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पाताल खण्ड · अध्याय 40

वीरमणि के साथ युद्ध का निश्चय

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

श्लोक 1 (padma.5.40.1)

शेष उवाच। सेनाचरा महाराज्ञो महाबलसमन्विताः । समागतास्तं पश्यंतो हयं रामस्य भूपतेः

śeṣa uvāca senācarā mahārājño mahābalasamanvitāḥ samāgatāstaṁ paśyaṁto hayaṁ rāmasya bhūpateḥ

शेष जी ने कहा — महाराज के महाबलशाली सैनिक वहाँ एकत्र होकर राजा राम के उस अश्व को खोजने लगे।

श्लोक 2 (padma.5.40.2)

क्वा सावश्वः केन नीतः कथं वा दृश्यते न सः । को गंता यमपुर्यां वै वाहं हृत्वा सुमंदधीः

kvā sāvaśvaḥ kena nītaḥ kathaṁ vā dṛśyate na saḥ ko gaṁtā yamapuryāṁ vai vāhaṁ hṛtvā sumaṁdadhīḥ

"वह अश्व कहाँ है, किसने ले लिया, और क्यों नहीं दिखाई पड़ रहा? हे मंदबुद्धि! अश्व को हरकर कौन यमपुरी को जाएगा?"

श्लोक 3 (padma.5.40.3)

विलोकयंतस्तन्मार्गं यावत्सेनाचरा रघोः । तावत्प्राप्तो महाराजो महासैन्यपरीवृतः

vilokayaṁtastanmārgaṁ yāvatsenācarā raghoḥ tāvatprāpto mahārājo mahāsainyaparīvṛtaḥ

रघुनाथ के सैनिक जब उस मार्ग को खोज रहे थे, तब तक महासेना से घिरे हुए महाराज वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 4 (padma.5.40.4)

पप्रच्छ सेवकान्सर्वान्कुत्राश्वो मम सांप्रतम् । न दृश्यते कथं वाहः स्वर्णपत्रसुशोभितः

papraccha sevakānsarvānkutrāśvo mama sāṁpratam na dṛśyate kathaṁ vāhaḥ svarṇapatrasuśobhitaḥ

उन्होंने समस्त सेवकों से पूछा — "अब मेरा वह अश्व कहाँ है? स्वर्ण-पत्र से सुशोभित वह घोड़ा क्यों दिखाई नहीं पड़ रहा?"

श्लोक 5 (padma.5.40.5)

इति तद्वचनं श्रुत्वा सेवकास्ते हयानुगाः । प्रोचुर्नाथ मनोवेगो वाहः केनापि कानने

iti tadvacanaṁ śrutvā sevakāste hayānugāḥ procurnātha manovego vāhaḥ kenāpi kānane

यह वचन सुनकर घोड़े के अनुगामी उन सेवकों ने कहा — "हे नाथ! मनोवेग वाला वह अश्व इस वन में किसी के द्वारा —

श्लोक 6 (padma.5.40.6)

हृतो न लक्ष्यते तस्मादस्माभिर्मार्गकोविदैः । तदत्र यत्नः कर्तव्यो हयप्राप्तिं प्रति प्रभो

hṛto na lakṣyate tasmādasmābhirmārgakovidaiḥ tadatra yatnaḥ kartavyo hayaprāptiṁ prati prabho

— हर लिया गया है, और मार्ग-निपुण हम भी उसे नहीं खोज पा रहे हैं। अतः हे प्रभो! यहाँ अश्व की प्राप्ति हेतु प्रयास करना होगा।"

श्लोक 7 (padma.5.40.7)

तेषां वचनमाकर्ण्य पप्रच्छ सुमतिं नृपः । शत्रुघ्नः शत्रुसंहारकारीमोहनरूपधृक्

teṣāṁ vacanamākarṇya papraccha sumatiṁ nṛpaḥ śatrughnaḥ śatrusaṁhārakārīmohanarūpadhṛk

उनके वचन सुनकर शत्रुओं के संहारक, मोहक रूप धारण करने वाले राजा शत्रुघ्न ने सुमति से पूछा।

श्लोक 8 (padma.5.40.8)

शत्रुघ्न उवाच। कोऽत्र राजा निवसति कथं वाहस्य संगमः । कियद्बलं भूमिपतेर्येन मेऽद्य हृतो हयः

śatrughna uvāca ko'tra rājā nivasati kathaṁ vāhasya saṁgamaḥ kiyadbalaṁ bhūmipaterena me'dya hṛto hayaḥ

शत्रुघ्न ने कहा — "यहाँ कौन राजा निवास करता है? अश्व का यहाँ आगमन कैसे हुआ? इस भूपति का बल कितना है, जिसने आज मेरा अश्व हर लिया है?"

श्लोक 9 (padma.5.40.9)

सुमतिरुवाच। राजन्देवपुरं ह्येतद्देवेनैव विनिर्मितम् । कैलासमिव दुर्गम्यं वैरिसंघैः सुसंहतैः

sumatiruvāca rājandevapuraṁ hyetaddevenaiva vinirmitam kailāsamiva durgamyaṁ vairisaṁghaiḥ susaṁhataiḥ

सुमति ने कहा — "हे राजन्! यह देवपुर है, जो स्वयं देव द्वारा निर्मित है, तथा शत्रुओं के सुसंगठित समूहों के लिए भी कैलास के समान दुर्गम है।

श्लोक 10 (padma.5.40.10)

अस्मिन्वीरमणी राजा महाशूरः प्रतापवान् । राज्यं करोति धर्मेण शिवेन परिरक्षितः

asminvīramaṇī rājā mahāśūraḥ pratāpavān rājyaṁ karoti dharmeṇa śivena parirakṣitaḥ

यहाँ राजा वीरमणि, महाशूर, प्रतापी, शिव द्वारा सुरक्षित होकर धर्मपूर्वक राज्य करते हैं।

श्लोक 11 (padma.5.40.11)

योऽसौ प्रलयकारी स आस्ते भक्त्या वशीकृतः । चंद्रचूडः स्वभक्तस्य पक्षपातं सृजन्सदा

yo'sau pralayakārī sa āste bhaktyā vaśīkṛtaḥ caṁdracūḍaḥ svabhaktasya pakṣapātaṁ sṛjansadā

जो प्रलयकारी हैं, वे भक्ति के वशीभूत होकर वहाँ रहते हैं — चंद्रचूड़, जो सदा अपने भक्त के प्रति पक्षपात दर्शाते हैं।

श्लोक 12 (padma.5.40.12)

तस्मादत्र महद्युद्धं गृहीतश्चेद्भविष्यति । यत्ताः संतः प्रकुर्वंतु रक्षणं कटकस्य हि

tasmādatra mahadyuddhaṁ gṛhītaścedbhaviṣyati yattāḥ saṁtaḥ prakurvaṁtu rakṣaṇaṁ kaṭakasya hi

अतः यदि यह विषय आगे बढ़ाया जाए, तो यहाँ एक महान् युद्ध होगा; अतः उपस्थित सभी सेना की रक्षा हेतु सावधान रहें।"

श्लोक 13 (padma.5.40.13)

एवं श्रुत्वा स शत्रुघ्नः सर्वभूपशिरोमणिः । सैन्यव्यूहं रचित्वासौ तिष्ठति स्म महायशाः

evaṁ śrutvā sa śatrughnaḥ sarvabhūpaśiromaṇiḥ sainyavyūhaṁ racitvāsau tiṣṭhati sma mahāyaśāḥ

यह सुनकर सर्वभूपशिरोमणि, महायशस्वी शत्रुघ्न ने अपनी सेना का व्यूह रचकर वहाँ प्रतीक्षा की।

श्लोक 14 (padma.5.40.14)

अथ तं सुखमासीनं मंत्रयंतं सुमंत्रिणा । आजगाम स देवर्षिर्युद्धकौतुकसंयुतः

atha taṁ sukhamāsīnaṁ maṁtrayaṁtaṁ sumaṁtriṇā ājagāma sa devarṣiryuddhakautukasaṁyutaḥ

तब जब वे सुखपूर्वक बैठे अपने सुयोग्य मंत्री से मंत्रणा कर रहे थे, तभी युद्ध के कौतुक से युक्त वे देवर्षि वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 15 (padma.5.40.15)

तमागतं मुनिं दृष्ट्वा शत्रुघ्नस्तपसां निधिम् । अभ्युत्थायासने स्थाप्य मधुपर्कमथार्पयत्

tamāgataṁ muniṁ dṛṣṭvā śatrughnastapasāṁ nidhim abhyutthāyāsane sthāpya madhuparkamathārpayat

उस आए हुए तपोनिधि मुनि को देखकर शत्रुघ्न उठकर खड़े हुए, उन्हें आसन पर बिठाया, और फिर मधुपर्क अर्पित किया।

श्लोक 16 (padma.5.40.16)

स्वागतेन च संतुष्टं नारदं मुनिसत्तमम् । उवाच प्रीणयन्वाचा वाक्यवादविशारदः

svāgatena ca saṁtuṣṭaṁ nāradaṁ munisattamam uvāca prīṇayanvācā vākyavādaviśāradaḥ

वाक्-वाद-निपुण शत्रुघ्न ने स्वागत से संतुष्ट हुए मुनिश्रेष्ठ नारद से प्रसन्न करने वाली वाणी में कहा।

श्लोक 17 (padma.5.40.17)

शत्रुघ्न उवाच। मदीयोऽश्व कुत्र विप्र कथयस्व महामते । न लक्ष्यते गतिस्तस्य सेवकैर्मम कोविदैः

śatrughna uvāca madīyo'śva kutra vipra kathayasva mahāmate na lakṣyate gatistasya sevakairmama kovidaiḥ

शत्रुघ्न ने कहा — "हे विप्र! हे महामते! मुझे बताइए, मेरा अश्व कहाँ है? मेरे निपुण सेवकों को भी उसकी गति ज्ञात नहीं हो रही।

श्लोक 18 (padma.5.40.18)

शंस तं येन वा नीतं क्षत्त्रियेण च मानिना । कथमत्र हयप्राप्तिर्भविष्यति तपोधन

śaṁsa taṁ yena vā nītaṁ kṣattriyeṇa ca māninā kathamatra hayaprāptirbhaviṣyati tapodhana

बताइए, किस अभिमानी क्षत्रिय ने इसे ले लिया है? हे तपोधन! यहाँ अश्व की प्राप्ति कैसे होगी?"

श्लोक 19 (padma.5.40.19)

इति वाक्यं समाकर्ण्य शत्रुघ्नस्य स नारदः । उवाच वीणां रणयन्गायन्रामकथां मुहुः

iti vākyaṁ samākarṇya śatrughnasya sa nāradaḥ uvāca vīṇāṁ raṇayangāyanrāmakathāṁ muhuḥ

शत्रुघ्न के इन वचनों को सुनकर नारद ने अपनी वीणा बजाते हुए, बार-बार राम-कथा गाते हुए कहा।

श्लोक 20 (padma.5.40.20)

नारद उवाच। एतद्देवपुरं राजन्भूपो वीरमणिर्महान् । तत्पुत्रेण वनस्थेन गृहीतस्तव वाजिराट्

nārada uvāca etaddevapuraṁ rājanbhūpo vīramaṇirmahān tatputreṇa vanasthena gṛhītastava vājirāṭ

नारद ने कहा — "हे राजन्! यह देवपुर है; यहाँ के महान् राजा वीरमणि हैं। उनके पुत्र ने, जो वन में था, तुम्हारे उस अश्वराज को पकड़ लिया है।

श्लोक 21 (padma.5.40.21)

तत्र युद्धं महत्तेऽद्य भविष्यति सुदारुणम् । अत्र वीराः पतिष्यंति बलशौर्यसमन्विताः

tatra yuddhaṁ mahatte'dya bhaviṣyati sudāruṇam atra vīrāḥ patiṣyaṁti balaśauryasamanvitāḥ

वहाँ आज तुम्हारा एक महान्, अत्यंत भयंकर युद्ध होगा; यहाँ बल-शौर्य से युक्त वीर गिरेंगे।

श्लोक 22 (padma.5.40.22)

तस्मादत्र महायत्नात्स्थातव्यं ते महाबल । रचय व्यूहरचनां दुर्गमां परसैनिकैः

tasmādatra mahāyatnātsthātavyaṁ te mahābala racaya vyūharacanāṁ durgamāṁ parasainikaiḥ

अतः हे महाबल! यहाँ तुम्हें महान् प्रयास से स्थिर रहना होगा; शत्रु-सैनिकों के लिए दुर्गम व्यूह-रचना करो।

श्लोक 23 (padma.5.40.23)

जयस्ते भविता राजन्कृच्छ्रेणास्मान्नृपोत्तमात् । रामं को नु पराजीयाद्भुवने सकले ह्यपि

jayaste bhavitā rājankṛcchreṇāsmānnṛpottamāt rāmaṁ ko nu parājīyādbhuvane sakale hyapi

हे राजन्! तुम्हारी विजय होगी, यद्यपि इस श्रेष्ठ राजा से कठिनतापूर्वक; समस्त भुवन में भी राम को कौन पराजित कर सकता है?"

श्लोक 24 (padma.5.40.24)

इत्युक्त्वांतर्दधे विप्रो नभसि स्थितवांस्ततः । युद्धं सुदारुणं द्रक्ष्यन्देवदानवयोरिव

ityuktvāṁtardadhe vipro nabhasi sthitavāṁstataḥ yuddhaṁ sudāruṇaṁ drakṣyandevadānavayoriva

ऐसा कहकर वह विप्र अंतर्धान हो गए और आकाश में स्थित होकर, मानो देव-दानवों के युद्ध के समान, उस अत्यंत भयंकर युद्ध को देखने लगे।

श्लोक 25 (padma.5.40.25)

शेष उवाच। अथ राजा वीरमणिः सर्वशूरशिरोमणिः । पटहं घोषितुं स्वीये पुरमध्ये महारवम्

śeṣa uvāca atha rājā vīramaṇiḥ sarvaśūraśiromaṇiḥ paṭahaṁ ghoṣituṁ svīye puramadhye mahāravam

शेष जी ने कहा — तब राजा वीरमणि, सर्वशूरशिरोमणि, ने अपने नगर के मध्य में महाघोष वाले युद्ध-पटह को बजाने का आदेश दिया।

श्लोक 26 (padma.5.40.26)

आह्वयामास सेनान्यं रिपुवीरं महोन्नतम् । कथयामास च क्षिप्रं मेघगंभीरया गिरा

āhvayāmāsa senānyaṁ ripuvīraṁ mahonnatam kathayāmāsa ca kṣipraṁ meghagaṁbhīrayā girā

उन्होंने अपने सेनापति, अत्यंत श्रेष्ठ रिपुवीर को बुलाया, और मेघ के समान गंभीर वाणी से शीघ्र उससे कहा।

श्लोक 27 (padma.5.40.27)

वीरमणिरुवाच। सेनानीः पटहस्याज्ञां देहि मे शोभने पुरे । तच्छ्रुत्वा मे सुसन्नद्धाः शत्रुघ्नं प्रति यांतु ते

vīramaṇiruvāca senānīḥ paṭahasyājñāṁ dehi me śobhane pure tacchrutvā me susannaddhāḥ śatrughnaṁ prati yāṁtu te

वीरमणि ने कहा — "हे सेनानी! मेरे इस शोभन नगर में पटह की आज्ञा दो; उसे सुनकर मेरे सुसन्नद्ध वीर शत्रुघ्न के विरुद्ध प्रस्थान करें।"

श्लोक 28 (padma.5.40.28)

इति वाक्यं समाकर्ण्य राज्ञो वीरमणेस्तदा । कारयामास पटहं महारवनिनादितम्

iti vākyaṁ samākarṇya rājño vīramaṇestadā kārayāmāsa paṭahaṁ mahāravanināditam

राजा वीरमणि के इस वचन को सुनकर उसने तब महाघोष से गूँजने वाले उस पटह को बजवाया।

श्लोक 29 (padma.5.40.29)

गेहे गेहे च रथ्यायां श्रूयते पटहध्वनिः । शत्रुघ्नं यांतु ये सर्वे वीरा राजपुरे स्थिताः

gehe gehe ca rathyāyāṁ śrūyate paṭahadhvaniḥ śatrughnaṁ yāṁtu ye sarve vīrā rājapure sthitāḥ

घर-घर में तथा गलियों में उस पटह की ध्वनि सुनाई देने लगी — "राजनगर में स्थित समस्त वीर शत्रुघ्न के विरुद्ध निकलें।

श्लोक 30 (padma.5.40.30)

ये वै राज्ञः समुल्लंघ्य शासनं वीरमानिनः । पुत्रा वा भ्रातरो वापि ते वध्याः स्युर्नृपाज्ञया

ye vai rājñaḥ samullaṁghya śāsanaṁ vīramāninaḥ putrā vā bhrātaro vāpi te vadhyāḥ syurnṛpājñayā

जो लोग वीर-अभिमानी होकर राजा की आज्ञा का उल्लंघन करें, चाहे वे पुत्र हों या भाई, वे राजाज्ञा से वध्य होंगे।

श्लोक 31 (padma.5.40.31)

शृण्वंतु वीराः पुनरप्याह ते पटहे रवम् । श्रुत्वा विधीयतामाशु कर्तव्यं मा विलंबितम्

śṛṇvaṁtu vīrāḥ punarapyāha te paṭahe ravam śrutvā vidhīyatāmāśu kartavyaṁ mā vilaṁbitam

वीरगण पुनः सुनें — यह पटह तुम्हें अपना घोष सुना रहा है; इसे सुनकर जो करना है, वह शीघ्र करो, विलंब मत करो।"

श्लोक 32 (padma.5.40.32)

शेष उवाच। इति पटहरवं स्वकर्णगोचरं । नरवरवीरवरा ययुर्नृपोत्तमम् । कनककवचभूषितस्वदेहाः । समरमहोत्सव हृष्टचित्तकोशाः

śeṣa uvāca iti paṭaharavaṁ svakarṇagocaraṁ naravaravīravarā yayurnṛpottamam kanakakavacabhūṣitasvadehāḥ samaramahotsava hṛṣṭacittakośāḥ

शेष जी ने कहा — पटह के इस घोष को अपने कानों से सुनकर, स्वर्ण-कवचों से सुशोभित शरीर वाले, युद्ध के महोत्सव से हर्षित चित्त वाले श्रेष्ठ वीर पुरुष उस नृपश्रेष्ठ के पास गए।

श्लोक 33 (padma.5.40.33)

केचिद्ययुः शिरस्त्राणं धृत्वा शिरसि शोभनम् । कवचेन सुशोभाढ्याः शतकोटिसुशोभिताः

kecidyayuḥ śirastrāṇaṁ dhṛtvā śirasi śobhanam kavacena suśobhāḍhyāḥ śatakoṭisuśobhitāḥ

कुछ शीश पर शोभन शिरस्त्राण धारण किए, कवच से सुशोभित, अरबों की संख्या में सुशोभित होकर गए।

श्लोक 34 (padma.5.40.34)

रथेन हययुग्मेन मणिकांचनशोभिना । ययुस्ते राजसंदेशान्नृवरालयमुन्मदाः

rathena hayayugmena maṇikāṁcanaśobhinā yayuste rājasaṁdeśānnṛvarālayamunmadāḥ

मणि-कांचन से सुशोभित, अश्व-युगल से युक्त रथों पर सवार होकर वे राजाज्ञा से उन्मत्त होकर उस नृपश्रेष्ठ के भवन को गए।

श्लोक 35 (padma.5.40.35)

केचिन्मतंगजैर्मत्तैः केचिद्वाहैः सुशोभनैः । ययुर्नपगृहं सर्वे राजसंदेशकारकाः

kecinmataṁgajairmattaiḥ kecidvāhaiḥ suśobhanaiḥ yayurnapagṛhaṁ sarve rājasaṁdeśakārakāḥ

कुछ मदमत्त हाथियों पर, कुछ सुंदर घोड़ों पर — राजाज्ञा का पालन करने वाले सभी राजभवन को गए।

श्लोक 36 (padma.5.40.36)

विविक्तस्वर्णकवचशिरस्त्राणसुशोभितः । रुक्मांगदोऽपि च निजे रथे तिष्ठन्मनोजवे

viviktasvarṇakavacaśirastrāṇasuśobhitaḥ rukmāṁgado'pi ca nije rathe tiṣṭhanmanojave

विशुद्ध स्वर्ण-कवच और शिरस्त्राण से सुशोभित रुक्मांगद भी अपने मनोवेगी रथ पर खड़े हुए।

श्लोक 37 (padma.5.40.37)

शुभांगदोऽनुजस्तस्य महारत्नमयं दधत् । कवचं वपुषि श्रेष्ठं निजं प्रायाद्रणोत्सवे

śubhāṁgado'nujastasya mahāratnamayaṁ dadhat kavacaṁ vapuṣi śreṣṭhaṁ nijaṁ prāyādraṇotsave

उनके छोटे भाई शुभांगद, अपने शरीर पर महारत्नों से बनी श्रेष्ठ कवच धारण किए, युद्धोत्सव के लिए निकल पड़े।

श्लोक 38 (padma.5.40.38)

राजभ्राता वीरसिंहः सर्वशस्त्रास्त्रकोविदः । ययौ नृपाज्ञया तत्र शासनं भूमिपस्य हि

rājabhrātā vīrasiṁhaḥ sarvaśastrāstrakovidaḥ yayau nṛpājñayā tatra śāsanaṁ bhūmipasya hi

राजा के भाई वीरसिंह, समस्त शस्त्रास्त्रों में निपुण, राजाज्ञा से, भूपति के आदेशानुसार वहाँ गए।

श्लोक 39 (padma.5.40.39)

जामेयस्तस्य राज्ञोऽपि बलमित्र इति स्मृतः । सन्नद्धः कवची खड्गी जगाम नृपमंदिरम्

jāmeyastasya rājño'pi balamitra iti smṛtaḥ sannaddhaḥ kavacī khaḍgī jagāma nṛpamaṁdiram

उस राजा के भांजे, जो बलमित्र के नाम से विख्यात थे, सन्नद्ध होकर, कवच और खड्ग धारण किए राजभवन को गए।

श्लोक 40 (padma.5.40.40)

सेनानी रिपुवारोऽपि सेनां तां चतुरंगिणीम् । सज्जां विधाय भूपाय न्यवेदयदथो महान्

senānī ripuvāro'pi senāṁ tāṁ caturaṁgiṇīm sajjāṁ vidhāya bhūpāya nyavedayadatho mahān

सेनापति रिपुवार ने भी उस चतुरंगिणी सेना को सन्नद्ध करके, उस महान् वीर ने राजा को उसकी सूचना दी।

श्लोक 41 (padma.5.40.41)

अथ राजा वीरमणिः सर्वशस्त्रास्त्रपूरितम् । मणिसृष्टोच्चचक्रोच्चमारोहत्स्यंदनोत्तमम्

atha rājā vīramaṇiḥ sarvaśastrāstrapūritam maṇisṛṣṭoccacakroccamārohatsyaṁdanottamam

तब राजा वीरमणि समस्त शस्त्रास्त्रों से भरे, मणिजड़ित ऊँचे पहियों वाले उस उत्तम रथ पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 42 (padma.5.40.42)

ततो वीरार्णवे शंखनिनादश्च समंततः । श्रूयते कातरान्वीरान्प्रेरयन्निव संगरे

tato vīrārṇave śaṁkhaninādaśca samaṁtataḥ śrūyate kātarānvīrānprerayanniva saṁgare

तब उस वीरों के सागर में चारों ओर शंख-ध्वनि सुनाई पड़ने लगी, मानो कातर वीरों को भी संग्राम में प्रेरित करती हुई।

श्लोक 43 (padma.5.40.43)

भेर्यः समंततो जघ्नुः शुभवादकवादिताः । अनीकान्यत्र तस्यासन्संग्रामाय प्रतस्थुषः

bheryaḥ samaṁtato jaghnuḥ śubhavādakavāditāḥ anīkānyatra tasyāsansaṁgrāmāya pratasthuṣaḥ

चारों ओर कुशल वादकों द्वारा बजाई गई भेरियाँ गूँज उठीं; वहाँ उनकी सेना की टुकड़ियाँ संग्राम हेतु प्रस्थान करने लगीं।

श्लोक 44 (padma.5.40.44)

सर्वे कृतस्वस्त्ययनाः सर्वाभरणभूषिताः । सर्वशस्त्रास्त्रसंपूर्णा ययुः समरमण्डलम्

sarve kṛtasvastyayanāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ sarvaśastrāstrasaṁpūrṇā yayuḥ samaramaṇḍalam

सभी स्वस्तिवाचन कराकर, समस्त आभूषणों से भूषित, समस्त शस्त्रास्त्रों से परिपूर्ण होकर समरभूमि की ओर चल पड़े।

श्लोक 45 (padma.5.40.45)

भेरीशंखनिनादेन पूरिताश्च नगा गुहाः । आकारितुं गतः किं नु तद्रवः स्वर्गसंस्थितान्

bherīśaṁkhaninādena pūritāśca nagā guhāḥ ākārituṁ gataḥ kiṁ nu tadravaḥ svargasaṁsthitān

भेरी-शंख की ध्वनि से पर्वत और गुफाएँ भर गईं — क्या उस गर्जन ने स्वर्गवासियों को भी बुलाने का प्रयास किया?

श्लोक 46 (padma.5.40.46)

तस्मिन्कोलाहले वृत्ते राजा वीरमणिर्महान् । रणोत्साहेन संयुक्तो ययौ प्रधनमंडलम्

tasminkolāhale vṛtte rājā vīramaṇirmahān raṇotsāhena saṁyukto yayau pradhanamaṁḍalam

उस महाकोलाहल के होने पर राजा वीरमणि रणोत्साह से युक्त होकर युद्धभूमि की ओर चल पड़े।

श्लोक 47 (padma.5.40.47)

आगत्य संस्थितस्तावद्रथपत्तिसमाकुलम् । समुद्र इव तत्स्थानात्प्लावितुं पुरुषानयात्

āgatya saṁsthitastāvadrathapattisamākulam samudra iva tatsthānātplāvituṁ puruṣānayāt

वहाँ आकर वे उस स्थान पर खड़े हुए, जो रथों और पैदल सैनिकों से इस प्रकार भरा था मानो वह स्थान समुद्र के समान पुरुषों से आप्लावित हो उठा हो।

श्लोक 48 (padma.5.40.48)

तदागतं बलं दृष्ट्वा रथिभिः शस्त्रकोविदैः । कोलाहलीकृतं सर्वमुवाच सुमतिं नृपः

tadāgataṁ balaṁ dṛṣṭvā rathibhiḥ śastrakovidaiḥ kolāhalīkṛtaṁ sarvamuvāca sumatiṁ nṛpaḥ

शस्त्रकुशल रथियों से समस्त वातावरण को कोलाहलपूर्ण बना देने वाली उस आई हुई सेना को देखकर राजा ने सुमति से कहा।

श्लोक 49 (padma.5.40.49)

शत्रुघ्न उवाच। समागतो वीरमणिर्मम वाजिधरो बली । योद्धुं मां महता भूयः सैन्येन चतुरंगिणा

śatrughna uvāca samāgato vīramaṇirmama vājidharo balī yoddhuṁ māṁ mahatā bhūyaḥ sainyena caturaṁginā

शत्रुघ्न ने कहा — "मेरे अश्व को रखने वाला बलवान वीरमणि पुनः महान् चतुरंगिणी सेना सहित मुझसे युद्ध करने आ गया है।

श्लोक 50 (padma.5.40.50)

कथं युद्धं प्रकर्तव्यं के योत्स्यंति बलोत्कटाः । तान्सर्वान्दिश मे वीरान्यथा स्याज्जय ईप्सितः

kathaṁ yuddhaṁ prakartavyaṁ ke yotsyaṁti balotkaṭāḥ tānsarvāndiśa me vīrānyathā syājjaya īpsitaḥ

यह युद्ध कैसे किया जाए? हमारे बलवान वीरों में से कौन युद्ध करेगा? मुझे वे सभी वीर बताओ, जिससे अभीष्ट विजय प्राप्त हो सके।"

श्लोक 51 (padma.5.40.51)

सुमतिरुवाच। स्वामिन्नसौ महाराजो महासैन्यपरीवृतः । समागतः स युद्धार्थं शिवभक्तिसमन्वितः

sumatiruvāca svāminnasau mahārājo mahāsainyaparīvṛtaḥ samāgataḥ sa yuddhārthaṁ śivabhaktisamanvitaḥ

सुमति ने कहा — "हे स्वामी! शिव-भक्ति से युक्त यह महाराज महासेना से घिरे होकर युद्ध हेतु आए हैं।

श्लोक 52 (padma.5.40.52)

सांप्रतं युद्ध्यतां वीरः पुष्कलः परमास्त्रवित् । अन्येपि नीलरत्नाद्या योद्धारो युद्धकोविदाः

sāṁprataṁ yuddhyatāṁ vīraḥ puṣkalaḥ paramāstravit anyepi nīlaratnādyā yoddhāro yuddhakovidāḥ

अब वीर पुष्कल, जो परमास्त्रवेत्ता हैं, युद्ध करें; तथा नीलरत्न आदि अन्य युद्धकुशल योद्धा भी युद्ध करें।

श्लोक 53 (padma.5.40.53)

शिवेन सह योद्धव्यं राज्ञा वा भवतानघ । द्वंद्वयुद्धेन जेतव्यो महाबलपराक्रमः

śivena saha yoddhavyaṁ rājñā vā bhavatānagha dvaṁdvayuddhena jetavyo mahābalaparākramaḥ

किंतु शिव के साथ अथवा स्वयं राजा के साथ युद्ध तो हे निष्पाप! आप ही करें; उस महाबल-पराक्रमी को द्वंद्व-युद्ध से ही जीतना होगा।

श्लोक 54 (padma.5.40.54)

अनेन विधिना राजञ्जयस्तेऽत्र भविष्यति । पश्चाद्यद्रोचते स्वामिंस्तत्कुरुष्व महामते

anena vidhinā rājañjayaste'tra bhaviṣyati paścādyadrocate svāmiṁstatkuruṣva mahāmate

इस विधि से, हे राजन्! यहाँ आपकी विजय होगी; इसके पश्चात्, हे स्वामी! हे महामते! जो आपको उचित लगे, वह कीजिए।"

श्लोक 55 (padma.5.40.55)

शेष उवाच। इति वाक्यं समाकर्ण्य शत्रुघ्नः परवीरहा । सुभटानादिदेशाथ युद्धाय कृतनिश्चयः

śeṣa uvāca iti vākyaṁ samākarṇya śatrughnaḥ paravīrahā subhaṭānādideśātha yuddhāya kṛtaniścayaḥ

शेष जी ने कहा — यह वचन सुनकर शत्रुशूरों के संहारक शत्रुघ्न ने युद्ध हेतु निश्चय करके अपने वीर योद्धाओं को आदेश दिया।

श्लोक 56 (padma.5.40.56)

सर्वैः ससैन्यैर्युद्धार्थं राजभिः शस्त्रकोविदैः । यथा स्यान्मे जयः क्षिप्रं यतितव्यं तथा पुनः

sarvaiḥ sasainyairyuddhārthaṁ rājabhiḥ śastrakovidaiḥ yathā syānme jayaḥ kṣipraṁ yatitavyaṁ tathā punaḥ

"आप सभी सेनाओं सहित, शस्त्रकुशल राजाओ! युद्ध हेतु इस प्रकार प्रयत्न करें, जिससे मेरी विजय शीघ्र हो सके।"

श्लोक 57 (padma.5.40.57)

जयार्थं राघवस्यैव श्रुत्वा ते रणकोविदाः । महोत्साहेन संयुक्ता ययुर्योद्धुं तु सैनिकैः

jayārthaṁ rāghavasyaiva śrutvā te raṇakovidāḥ mahotsāhena saṁyuktā yayuryoddhuṁ tu sainikaiḥ

यह सुनकर वे युद्धकुशल वीर, महोत्साह से युक्त होकर, राघव की ही विजय हेतु अपने सैनिकों सहित युद्ध करने चल पड़े।

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