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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 3

कार्तिक-माहात्म्य और दीपदान की महिमा

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (padma.4.3.1)

शौनक उवाच । कार्त्तिकस्य च माहात्म्यं ब्रूहि सूत ममाग्रतः । तद्व्रतस्य फलं किं वा दोषं किं तदकुर्वतः ।

śaunaka uvāca kārttikasya ca māhātmyaṁ brūhi sūta mamāgrataḥ tadvratasya phalaṁ kiṁ vā doṣaṁ kiṁ tadakurvataḥ

शौनक ने कहा — हे सूत! कार्तिक मास की महिमा मुझसे कहिए। उस व्रत का फल क्या है, और उसे न करने से क्या दोष होता है?

श्लोक 2 (padma.4.3.2)

सूत उवाच । पुरैकदा मुनिश्रेष्ठ व्यासं सत्यवतीसुतम् । जैमिनिः पृष्टवानेतदारेभे कथितं मुनिः ।

sūta uvāca puraikadā muniśreṣṭha vyāsaṁ satyavatīsutam jaiminiḥ pṛṣṭavānetadārebhe kathitaṁ muniḥ

सूत ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! पूर्वकाल में एक बार जैमिनि ने सत्यवती-पुत्र व्यास जी से यही पूछा था; मुनि ने इसे कहना आरंभ किया।

श्लोक 3 (padma.4.3.3)

व्यास उवाच । तिलतैलं मैथुनं यः शुभदे कार्त्तिके त्यजेत् । बहुजन्मकृतैःपापैर्मुक्तो याति हरेर्गृहम् ।

vyāsa uvāca tilatailaṁ maithunaṁ yaḥ śubhade kārttike tyajet bahujanmakṛtaiḥpāpairmukto yāti harergṛham

व्यास जी ने कहा — जो शुभदायी कार्तिक मास में तिल-तेल और मैथुन का त्याग करता है, वह बहुत जन्मों में किए पापों से मुक्त होकर हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 4 (padma.4.3.4)

मत्स्यं च मैथुनं यो वै कार्त्तिके न परित्यजेत् । प्रतिजन्मनि संमूढः शूकरश्च भवेद्ध्रुवम् ।

matsyaṁ ca maithunaṁ yo vai kārttike na parityajet pratijanmani saṁmūḍhaḥ śūkaraśca bhaveddhruvam

जो कार्तिक में मछली और मैथुन का त्याग नहीं करता, वह प्रत्येक जन्म में मूढ़ रहेगा और अवश्य ही सूअर होगा।

श्लोक 5 (padma.4.3.5)

कार्त्तिके तुलसीपत्रैः पूजयेद्वै जनार्दनम् । पत्रेपत्रेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।

kārttike tulasīpatraiḥ pūjayedvai janārdanam patrepatre'śvamedhasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ

कार्तिक में जो तुलसी-पत्रों से जनार्दन की पूजा करता है, वह मनुष्य प्रत्येक पत्र पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 6 (padma.4.3.6)

कार्त्तिके मुनिपुष्पैर्यः पूजयेन्मधुसूदनम् । देवानां दुर्लभं मोक्षं प्राप्नोति कृपया हरेः ।

kārttike munipuṣpairyaḥ pūjayenmadhusūdanam devānāṁ durlabhaṁ mokṣaṁ prāpnoti kṛpayā hareḥ

कार्तिक में जो मुनि-पुष्पों से मधुसूदन की पूजा करता है, वह हरि की कृपा से देवताओं को भी दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (padma.4.3.7)

कार्त्तिके मुनिशाकं वै योऽश्नाति च नरोत्तमः । संवत्सरकृतं पापं शाकेनैकेन नश्यति ।

kārttike muniśākaṁ vai yo'śnāti ca narottamaḥ saṁvatsarakṛtaṁ pāpaṁ śākenaikena naśyati

जो श्रेष्ठ मनुष्य कार्तिक में मुनि-शाक खाता है, उस एक शाक से उसका एक वर्ष का पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (padma.4.3.8)

फलं तस्य नरोऽश्नाति चोर्जे यो वै हरिप्रिये । प्रदत्त्वा तु हरेर्ब्रह्मन्वृजिनं कोटिजन्मजम् ।

phalaṁ tasya naro'śnāti corje yo vai haripriye pradattvā tu harerbrahmanvṛjinaṁ koṭijanmajam

हे ब्रह्मन्! जो मनुष्य हरिप्रिय ऊर्ज मास (कार्तिक) में हरि को अर्पित करके फल खाता है, उसका करोड़ों जन्मों का पाप नष्ट होता है।

श्लोक 9 (padma.4.3.9)

सुरसं सर्पिषायुक्तं दद्याद्यो हरयेपि च । सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स गच्छेद्धरिमंदिरम् ।

surasaṁ sarpiṣāyuktaṁ dadyādyo harayepi ca sarvapāpairvinirmuktaḥ sa gaccheddharimaṁdiram

जो हरि को घृतयुक्त सुरस पदार्थ अर्पित करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 10 (padma.4.3.10)

कार्तिके यो नरो दद्यादेकपद्मं हरावपि । अंते विष्णुपदं गच्छेत्सर्वपापविवर्जितः ।

kārtike yo naro dadyādekapadmaṁ harāvapi aṁte viṣṇupadaṁ gacchetsarvapāpavivarjitaḥ

कार्तिक में जो मनुष्य हरि को एक भी कमल अर्पित करता है, वह अंत में समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु-पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (padma.4.3.11)

प्रातःस्नानं नरो यो वै कार्तिके श्रीहरिप्रिये । करोतिसर्वतीर्थेषुयत्स्नात्वातत्फलंलभेत् ।

prātaḥsnānaṁ naro yo vai kārtike śrīharipriye karotisarvatīrtheṣuyatsnātvātatphalaṁlabhet

जो मनुष्य श्रीहरिप्रिय कार्तिक में प्रातःकाल स्नान करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (padma.4.3.12)

कार्तिके यो नरो दद्यात्प्रदीपं नभसि द्विजः । विप्रहत्यादिभिः पापैर्मुक्तो गच्छेद्धरेर्गृहम् ।

kārtike yo naro dadyātpradīpaṁ nabhasi dvijaḥ viprahatyādibhiḥ pāpairmukto gaccheddharergṛham

हे द्विज! कार्तिक में जो मनुष्य आकाश में दीपक जलाता है, वह ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त होकर हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 13 (padma.4.3.13)

मुहूर्तमपि यो दद्यात्कार्त्तिके प्रीतये हरेः । दीपं नभसि विप्रेन्द्र तस्मिंस्तुष्टः सदा हरिः ।

muhūrtamapi yo dadyātkārttike prītaye hareḥ dīpaṁ nabhasi viprendra tasmiṁstuṣṭaḥ sadā hariḥ

हे विप्रेंद्र! जो कार्तिक में हरि की प्रीति के लिए मुहूर्तभर भी आकाश-दीप देता है, उससे हरि सदा संतुष्ट रहते हैं।

श्लोक 14 (padma.4.3.14)

यो दद्याच्च गृहे दीपं कृष्णस्य सघृतं द्विजः । कार्तिके चाश्वमेधस्य फलं स्याद्वै दिनेदिने ।

yo dadyācca gṛhe dīpaṁ kṛṣṇasya saghṛtaṁ dvijaḥ kārtike cāśvamedhasya phalaṁ syādvai dinedine

हे द्विज! जो कार्तिक में प्रतिदिन कृष्ण को घृतयुक्त दीप घर में अर्पित करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (padma.4.3.15)

प्रदीपस्य च माहात्म्यं विशेषमुच्यते मया । निशामय द्विजश्रेष्ठ सेतिहासं समाहितः ।

pradīpasya ca māhātmyaṁ viśeṣamucyate mayā niśāmaya dvijaśreṣṭha setihāsaṁ samāhitaḥ

अब मैं दीपक की विशेष महिमा उसके इतिहास सहित कहता हूँ; हे द्विजश्रेष्ठ! ध्यानपूर्वक सुनिए।

श्लोक 16 (padma.4.3.16)

पूर्वं त्रेतायुगे विप्रो वैकुंठो नामतः शुचिः । यस्य संगप्रभावेण मुक्तो भवति पातकी ।

pūrvaṁ tretāyuge vipro vaikuṁṭho nāmataḥ śuciḥ yasya saṁgaprabhāveṇa mukto bhavati pātakī

त्रेतायुग में पूर्वकाल में वैकुंठ नामक एक पवित्र ब्राह्मण था, जिसकी संगति के प्रभाव से पापी भी मुक्त हो जाता था।

श्लोक 17 (padma.4.3.17)

एकदा कार्तिके सोऽपि प्रदीपं पुरतो हरेः । दत्वा गृहं गतो विप्रो घृतपूर्णं द्विजर्षभः ।

ekadā kārtike so'pi pradīpaṁ purato hareḥ datvā gṛhaṁ gato vipro ghṛtapūrṇaṁ dvijarṣabhaḥ

एक बार कार्तिक में उस द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मण ने हरि के समक्ष घृतपूर्ण दीपक अर्पित करके अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 18 (padma.4.3.18)

सर्पिस्तत्स्वादितु चाखुरागतोऽपि प्रदीपतः । यावत्खादितुमारेभे बोधितोऽसौ प्रदीपकः ।

sarpistatsvāditu cākhurāgato'pi pradīpataḥ yāvatkhāditumārebhe bodhito'sau pradīpakaḥ

वहाँ एक चूहा उस घी को चखने आया; ज्यों ही वह खाने लगा, त्यों ही उससे वह दीपक जगमगा उठा।

श्लोक 19 (padma.4.3.19)

मूषकोऽग्निभयात्तत्र वेगेनापि पलायितः । आखोश्च सकलं पापं विनष्टं कृपया हरेः ।

mūṣako'gnibhayāttatra vegenāpi palāyitaḥ ākhośca sakalaṁ pāpaṁ vinaṣṭaṁ kṛpayā hareḥ

अग्नि के भय से वह मूषक वेगपूर्वक वहाँ से भाग गया; और हरि की कृपा से उस चूहे का सारा पाप नष्ट हो गया।

श्लोक 20 (padma.4.3.20)

सर्पेण दंशितश्चाखुः प्राणत्यागं चकार ह । ततो यमाज्ञया दूताः पाशमुद्गरपाणयः ।

sarpeṇa daṁśitaścākhuḥ prāṇatyāgaṁ cakāra ha tato yamājñayā dūtāḥ pāśamudgarapāṇayaḥ

सर्प के डसने से वह चूहा प्राण त्याग गया। तब यम की आज्ञा से पाश और मुद्गर हाथ में लिए दूत —

श्लोक 21 (padma.4.3.21)

आगतास्तं समानेतुं बबंधुश्चर्मरज्जुभिः । यावन्नेतुं मनश्चक्रुः शंखचक्रगदाधराः ।

āgatāstaṁ samānetuṁ babaṁdhuścarmarajjubhiḥ yāvannetuṁ manaścakruḥ śaṁkhacakragadādharāḥ

उसे लाने के लिए आए और चर्म-रज्जुओं से उसे बाँध लिया। जब वे उसे ले जाने को उद्यत हुए, तभी शंख-चक्र-गदाधारी —

श्लोक 22 (padma.4.3.22)

आगता गरुडारूढा विष्णुदूताश्चतुर्भुजाः । विमानं गगने चैव राजहंसयुतं शुभम् ।

āgatā garuḍārūḍhā viṣṇudūtāścaturbhujāḥ vimānaṁ gagane caiva rājahaṁsayutaṁ śubham

गरुड़ पर आरूढ़ चतुर्भुज विष्णु-दूत आ पहुँचे, साथ ही आकाश में राजहंसों से युक्त एक शुभ विमान भी,

श्लोक 23 (padma.4.3.23)

निर्मितं कनकैः शुद्धैः कामगं कृपया हरेः । पाशं छित्वा ततो दूताः प्रोचुस्ते यमकिंकरान् ।

nirmitaṁ kanakaiḥ śuddhaiḥ kāmagaṁ kṛpayā hareḥ pāśaṁ chitvā tato dūtāḥ procuste yamakiṁkarān

जो शुद्ध स्वर्ण से निर्मित तथा हरि की कृपा से इच्छानुसार चलने वाला था। तब उन दूतों ने पाश काटकर यमदूतों से कहा —

श्लोक 24 (padma.4.3.24)

विष्णुभक्तोऽप्यसौ मूढा व्यर्थं तु बंधनं कृतम् । गच्छध्वं शमनप्रेष्या यदि वांछास्ति जीवितुम् ।

viṣṇubhakto'pyasau mūḍhā vyarthaṁ tu baṁdhanaṁ kṛtam gacchadhvaṁ śamanapreṣyā yadi vāṁchāsti jīvitum

'हे मूढो! यह तो विष्णु-भक्त है, तुमने इसे व्यर्थ ही बाँधा है। यदि जीवित रहना चाहते हो तो हे यम के सेवको, यहाँ से लौट जाओ!'

श्लोक 25 (padma.4.3.25)

श्रुत्वा प्रकंपितास्ते वै पृच्छंति विनयान्विताः । केन पुण्यप्रभावेण युष्माभिर्नीयते पुरम् ।

śrutvā prakaṁpitāste vai pṛcchaṁti vinayānvitāḥ kena puṇyaprabhāveṇa yuṣmābhirnīyate puram

यह सुनकर वे भयभीत हो गए और विनयपूर्वक पूछने लगे — 'किस पुण्य के प्रभाव से आप इसे अपने नगर ले जा रहे हैं?

श्लोक 26 (padma.4.3.26)

असौ विष्णोर्महापापी यूयं तद्वक्तुमर्हथ । विष्णुदूता ऊचुः । पुरतो वासुदेवस्य प्रदीपबोधनं कृतम् ।

asau viṣṇormahāpāpī yūyaṁ tadvaktumarhatha viṣṇudūtā ūcuḥ purato vāsudevasya pradīpabodhanaṁ kṛtam

यह तो विष्णु का महापापी है, यह आप ही बताने योग्य हैं।' विष्णु-दूतों ने कहा — इसने वासुदेव के समक्ष दीपक को जगाया था —

श्लोक 27 (padma.4.3.27)

तेनैव कर्मणा दूता नयामो विष्णुमंदिरम् । अनिच्छयापि यः कुर्याद्विष्णोर्दीपस्य बोधनम् ।

tenaiva karmaṇā dūtā nayāmo viṣṇumaṁdiram anicchayāpi yaḥ kuryādviṣṇordīpasya bodhanam

उसी कर्म से, हे दूतो! हम इसे विष्णु-मंदिर ले जा रहे हैं। जो कोई अनिच्छापूर्वक भी विष्णु के दीपक को जगाता है,

श्लोक 28 (padma.4.3.28)

कोटिजन्मार्जितं पापं त्यक्त्वा याति हरेर्गृहम् । भक्त्या प्रदीपं यो दद्यात्कार्तिके तु हरेर्दिनैः ।

koṭijanmārjitaṁ pāpaṁ tyaktvā yāti harergṛham bhaktyā pradīpaṁ yo dadyātkārtike tu harerdinaiḥ

वह करोड़ों जन्मों में अर्जित पाप त्यागकर हरि के धाम को जाता है। जो भक्तिपूर्वक कार्तिक के दिनों में हरि को दीपक अर्पित करता है,

श्लोक 29 (padma.4.3.29)

तस्य पुण्यं समाख्यातुं न शक्तो हरिणा विना । घृतपूर्णप्रदीपं यो भक्त्या दद्याद्धरेर्गृहे ।

tasya puṇyaṁ samākhyātuṁ na śakto hariṇā vinā ghṛtapūrṇapradīpaṁ yo bhaktyā dadyāddharergṛhe

उसके पुण्य को हरि के अतिरिक्त कोई भी वर्णन करने में समर्थ नहीं है। जो भक्तिपूर्वक हरि के घर में घृतपूर्ण दीपक अर्पित करता है,

श्लोक 30 (padma.4.3.30)

अश्वमेधसहस्रेण तस्य किं वा प्रयोजनम् । अश्वमेधप्रकर्ता यः स्वर्गं याति हरेर्दिने ।

aśvamedhasahasreṇa tasya kiṁ vā prayojanam aśvamedhaprakartā yaḥ svargaṁ yāti harerdine

उसे सहस्र अश्वमेध यज्ञों से भी क्या प्रयोजन? अश्वमेध करने वाला स्वर्ग को जाता है,

श्लोक 31 (padma.4.3.31)

कार्तिके दीपदाता च स गच्छेद्धरिमंदिरम् । व्यास उवाच । इति श्रुत्वा ततो दूता गतास्ते वै यथागताः ।

kārtike dīpadātā ca sa gaccheddharimaṁdiram vyāsa uvāca iti śrutvā tato dūtā gatāste vai yathāgatāḥ

परंतु कार्तिक में दीपदाता हरि के धाम को ही जाता है। व्यास जी ने कहा — यह सुनकर वे यमदूत जैसे आए थे, वैसे ही लौट गए।

श्लोक 32 (padma.4.3.32)

विष्णुदूता रथे कृत्वा गतास्तं विष्णुमंदिरम् । विष्णुसान्निध्य एवास्य मन्वंतरशतं गतम् ।

viṣṇudūtā rathe kṛtvā gatāstaṁ viṣṇumaṁdiram viṣṇusānnidhya evāsya manvaṁtaraśataṁ gatam

विष्णु-दूत उसे रथ में बिठाकर विष्णु-धाम को ले गए। वहाँ विष्णु के सान्निध्य में उसके सौ मन्वंतर बीत गए।

श्लोक 33 (padma.4.3.33)

ततो मर्त्ये राजकन्या बभूव कृपया हरेः । पुत्रपौत्रसमायुक्ता चिरं भोगं चकार सा ।

tato martye rājakanyā babhūva kṛpayā hareḥ putrapautrasamāyuktā ciraṁ bhogaṁ cakāra sā

फिर हरि की कृपा से वह मृत्युलोक में राजकन्या हुई; पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर उसने दीर्घकाल तक भोग किया।

श्लोक 34 (padma.4.3.34)

इतः पुनर्गता सा तु गोलोकं हरिसेवया । सूत उवाच । भक्त्या शृणोति यो मर्त्यो दीपमाहात्म्यमुत्तमम् ।

itaḥ punargatā sā tu golokaṁ harisevayā sūta uvāca bhaktyā śṛṇoti yo martyo dīpamāhātmyamuttamam

यहाँ से पुनः वह हरि की सेवा के प्रभाव से गोलोक को गई। सूत ने कहा — जो मनुष्य भक्तिपूर्वक दीपक की इस उत्तम महिमा को सुनता है,

श्लोक 35 (padma.4.3.35)

सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति विष्णुमंदिरम् ।

sarvapāpavinirmuktaḥ sa yāti viṣṇumaṁdiram

वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु-धाम को प्राप्त करता है।

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