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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 179

दन्त, कर्ण और नेत्र सम्बन्धी उपचार

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

श्लोक 1 (garuda.1.179.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १७९ हरिरुवाच । हरितालं यवक्षांरं पत्राङ्गं रक्तचन्दनम् । जातिहिङ्गुलकं लाक्षां पक्त्वा दन्तान्प्रलेपयेत्

śrīgaruḍamahāpurāṇam 179 hariruvāca haritālaṁ yavakṣāṁraṁ patrāṅgaṁ raktacandanam jātihiṅgulakaṁ lākṣāṁ paktvā dantānpralepayet

हरि ने कहा — हरताल, यव-क्षार, दालचीनी, लाल चन्दन, जाती, सिन्दूर और लाख को पकाकर दाँतों पर लेप करना चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.179.2)

हरीतकीकषायेण मृष्ट्वा दन्तान्प्रलेपयेत् । दन्ताः स्युर्लोहिताः पुंसः श्वेता रुद्र न संशयः

harītakīkaṣāyeṇa mṛṣṭvā dantānpralepayet dantāḥ syurlohitāḥ puṁsaḥ śvetā rudra na saṁśayaḥ

हरड़ के काढ़े से दाँतों को माँजकर लेप करना चाहिए; इससे पुरुष के दाँत लाल हो जाते हैं, अथवा श्वेत रहते हैं, हे रुद्र, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 3 (garuda.1.179.3)

मूलकं स्विद्य मन्दाग्नौ रसं तस्य प्रपूरयेत् । कर्णयोः पूरणात्तेन कर्णस्त्रावो विनश्यति

mūlakaṁ svidya mandāgnau rasaṁ tasya prapūrayet karṇayoḥ pūraṇāttena karṇastrāvo vinaśyati

मूली को मन्द आँच पर भाप देकर उसका रस भरना चाहिए; कानों में उसे भरने से कान का स्राव नष्ट हो जाता है।

श्लोक 4 (garuda.1.179.4)

अर्कपत्रं गृहीत्वा तु मन्दाग्नौ तापयेच्छनैः । निष्पीड्य पूरयेत्कर्णौ कर्णशूलं विनश्यति

arkapatraṁ gṛhītvā tu mandāgnau tāpayecchanaiḥ niṣpīḍya pūrayetkarṇau karṇaśūlaṁ vinaśyati

आक के पत्ते को लेकर मन्द आँच पर धीरे-धीरे गर्म करना चाहिए; उसे निचोड़कर कानों में भरने से कर्णशूल नष्ट होता है।

श्लोक 5 (garuda.1.179.5)

प्रियङ्गुमधुका चैव धातक्युत्पलपाङ्क्तिभिः । मञ्जिष्ठा लोध्रलाक्षाभिः कपित्थस्वरसेन च । पचेत्तैलं तथा स्त्रीणां नश्येत्क्लेदः प्रपूरणात्

priyaṅgumadhukā caiva dhātakyutpalapāṅktibhiḥ mañjiṣṭhā lodhralākṣābhiḥ kapitthasvarasena ca pacettailaṁ tathā strīṇāṁ naśyetkledaḥ prapūraṇāt

प्रियंगु, मुलेठी, धातकी, नील कमल की पंक्ति सहित, मंजिष्ठा, लोध्र, लाख और कैथ के स्वरस से पकाया गया तेल स्त्रियों के लिए [योनि] भरने पर गीलेपन-स्राव को नष्ट कर देता है।

श्लोक 6 (garuda.1.179.6)

शुष्कमूलकशुण्ठीनां क्षारो हिङ्गुमहौषधम् । सतपुष्पावचा कुष्ठं दारु शिग्र रसाञ्जनम्

śuṣkamūlakaśuṇṭhīnāṁ kṣāro hiṅgumahauṣadham satapuṣpāvacā kuṣṭhaṁ dāru śigra rasāñjanam

सूखी मूली और सोंठ का क्षार, हींग, महौषध, शतपुष्पा, वच, कूठ, देवदारु, सहजन और रसाञ्जन —

श्लोक 7 (garuda.1.179.7)

सौवर्चलं यवक्षारं तथा सर्जकसैन्धवम् । तथा ग्रन्थिर्विडं मुस्तं मधुयुक्तं चतुर्गुणम्

sauvarcalaṁ yavakṣāraṁ tathā sarjakasaindhavam tathā granthirviḍaṁ mustaṁ madhuyuktaṁ caturguṇam

सौवर्चल नमक, यव-क्षार, सर्जक-क्षार, सेंधा नमक, ग्रन्थि, विड-नमक और मुस्तक, इन्हें चौगुने मधु के साथ मिलाकर —

श्लोक 8 (garuda.1.179.8)

मातुलुं गरसस्तद्वत्कदल्याश्च रसो हि तैः । पक्वतैलं हरेदाशु स्त्रावादींश्च न संशयः

mātuluṁ garasastadvatkadalyāśca raso hi taiḥ pakvatailaṁ haredāśu strāvādīṁśca na saṁśayaḥ

बिजौरे का रस, तथा केले का रस भी इनके साथ मिलाना चाहिए। इस प्रकार पकाया गया तेल शीघ्र ही स्राव आदि दोषों को दूर करता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 9 (garuda.1.179.9)

कर्णयोः कृमिनाशः स्यात्कटुतैलस्य पूरणात् । हरिद्रा निम्बपत्राणि पिप्पल्यो मरिचानि च

karṇayoḥ kṛmināśaḥ syātkaṭutailasya pūraṇāt haridrā nimbapatrāṇi pippalyo maricāni ca

कानों में तीखा तेल भरने से कान के कृमि नष्ट होते हैं। हल्दी, नीम के पत्ते, पीपल और काली मिर्च,

श्लोक 10 (garuda.1.179.10)

विडङ्गभद्रं मुस्तञ्च सप्तमं विश्वभेषजम् । गोमूत्रेण च पिष्ट्वैव कृत्वा च वटिकां हर ! । अजीर्णहृद्भवेच्चैकं द्वयं विषूचिकापहम्

viḍaṅgabhadraṁ mustañca saptamaṁ viśvabheṣajam gomūtreṇa ca piṣṭvaiva kṛtvā ca vaṭikāṁ hara ! ajīrṇahṛdbhaveccaikaṁ dvayaṁ viṣūcikāpaham

विडंग, भद्र, मुस्तक और सातवाँ सोंठ — इन्हें गोमूत्र में पीसकर गोली बनाकर, हे हर — एक [गोली] अजीर्ण का, दो विसूचिका (हैज़े-जैसे रोग) का नाश करती हैं।

श्लोक 11 (garuda.1.179.11)

पटोलं मधुना हन्ति गोमूत्रेण तथाबुदम् । एषा च शङ्करी वर्तिः सर्वनेत्रामया पहा

paṭolaṁ madhunā hanti gomūtreṇa tathābudam eṣā ca śaṅkarī vartiḥ sarvanetrāmayā pahā

परवल मधु के साथ [रोग] नष्ट करता है, गोमूत्र के साथ अर्बुद (गाँठ) को भी नष्ट करता है। यही 'शांकरी वर्ती' है, जो सभी नेत्र-रोगों का नाशक है।

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