प्रभास खण्ड · अध्याय 176
सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.176.1)
ततो गच्छेन्महादेवि सिद्धेश्वरमिति स्मृतम्। अर्कस्थलात्तथाग्नेय्यां नातिदूरे व्यवस्थितम्
tato gacchenmahādevi siddheśvaramiti smṛtam| arkasthalāttathāgneyyāṁ nātidūre vyavasthitam
इसके पश्चात् हे महादेवि, सिद्धेश्वर नाम से स्मृत लिंग के पास जाना चाहिए, जो अर्कस्थल से आग्नेय दिशा में न अधिक दूर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.176.2)
अष्टादश सहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम्। तस्मिँल्लिंगे तु सिद्धानि सिद्धेश्वरमतः स्मृतम्
aṣṭādaśa sahasrāṇi ṛṣīṇāmūrdhvaretasām| tasmiṁlliṁge tu siddhāni siddheśvaramataḥ smṛtam
अठारह सहस्र ऊर्ध्वरेता ऋषि उस लिंग में सिद्ध हुए, अतः यह सिद्धेश्वर नाम से स्मरण किया जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.176.3)
स्नात्वाऽर्चयेन्नरो भक्त्या सोपवासो जितेन्द्रियः। संपूज्य विधिवद्देवं दद्याद्विप्रेषु दक्षिणाम्। सर्वकामसमृद्धस्तु स याति परमं पदम्
snātvā'rcayennaro bhaktyā sopavāso jitendriyaḥ| saṁpūjya vidhivaddevaṁ dadyādvipreṣu dakṣiṇām| sarvakāmasamṛddhastu sa yāti paramaṁ padam
स्नान कर, उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय होकर, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उसका पूजन करता है, और विधिपूर्वक देव की पूजा कर ब्राह्मणों को दक्षिणा देता है, वह समस्त कामनाओं से समृद्ध होकर परम पद को प्राप्त करता है।