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अवन्ती खण्ड · अध्याय 357

शिखि तीर्थ की महिमा

अध्याय 356अध्याय-सूचीअध्याय 358

श्लोक 1 (skanda.5.357.1)

मार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं चान्यच्छिखितीर्थमनुत्तमम्। प्रधानं सर्वतीर्थानां पञ्चायतनमुत्तमम्

mārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ cānyacchikhitīrthamanuttamam| pradhānaṁ sarvatīrthānāṁ pañcāyatanamuttamam

मार्कण्डेय ने कहा — उसके ठीक बाद एक और अनुपम शिखितीर्थ है, जो समस्त तीर्थों में प्रधान तथा उत्तम पंचायतन है।

श्लोक 2 (skanda.5.357.2)

तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा शिखार्थं हव्यवाहनः। शिखां प्राप्य शिखी भूत्वा शिखाख्यं स्थापयञ्छिवम्

tatra tīrthe tapastaptvā śikhārthaṁ havyavāhanaḥ| śikhāṁ prāpya śikhī bhūtvā śikhākhyaṁ sthāpayañchivam

उस तीर्थ में अग्निदेव ने शिखा (ज्वाला) प्राप्त करने के लिए तपस्या की, और शिखा प्राप्त कर शिखी बनकर वहाँ शिखाख्य शिव को स्थापित किया।

श्लोक 3 (skanda.5.357.3)

प्रतिपच्छुक्लपक्षे या भवेदाश्वयुजे नृप। तदा तीर्थवरे गत्वा स्नात्वा वै नर्मदाजले

pratipacchuklapakṣe yā bhavedāśvayuje nṛpa| tadā tīrthavare gatvā snātvā vai narmadājale

हे राजन्! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की जो प्रतिपदा होती है, उस दिन उस श्रेष्ठ तीर्थ में जाकर नर्मदा के जल में स्नान करके।

श्लोक 4 (skanda.5.357.4)

देवानृषीन् पित्ॄंश्चान्यांस्तर्पयेत्तिलवारिणा। हिरण्यं ब्राह्मणे दद्यात्संतर्प्य च हुताशनम्

devānṛṣīn pitṝṁścānyāṁstarpayettilavāriṇā| hiraṇyaṁ brāhmaṇe dadyātsaṁtarpya ca hutāśanam

तिल-मिश्रित जल से देवताओं, ऋषियों तथा अन्य पितरों का तर्पण करे, और अग्निदेव का तर्पण करके ब्राह्मण को स्वर्ण का दान दे।

श्लोक 5 (skanda.5.357.5)

गन्धमाल्यैस्तथा धूपैस्ततः सम्पूजयेच्छिवम्। अनेन विधिनाभ्यर्च्य शिखितीर्थे महेश्वरम्

gandhamālyaistathā dhūpaistataḥ sampūjayecchivam| anena vidhinābhyarcya śikhitīrthe maheśvaram

फिर गन्ध, माला और धूप से शिव की पूजा करे। इस विधि से शिखितीर्थ में महेश्वर की पूजा करके।

श्लोक 6 (skanda.5.357.6)

विमानेनार्कवर्णेन ह्यप्सरोगणसंवृतः। गीयमानस्तु गन्धर्वैर्रुद्रलोकं स गच्छति

vimānenārkavarṇena hyapsarogaṇasaṁvṛtaḥ| gīyamānastu gandharvairrudralokaṁ sa gacchati

सूर्य के समान वर्ण वाले विमान द्वारा, अप्सराओं से घिरा हुआ, गन्धर्वों द्वारा गाया जाता हुआ, वह रुद्रलोक को जाता है।

श्लोक 7 (skanda.5.357.7)

शत्रुक्षयमवाप्नोति तेजस्वी जायते भुवि

śatrukṣayamavāpnoti tejasvī jāyate bhuvi

वह शत्रुओं के क्षय को प्राप्त करता है, और पृथ्वी पर तेजस्वी होकर जन्म लेता है।

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