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अवन्ती खण्ड · अध्याय 319

सांवौरेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 318अध्याय-सूचीअध्याय 320

श्लोक 1 (skanda.5.319.1)

ततो गच्छेन्महाराज सांवौरं तीर्थमुत्तमम्। यत्र संनिहितो भानुः पूज्यमानः सुरासुरैः॥

tato gacchenmahārāja sāṁvauraṁ tīrthamuttamam| yatra saṁnihito bhānuḥ pūjyamānaḥ surāsuraiḥ||

श्रीमार्कण्डेय बोले - हे महाराज! तत्पश्चात् श्रेष्ठ सांवौर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ सुर-असुरों द्वारा पूजित भगवान् सूर्य साक्षात् विराजमान हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.319.2)

तत्र ये पङ्गुतां प्राप्ताः शीर्णघ्राणनखा नराः। दद्रुमण्डलभिन्नाङ्गा मक्षिकाकृमिसंकुलाः॥

tatra ye paṅgutāṁ prāptāḥ śīrṇaghrāṇanakhā narāḥ| dadrumaṇḍalabhinnāṅgā makṣikākṛmisaṁkulāḥ||

वहाँ जो मनुष्य लंगड़ेपन को प्राप्त हैं, जिनके नाक-नाखून गल गए हैं, दाद के मण्डलों से जिनके अंग विदीर्ण हैं, तथा जो मक्खियों-कीड़ों से भरे हैं,

श्लोक 3 (skanda.5.319.3)

मातापितृभ्यां रहिता भ्रातृभार्याविवर्जिताः। अनाथा विकला व्यङ्गा मग्ना ये दुःखसागरे॥

mātāpitṛbhyāṁ rahitā bhrātṛbhāryāvivarjitāḥ| anāthā vikalā vyaṅgā magnā ye duḥkhasāgare||

जो माता-पिता से रहित, भाई-पत्नी से वंचित, अनाथ, विकलांग, अपाहिज तथा दुःख-सागर में डूबे हैं -

श्लोक 4 (skanda.5.319.4)

तेषां नाथो जगद्योनिर्नर्मदातटमाश्रितः। सांवौरनाथो लोकानामार्तिहा दुःखनाशनः॥

teṣāṁ nātho jagadyonirnarmadātaṭamāśritaḥ| sāṁvauranātho lokānāmārtihā duḥkhanāśanaḥ||

- उनके स्वामी, जगत् के उद्गम, नर्मदा के तट पर स्थित, लोकों के दुःख-नाशक, पीड़ा-हर्ता सांवौरनाथ ही हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.319.5)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा मासमेकं निरन्तरम्। पूजयेद्भास्करं देवं तस्य पुण्यफलं शृणु॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā māsamekaṁ nirantaram| pūjayedbhāskaraṁ devaṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu||

उस तीर्थ में स्नान करके जो निरन्तर एक मास तक भास्कर देव की पूजा करता है, उसका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 6 (skanda.5.319.6)

यत्फलं चोत्तरे पार्थ तथा वै पूर्वसागरे। दक्षिणे पश्चिमे स्नात्वा तत्र तीर्थे तु तत्फलम्॥

yatphalaṁ cottare pārtha tathā vai pūrvasāgare| dakṣiṇe paścime snātvā tatra tīrthe tu tatphalam||

हे पार्थ! उत्तर सागर में, पूर्व सागर में, दक्षिण और पश्चिम सागर में स्नान करने से जो फल मिलता है, वही फल उस तीर्थ में स्नान से मिलता है।

श्लोक 7 (skanda.5.319.7)

कौमारे यौवने पापं वार्द्धके यच्च संचितम्। तत्प्रणश्यति सांवौरे स्नानमात्रान्न संशयः॥

kaumāre yauvane pāpaṁ vārddhake yacca saṁcitam| tatpraṇaśyati sāṁvaure snānamātrānna saṁśayaḥ||

बाल्यावस्था, यौवनावस्था तथा वृद्धावस्था में संचित पाप - वह सांवौर में स्नान मात्र से निःसन्देह नष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.5.319.8)

न व्याधिर्नैव दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्। सप्तजन्मानि राजेन्द्र सांवौरपरिसेवनात्॥

na vyādhirnaiva dāridryaṁ na caiveṣṭaviyojanam| saptajanmāni rājendra sāṁvauraparisevanāt||

हे राजेन्द्र! सांवौर की सेवा करने से सात जन्मों तक न रोग होता है, न दरिद्रता, न ही प्रियजनों से वियोग होता है।

श्लोक 9 (skanda.5.319.9)

सप्तम्यामुपवासेन तद्दिने चाप्युपोषिते। स तत्फलमवाप्नोति तत्र स्नात्वा न संशयः॥

saptamyāmupavāsena taddine cāpyupoṣite| sa tatphalamavāpnoti tatra snātvā na saṁśayaḥ||

सप्तमी को उपवास करके, उसी दिन उपवासपूर्वक वहाँ स्नान करके, वह निःसन्देह उस फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (skanda.5.319.10)

रक्तचन्दनमिश्रेण यदर्घ्येण फलं स्मृतम्। तत्र तीर्थे नृपश्रेष्ठ स्नात्वा तत्फलमाप्नुयात्॥

raktacandanamiśreṇa yadarghyeṇa phalaṁ smṛtam| tatra tīrthe nṛpaśreṣṭha snātvā tatphalamāpnuyāt||

हे नृपश्रेष्ठ! रक्तचन्दनमिश्रित अर्घ्य देने से जो फल कहा गया है, वही फल उस तीर्थ में स्नान करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 11 (skanda.5.319.11)

नर्मदासलिलं रम्यं सर्वपातकनाशनम्। निरीक्षितं विशेषेण सांवौरेण महात्मना॥

narmadāsalilaṁ ramyaṁ sarvapātakanāśanam| nirīkṣitaṁ viśeṣeṇa sāṁvaureṇa mahātmanā||

नर्मदा का रम्य, समस्त पापों का नाशक जल, महात्मा सांवौर द्वारा विशेष रूप से निरीक्षित है।

श्लोक 12 (skanda.5.319.12)

ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम्। स्नात्वा पश्यन्ति देवेशं सांवौरेश्वरमुत्तमम्॥

te dhanyāste mahātmānasteṣāṁ janma sujīvitam| snātvā paśyanti deveśaṁ sāṁvaureśvaramuttamam||

वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म और जीवन सफल है, जो स्नान करके श्रेष्ठ देवेश सांवौरेश्वर का दर्शन करते हैं।

श्लोक 13 (skanda.5.319.13)

सूर्यलोके वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लवम्॥

sūryaloke vasettāvadyāvadābhūtasamplavam||

वे प्रलयकाल तक सूर्यलोक में निवास करते हैं।

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