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भूमि खण्ड · अध्याय 1

प्रह्लाद-विषयक संदेह तथा शिवशर्मा द्वारा पुत्रों की परीक्षा

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (padma.2.1.1)

ऋषय ऊचुः- शृणु सूत महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । संदेहमागतं विद्वन्दारुणं बुद्धिनाशनम्

ṛṣaya ūcuḥ- śṛṇu sūta mahābhāga sarvatattvārthakovida saṁdehamāgataṁ vidvandāruṇaṁ buddhināśanam

ऋषियों ने कहा — हे परम सौभाग्यशाली सूत! हे समस्त तत्त्वों के अर्थ में निपुण! सुनिए, हमें एक भयंकर संदेह उत्पन्न हुआ है, जो बुद्धि को नष्ट करने वाला है।

श्लोक 2 (padma.2.1.2)

केचित्पठंति प्रह्लादं पुराणेषु द्विजोत्तमाः । पंचवर्षान्वितेनापि केशवः परितोषितः

kecitpaṭhaṁti prahlādaṁ purāṇeṣu dvijottamāḥ paṁcavarṣānvitenāpi keśavaḥ paritoṣitaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! कुछ लोग पुराणों में यह पढ़ते हैं कि प्रह्लाद ने केवल पाँच वर्ष की अवस्था में ही केशव को संतुष्ट कर दिया था।

श्लोक 3 (padma.2.1.3)

देवासुरे कथं प्राप्ते हरिणा सह युध्यति । निहतो वासुदेवेन प्रविष्टो वैष्णवीं तनुम्

devāsure kathaṁ prāpte hariṇā saha yudhyati nihato vāsudevena praviṣṭo vaiṣṇavīṁ tanum

फिर देवासुर संग्राम होने पर वे हरि के विरुद्ध युद्ध कैसे करते हैं? वासुदेव द्वारा मारे जाकर वे वैष्णवी देह में कैसे प्रविष्ट हो गए?

श्लोक 4 (padma.2.1.4)

सूत उवाच- कश्यपेन पुरा ज्ञातं कृतं व्यासेन धीमता । ब्रह्मणा कथितं पूर्वं व्यासस्याग्रे स्वयं प्रभोः

sūta uvāca- kaśyapena purā jñātaṁ kṛtaṁ vyāsena dhīmatā brahmaṇā kathitaṁ pūrvaṁ vyāsasyāgre svayaṁ prabhoḥ

सूत जी ने कहा — यह पूर्वकाल में कश्यप द्वारा जाना गया, बुद्धिमान व्यास ने इसे रचा, और स्वयं प्रभु ब्रह्मा ने पहले व्यास के समक्ष इसे कहा था।

श्लोक 5 (padma.2.1.5)

तमेवं हि प्रवक्ष्यामि भवतामग्रतो द्विजाः । संदेहकारणं जातं छिन्नं देवेन वेधसा

tamevaṁ hi pravakṣyāmi bhavatāmagrato dvijāḥ saṁdehakāraṇaṁ jātaṁ chinnaṁ devena vedhasā

हे द्विजो! वही वृत्तांत अब मैं आपके समक्ष कहूँगा — यह संदेह का कारण देव विधाता (ब्रह्मा) द्वारा पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है।

श्लोक 6 (padma.2.1.6)

व्यास उवाचः- शृणु सूत महाभाग ब्रह्मणा परिभाषितम् । प्रह्लादस्य यथा जन्म पुराणेप्यन्यथा श्रुतम्

vyāsa uvācaḥ- śṛṇu sūta mahābhāga brahmaṇā paribhāṣitam prahlādasya yathā janma purāṇepyanyathā śrutam

व्यास जी ने कहा — हे परम सौभाग्यशाली सूत! सुनो, ब्रह्मा ने जो कहा — प्रह्लाद का जन्म पुराणों में जिस प्रकार भिन्न-भिन्न सुना जाता है, वह इस प्रकार है।

श्लोक 7 (padma.2.1.7)

जातमात्रः सर्वसुखं वैष्णवं मार्गमाश्रितः । महाभागवतश्रेष्ठः प्रह्लादो देवपूजितः

jātamātraḥ sarvasukhaṁ vaiṣṇavaṁ mārgamāśritaḥ mahābhāgavataśreṣṭhaḥ prahlādo devapūjitaḥ

जन्म लेते ही समस्त सुखों से युक्त, वैष्णव मार्ग का आश्रय लेने वाले, महाभागवतों में श्रेष्ठ प्रह्लाद देवताओं द्वारा पूजित हुए।

श्लोक 8 (padma.2.1.8)

विष्णुना सह युद्धाय सपुत्रः संगरंगतः । निहतो वासुदेवेन प्रविष्टो वैष्णवीं तनुम्

viṣṇunā saha yuddhāya saputraḥ saṁgaraṁgataḥ nihato vāsudevena praviṣṭo vaiṣṇavīṁ tanum

किंतु अन्यत्र यह भी कहा जाता है कि अपने पुत्रों सहित विष्णु से युद्ध करने के लिए संग्राम में गया और वासुदेव द्वारा मारा जाकर वैष्णवी देह में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 9 (padma.2.1.9)

सृष्टिभावं शृणुष्व त्वमस्यैव च महात्मनः । संगरं प्राप्य पुत्राद्यैर्विष्णुना सह वीर्यवान्

sṛṣṭibhāvaṁ śṛṇuṣva tvamasyaiva ca mahātmanaḥ saṁgaraṁ prāpya putrādyairviṣṇunā saha vīryavān

अब उस महात्मा की सच्ची उत्पत्ति सुनो — पुत्रों सहित विष्णु से संग्राम प्राप्त कर वह वीर्यवान —

श्लोक 10 (padma.2.1.10)

प्रविष्टो वैष्णवं तेजः संप्राप्य स्वेन तेजसा । पुराकल्पे महाभाग यथा जातः स वीर्यवान्

praviṣṭo vaiṣṇavaṁ tejaḥ saṁprāpya svena tejasā purākalpe mahābhāga yathā jātaḥ sa vīryavān

—अपने ही तेज से विष्णु के तेज में प्रविष्ट हो गया। हे महाभाग! पूर्वकल्प में वह वीर्यवान जिस प्रकार उत्पन्न हुआ था, वह सुनो।

श्लोक 11 (padma.2.1.11)

वृत्तांतं तस्य वीरस्य प्रवक्ष्यामि समासतः । पश्चिमे सागरस्यांते द्वारका नाम वै पुरी

vṛttāṁtaṁ tasya vīrasya pravakṣyāmi samāsataḥ paścime sāgarasyāṁte dvārakā nāma vai purī

उस वीर का वृत्तांत मैं संक्षेप में कहूँगा। समुद्र के पश्चिमी तट पर द्वारका नामक नगरी है।

श्लोक 12 (padma.2.1.12)

सर्वऋद्धिसमायुक्ता सर्वसिद्धिसमन्विता । तस्यामास्ते सदा देवो योगज्ञो योगवित्तमः

sarvaṛddhisamāyuktā sarvasiddhisamanvitā tasyāmāste sadā devo yogajño yogavittamaḥ

जो समस्त ऋद्धियों से युक्त और समस्त सिद्धियों से संपन्न थी — वहाँ सदा एक देव निवास करता था, जो योग का ज्ञाता और योगियों में श्रेष्ठ था।

श्लोक 13 (padma.2.1.13)

शिवशर्मेति विख्यातो वेदशास्त्रार्थकोविदः । तस्यापि पंचपुत्रास्तु बभूवुः शास्त्रकोविदाः

śivaśarmeti vikhyāto vedaśāstrārthakovidaḥ tasyāpi paṁcaputrāstu babhūvuḥ śāstrakovidāḥ

वह शिवशर्मा नाम से विख्यात, वेद-शास्त्रों के अर्थ में निपुण था। उसके भी पाँच पुत्र हुए, जो सभी शास्त्रों में निपुण थे।

श्लोक 14 (padma.2.1.14)

यज्ञशर्मा वेदशर्मा धर्मशर्मा तथैव च । विष्णुशर्मा महाभागो नूनं तत्कर्मकोविदः

yajñaśarmā vedaśarmā dharmaśarmā tathaiva ca viṣṇuśarmā mahābhāgo nūnaṁ tatkarmakovidaḥ

यज्ञशर्मा, वेदशर्मा, तथा धर्मशर्मा, और महाभाग विष्णुशर्मा, जो निश्चय ही अपने-अपने कर्मों में निपुण थे।

श्लोक 15 (padma.2.1.15)

पंचमः सोमशर्मेति पितृभक्तिपरायणः । पितृभक्तिं विना चैव धर्ममन्यं द्विजोत्तमाः

paṁcamaḥ somaśarmeti pitṛbhaktiparāyaṇaḥ pitṛbhaktiṁ vinā caiva dharmamanyaṁ dvijottamāḥ

पाँचवाँ सोमशर्मा नाम से पितृभक्ति में सदा तत्पर था। हे द्विजश्रेष्ठो! पितृभक्ति के बिना अन्य किसी धर्म को —

श्लोक 16 (padma.2.1.16)

न विदंति महात्मानस्तद्भावेन तु भाविताः । तेषां तु भक्तिं संपश्यञ्छिवशर्मा द्विजोत्तमः

na vidaṁti mahātmānastadbhāvena tu bhāvitāḥ teṣāṁ tu bhaktiṁ saṁpaśyañchivaśarmā dvijottamaḥ

—महात्मा जन नहीं जानते, वे उसी भाव से भावित रहते हैं। उनकी यह भक्ति देखकर द्विजश्रेष्ठ शिवशर्मा ने —

श्लोक 17 (padma.2.1.17)

चिंतयामास मेधावी निष्कर्षिष्ये सुरोत्तमान् । पितृभक्तेषु यो भावो नैतेषां मनसि स्थितः

ciṁtayāmāsa medhāvī niṣkarṣiṣye surottamān pitṛbhakteṣu yo bhāvo naiteṣāṁ manasi sthitaḥ

—बुद्धिमान होने के कारण विचार किया कि 'मैं इन श्रेष्ठ पुत्रों की परीक्षा लूँगा। पितृभक्ति का जो भाव है, वह अभी तक इनके मन में दृढ़ नहीं हुआ है' —

श्लोक 18 (padma.2.1.18)

यथा जानाम्यहं चाथ करिष्ये बुद्धिपूर्वकम् । विष्णोश्चैव प्रसादात्स सर्वसिद्धिर्बभूव ह

yathā jānāmyahaṁ cātha kariṣye buddhipūrvakam viṣṇoścaiva prasādātsa sarvasiddhirbabhūva ha

—'जैसा मैं जानता हूँ, वैसा ही बुद्धिपूर्वक करूँगा।' और विष्णु की कृपा से उसकी सारी सिद्धि पूर्ण हो गई।

श्लोक 19 (padma.2.1.19)

सद्भावं चिंतयामास अंजनार्थं द्विजोत्तमाः । उपायं ब्राह्मणश्रेष्ठस्तपसस्तेजसः किल

sadbhāvaṁ ciṁtayāmāsa aṁjanārthaṁ dvijottamāḥ upāyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhastapasastejasaḥ kila

हे द्विजश्रेष्ठो! उस ब्राह्मणश्रेष्ठ ने उनकी परीक्षा के लिए अपने तप के तेज से एक उपाय की रचना की।

श्लोक 20 (padma.2.1.20)

चकार सोप्युपायज्ञो मायया ब्रह्मवित्तमः । तेषामग्रे ततो व्याजं शिवशर्मा व्यदर्शयत्

cakāra sopyupāyajño māyayā brahmavittamaḥ teṣāmagre tato vyājaṁ śivaśarmā vyadarśayat

उपाय जानने वाले, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस शिवशर्मा ने अपनी माया से वह रचा, और फिर उनके समक्ष एक छलपूर्ण दृश्य प्रकट किया।

श्लोक 21 (padma.2.1.21)

महता ज्वररोगेण मृता माता विदर्शिता । तैस्तु दृष्टा मृता माता पितरं वाक्यमब्रुवन्

mahatā jvararogeṇa mṛtā mātā vidarśitā taistu dṛṣṭā mṛtā mātā pitaraṁ vākyamabruvan

भयंकर ज्वर रोग से माता की मृत्यु दिखाई गई। मृत माता को देखकर उन्होंने पिता से यह वचन कहा —

श्लोक 22 (padma.2.1.22)

ययावयं महाभाग गर्भोदरे प्रवर्द्धिताः । कलेवरं परित्यज्य स्वयमेव गता क्षयम्

yayāvayaṁ mahābhāga garbhodare pravarddhitāḥ kalevaraṁ parityajya svayameva gatā kṣayam

'हे महाभाग! जिस माता ने हमें गर्भ में पालकर बढ़ाया, वह अपना शरीर त्यागकर स्वयं ही नष्ट हो गई।

श्लोक 23 (padma.2.1.23)

अपहाय गता सेयं स्वर्गे तात किमुच्यते । शिवशर्मोपरिभवं पुत्रं भक्तिपरायणम्

apahāya gatā seyaṁ svarge tāta kimucyate śivaśarmoparibhavaṁ putraṁ bhaktiparāyaṇam

वह हमें छोड़कर चली गई — हे तात! अब स्वर्ग में क्या कहा जाए?' यह सुनकर शिवशर्मा ने भक्तिपरायण पुत्र [यज्ञशर्मा] की ओर —

श्लोक 24 (padma.2.1.24)

यज्ञशर्माणमाहूय इत्युवाच द्विजोत्तमः । शिवशर्मोवाच- अनेनापि सुतीक्ष्णेन शस्त्रेण निशितेन वै

yajñaśarmāṇamāhūya ityuvāca dvijottamaḥ śivaśarmovāca- anenāpi sutīkṣṇena śastreṇa niśitena vai

—यज्ञशर्मा को बुलाकर द्विजश्रेष्ठ ने यह कहा। शिवशर्मा ने कहा — 'इसी अत्यंत तीक्ष्ण, पैने शस्त्र से —

श्लोक 25 (padma.2.1.25)

विच्छिद्यांगानि सर्वाणि यत्र तत्र क्षिपस्व ह । तत्कृतं तेन पुत्रेण यथादेशः श्रुतः पितुः

vicchidyāṁgāni sarvāṇi yatra tatra kṣipasva ha tatkṛtaṁ tena putreṇa yathādeśaḥ śrutaḥ pituḥ

—इसके सारे अंगों को काटकर, यहाँ-वहाँ बिखेर दो।' पिता की आज्ञा सुनकर उस पुत्र ने वैसा ही किया।

श्लोक 26 (padma.2.1.26)

समायातः पुनः पश्चात्पितरं वाक्यमब्रवीत् । यथादिष्टं त्वया तात तत्सर्वं कृतवानहम्

samāyātaḥ punaḥ paścātpitaraṁ vākyamabravīt yathādiṣṭaṁ tvayā tāta tatsarvaṁ kṛtavānaham

फिर लौटकर उसने पिता से यह वचन कहा — 'हे तात! जैसा आपने आदेश दिया, वह सब मैंने कर दिया है।

श्लोक 27 (padma.2.1.27)

समादिश ममान्यच्च कार्यकारणमद्य च । तच्च सर्वं करिष्यामि दुर्जयं दुर्लभं पितः

samādiśa mamānyacca kāryakāraṇamadya ca tacca sarvaṁ kariṣyāmi durjayaṁ durlabhaṁ pitaḥ

मुझे अन्य कोई कार्य और उसका कारण आज ही बताइए, वह सब मैं करूँगा, चाहे वह कितना भी दुर्जय और दुर्लभ क्यों न हो, हे पिता!'

श्लोक 28 (padma.2.1.28)

तमाज्ञाय महाभागं पितृभक्तं स च द्विजः । निश्चयं परमं ज्ञात्वा द्वितीयस्य विचिंतयन्

tamājñāya mahābhāgaṁ pitṛbhaktaṁ sa ca dvijaḥ niścayaṁ paramaṁ jñātvā dvitīyasya viciṁtayan

उस महाभाग, पितृभक्त को पहचानकर वह द्विज, उसका सर्वोच्च निश्चय जानकर दूसरे [पुत्र] के विषय में विचार करने लगा।

श्लोक 29 (padma.2.1.29)

वेदशर्माणमाहूय गच्छ त्वं मम शासनात् । स्त्रिया विना न शक्नोमि स्थातुं कंदर्पमोहितः

vedaśarmāṇamāhūya gaccha tvaṁ mama śāsanāt striyā vinā na śaknomi sthātuṁ kaṁdarpamohitaḥ

वेदशर्मा को बुलाकर [कहा] — 'मेरी आज्ञा से जाओ। स्त्री के बिना मैं कामबाण से मोहित होकर रह नहीं सकता।'

श्लोक 30 (padma.2.1.30)

मायया दर्शिता नारी सर्वसौभाग्यसंपदा । एनामानय वत्स त्वं ममार्थे कृतनिश्चयः

māyayā darśitā nārī sarvasaubhāgyasaṁpadā enāmānaya vatsa tvaṁ mamārthe kṛtaniścayaḥ

माया से एक स्त्री दिखाई गई, जो समस्त सौभाग्य-संपदा से युक्त थी। 'हे पुत्र! उसे मेरे लिए ले आओ, दृढ़ निश्चय के साथ।'

श्लोक 31 (padma.2.1.31)

एवमुक्तस्तथा प्राह करिष्ये तव सुप्रियम् । पितरं तं नमस्कृत्य तामुवाच गतस्ततः

evamuktastathā prāha kariṣye tava supriyam pitaraṁ taṁ namaskṛtya tāmuvāca gatastataḥ

इस प्रकार कहे जाने पर उसने वैसा ही कहा — 'मैं आपको अत्यंत प्रिय कार्य करूँगा।' पिता को नमस्कार कर वह वहाँ से जाकर उससे बोला —

श्लोक 32 (padma.2.1.32)

त्वां देवि याचते तातः कामबाणप्रपीडितः । अतस्त्वं जरया युक्ते प्रसादसुमुखी भव

tvāṁ devi yācate tātaḥ kāmabāṇaprapīḍitaḥ atastvaṁ jarayā yukte prasādasumukhī bhava

'हे देवी! कामबाण से पीड़ित मेरे पिता आपसे याचना करते हैं। अतः वृद्धावस्था से पीड़ित उन पर आप प्रसन्नमुखी होकर कृपा करें।'

श्लोक 33 (padma.2.1.33)

भज त्वं चारुसर्वांगि पितरं मम सुंदरि । एवमाकर्णितं तस्य मायया वेदशर्मणः

bhaja tvaṁ cārusarvāṁgi pitaraṁ mama suṁdari evamākarṇitaṁ tasya māyayā vedaśarmaṇaḥ

'हे सुंदरी! समस्त अंगों से मनोहर, आप मेरे पिता को स्वीकार करें।' यह बात वेदशर्मा ने उस माया-रचित स्त्री से इस प्रकार कही।

श्लोक 34 (padma.2.1.34)

स्त्र्युवाच- जरया पीडितस्यापि नैवेच्छामि कदाचन । सश्लेष्ममुखरोगस्य व्याधिग्रस्तस्य सांप्रतम्

stryuvāca- jarayā pīḍitasyāpi naivecchāmi kadācana saśleṣmamukharogasya vyādhigrastasya sāṁpratam

स्त्री ने कहा — 'वृद्धावस्था से पीड़ित, अभी रोगग्रस्त, कफयुक्त मुखरोग वाले —

श्लोक 35 (padma.2.1.35)

शिथिलस्यापि चार्तस्य तस्य वृद्धस्य संगमम् । भवंतं रंतुमिच्छामि करिष्ये तव सुप्रियम्

śithilasyāpi cārtasya tasya vṛddhasya saṁgamam bhavaṁtaṁ raṁtumicchāmi kariṣye tava supriyam

—शिथिल और दुःखी उस वृद्ध के साथ संगम मैं कभी नहीं चाहती। मैं तो आपसे रमण करना चाहती हूँ; मैं आपकी अत्यंत प्रिय इच्छा पूरी करूँगी।

श्लोक 36 (padma.2.1.36)

भवंतं रूपसौभाग्यैर्गुणरत्नैरलंकृतम् । दिव्यलक्षणसंपन्नं दिव्यरूपं महौजसम्

bhavaṁtaṁ rūpasaubhāgyairguṇaratnairalaṁkṛtam divyalakṣaṇasaṁpannaṁ divyarūpaṁ mahaujasam

आप रूप और सौभाग्य से, गुणरूपी रत्नों से अलंकृत, दिव्य लक्षणों से संपन्न, दिव्य रूप वाले, महातेजस्वी हैं —

श्लोक 37 (padma.2.1.37)

किं करिष्यसि तातेन वृद्धेन शृणु मानद । ममांगभोगभावेन सर्वं प्राप्स्यसि दुर्लभम्

kiṁ kariṣyasi tātena vṛddhena śṛṇu mānada mamāṁgabhogabhāvena sarvaṁ prāpsyasi durlabham

—वृद्ध पिता से आपको क्या लेना-देना? हे मानद! सुनिए, मेरे अंगभोग से आप वह सब कुछ प्राप्त करेंगे जो अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 38 (padma.2.1.38)

यद्यत्त्वमिच्छसे विप्र तद्ददामि न संशयः । एतद्वाक्यं महच्छ्रुत्वा अप्रियं पापसंकुलम्

yadyattvamicchase vipra taddadāmi na saṁśayaḥ etadvākyaṁ mahacchrutvā apriyaṁ pāpasaṁkulam

हे विप्र! जो कुछ भी आप चाहें, मैं वह दूँगी, इसमें संदेह नहीं है।' यह गंभीर, अप्रिय, पापयुक्त वचन सुनकर —

श्लोक 39 (padma.2.1.39)

वेदशर्मोवाच- अधर्मयुक्तं ते वाक्यमयुक्तं पापमिश्रितम् । नेदृशं मां वदेर्देवि पितृभक्तिमनागसम्

vedaśarmovāca- adharmayuktaṁ te vākyamayuktaṁ pāpamiśritam nedṛśaṁ māṁ vaderdevi pitṛbhaktimanāgasam

वेदशर्मा ने कहा — 'तुम्हारा यह वचन अधर्मयुक्त, अनुचित, पापमिश्रित है। हे देवी! मुझ निर्दोष पितृभक्त से ऐसा मत कहो —

श्लोक 40 (padma.2.1.40)

पितुरर्थं समायातस्त्वामहं प्रार्थये शुभे । अन्यदेवं न वक्तव्यं भज त्वं पितरं मम

piturarthaṁ samāyātastvāmahaṁ prārthaye śubhe anyadevaṁ na vaktavyaṁ bhaja tvaṁ pitaraṁ mama

मैं पिता के लिए ही आया हूँ, हे शुभे! मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूँ। अन्य कुछ ऐसा मत कहिए; आप मेरे पिता को ही स्वीकार करें।

श्लोक 41 (padma.2.1.41)

यद्यत्त्वमिच्छसे देवि त्रैलोक्ये सचराचरम् । तत्तद्दद्मि न संदेहो देवराज्याधिकं शुभे

yadyattvamicchase devi trailokye sacarācaram tattaddadmi na saṁdeho devarājyādhikaṁ śubhe

हे देवी! त्रैलोक्य में चराचर सहित जो कुछ भी आप चाहें, वह सब मैं दूँगा, इसमें संदेह नहीं — हे शुभे! देवराज्य से भी अधिक।'

श्लोक 42 (padma.2.1.42)

स्त्र्युवाच- एवं समर्थो दातुं मे पितुरर्थे यदा भवान् । तदा मे दर्शयाद्यैव सेंद्रास्त्वं समहेश्वरान्

stryuvāca- evaṁ samartho dātuṁ me piturarthe yadā bhavān tadā me darśayādyaiva seṁdrāstvaṁ samaheśvarān

स्त्री ने कहा — 'यदि आप मेरे पिता के लिए इस प्रकार देने में समर्थ हैं, तो आज ही मुझे इंद्र सहित सभी महेश्वरों को दिखाइए।

श्लोक 43 (padma.2.1.43)

दातुमेवं समर्थोसि दुर्लभं सांप्रतं किल । किं ते बलं महाभाग दर्शयस्व त्वमात्मनः

dātumevaṁ samarthosi durlabhaṁ sāṁprataṁ kila kiṁ te balaṁ mahābhāga darśayasva tvamātmanaḥ

आप ऐसा देने में समर्थ हैं जो अभी अत्यंत दुर्लभ है — हे महाभाग! आपका बल क्या है, वह स्वयं दिखाइए।'

श्लोक 44 (padma.2.1.44)

वेदशर्मोवाच- पश्य पश्य बलं देवि प्रभावं तपसो मम । मयाहूताः समायाता इंद्राद्याः सुरसत्तमाः

vedaśarmovāca- paśya paśya balaṁ devi prabhāvaṁ tapaso mama mayāhūtāḥ samāyātā iṁdrādyāḥ surasattamāḥ

वेदशर्मा ने कहा — 'हे देवी! मेरे तप के प्रभाव और बल को देखो, देखो! मेरे बुलाने पर इंद्र आदि श्रेष्ठ देवगण आ गए हैं।'

श्लोक 45 (padma.2.1.45)

वेदशर्माणमूचुस्ते किं कुर्मो हि द्विजोत्तम । यमेवमिच्छसे विप्र तं ददामो न संशयः

vedaśarmāṇamūcuste kiṁ kurmo hi dvijottama yamevamicchase vipra taṁ dadāmo na saṁśayaḥ

वेदशर्मा से उन्होंने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठ! हम क्या करें? हे विप्र! आप जो चाहें, वह हम देंगे, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 46 (padma.2.1.46)

वेदशर्मोवाच- यदि देवाः प्रसान्ना मे प्रसादसुमुखा यदि । ददंतु विमलां भक्तिं पादयोः पितुरेव मे

vedaśarmovāca- yadi devāḥ prasānnā me prasādasumukhā yadi dadaṁtu vimalāṁ bhaktiṁ pādayoḥ pitureva me

वेदशर्मा ने कहा — 'यदि देवगण मुझसे प्रसन्न हैं, यदि वे कृपापूर्वक प्रसन्नमुख हैं, तो वे मुझे मेरे पिता के चरणों में निर्मल भक्ति प्रदान करें।'

श्लोक 47 (padma.2.1.47)

एवमस्तु सुराः सर्वे यथायातास्तथा गताः । तमुवाच तथा दृष्ट्वा दृष्टं ते तपसो बलम्

evamastu surāḥ sarve yathāyātāstathā gatāḥ tamuvāca tathā dṛṣṭvā dṛṣṭaṁ te tapaso balam

'ऐसा ही हो' — सभी देवगण जैसे आए थे वैसे ही चले गए। यह देखकर उस स्त्री ने उससे कहा — 'मैंने तुम्हारे तप का बल देख लिया।

श्लोक 48 (padma.2.1.48)

देवैस्तु नास्ति मे कार्यं यदि दातुमिहेच्छसि । यन्मां नयसि गुर्वर्थं तत्कुरुष्व मम प्रियम्

devaistu nāsti me kāryaṁ yadi dātumihecchasi yanmāṁ nayasi gurvarthaṁ tatkuruṣva mama priyam

देवताओं से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। यदि आप यहाँ देना चाहते हैं, तो चूँकि आप मुझे पिता के लिए ले जाना चाहते हैं, तो मेरी यह प्रिय इच्छा पूर्ण कीजिए —

श्लोक 49 (padma.2.1.49)

देहि त्वं स्वं शिरो विप्र स्वहस्तेन निकृत्य वै । वेदशर्मोवाच- धन्योहमद्य संजातो मुक्तश्चैव ऋणत्रयात्

dehi tvaṁ svaṁ śiro vipra svahastena nikṛtya vai vedaśarmovāca- dhanyohamadya saṁjāto muktaścaiva ṛṇatrayāt

हे विप्र! अपने ही हाथ से काटकर अपना सिर मुझे दीजिए।' वेदशर्मा ने कहा — 'आज मैं धन्य हो गया, और तीनों ऋणों से मुक्त हो गया।

श्लोक 50 (padma.2.1.50)

स्वशिरो देवि दास्यामि गृह्यतां गृह्यतां शुभे । शितेन तीक्ष्णधारेण शस्त्रेण द्विजसत्तमः

svaśiro devi dāsyāmi gṛhyatāṁ gṛhyatāṁ śubhe śitena tīkṣṇadhāreṇa śastreṇa dvijasattamaḥ

हे देवी! मैं अपना सिर दूँगा, इसे ग्रहण करो, ग्रहण करो, हे शुभे!' पैने, तीक्ष्ण धार वाले शस्त्र से उस द्विजश्रेष्ठ ने —

श्लोक 51 (padma.2.1.51)

निकृत्य स्वं शिरश्चाथ दत्तं तस्यै प्रहस्य च । रुधिरेण प्लुतं सा च परिगृह्य गता मुनिम्

nikṛtya svaṁ śiraścātha dattaṁ tasyai prahasya ca rudhireṇa plutaṁ sā ca parigṛhya gatā munim

—अपना सिर काटकर, हँसते हुए उसे दे दिया। रक्त से भीगे उस सिर को ग्रहण कर वह मुनि के पास गई।

श्लोक 52 (padma.2.1.52)

स्त्र्युवाच- तवार्थे प्रेषितं विप्र पुत्रेण वेदशर्मणा । एतच्छिरः संगृहाण निकृत्तं चात्मनात्मनः

stryuvāca- tavārthe preṣitaṁ vipra putreṇa vedaśarmaṇā etacchiraḥ saṁgṛhāṇa nikṛttaṁ cātmanātmanaḥ

स्त्री ने कहा — 'हे विप्र! आपके लिए आपके पुत्र वेदशर्मा ने यह भेजा है। अपने ही हाथों से काटा गया यह सिर ग्रहण कीजिए।

श्लोक 53 (padma.2.1.53)

उत्तमांगं प्रदत्तं मे पितृभक्तेन तेन ते । तवार्थे द्विजशार्दूल मामेवं परिभुंक्ष्व वै

uttamāṁgaṁ pradattaṁ me pitṛbhaktena tena te tavārthe dvijaśārdūla māmevaṁ paribhuṁkṣva vai

उसने पितृभक्ति के कारण अपना उत्तमांग मुझे प्रदान किया, आपके ही लिए। हे द्विजश्रेष्ठ! आप इसी प्रकार मुझे स्वीकार कीजिए।'

श्लोक 54 (padma.2.1.54)

तस्य तैर्भ्रातृभिर्दृष्टं साहसं वेदशर्मणः । वेपितांगत्वमापन्नास्ते बभूवुः परस्परम्

tasya tairbhrātṛbhirdṛṣṭaṁ sāhasaṁ vedaśarmaṇaḥ vepitāṁgatvamāpannāste babhūvuḥ parasparam

वेदशर्मा के इस साहसिक कार्य को देखकर उसके भाई काँप उठे और आपस में कहने लगे —

श्लोक 55 (padma.2.1.55)

मृता नो धर्मसाध्वी सा माता सत्यसमाधिना । अयमेव महाभागः पितुरर्थे मृतः शुभः

mṛtā no dharmasādhvī sā mātā satyasamādhinā ayameva mahābhāgaḥ piturarthe mṛtaḥ śubhaḥ

'हमारी धर्मपरायण माता सत्य के प्रति दृढ़ रहकर मृत्यु को प्राप्त हुई, और यह महाभाग भी पिता के लिए ही मृत्यु को प्राप्त हुआ, यह मंगलमय है।

श्लोक 56 (padma.2.1.56)

धन्योयं धन्यतां प्राप्तः पितुरर्थे कृतं शुभम् । एवं संभाषितं तैस्तु भ्रातृभिः पुण्यचारिभिः

dhanyoyaṁ dhanyatāṁ prāptaḥ piturarthe kṛtaṁ śubham evaṁ saṁbhāṣitaṁ taistu bhrātṛbhiḥ puṇyacāribhiḥ

यह धन्य है, धन्यता को प्राप्त हुआ है; पिता के लिए इसने शुभ कार्य किया है।' इस प्रकार उन पुण्यचारी भाइयों ने आपस में बातचीत की।

श्लोक 57 (padma.2.1.57)

समाकर्ण्य द्विजो वाक्यं ज्ञात्वा भक्तिपरायणम् । निकृत्तं च शिरस्तेन पुत्रेण वेदशर्मणा

samākarṇya dvijo vākyaṁ jñātvā bhaktiparāyaṇam nikṛttaṁ ca śirastena putreṇa vedaśarmaṇā

यह वचन सुनकर और उसकी भक्ति को जानकर उस द्विज ने अपने पुत्र वेदशर्मा द्वारा काटे गए उस सिर को देखा —

श्लोक 58 (padma.2.1.58)

धर्मशर्माणमाहाथ शिर एतत्प्रगृह्यताम्

dharmaśarmāṇamāhātha śira etatpragṛhyatām

—और फिर धर्मशर्मा से कहा — 'अब यह सिर ग्रहण किया जाए।'

अध्याय-सूचीअध्याय 2