūlā ghanā dīrghāḥ snagdhāḥ syurnotpatanti ca

आम की गुठली की मींगी और आँवले का लेप लगाने से बाल जड़ से मज़बूत, घने, लम्बे और चिकने हो जाते हैं तथा गिरते नहीं।

श्लोक 6 (garuda.1.176.6)

विडङ्गगन्धपाषाणसाधितं तैलमुत्तमम् । सचतुर्गुणगोमूत्रं मनसः शिलमेव वा

viḍaṅgagandhapāṣāṇasādhitaṁ tailamuttamam sacaturguṇagomūtraṁ manasaḥ śilameva vā

विडंग और गन्धक-पाषाण से सिद्ध किया गया उत्तम तेल, चौगुने गोमूत्र सहित, अथवा मैनसिल के साथ बनाया गया,

श्लोक 7 (garuda.1.176.7)

शिरोऽभ्यङ्गाच्छिराजन्मयूकालिख्याः क्षयं नयेत् । नवदग्धं शङ्खचूर्णं घृष्टसीसकलेपितम्

śiro'bhyaṅgācchirājanmayūkālikhyāḥ kṣayaṁ nayet navadagdhaṁ śaṅkhacūrṇaṁ ghṛṣṭasīsakalepitam

— सिर पर मालिश करने से शिराओं में उत्पन्न मयूक (बालों का एक रोग) और लीख (जूँ के अण्डे) नष्ट हो जाते हैं। नए जले शंख का चूर्ण और घिसे हुए सीसे का लेप —

श्लोक 8 (garuda.1.176.8)

कचाः श्लक्ष्णा महाकृष्णा भवन्ति वृषभध्वज । भृङ्गराजं लोहचूर्णं त्रिफला बीजपूरकम्

kacāḥ ślakṣṇā mahākṛṣṇā bhavanti vṛṣabhadhvaja bhṛṅgarājaṁ lohacūrṇaṁ triphalā bījapūrakam

— हे वृषभध्वज (शिव)! इससे बाल चिकने और अत्यन्त काले हो जाते हैं। भृंगराज, लौह-चूर्ण, त्रिफला और बिजौरा —

श्लोक 9 (garuda.1.176.9)

नीली च करवीरं च गुडमेतैः समं शृतम् । पलितानीह कृष्णानि कुर्याल्लेपान्महौषधम्

nīlī ca karavīraṁ ca guḍametaiḥ samaṁ śṛtam palitānīha kṛṣṇāni kuryāllepānmahauṣadham

— नीली, कनेर और गुड़ — इन सबको समान मात्रा में उबालकर बनाया गया यह महान् औषध-लेप यहाँ के सफेद बालों को काला कर देता है।

श्लोक 10 (garuda.1.176.10)

आम्रास्थिमज्जा त्रिफला नी (ता) ली च भृङ्ग राजकम् । जीर्णं पक्वं लोहचूर्णं काञ्जिकं कृष्णकेशकृत्

āmrāsthimajjā triphalā nī (tā) lī ca bhṛṅga rājakam jīrṇaṁ pakvaṁ lohacūrṇaṁ kāñjikaṁ kṛṣṇakeśakṛt

आम की गुठली की मींगी, त्रिफला, नील और भृंगराज — इन्हें भलीभाँति पकाकर लौह-चूर्ण और काँजी के साथ मिलाने से बाल काले हो जाते हैं।

श्लोक 11 (garuda.1.176.11)

चक्रमर्दकबीजानि कुष्ठमेरण्डमूलकम् । अत्यम्लकाञ्जिकं पिष्ट्वा लेपान्मस्तकरोगनुत्

cakramardakabījāni kuṣṭhameraṇḍamūlakam atyamlakāñjikaṁ piṣṭvā lepānmastakaroganut

चक्रमर्द के बीज, कूठ और अरंडी की जड़ को अत्यन्त खट्टी काँजी में पीसकर लेप करने से सिर के रोग नष्ट होते हैं।

श्लोक 12 (garuda.1.176.12)

सैन्धवं च वचा हिङ्गु कुष्ठं नागेश्वरं तथा । शतपुष्पा देवदारु एभिस्तैलं तु साधितम्

saindhavaṁ ca vacā hiṅgu kuṣṭhaṁ nāgeśvaraṁ tathā śatapuṣpā devadāru ebhistailaṁ tu sādhitam

सेंधा नमक, वच, हींग, कूठ, नागेश्वर, शतपुष्पा और देवदारु — इनसे सिद्ध किया गया तेल —

श्लोक 13 (garuda.1.176.13)

गोपुरीपरसेनैव चतुर्भागेन संयुतम् । तत्कणभरणादुग्रकर्णशूलं क्षयं नयेत्

gopurīparasenaiva caturbhāgena saṁyutam tatkaṇabharaṇādugrakarṇaśūlaṁ kṣayaṁ nayet

— गोपुरी के रस के साथ चौथाई भाग में मिलाकर कान में भरने से भयंकर कर्णशूल नष्ट हो जाता है।

श्लोक 14 (garuda.1.176.14)

मेषमूत्रसैन्धवाभ्यां कर्णयोर्भरणाच्छिव । कर्णयोः पूतिनाशः स्यात्कृमिस्त्रावादिकस्य च

meṣamūtrasaindhavābhyāṁ karṇayorbharaṇācchiva karṇayoḥ pūtināśaḥ syātkṛmistrāvādikasya ca

बकरी के मूत्र और सेंधा नमक से कानों को भरने से, हे शिव, कानों की दुर्गन्ध, कृमि और स्राव आदि का नाश होता है।

श्लोक 15 (garuda.1.176.15)

मालतीपुप्पदलयो रसेन भरणात्तथा । गोजलेनैव पूरेण पूयस्त्रावो विनश्यति

mālatīpuppadalayo rasena bharaṇāttathā gojalenaiva pūreṇa pūyastrāvo vinaśyati

मालती के फूलों की पंखुड़ियों के रस से कान भरने से, तथा गोजल के प्रयोग से भी, मवाद का स्राव नष्ट हो जाता है।

श्लोक 16 (garuda.1.176.16)

कष्ठमाषमरीचानि तगरं मधु पिप्पली । अपामार्गोऽश्वगन्धा च बृहती सितसर्षपाः

kaṣṭhamāṣamarīcāni tagaraṁ madhu pippalī apāmārgo'śvagandhā ca bṛhatī sitasarṣapāḥ

कूठ, उड़द, मिर्च, तगर, मधु, पीपल, अपामार्ग, अश्वगन्धा, बृहती और सफेद सरसों —

श्लोक 17 (garuda.1.176.17)

यवास्तिलाः सैन्धवं च पादिकोद्वर्तनं शुभम् । लिङ्गबाहुस्तनानां च कर्णयोर्वृद्धिकृद्भवेत् । कटुतैलं भल्लातकं बृहती फलदाडिमम्

yavāstilāḥ saindhavaṁ ca pādikodvartanaṁ śubham liṅgabāhustanānāṁ ca karṇayorvṛddhikṛdbhavet kaṭutailaṁ bhallātakaṁ bṛhatī phaladāḍimam

— जौ, तिल और सेंधा नमक — इनसे बना उबटन शुभ है; यह लिंग, भुजा, स्तन और कान की वृद्धि करने वाला होता है। कड़वा तेल, भिलावा, बृहती-फल और अनार —

श्लोक 18 (garuda.1.176.18)

वल्कलैः साधितैर्लिप्तं लिङ्गं तेन विवर्धते

valkalaiḥ sādhitairliptaṁ liṅgaṁ tena vivardhate

— इनकी छाल से सिद्ध किया हुआ लेप लिंग पर लगाने से उसकी वृद्धि होती है।

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