प्रभास खण्ड · अध्याय 191
अजीगर्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.191.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि अजीगर्तेश्वरं हरम्। चन्द्रवापीसमीपस्थं कर्ममोटीसमीपतः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi ajīgarteśvaraṁ haram| candravāpīsamīpasthaṁ karmamoṭīsamīpataḥ
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर हर के अजीगर्तेश्वर नामक रूप की ओर जाना चाहिए, जो कर्ममोटी के समीप स्थित चन्द्रवापी के निकट है।
श्लोक 2 (skanda.7.191.2)
तस्यां स्नात्वा महादेवि यस्तल्लिंगं प्रपूजयेत्। स मुक्तः पातकैर्घोरैर्गच्छेच्छिवपदं महत्
tasyāṁ snātvā mahādevi yastalliṅgaṁ prapūjayet| sa muktaḥ pātakairghorairgacchecchivapadaṁ mahat
हे महादेवि, उस चन्द्रवापी में स्नान कर जो उस लिंग का सम्यक् पूजन करता है, वह घोर पापों से मुक्त होकर महान शिवपद को प्राप्त करता है।