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प्रभास खण्ड · अध्याय 358

नारायणतीर्थमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 357अध्याय-सूचीअध्याय 359

श्लोक 1 (skanda.7.358.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तीर्थं नारायणाभिधम्। तस्यैवेशानदिग्भागे वापी शांडिल्यकीर्तिता

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tīrthaṁ nārāyaṇābhidham| tasyaiveśānadigbhāge vāpī śāṁḍilyakīrtitā

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर नारायण नामक तीर्थ में जाना चाहिए। उसी के ईशान दिशा भाग में शांडिल्य नाम से विख्यात एक वापी (बावली) है।

श्लोक 2 (skanda.7.358.2)

स्नात्वा तत्रैव विधिवच्छांडिल्यं यः प्रपूजयेत्। ऋषिपंचम्यां विधिना नारी चैव पतिव्रता। स्पृष्ट्वास्पृष्ट्वा विमुच्येत रजोदोषभयाद्ध्रुवम्

snātvā tatraiva vidhivacchāṁḍilyaṁ yaḥ prapūjayet| ṛṣipaṁcamyāṁ vidhinā nārī caiva pativratā| spṛṣṭvāspṛṣṭvā vimucyeta rajodoṣabhayāddhruvam

वहाँ स्नान कर जो विधिपूर्वक शांडिल्य की पूजा करता है, तथा ऋषिपंचमी के दिन विधिपूर्वक पूजा करने वाली पतिव्रता स्त्री—दोनों ही स्पर्श करें या न करें, रजोदोष के भय से निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं।

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