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अवन्ती खण्ड · अध्याय 273

इंद्र तीर्थ की महिमा

अध्याय 272अध्याय-सूचीअध्याय 274

श्लोक 1 (skanda.5.273.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्। इन्द्रतीर्थेतिविख्यातं नर्मदादक्षिणे तटे।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra tīrthaṁ paramaśobhanam| indratīrthetivikhyātaṁ narmadādakṣiṇe taṭe||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात परम सुंदर तीर्थ में जाना चाहिए, जो नर्मदा के दक्षिणी तट पर इंद्रतीर्थ नाम से विख्यात है।

श्लोक 2 (skanda.5.273.2)

युधिष्ठिर उवाच। नर्मदादक्षिणे कूले इन्द्रतीर्थं कथं भवेत्। श्रोतुमिच्छामि विप्रेन्द्र ह्यादिमध्यान्तविस्तरैः।

yudhiṣṭhira uvāca| narmadādakṣiṇe kūle indratīrthaṁ kathaṁ bhavet| śrotumicchāmi viprendra hyādimadhyāntavistaraiḥ||

युधिष्ठिर बोले - नर्मदा के दक्षिणी तट पर इंद्रतीर्थ कैसे हुआ? हे विप्रेन्द्र! मैं इसे आदि, मध्य और अंत के विस्तार सहित सुनना चाहता हूं।

श्लोक 3 (skanda.5.273.3)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं धर्मपुत्रस्य धीमतः। कथयामास तद्वत्तमितिहासं पुरातनम्।

etacchrutvā tu vacanaṁ dharmaputrasya dhīmataḥ| kathayāmāsa tadvattamitihāsaṁ purātanam||

धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) की इस बुद्धिमत्तापूर्ण वाणी को सुनकर उन्होंने वह संपूर्ण प्राचीन इतिहास कहना आरंभ किया।

श्लोक 4 (skanda.5.273.4)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। विश्वासयित्वा सुचिरं धर्मशत्रुं महाबलम्। वृत्रं जित्वाथ हत्वा तु गच्छमानं शचीपतिम्।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| viśvāsayitvā suciraṁ dharmaśatruṁ mahābalam| vṛtraṁ jitvātha hatvā tu gacchamānaṁ śacīpatim||

श्री मार्कण्डेय बोले - महाबली धर्मशत्रु वृत्र को दीर्घकाल तक विश्वास में लेकर, उसे जीतकर तथा मारकर, शचीपति इंद्र जाते हुए -

श्लोक 5 (skanda.5.273.5)

निष्क्राममाणं मार्गेण ब्रह्महत्या दुरासदा। अहोरात्रमविश्रान्ता जगाम भुवनत्रयम्।

niṣkrāmamāṇaṁ mārgeṇa brahmahatyā durāsadā| ahorātramaviśrāntā jagāma bhuvanatrayam||

-मार्ग से निकलते हुए उनके पीछे दुर्निवार ब्रह्महत्या, अहोरात्र बिना विश्राम किए, तीनों भुवनों में पीछा करती रही।

श्लोक 6 (skanda.5.273.6)

यतोयतो ब्रह्महणं याति यानेन शोभनम्। दिशो भागं सुरैः सार्द्धं ततो हत्या न मुञ्चति।

yatoyato brahmahaṇaṁ yāti yānena śobhanam| diśo bhāgaṁ suraiḥ sārddhaṁ tato hatyā na muñcati||

ब्रह्महंता जहां-जहां अपने सुंदर विमान से देवताओं सहित दिशा के किसी भाग में जाता, वहां से भी वह हत्या (पाप) उसे नहीं छोड़ती।

श्लोक 7 (skanda.5.273.7)

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वगनागमः। पातकानां गतिर्दृष्टा न तु विश्वासघातिनाम्।

brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaganāgamaḥ| pātakānāṁ gatirdṛṣṭā na tu viśvāsaghātinām||

ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुपत्नी-गमन - इन पातकियों के लिए भी प्रायश्चित्त का मार्ग देखा गया है, परंतु विश्वासघातियों के लिए नहीं।

श्लोक 8 (skanda.5.273.8)

पापकर्ममुखं दृष्ट्वा स्नानदानैर्विशुध्यति। नारी वा पुरुषो वापि नैव विश्वासघातिनः।

pāpakarmamukhaṁ dṛṣṭvā snānadānairviśudhyati| nārī vā puruṣo vāpi naiva viśvāsaghātinaḥ||

पापकर्म के मुख को देखकर स्त्री हो अथवा पुरुष, स्नान और दान से शुद्ध हो जाता है, परंतु विश्वासघाती कभी नहीं।

श्लोक 9 (skanda.5.273.9)

एवमादीनि चान्यानि श्रुत्वा वाक्यानि देवराट्। वचनं तद्विधैरुक्तं विषादमगमत्परम्।

evamādīni cānyāni śrutvā vākyāni devarāṭ| vacanaṁ tadvidhairuktaṁ viṣādamagamatparam||

इस प्रकार के अन्य वचनों को सुनकर देवराज इंद्र उन मुनियों द्वारा कहे गए इस कथन से अत्यंत विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 10 (skanda.5.273.10)

त्यक्त्वा राज्यं सुरैः सार्धं जगाम तप उत्तमम्। पुत्रदारगृहं राज्यं वसूनि विविधानि च।

tyaktvā rājyaṁ suraiḥ sārdhaṁ jagāma tapa uttamam| putradāragṛhaṁ rājyaṁ vasūni vividhāni ca||

राज्य को त्यागकर, देवताओं सहित वे परम तप के लिए चले गए - पुत्र, पत्नी, घर, राज्य तथा विविध धन-संपत्ति को त्यागकर।

श्लोक 11 (skanda.5.273.11)

फलान्येतानि धर्मस्य शोभयन्ति जनेश्वरम्। फलं धर्मस्य भुञ्जेति सुहृत्स्वजनबान्धवाः।

phalānyetāni dharmasya śobhayanti janeśvaram| phalaṁ dharmasya bhuñjeti suhṛtsvajanabāndhavāḥ||

ये सभी धर्म के फल राजा को शोभा देते हैं; मित्र, स्वजन और बंधु कहते हैं - "धर्म के फल का उपभोग करो" -

श्लोक 12 (skanda.5.273.12)

पश्यतां सर्वमेतेषां पापमेकेन भुज्यते। परं हि सुखमुत्सृज्य कर्शयन्वै कलेवरम्।

paśyatāṁ sarvameteṣāṁ pāpamekena bhujyate| paraṁ hi sukhamutsṛjya karśayanvai kalevaram||

-किंतु ये सब देखते ही रहते हैं, जबकि पाप का भोग अकेला ही करना पड़ता है। परम सुख को त्यागकर उन्होंने अपने शरीर को क्षीण कर लिया।

श्लोक 13 (skanda.5.273.13)

देवराजो जगामासौ तीर्थान्यायतनानि च। गङ्गातीर्थेषु सर्वेषु यामुनेषु तथैव च।

devarājo jagāmāsau tīrthānyāyatanāni ca| gaṅgātīrtheṣu sarveṣu yāmuneṣu tathaiva ca||

देवराज इंद्र समस्त तीर्थों और पवित्र स्थानों में गए - गंगा के समस्त तीर्थों में, तथा यमुना के तीर्थों में भी -

श्लोक 14 (skanda.5.273.14)

सारस्वतेषु सर्वेषु सामुद्रेषु पृथक्पृथक्। नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च।

sārasvateṣu sarveṣu sāmudreṣu pṛthakpṛthak| nadīṣu devakhāteṣu taḍāgeṣu saraḥsu ca||

-सरस्वती के समस्त तीर्थों में, तथा पृथक-पृथक समुद्र-तटों में, नदियों, देवखातों, तालाबों तथा सरोवरों में -

श्लोक 15 (skanda.5.273.15)

पापं न मुञ्चते सर्वे पश्चाद्देवसमागमे। रेवाप्रभवतीर्थेषु कूलयोरुभयोरपि।

pāpaṁ na muñcate sarve paścāddevasamāgame| revāprabhavatīrtheṣu kūlayorubhayorapi||

-वहां भी पाप ने उन्हें नहीं छोड़ा। तत्पश्चात देवताओं से मिलकर, रेवा से उत्पन्न तीर्थों में, दोनों तटों पर -

श्लोक 16 (skanda.5.273.16)

पूजयन्वै महादेवं स्कन्दतीर्थं समासदत्। तव स्थित्वोपवासैश्च कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः।

pūjayanvai mahādevaṁ skandatīrthaṁ samāsadat| tava sthitvopavāsaiśca kṛcchracāndrāyaṇādibhiḥ||

-महादेव की पूजा करते हुए वे स्कंदतीर्थ पहुंचे; वहां उपवास तथा कृच्छ्र-चांद्रायण आदि व्रतों के साथ रहते हुए -

श्लोक 17 (skanda.5.273.17)

कर्शयन्वै स्वकं देहं न लेभे शर्म वै क्वचित्। ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो वर्षासु स्थण्डिलेशयः।

karśayanvai svakaṁ dehaṁ na lebhe śarma vai kvacit| grīṣme pañcāgnimadhyastho varṣāsu sthaṇḍileśayaḥ||

-अपने शरीर को क्षीण करते हुए भी उन्हें कहीं शांति नहीं मिली। ग्रीष्म में पंचाग्नि के मध्य खड़े होकर, वर्षा में भूमि पर शयन करते हुए -

श्लोक 18 (skanda.5.273.18)

आर्द्रवासास्तु हेमन्ते चचार विपुलं तपः। एवं तु तपतस्तस्य इन्द्रस्य विदितात्मनः।

ārdravāsāstu hemante cacāra vipulaṁ tapaḥ| evaṁ tu tapatastasya indrasya viditātmanaḥ||

-तथा हेमंत में भीगे वस्त्र पहनकर उन्होंने विपुल तप किया। इस प्रकार तप करते हुए उस विदितात्मा इंद्र के -

श्लोक 19 (skanda.5.273.19)

वत्सराणां सहस्राणि गतानि दश भारत। ततस्त्वेकादशे प्राप्ते वर्षे तु नृपसत्तम।

vatsarāṇāṁ sahasrāṇi gatāni daśa bhārata| tatastvekādaśe prāpte varṣe tu nṛpasattama||

-हे भारत! दस सहस्र वर्ष बीत गए। तत्पश्चात हे नृपसत्तम! जब ग्यारहवां वर्ष आया -

श्लोक 20 (skanda.5.273.20)

सहसा भगवान्देवस्तु तुतोष परमेश्वरः। तथा ब्रह्मर्षयः सिद्धा ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः।

sahasā bhagavāndevastu tutoṣa parameśvaraḥ| tathā brahmarṣayaḥ siddhā brahmaviṣṇupurogamāḥ||

-तब सहसा भगवान परमेश्वर प्रसन्न हुए; तथा ब्रह्मा और विष्णु के नेतृत्व में ब्रह्मर्षि और सिद्धगण भी -

श्लोक 21 (skanda.5.273.21)

तत्राजग्मुः सुराः सर्वे यत्र देवः शतक्रतुः। दृष्ट्वा समागतान् देवानृषींश्चैव महामतिः।

tatrājagmuḥ surāḥ sarve yatra devaḥ śatakratuḥ| dṛṣṭvā samāgatān devānṛṣīṁścaiva mahāmatiḥ||

-वहां आए जहां शतक्रतु इंद्र थे। देवताओं और ऋषियों को एकत्रित आया देख वह महामति -

श्लोक 22 (skanda.5.273.22)

उवाच प्रणतो भूत्वा सर्वदेवपुरोहितः। विदितं सर्वमेतेषां यथा वृत्रवधः कृतः।

uvāca praṇato bhūtvā sarvadevapurohitaḥ| viditaṁ sarvameteṣāṁ yathā vṛtravadhaḥ kṛtaḥ||

-प्रणाम करते हुए बोले, वे सर्वदेव-पुरोहित (बृहस्पति) - इन सबको यह विदित है कि वृत्र-वध किस प्रकार किया गया -

श्लोक 23 (skanda.5.273.23)

युष्माकं चाज्ञया पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। तथाप्येवं ब्रह्महणं मत्वा पापस्य कारिणम्।

yuṣmākaṁ cājñayā pūrvaṁ brahmaviṣṇumaheśvarāḥ| tathāpyevaṁ brahmahaṇaṁ matvā pāpasya kāriṇam||

-तथा हे ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर! पूर्वकाल में आप ही की आज्ञा से यह हुआ था। फिर भी इसे ब्रह्महत्यारा तथा पापकर्ता मानकर -

श्लोक 24 (skanda.5.273.24)

भ्रमन्तं सर्वतीर्थेषु ब्रह्महत्या न मुञ्चति। न नन्दति जगत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।

bhramantaṁ sarvatīrtheṣu brahmahatyā na muñcati| na nandati jagatsarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram||

-समस्त तीर्थों में भ्रमण करते हुए भी ब्रह्महत्या उन्हें नहीं छोड़ रही। चराचर सहित संपूर्ण त्रैलोक्य आनंदित नहीं हो पा रहा है।

श्लोक 25 (skanda.5.273.25)

यथा विहीनचन्द्रार्कं तथा राज्यमनायकम्। तस्मात्सर्वे सुरश्रेष्ठा विज्ञाप्यं मम सम्प्रति।

yathā vihīnacandrārkaṁ tathā rājyamanāyakam| tasmātsarve suraśreṣṭhā vijñāpyaṁ mama samprati||

-जैसे चंद्र-सूर्य के बिना आकाश शोभाहीन है, वैसे ही राज्य नायकविहीन है। इसलिए हे सुरश्रेष्ठो! अब मैं आप सबसे यह निवेदन करना चाहता हूं -

श्लोक 26 (skanda.5.273.26)

कुर्वन्तु शक्रं निर्दोषं तथा सर्वे महर्षयः। बृहस्पतिमुखोद्गीर्णं श्रुत्वा तद्वचनं शुभम्।

kurvantu śakraṁ nirdoṣaṁ tathā sarve maharṣayaḥ| bṛhaspatimukhodgīrṇaṁ śrutvā tadvacanaṁ śubham||

-आप सभी समस्त महर्षियों सहित इंद्र को निर्दोष कर दें। बृहस्पति के मुख से निकले इस शुभ वचन को सुनकर -

श्लोक 27 (skanda.5.273.27)

ततः प्रोवाच भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः। एतत्पापं महाघोरं ब्रह्महत्यासमुद्भवम्।

tataḥ provāca bhagavānbrahmā lokapitāmahaḥ| etatpāpaṁ mahāghoraṁ brahmahatyāsamudbhavam||

-तब भगवान लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा - यह अत्यंत घोर पाप, जो ब्रह्महत्या से उत्पन्न हुआ है -

श्लोक 28 (skanda.5.273.28)

दैवतेभ्योऽथ भूतेभ्यश्चतुर्भागं क्षिपाम्यहम्। एवं मुक्त्वा क्षिपच्चैनो जलोपरि महामतिः।

daivatebhyo'tha bhūtebhyaścaturbhāgaṁ kṣipāmyaham| evaṁ muktvā kṣipaccaino jalopari mahāmatiḥ||

-उसका एक चतुर्थांश मैं देवताओं और भूतों पर डालता हूं। इस प्रकार पाप का विभाजन कर उस महामति ने उसे डाला -

श्लोक 29 (skanda.5.273.29)

अवगाह्य ततः पेया आपो वै नान्यथा बुधैः। धरायामक्षिपद्भागं द्वितीयं पद्मसंभवः।

avagāhya tataḥ peyā āpo vai nānyathā budhaiḥ| dharāyāmakṣipadbhāgaṁ dvitīyaṁ padmasaṁbhavaḥ||

-जल के ऊपर; इसलिए बुद्धिमानों को जल में अवगाहन किए बिना उसे पीना नहीं चाहिए। पद्मसंभव (ब्रह्मा) ने दूसरा भाग पृथ्वी पर डाला -

श्लोक 30 (skanda.5.273.30)

अभक्ष्या तेन संजाता सदाकालं वसुंधरा। तदार्धमर्द्धं नारीणां द्वितीयेऽह्नि युधिष्ठिर।

abhakṣyā tena saṁjātā sadākālaṁ vasuṁdharā| tadārdhamarddhaṁ nārīṇāṁ dvitīye'hni yudhiṣṭhira||

-उससे पृथ्वी सदा के लिए कहीं-कहीं अभक्ष्य (अनुपजाऊ) हो गई। हे युधिष्ठिर! तत्पश्चात उसका आधा भाग स्त्रियों पर, दूसरे दिन -

श्लोक 31 (skanda.5.273.31)

निक्षिप्य भगवान्देवः पुनरन्यज्जगाद ह। असंग्राह्या त्वसंग्राह्या तेन जाता रजस्वला।

nikṣipya bhagavāndevaḥ punaranyajjagāda ha| asaṁgrāhyā tvasaṁgrāhyā tena jātā rajasvalā||

-भगवान देव ने डाला और पुनः यह वचन कहा - इससे वह असंग्राह्य हो जाएगी, असंग्राह्य हो जाएगी - उसी से वे रजस्वला (मासिक धर्मयुक्त) हुईं -

श्लोक 32 (skanda.5.273.32)

चतुर्दिनानि सा प्राज्ञैः पापस्य महतो महात्। चतुर्थं तु ततो भागं विभज्य परमेश्वरः।

caturdināni sā prājñaiḥ pāpasya mahato mahāt| caturthaṁ tu tato bhāgaṁ vibhajya parameśvaraḥ||

-चार दिनों तक, बुद्धिमानों के अनुसार, उस महापाप के कारण। तत्पश्चात परमेश्वर ने चतुर्थ भाग को विभक्त कर -

श्लोक 33 (skanda.5.273.33)

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यैः शूद्रसेवाकरे द्विजे। ततोऽभिनन्दयामासुः सर्वे देवा महर्षयः।

kṛṣigorakṣyavāṇijyaiḥ śūdrasevākare dvije| tato'bhinandayāmāsuḥ sarve devā maharṣayaḥ||

-कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य में, तथा शूद्र-सेवा करने वाले द्विज में स्थापित किया। तत्पश्चात समस्त देवताओं और महर्षियों ने -

श्लोक 34 (skanda.5.273.34)

देवेन्द्रं वाग्भिरिष्टाभिर्नर्मदाजलसंस्थितम्। वरेण छन्दयामास ततस्तुष्टो महेश्वरः।

devendraṁ vāgbhiriṣṭābhirnarmadājalasaṁsthitam| vareṇa chandayāmāsa tatastuṣṭo maheśvaraḥ||

-नर्मदा के जल में स्थित देवेन्द्र का प्रिय वचनों से अभिनंदन किया। तत्पश्चात प्रसन्न होकर महेश्वर ने उन्हें वर मांगने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 35 (skanda.5.273.35)

वरं दास्यामि देवेश वरं वृणु यथेप्सितम्।

varaṁ dāsyāmi deveśa varaṁ vṛṇu yathepsitam||

हे देवेश! मैं तुम्हें वर दूंगा, जो चाहते हो वर मांगो।

श्लोक 36 (skanda.5.273.36)

इन्द्र उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम। अत्र संस्थापयिष्यामि सदा संनिहितो भव।

indra uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama| atra saṁsthāpayiṣyāmi sadā saṁnihito bhava||

इंद्र बोले - हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं यहां आपकी स्थापना करूंगा; आप सदा यहां संनिहित रहें।

श्लोक 37 (skanda.5.273.37)

एवमस्त्विति चोक्त्वा तं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। जग्मुराकाशमाविश्य स्तूयमाना महर्षिभिः।

evamastviti coktvā taṁ brahmaviṣṇumaheśvarāḥ| jagmurākāśamāviśya stūyamānā maharṣibhiḥ||

"ऐसा ही हो" कहकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, आकाश में प्रविष्ट होकर चले गए।

श्लोक 38 (skanda.5.273.38)

गतेषु देवदेवेषु देवराजः शतक्रतुः। स्थापयित्वा महादेवं जगाम त्रिदशालयम्।

gateṣu devadeveṣu devarājaḥ śatakratuḥ| sthāpayitvā mahādevaṁ jagāma tridaśālayam||

देवदेवों के चले जाने पर शतक्रतु देवेन्द्र ने वहां महादेव को स्थापित कर स्वर्ग को प्रस्थान किया।

श्लोक 39 (skanda.5.273.39)

इन्द्रतीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः। महापातकयुक्तोऽपि मुच्यते सर्वपातकैः।

indratīrthe tu yaḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ| mahāpātakayukto'pi mucyate sarvapātakaiḥ||

जो इंद्रतीर्थ में स्नान कर पितृदेवताओं का तर्पण करता है, वह महापातकयुक्त होते हुए भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.5.273.40)

इन्द्रतीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम्। सोऽश्वमेधस्य यज्ञस्य पुष्कलं फलमश्नुते।

indratīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram| so'śvamedhasya yajñasya puṣkalaṁ phalamaśnute||

जो इंद्रतीर्थ में स्नान कर परमेश्वर की पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का प्रचुर फल प्राप्त करता है।

श्लोक 41 (skanda.5.273.41)

एतत्ते कथितं सर्वं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। श्रुतमात्रेण येनैव मुच्यन्ते पातकैर्नराः।

etatte kathitaṁ sarvaṁ tīrthamāhātmyamuttamam| śrutamātreṇa yenaiva mucyante pātakairnarāḥ||

यह तीर्थ की संपूर्ण उत्तम महिमा तुम्हें बताई गई, जिसे सुनने मात्र से ही मनुष्य पापों से मुक्त हो जाते हैं।

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