प्रभास खण्ड · अध्याय 156
गरुडेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.156.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि वैनतेयप्रतिष्ठितम्। रत्नेश्वरादुत्तरतो धनुषां त्रितये स्थितम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi vainateyapratiṣṭhitam| ratneśvarāduttarato dhanuṣāṁ tritaye sthitam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर वैनतेय (गरुड़) द्वारा प्रतिष्ठित उस लिंग के पास जाना चाहिए, जो रत्नेश्वर से उत्तर दिशा में तीन धनुष की दूरी पर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.156.2)
वैनतेयश्च देवेशि ज्ञात्वा क्षेत्रं तु वैष्णवम्। लिंगं प्रतिष्ठयामास सर्वपापप्रणाशनम्
vainateyaśca deveśi jñātvā kṣetraṁ tu vaiṣṇavam| liṅgaṁ pratiṣṭhayāmāsa sarvapāpapraṇāśanam
हे देवेशि, वैनतेय ने इस वैष्णव क्षेत्र को जानकर सब पापों को नष्ट करने वाले उस लिंग की प्रतिष्ठा की।
श्लोक 3 (skanda.7.156.3)
यस्तं पूजयते भक्त्या पंचम्यां तु विधानतः। न विषं क्रमते तस्य सप्त जन्मानि सर्पजम्
yastaṁ pūjayate bhaktyā paṁcamyāṁ tu vidhānataḥ| na viṣaṁ kramate tasya sapta janmāni sarpajam
जो भक्तिपूर्वक विधिवत् पंचमी को उसकी पूजा करता है, उसे सात जन्मों तक सर्पजन्य विष बाधा नहीं पहुँचाता।
श्लोक 4 (skanda.7.156.4)
पंचामृतेन संस्नाप्य पूजयित्वा विधानतः। प्राप्नुयात्सकलं पुण्यं मोदते दिवि देववत्
paṁcāmṛtena saṁsnāpya pūjayitvā vidhānataḥ| prāpnuyātsakalaṁ puṇyaṁ modate divi devavat
पंचामृत से स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजा करने पर मनुष्य समस्त पुण्य को प्राप्त करता है और देवताओं के समान स्वर्ग में आनन्दित होता है।