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प्रभास खण्ड · अध्याय 181

क्षेत्रपालेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

श्लोक 1 (skanda.7.181.1)

ततो गच्छेन्महादेवि क्षेत्रपेश्वरमुत्तमम्। सिद्धेश्वरसमीपस्थं पूर्वस्मिन्नातिदूरतः

tato gacchenmahādevi kṣetrapeśvaramuttamam| siddheśvarasamīpasthaṁ pūrvasminnātidūrataḥ

इसके पश्चात् हे महादेवि, उस उत्तम क्षेत्रपेश्वर के पास जाना चाहिए, जो सिद्धेश्वर के समीप, पूर्व दिशा में न अधिक दूर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.181.2)

तं दृष्ट्वा शुक्लपञ्चम्यां न च नागैः स दश्यते

taṁ dṛṣṭvā śuklapañcamyāṁ na ca nāgaiḥ sa daśyate

शुक्ल पक्ष की पंचमी को उसका दर्शन करने से मनुष्य सर्पों द्वारा दंशित नहीं होता।

श्लोक 3 (skanda.7.181.3)

पूजयेत्तं विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। भोजयेद्ब्राह्मणाञ्छक्त्या भक्ष्यभोज्यैरनेकशः

pūjayettaṁ vidhānena gandhapuṣpādibhiḥ kramāt| bhojayedbrāhmaṇāñchaktyā bhakṣyabhojyairanekaśaḥ

विधिपूर्वक क्रमशः गन्ध, पुष्प आदि से उसका पूजन करना चाहिए, और शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को विविध भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से अनेक प्रकार से भोजन कराना चाहिए।

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